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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 684 में से

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पृष्ठ 133

१३२ फलदीपिका
लाभ में, लाभेश धन में (१४)* सुखेश पञ्चम में और पञ्चमेश
सुख में (१५) सुखेश सप्तम में और सप्तमेश सुख में (१६) सुखेश
भाग्य में और भाग्येश सुख में (१७) सुखेश दशम में, दशमेश सुख में
(१८) सुखेश लाभ में, लाभेश सुख में (१९) पञ्चमेश सप्तम में, सप्त-
मेश पंचम में (२०) पंचमेश भाग्य में और भाग्येश पंचम में (२१)
पंचमेश दशम में और दशमेश पंचम में (२२) पंचमेश लाभ में तथा
लाभेश पंचम में (२३) सप्तमेश भाग्य में और भाग्येश सप्तम में (२४)
सप्तमेश दशम में और दशमेश सप्तम में (२५) सप्तमेश लाभ में और
लाभेश सप्तम में (२६) भाग्येश राज्य f में और राज्येश भाग्य में (२७)
भाग्येश लाभ में और लाभेश भाग्य में (२८) राज्येश लाभ में और लाभेश
राज्य में ।
ऊपर जो २८ योग बताये गये हैं उन सबको 'महायोग' कहते हैं।
अब इनका फल बताते हैं। जो व्यक्ति महायोग में पैदा होता है उस पर
लक्ष्मी का कृपा कटाक्ष होता है अर्थात् वह धनी होता है। ऐसा जातक
अनेक व्यक्तियों का स्वामी, धनिक, सुन्दर वस्त्र और आभूषण धारण
करने वाला, राजा (या सरकार) से सम्मानित और पुरस्कृत होगा।
उच्च पदवी पर काम करे और उसे राजा से अधिकार मिले। ऐसे व्यक्ति
को धन, पुत्र और सवारी का सुख प्राप्त हो।
अब बाकी ३८ ऐसे योग बताते हैं जो अच्छे नहीं समझे जाते। इन
३८ योगों को दो भागों में बाँटा गया है। इनमें ८ तो खल योग कहलाते
हैं और बाकी के ३० योग, दैन्य योग।

  • चौथे स्थान को सुख स्थान कहते हैं और चौथे घर के स्वामी
    को सुखेश कहते हैं।
    f दशम स्थान को राज्य स्थान कहते हैं और दशमेश को
    राज्येश ।