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माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

भाग 1 (पृष्ठ 1-20)

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  1. □□□□□□□□□ □□□ □□.....................................................................................2
  2. □□□□□□ □□ □□□□.....................................................................................18
  3. □□□□□□□□□ □□ □□□...................................................................................31
  4. □□□□□ □□ □□□□□....................................................................................45
  5. □□□□ □□□□ □□?........................................................................................61
  6. □□□□□□ □□ □□□□□....................................................................................72
  7. □□□□□□□□□ □□ □□□□□□.............................................................................88
  8. □□□□□□ □□ □□□.......................................................................................101
  9. □□□□□ □□ □□□.........................................................................................114
    10........................................................................................□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□
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    11..................................................................................................·□□□□□□□ □□ □□□□□
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    1

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विचारो अगर अपने भीतर करो, तो पाप सब मिट जायं गे, जो समझ लो प्रभु नाम को, तो मुक्ति पद
मिल जाय गा। सब जीवों को सुख-दुख अपने कर्मों से मिलता है। कोई किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता और
न बना सकता।
फिर भी संसार के लोग, जो कर्मों के प्रभाव--का रहस्य नहीं जानते हैं वे? अमुक
मेरा शत्रु है और अमुक मित्र है?
जो हो गया उसको, भूतकाल को, वर्तमान काल विचार से देखना चाहिये।
भूतकाल में, वर्तमान काल में अनेक बार दुख-सुख मिले हैं और मिलते रहेंगे। यह
कर्मों का फल है। पाप-पुण्य का फल मिला।
इस अवसर को पाकर जो कोई शुभ और अशुभ के स्वरूप को समझ लेता है; वह हमेशा
के लिये मुक्त हो जाता है। जो कर्मों के कारण सुख दुख को जान कर सन्तोष धारण करता है? अपने
को कर्त्ता मानकर न राग और द्वेष को बढ़ाता है। पाप-पुण्य सब कर्मों के फल हैं? पाप-पुण्य आत्मा
के नहीं हैं।
आत्मा तो ज्ञाता और दृष्टा है, दृष्टापन से, ज्ञातापन से, आत्मा अपने
को ही देखता हुआ सब जीवों को, आत्मिक सुख का दान दे सकता है।
इसलिये हे भव्यजीवों! इस अवसर को व्यर्थ मत जाने दो। मनुष्य जन्म,
उत्तम कुल, जैनधर्म का संयोग पा कर अगर हम आत्म-कल्याण नहीं
कर सके तो कब करेंगे, जिससे फिर यह नर जन्म, यह सब उत्तम सामग्री फिर मिल सके;
यह अवसर मिला है। इसलिये इस दुर्लभ अवसर को पाकर, आत्महित में लगो,
स्वाध्याय में लगो, तत्वज्ञान में लगो, संयम में लगो, तपस्या में
लगो, सामायिक, ध्यान में लगकर इस नर जन्म को सफल करो। इस दुर्लभ अवसर को पा
कर अगर प्रमाद में ही काल गंवा दोगे तो फिर पछताओगे और रोओगे। नर पर्याय
पाकर भी जो धर्म साधन नहीं कर सकता वह नरक और निगोद में भटकता रहेगा,
तिर्यंचों से भी गया बीता, जो अपने आत्म कल्याण में नहीं लग
सकता। मनुष्य होकर भी जो पाप करता रहेगा नरक में ही जायेगा इसलिये नर जन्म
का सदुपयोग करो और धर्म में लगो!
इस प्रकार से श्री जिन मंदिर में धर्मोपदेश सुनकर सब लोग अपने अपने
घरों को चले गये। सेठ जी वहीं सामायिक, आत्म-ध्यानावस्थित, विचार में
लीन, ध्यान-मग्न, विचार में लीन हो गये, ऐसा ध्यान लगा कि
सब कुछ भूल गये। घर का मोह ममता सब छूट गया, मन में विचार ही रहा
कि संसार स्वार्थमय है। कोई किसी का नहीं, सब अपने स्वार्थ
के साथी हैं। इसलिये इस संसार को छोड़ कर जाना चाहिये, इस संसार से मुक्ति
का उपाय करना चाहिये।
मैं कब मुक्ति लाभ करूं?
मैं कब मुनि बनकर वन में जा कर तपस्या करके...
संसार के व्यवहार, प्रपंचों से अलग रहूं। संसार की तृष्णा मिटाने
का उपाय करूं। संसार में जितने सम्बन्ध हैं उनसे सर्व प्रकार विरक्त होकर अपने
स्वरूप में लीन होऊं। मैं कब ऐसा विचार करता हुआ, अपने को सब बंधनों से छुड़ा सकूंगा।
मैं कब संयमी होकर संयम का पालन कर सकूंगा? कब दिगम्बर दीक्षा लेकर, वन में
रह कर अपने को शुद्ध करूंगा। हे भगवन्, मुझ पर दया करो।
कब ऐसा दिन आयेगा कि जब, मैं गृहस्थी के बन्धनों से मुक्त
होऊं? संसार के विषय भोगों को त्याग कर अपने आत्म स्वरूप का लाभ
प्राप्त कर सकूं, यह विचार करते-करते सेठ जी सो गये?
दूसरे दिन प्रातःकाल उठ कर सेठ जी ने नित्यकर्म से निवृत्त होकर
सामायिक में समय व्यतीत किया, सेठ जी वैराग्य-भावित, अपने को
संसार से सर्वथा विरक्त अनुभव कर रहे थे। ऐसा लग रहा था कि घर,
परिवार, धन-सम्पत्ति सब कुछ जलता हुआ दिखाई दे रहा था। उनका
मन उद्विग्न हो उठा और वे कहने लगे, हे भगवान्! मुझ पर दया करो!
इस बन्धन से कब मुक्त हो सकूंगा?
इस प्रकार विचार करते हुए सेठ जी का चित्त घर से उचट गया।
वह हर समय वैराग्य-भावनाओं में लीन रहने लगे।
आत्मा के विचार में अपना समय व्यतीत करने लगे। संसार के काम-काज में
उनकी वृत्ति नहीं रही। सेठ जी का ऐसा परिवर्तन देख कर सेठानी चिन्तित हुई, और वे
3

कहना उचित होगा कि यह सब कुछ एक ही स्थान पर आवश्यकता से कम समय व्यतीत करके
किया जा सकता है?
नहीं, ऐसा कभी संभव नहीं । जब तक मन और इन्द्रियों तथा इन दोनोंके
मूल को शांत न, कर मन तथा इन्द्रियों द्वारा होनेवाले व्यवहार को समाप्त करके मूल
का ही लय नहीं कर दिया जाता तथा जब तक उस शांत पदमें विश्राम नहीं मिल
जाता! या जैसा उपनिषद् में कहा गया कि शांत आत्मा में पहले वाणी को शांत करो
या वाणी तथा मन को शांत कर विज्ञानमें, लय करो या मिलाओ! तब कहीं यह सब
या ऐसा कार्य समाप्त-समाधान को प्राप्त हो सके गा, तब कहीं सच्चा सुख या
आनन्द प्राप्त होगा, तो क्या ऐसा संभव हो सके?
यह अभ्यासप्रयास सब कुछ तो अभ्यास की सहायता से धीरे धीरे ही हो सके गा
और उचित काल में ही संभव होगा और होगा, ही होगा, पर ऐसा विचार करके मन को
शिथिल न होना है? आत्मसाक्षात्कार या आत्मज्ञान को प्राप्त हो जाना
कोईसाधारण बात नहीं है बल्कि अत्यंत कठिन कार्यहैतथाअत्यंतसाधनाके बलपरहीहोसकता
बात यह सब, अभ्यास या विचार द्वारा धीरे ही धीरे सिद्ध हो तो उचित ही कहलायेगा,
यह उचित कहलायेगा, तो फिर साधनकीआवश्यकता क्यों
सारा संसार अभ्यासकी ही साधना में लगा हुआ दिखाई देता है। चाहे वह ज्ञान
विषयक हो चाहे वह कर्म या कर्म फल फल भोग रूप विषयक साधन क्यों न हो। प्रत्येक
नर या नारीको हर समय यही चाहना बनी रहती हैकि जो कार्य वह कररहा है या करेगा वह सुख-
कारक अवश्यही बन जावे या वह ऐसा कार्य करेजिससे अधिक सेअधिक लाभहो
ताकि वह अधिक से अधिक सुखीहो सके। क्या कभी कोई ऐसा उपाय दिखाई दे रहा है? कभी
ऐसा हो भी रहा है। कभी नहीं और न ही कभी संभव दिखाई देता है। केवल
अभ्यासमात्रसे ही सब काम चल नहीं सकता या अभ्यासके ही भरोसे सब कुछ नहीं हो
सकता सब कुछ-तो सब कुछ सब कुछ नहीं रहता तथा सब कुछ नहीं किया जा सकता
कि हर कोई अपनी ही इच्छानुसार सब कुछ-तो क्या कुछ भी कर सके गा, यह
बात नहीं, पर जो कुछ होगा या सब कुछ होगा, इसके लिए, उचित काल विचार
की तथा सब कुछ-तो सब कुछ काल तथा काल द्वारा ही सब कुछ तो क्या सब
कुछ बन जाने पर अभ्यास या अभ्यास का बल काम करेगा या दे सकेगा!
सो अभ्यासकीआवश्यकता तो हर ही काल में बनी रहनेवाली बात तो सदा बनी
हीरहेगी फिर भी विचार किया जाता हैकि जो कुछ, हो रहा है या होवेगा
उसके हो जानेपर ही अभ्यास होगा, ऐसा सोचना या मानना भी उचित तो नहीं होगा
कि जब सब कुछ हो जावेगा तब सब कुछ, हम करेंगे तथा साधन करेंगे या यह
सोचना कि काल आने पर होगा, सोभी विचार कालके भरोसे ही छोड़ देना है।
सो अभ्यास को भी तो साथ ही साथ में रखना होगा ही या अभ्यास केवल साधन ही
बनकर रहेगा तब ही तो कार्य या अभ्यास फल दे सकेगा तथा काल ही काल सब
कुछ अपने आप करता है या करेगा, यह भी नहीं कहा, जावेगा या कहा जावेगा? सो
दोनों का ही साथ साथ में ही योग, बन रहा है या दोनों का ही योग रहेगा
सो जो अभ्याससहित अपने स्वरूप विचारमेंलगा हुआहै वह सब कुछ अपने
ही हाथ में कर रहा है। सो जो आत्मविचारमेंलगा हुआहै वह सब कुछ अपने
वश में ही समझ रहा है या समझ गया है अभ्यास या अभ्यासकी बात स्वयं
ही सिद्ध हो या समझमें आ रही है? क्या वह कालके भरोसे बैठा रहेगा अथवा काल
अथवा काल काल का नाम ही लेता रहेगा अथवा काल के भरोसे ही सब छोड़
कर वह बैठ जावेगा या बैठ गया है? नहीं वह तो अभ्यासद्वारा सब कुछ करता हुआ ही बैठ
सकता हैतथा काल को भी वश करसकताहै अभ्यास के बलपरहीसबकुछ संभव
किया जा सक ताहै? और जो ऐसा करता रहेगा वही कालके प्रभावसे बच
सकताहै तथा वह ही काल, काल बन कर काम कर सकता तथा काल को वश
में रखकर अभ्यासके बलपर ही सब कुछ कर रहा है। अभ्यास कालकी
चाल चाल चलता है। अभ्यास सब को दबा कर रखता है। अभ्यास ही काल को वश
में कर सकता है। अभ्यास के बलपर ही काल को दबाया जा सकता है। अभ्यास
सब, का ही काम कर सकता! काल सब कुछ नाश करने वालाहोने पर भीअभ्यास
के बल के आगे नतमस्तक हो, काल ही काल को वश कर के सब कुछ नाश कर
रहा
4

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5

महाराज के मन मन्दिर में जो बात थी, उसका केवल आभास पाकर ही मन्दिर गिर पड़ा तो
महाराज इस बात का तो ज्ञान विवशतापूर्वक ही समझ सकेंगेकि जब वह बात, प्रत्यक्ष रूप
में आ गई--तो? फिर उस बात का रूप क्या था जिसे छुपाने का! प्रयास किया गया तथा
जिसके छुपाने मात्र पर यह विनाश आ पड़ा था न केवल एक मन्दिर पर! वरन् मन्दिरों पर! अथवा सारी
लङ्का पर जिस बात के न कहने पर यह सब अनर्थ हो, वह बात अगर खुल जाये तो लङ्का का क्या
रूप होगा
तो क्या बात का भय था यह तो बात का प्रत्यक्ष रूप हुआ जिसने लङ्का के रूप को भस्मीभूत कर
ही दिया पर भय तो बात का था ही न! लङ्का के मन्दिर तो भस्मीभूत हो ही गये! तो
क्या लङ्का के सभी मन्दिर नष्ट हुए, लङ्का का कोई मन्दिर शेष नहीं बचा था जिससे
या तो, लङ्का का भय समाप्त हुआ! या तो भय का निवारण हो गया था! दोनों बातें ही
समाप्त हुईं... ! तो प्रश्न यह था, लङ्का! जो लङ्का का स्वरूप था उसके मन्दिर अथवा
देवालय किस बात के प्रतीक थे तथा उन मन्दिरों का जो, स्वरूप! तो यह लङ्का
जिन मन्दिरों अथवा देवालयों से थी, वह मन्दिर तो महाराज के मन के देवालय रूप
ही प्रतीक मात्र ही तो नहीं थे। लङ्का मन्दिर विहीन होकर भी क्या लङ्का रूप में ही कही जा
रही, अथवा लङ्का के मन का रूप क्या था जो लङ्का केवल लङ्का रूप ही कही जा रही थी।
लङ्का नाम का क्या रूप था लङ्का? लङ्का का क्या नाम लङ्का ही? लङ्का का
विस्तार रूप था या केवल एक लङ्का ही के रूप में यह कही गई? लङ्का के स्वरूप रूप
का क्या रूप था जो लङ्का ही के रूप में माना गया? लङ्का का स्वरूप क्या मात्र
लङ्का ही कही गई रूप में ही माना गया? क्या लङ्का रूप का स्वरूप जो लङ्का
का ही तो स्वरूप था या सब लङ्का ही, रूप का नाम था?
लङ्का स्वरूप के लङ्का रूप में जो बात कही गई उस लङ्का स्वरूप लङ्का रूप
लङ्का में, लङ्का स्वरूप लङ्का रूप लङ्का के रूप का रूप लङ्का का, लङ्का था!
जो लङ्का रूप लङ्का रूप में तो लङ्का लङ्का लङ्का रूप में तो लङ्का रूप ही कही
जायेगी न, तो नामकरण के आधार रूप लङ्का नाम ही? तो लङ्का,
नामकरण के आधार रूप लङ्का का नाम ही? लङ्का नाम ही? लङ्का
नाम रूप ही नाम रूप के लङ्का रूप लङ्का का नाम ही था?
बात केवल लङ्का के स्वरूप की बात नहीं, पर बात तो यह थी कि लङ्का
रूप देवालय, जिस के लिए कहा गया था, कि देवालय के रूप में लङ्का रूप
ही कहा जा सकता था देवालयों के रूप को भी, तो क्या लङ्का के रूप में
देवालय, एक रूप लङ्का रूप में अपने अस्तित्व का दावा करने लगे थे, जिस
के बल पर लङ्का, रूप का लङ्का, रूप का रूप, रूप का देवालय लङ्का रूप
को इस बात का अहसास तो करा ही देता, कि लङ्का का रूप देवालय स्वरूप
रूप लङ्का ही रूप तो नहीं हो गया था लङ्का जिसके कारण लङ्का?
लङ्का रूप लङ्का? हो सकता था, लङ्का लङ्का के स्वरूप के कारण, लङ्का के
लङ्का रूप, लङ्का के रूप में ही लङ्का रूप में जो लङ्का स्वरूप के रूप का
लङ्का स्वरूप, रूप लङ्का रूप का रूप लङ्का
लङ्का का रूप नाम तो देवालय के रूप द्वारा लङ्का रूप ही तो था
जिसके कारण लङ्का रूप, देवालय के स्वरूप लङ्का के रूप का रूप,
एक रूप का नाम ही नाम का रूप-नाम देवालय लङ्का के रूप नाम के ही
रूप रूप लङ्का लङ्का देवालय के स्वरूप लङ्का रूप का रूप तो लङ्का रूप
का ही रूप लङ्का रूप के देवालय रूप, रूप था! लङ्का रूप का रूप
नाम था, जब कि लङ्का नाम ही नाम रूप था, लङ्का देवालय रूप, लङ्का
देवालय रूप, लङ्का लङ्का रूप ही तो था ही लङ्का रूप के लङ्का रूप
लङ्का के लङ्का रूप नाम लङ्का देवालय के नाम-रूप देवालय के
नाम स्वरूप-नाम देवालय के ही नाम के रूप में
लङ्का केवल एक ही रूप तो नहीं लङ्का रूप, लङ्का लङ्का रूप
के रूप में लङ्का रूप के ही रूप में स्वरूप, लङ्का लङ्का के लङ्का रूप
का रूप लङ्का रूप में था, लङ्का लङ्का के लङ्का रूप के लङ्का लङ्का रूप लङ्का
के, जो लङ्का के लङ्का रूप का लङ्का लङ्का रूप के लङ्का रूप में था, लङ्का
लङ्का के लङ्का रूप के रूप लङ्का में, लङ्का लङ्का के लङ्का लङ्का लङ्का लङ्का
रूप, देवालय रूप लङ्का के रूप लङ्का लङ्का लङ्का रूप के लङ्का रूप ही तो लङ्का
लङ्का लङ्का, के रूप के लङ्का लङ्का लङ्का
6

इस बात सम्बन्धी प्रमाण सब वेद और पुराणोंमें मिलते हैं, विशेष कर राम चरित मानस को
देखना जी, जिसमें लिखाएव प्रमाण दिया गया है। प्रमाण यहहै त्रिलोकीनाथ भगवान् को राम रूप
बनाया जी, सब कोई उन चरणों का आराधकहै, ब्रह्मा, विश्वामित्रजी जी,
कश्यपऋषिजी इन सबने जन्म लिया राम को देखने केलिए, कश्यप, वशिष्ठ कहलाए और
उनके कुलगुरु जी, इस प्रकार प्रमाण सब वेद शास्त्र कहैं।
पर देखने की बात यह विचारने की यहहै रामके समान शक्ति तो किसी को प्राप्त नहीं
होसक्ती जी, राम-अवतार प्रभु जी, सो दशरथ के महलों प्रकाश पाया सब सुख सम्पदा पाई
कंचन महल कंचन छत्र कंचन रथ, सब सुख भोगने लायक सुख पाए राम को अभाव था, जो राम-रूप
होकर सुख भोगते भोगना था संसार का सुख। तो जो सुख भोगने लायक सुख सामग्री थी राम
रूप बन कर पाए प्रभु सो त्यागकर जंगल गमन क्यों? जो विचार करे मन, सोचेगा अवश्य,
त्याग से आनन्द प्राप्त हो गया, पर सोचे! राम-रूप धरकर भी! जिसने जंगल जंगल
भ्रमण किया दशरथ नन्दन सो भी सुख विलास छोड़ कर जंगल का दुःख कष्ट उठाने केलिए?
काहे दुख का कष्ट सो स्वयं लिया? किस सुख प्राप्ति वास्ते दशरथ को त्यागा वा कौशल्या?
जनक नन्दिनी? जो स्वयं आनन्द रूप सो दुःख कष्ट का भोक्ता, जिसका जो नाम लेता
सो, भव बन्धनों पार कर जाता सो खुद जंगल मेंकष्ट पाए, इसका कारण यह, विवश होकर
सुख ऐश्वर्य का त्याग कर जंगल का कष्ट ले कर दिखाया कि सुख
ऐश्वर्य भोगने में नहीं जी, सुख त्याग में त्यागने से आनन्द है। किस बात का त्याग
संसार का! विषय वासना त्यागने का! राम-रूप होकर यह दिखाया त्याग कर! जो पर सत्य
त्यागने का काम किया! कि सब सुख विलास सम्बन्धी पर त्याग कर दिया राम नेमों, अपने
मत पर अटल रहा सुख सम्पदा का त्याग करके जंगल जंगल वास कर सत्यकी मर्यादाको पूरा
किया। सब पर प्रेम किया राम नेमों का पालन करते मर्यादाको पूरा करने पर त्याग
दिया सब ऐश्वर्य सुख सम्बन्धी को त्याग कर कष्ट सहन किया! हे जीव! विचार करके देख
त्याग से आनन्द प्राप्त होता वा सांसारिकता भोग पर जो आसक्त रहा सुख भोग
उस आत्माको दुख भोगना पड़ा संसार त्यागने से, सब कष्ट दूर हुए सुख मिला। पर
कशमीर-गद्दी त्याग त्यागी बना, तो सब का सब प्राप्त हो संसारिक सुख क्या
था! जिसके त्याग कर मन-अन्त का सुख प्राप्त होगया, त्याग ही सब सुख का मूलहै, त्याग
ही सब का सार, त्याग ही सब का शिरोमणि!
पर त्याग किस बात का करना त्याग विषय भोग-राग द्वेष छल कपटका जो मन
वासना का घर बना है। इस मन को साफ़ बनाना जो सब पर त्याग से होगा पर सत्य
धर्म निष्ठा से मन निर्मल हो सत्य कर्म का धारण कर संसार को त्यागना ही त्याग का फल
सत्य स्वरूप होगा
त्याग किए पश्चात् मन का जो रूप बन जाता सो सब निष्काम कर्म का रूप होता
पर विचार करना त्यागने से मन का रूप सब विकार त्याग कर प्रभुके चरणकमल रूप ध्यान
का ही धारण स्वरूप धारण कर मन केवल आनन्द स्वरूप रूप बन
स्वरूप भी सत्-चित्-आनन्द हो जाता जब विकार रहित त्याग रूप बना तो
वासना का सम्बन्ध भी सब छूट गया सो सत्-चित्-आनन्द स्वरूप ही हो कर रहा फिर
विचार रूप क्या रहा
पर केवल त्याग स्वरूप ही बन कर सो संसार के कल्याण निमित्त ही सब कर्म
स्वरूप बन जाता है। इस प्रकार से जो जो त्याग के रूप को प्राप्त हो गया उसका
रूप संसार के पर उपकार हेतु निमित्त ही रहता है। ऐसा त्याग केवल रूप बन गया
जो! संसार का त्याग क्या होता? त्याग रूप का स्वरूप क्या? त्याग केवल सो
त्याग का निमित्त ही होता?
सुनो सन्तो, सब त्याग निष्काम रूप! त्याग केवल मन, स्वरूप रूप बन! सब
विषय वास त्यागना रूप! त्याग मन रूप सब त्याग त्याग कर सब त्याग स्वरूप
ही बन गया रूप!
पर त्याग का स्वरूप जो निष्काम स्वरूप, जो रूप बन गया उस रूप से
जो जो कर्म, सो सब त्याग रूप ही त्याग रूप जो जो त्याग निष्काम कर्म सो निष्काम
ही पर उपकार स्वरूप हो जाता सो त्याग रूप का त्याग फल
सब का सार सो ही निष्कामता का स्वरूप त्याग रूप धारण करना है,
निष्काम त्याग के त्याग रूप को निष्काम ही कहा है, त्याग निष्काम कर्म
किस का त्याग? सब वासना का सार है? त्यागी केवल निष्काम स्वरूप
रूप बन, निष्काम त्याग के त्याग रूप त्याग को सब त्याग संसार त्याग
निष्काम ही स्वरूप बन जाता जिस त्याग से सब जग का भला रूप
7

प्यास का विचार छोड़कर वह उठ कर खड़ा होकर भगवान् शंकर का स्मरण करता हुआ वहीं
बैठ विचारने का करने लगा, कि यह तो सो विचारणीय कि हमारे आचार्य इस वन बीच
घर का विचार या किसी आश्रम किंवा गो--शाला आदि को तो पहचान अवश्य ही कर
सकते बिना इस पहिचान के वह इस आश्रम में उपस्थित हो सकते नहीं इस लिये मुझ
को जिस बात विचारणीय या उपहासिक का डर पड़ा था, आचार्य जन का विचार
इसके विपरीत ही था सो मैं व्यर्थ ही डर रहा था, इस लिये भगवान् शंकर सदा ही
कल्याण को देने, विघ्न--बाधा निवारक सो उन्होंने ही आज रक्षा करके मुझ अज्ञानी
अज्ञानता रूप से बचाकर यह जो कि आचार्य महाराज मुझ पर दया या कृपा रूप से
उपदेश दे आधि-व्याधि रूप संकट निवारण से सत्य पथ ज्ञान मार्ग दिखलाया जिस
पर चल कर कल्याण लाभ प्राप्त करूं, यह तो मुझे बड़ा उपकार ही हो गया।
ऐसी ही विचार में वह लगा, थोड़ी ही आवृति में भोजन आदि से तृप्त
तथा वन के मार्ग द्वारा कष्ट पाकर थका हुआ शिष्य निद्रा वश को प्राप्त हो गया।
उधर राजा, जो कि वह वन में गायें चरा रहा था प्रातः ही उठ कर प्रातः कर्म से निवृत्त हो
गाय के मुखों रूप से जो फेन गिर रहा था तथा काष्ठ तृणों द्वारा जो, पसीने से,
श्रम से उत्पन्न हो रहा पसीना उस को हाथ लगा कर साफ करता हुआ
अहो? हमारे जन के तन का कष्ट इन गायों के खाने के पश्चात मन शांत होने
लगा है?
इतने जन के तन का--दुःख इस प्रकार जन का शांत होगा क्या? यह सब
मेरा भ्रम है! सो तो भ्रम ही कहा जावेगा?
हे भगवान्, जिसे पिता ने, या माता ने तथा किसी जन ने, या सब प्रजा
जनों ने इस प्रकार वन रूपी वनवास देकर यहां भेज दिया तथा यहां भी कष्ट ही
हो, ऐसा कष्ट अब और किसी को भोगना पड़ा न, पिता के तन पर तो सुख मात्र
का राज्य ही प्राप्त था।
पिता के तन द्वारा जो, माता के तन विलासिता का राज्य तो
सब राज परिकर ऐश्वर्य भोग रहा है? विधाता ने ऐसी कैसी
यह कर्म-रेखा विधाता ने इस विधि बना दी या माता, या पिता, या
माता, जो कि आज स्वरूप गो--सेवा के रूप में तन को कष्ट हो
प्राप्त हो विधाता यह तो बता, अब तो दया कर जन पर यह दुख रूपी
का कष्ट दूर कर अब हमारे कष्ट निवारण कर, भगवान् के आगे रोता,
भगवान् के आगे नम्र, यह सब विधि क्या है? मेरा किस बात का दोष है,
पिता द्वारा किसका दोष है? मुझे पिता ने त्याग दिया, या प्रजा त्याग दिया
इस बात का ज्ञान करा, या विधाता कृपा करके मुझ पर दया कर दयामय
हो? ऐसी ही जन सोच
रहा तथा उधर शिष्य जहां पर था वहां से उठा, प्रातः काल हो कर
वह संध्या वन्दनादि कर्म से निवृत्त होकर, जल का पान करके तथा
गाय के पावन हो कर दूध से तृप्त होकर, पश्चात्, आगे चलता,
चला गया, आगे जाकर, गाय को चरते देखकर, वह बोला? हे भगवन्
यह तो संसार में सब से अलग ही गाय
चारण करने का नियम हो रहा है, जहां न जन वास या ग्राम का
वास हो, या भगवान् शिव का वास हो, तथा इसके ऊपर एक जन, जो कि एक मात्र
अकेला ही, सब दिन इस प्रकार यहां रहता है, या कोई जन ऐसा भी हो कि
जिस को विधि-विधाता ने त्याग दिया हो तथा या संसार से विरक्त हो
कर इस वन बीच अपना जीवन व्यतीत कर रहा हो तथा इस बात का विचार यह भी
किया जा रहा था कि इस प्रकार विचार किया जाय, तो जो गाय का विचार
यह गाय सब प्रकार से तो उत्तम से ही उत्तम प्रकार का काम करती, इसके ऊपर जो
एक
बालक स्वरूप रूप से दिखाई रहा सो कोई जन का, इसके मुख को
देख कर ही यह ज्ञान होता कि मुख की कांति तो सूर्य रूप में प्रकाशित
तथा मुख की कांति तो पूर्ण चन्द्र के समान, विशाल रूप नेत्र तथा नैनों से
प्रकाशित तेज तथा रूप ऐसा प्रतीत होता कि साक्षात रूपी कामदेव प्रकट होकर
प्रकट होकर सब काम को परास्त कर इस बालक के रूप में समा गया है। क्या
भगवान् की ऐसी लीला है? हे प्रभु परमात्मा, आपकी जो सब कृपा रूप बन कर
8

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9

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The text in the provided image cannot be read or transcribed into Hindi/Devanagari because the document suffered from a font-rendering error (missing font glyphs), causing almost all characters to appear as empty square boxes (tofu symbols □).

Here is the exact visual transcription of the visible symbols, punctuation, and line structure from the page:

□□□ □□? □□□□□ □□□ □□□ □□, □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□,
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12

इस पृष्ठ में फ़ॉन्ट (Font) की समस्या के कारण सभी देवनागरी वर्ण खाली चौकोर बॉक्स (tofu / missing glyph boxes) के रूप में प्रदर्शित हो रहे हैं, जिसके कारण मूल पाठ पढ़ा नहीं जा सकता।

पृष्ठ पर केवल विराम चिह्न और पृष्ठ संख्या दिखाई दे रही है:

  • पृष्ठ संख्या: 13
  • विराम चिह्न: अल्पविराम (,), योजक चिह्न (-), विस्मयादिबोधक चिह्न (!), प्रश्नवाचक चिह्न (?)

समाज कोई एक प्रकार विशेष का स्वरूप नहीं, बल्कि सभी प्रकार विशेषों द्वारा अपने को पूर्ण
पाता जा रहा, समझता जा रहा? सो तो सब कुछ भीतर ही भीतर घटित होकर
वैज्ञानिक विधि से समय आने पर प्रत्यक्ष दीखा करता और तात्कालिक दृष्टि से जो भी
विकट दिखता सो केवल तात्कालिक रूप में ही उपस्थित हुआ करता अथवा नष्ट भी हो जाता
और समाज का जो स्वरूप बना, बनता जा रहा स्वरूप था, बढ़ता जा रहा स्वरूप था,
उन्नत हो रहा स्वरूप बना वैज्ञानिक रूप में बढ़ रहा था, विकृत होने वाले स्वरूप वाले केवल
विकृति देखकर विह्वल होकर
चकरा रहेगे, वास्तविकता से दूर-दूर होकर केवल व्यर्थ का प्रलाप--सा करके,
अनियन्त्रितों की श्रृंखला में पड़ अपने समय विशेष को ही नष्ट कर रहेगे,
केवल दूसरों पर ही दोष न मढ़ समय चक्र को समझने का यत्न करे! इस दृष्टि से सोच
प्रत्येक व्यक्ति को ही ऐसा यत्न कर लेना, सब प्रकार से श्रेष्ठ है!
सो जब भी ऐसा समाज इस दृष्टि को खो बैठ कर ही सब तरह नष्ट हुआ करता
केवल तब ही सब कुछ नष्ट हो कर नए से प्रारम्भ होकर विस्तृत हो जाया करता, समाज
का रूप तो सदा बना रहा, बना हुआ
प्रत्येक ही सम्प्रदाय के मत को इस दृष्टि द्वारा परख, जो भी अच्छाई मिले
समाज रूप में उस को ग्रहण कर, जो भी दोष हो, उस को प्रत्येक प्रकार ही से नष्ट करने
का यत्न कर, हर एक द्वारा प्रत्येक मत को एक ही दृष्टि द्वारा परखने का यत्न किया
जाता और इस प्रकार केवल, मत विशेष-विशेष की ओर ही दृष्टि न रख कर सब कुछ
समझा, देखा जा कर यदि हर प्रकार रूप व भाव का विस्तार ही दिखाई देता प्रत्येक
मत द्वारा अपने स्थान पर सब प्रकार सब ओर से ही सत्यता को सब ओर से ही एक
ओर सम्मुख कर ही सब कुछ बढ़ाया, उस रूप द्वारा जन-मन जागता तो, हर भी
व्यक्ति सब को सब कुछ सही रूप समझ, सब कुछ सहज अपना सकता
मगर, दुर्भाग्य वश, उस समय केवल एक दृष्टि द्वारा सब को नहीं जा परखा गया,
केवल सम्प्रदाय व मत को ही महत्व दिया गया, जो समय विशेष रूप से केवल सत्य था,
उस समय के लिए केवल उपयोगी सिद्ध हुआ आवश्यकतानुसार, केवल उसी सम्प्रदाय विशेष
द्वारा, जो केवल प्रचारित रूप द्वारा फैला दिया गया था, सो केवल व्यापक रूप
रूप में ही केवल विस्तृत रूप होकर ही सत्य सिद्ध समझा जाने लगा था, केवल
प्रचार! जिस का ही रूप विस्तृत होकर बढ़ रहा था, प्रचारक द्वारा, केवल अपने
मत को! जिस कारण ही सब प्रकार समाज का स्वरूप नष्ट सा होकर रह गया
अनगिनत सम्प्रदायों द्वारा केवल यह प्रचार ही अधिक बढ़ जाने से केवल व केवल
सत्य व्यापक का रूप सब प्रकार नष्ट सा होकर केवल अपने प्रचार का ही प्रचार
होकर रह गया था सब प्रकार, तो न तो वह, न वैचारिक ही रहा!
सो व्यापक मत द्वारा रूप बना जो सदा व्याप्त होकर सब को--प्रोत्साहित
करता था, सम्प्रदायों द्वारा वह, सम्प्रदायों द्वारा रूप ही संकुचित होकर रह गया, केवल
प्रचारित रूप ही रह गया, जिसका स्वरूप ही बदल गया
जब जन को, हर एक को अपने स्थान द्वारा ही सबलताओं सहित समर्थ न
कर सब ओर प्रचारक स्वरूप द्वारा ही हर प्रकार केवल अपने सम्प्रदाय विशेष का रूप
व्यापक होकर विस्तृत कराया जाने लगा तब, जो स्वरूप बना व बढ़ा जन का
स्वरूप न होकर, प्रचारक रूप केवल रहा
केवल उसी जन को दो--विचारों--का प्रचार करके फैला दिया तो वह केवल अपने
भावों स्वरूप का प्रचार दो--विचारों का, केवल दो--विचारों का स्वरूप होकर,
दो ही रूपी दायरा बन कर रह, हर एक प्रकार व भावों, रूपों को भूल व भुला!
जो भी रूप अपने मन में सब ओर देख सकता, उस प्रकार के भावों स्वरूपों को
जन मन से सब प्रकार निकाल कर केवल प्रचार का रूप बना कर, हर एक का रूप व
भाव सीमित कर सब प्रकार संकीर्ण बना दिया
केवल दो भागों का दृष्टिकोण फैला सब सम्प्रदायों का रूप ही नष्ट कर
दिया समाज विस्तृत स्वरूप को सब प्रकार सीमित कर जन--मन को ऐसा बना दिया
कि केवल दो प्रकार सोचा जा सके, केवल सोच तक केवल सीमित कर सब ओर का रूप
स्वयं ही नष्ट कर, हर एक दिशा को अवरुद्ध कर जन, हर को केवल दो ही ओर
सोचने योग्य छोड़ कर सब कुछ नष्ट कर... ।
केवल दो ही प्रकार क्यों?
इस का भी रूप तो प्रत्येक सम्प्रदाय--मत द्वारा ही, प्रचार द्वारा ही, हर पर
लादा गया केवल था, जन जन केवल उस ओर ही सोच सके और जन को इस तरह सब ओर,
14

भगवान् एक रस रूप रहा, एक समान नित्य प्रभाव, एक स्वरूप, एक स्वरूप प्रकाश,
सो रहा, तदन्तर यह जो त्रिगुण माया प्रकृत रूप सो जो व्यापी भय व्यापक जो ईश्वर सो
रहा सो, सो जो ईश्वर कहा सो यह जो माया सो, एक स्वरूप विचार रस रहा व्यापी
हो, इस स्वरूप अ--द्वैत विचार को विचार रूप, इसते परे और को व्यापक
रहा जो माया विचार स्वरूप सो, सो सब को त्याग रूप सब हो के व्यापी सो
भगवान्, जहां तहां स्वरूप रूप को त्याग विचार को स्वरूप प्रकाश रूप हो सबई शून्य
हो व्यापि सो प्रकाश हो भगवान् वास हो भया रहा!
सो सब हो के आधार स्वरूप हो के सो शब्द हो कर रूप सब शून्य
आकाश शब्द स्वरूप भया और शब्द स्वरूप आकाश शब्द को व्यापी सो
प्रकाश रूप सब भगवान् रूप भया सो, सो आदि सब को भय जो सब को
प्रकाशक सो, सो जो सब को आधार रूप, तहां शब्द स्वरूप प्रकाश रूप, प्रकाश
स्वरूप शब्द रूप सो हो आधारवान् शब्द रूप सब को आधार हो ईश्वर स्वरूप
हो अ--द्वैत, शब्द रूप भया ब्रह्म शब्द सो सब घट शब्द स्वरूप सो,
सब शब्द रूप शब्द सो शब्द के मध्य से शब्द घट सब शब्द शब्द रूप सो,
शून्य सो, शब्द रूप सो, शब्द घट शब्द सो शब्द के मध्य सब घट को सब घट
प्रकाश व्यापि भया
सो ईश्वर रूप सो अद्वैत सो शब्द रूप, सो सब शब्द को भया; सो सब सो
प्रकाश स्वरूप सो घट शब्द रूप सो अद्वैत सो, सो सब प्रकाश स्वरूप घट
शब्द के मध्य सो शब्द भया, सो जो २ शब्द स्वरूप सब घट शब्द शब्द को शब्द
रूप सब शब्द भया, सो जो घट रूप सो शब्द घट के मध्य सो, सो सब शब्द
अ--द्वैत रूप के मध्य भया, सो सब रूप सो सब शब्द रूप शब्द घट
शब्द के मध्य ब्रह्म स्वरूप को सब घट सो व्यापक, भगवान् रूप,
सो स्वरूप को हो व्यापि, सो प्रकाश सो हो शब्द को अ-द्वैत सो व्यापक
हो अ-द्वैत सो शब्द रूप सब अ-द्वैत भया, सब भगवान् रूप भया सो,
सब घट व्यापि शब्द सब हो के, सो ईश्वर भया
सो सो शब्द ईश्वर को प्रकाशक, भगवान् सब घट सो शब्द का भया
सो सब शब्द को घट रूप सो, घट शब्द को सो, सो रूप भय घट
शब्द का, शब्द सो घट रूप शब्द घट शब्द को घट रूप प्रकाश, सो शब्द से सब
रूप शब्द से प्रकाशवान् सब प्रकृत रूप भया, सो सब शब्द स्वरूप सो
सब को प्रकाश रूप सब घट भया सो सब, ईश्वर रूप सब, ब्रह्म रूप सो सब
शब्द को सो शब्द सो, सब शब्द भया सो भगवान् को शब्द सो सब को सो सब
शब्द रूप सो सब शब्द भया सब घट सो सो, सब को व्यापि सो सब
रूप भगवान् शब्द रूप सो हो ईश्वर को शब्द भगवान् को प्रकाश स्वरूप
हो सब शब्द घट रहा, सो शब्द को सब कहा
सो प्रकाश सो घट रूप सो घट शब्द रूप सब घट को सो सब स्वरूप सो,
ईश्वर स्वरूप सो सब घट रूप प्रकाश स्वरूप को मध्य प्रकाश को मध्य मध्य
के घट को मध्य सब घट सो हो के, मध्य रूप २ रूप! सब घट मध्य सो, सो सब
ईश्वर सो मध्य सब मध्य घट सो सब ईश्वर सब घट को, सो सो ईश्वर सब
के मध्य सो सब घट मध्य सो, मध्य रूप निरालम्बन भया; सो सो ईश्वर सब
घट मध्य सब मध्य सो, मध्य रूप घट रूप सब घट सब प्रकाश भया सो,
प्रकाश स्वरूप सो घट सब घट सो मध्य सो, मध्य रूप सो सब मध्य सब
घट रूप २ रूप सो, मध्य रूप सब घट मध्य सब प्रकाश घट को मध्य भया,
मध्य रूप से सब रूप सब मध्य मध्य मध्य भया सब
सब मध्य प्रकाश सो सब को मध्य रूप ईश्वर सब मध्य घट, सब मध्य
सब के मध्य मध्य भया, मध्य मध्य को प्रकाश सब घट के मध्य सो मध्य मध्य
का सब प्रकाश

15

जीवन एक तपस्या रूप
स्वामी शरणम्
सम्मोहन का रहस्य
नमो भगवते रुद्राय !
हे शर्वदेव, काम-विजेता प्रभु तू, तू सर्वदा सब काल में अपने भक्तों
रूपी मन्द मन्द बहने वाले मारुत के स्पर्श से सुख रूपी प्रवाल वन रूपी तरंग
रूप जल से भरे समुद्रों को शांत करता है, उस शांत रूप तरङ्ग से विहीन तू
ही समस्त के मनोगत भाव को ले--के अपने में लीन कर लेता है। परंतु हे
महेश्वर तू स्वयं जो कि सर्व रूप में सब पदार्थों का जीवन है उसी शांत, हे
सर्वज्ञ तू संसार के सुख रूप या ऐश्वर्य के भोग को अपने समक्ष कुछ भी नहीं
मान कर त्यागता
हुआ मन, रूपी भ्रमर, रूपी सुमन, रूपी वन को, तू स्वयं ही अपने
उस परमात्मा रूपी कमल दल में--लीन किये है, जिसे पद, जिस को पद, संसार
के जन, सब मुनिगण, सब योगी--जन नित्य खोज करते ही रहते हैं वही तू!
जिसका तू आश्रय लेकर सदा ही उसी में लीन हुआ कर! जिस पर सब जगत
की दृष्टि? समस्त रूप दृष्टि प्रकृति का अंश ही बनकर रह गया तब तू ही क्या
रूपता के वश पड़ा रह के लीन हो, जिस दिव्य एकाग्रता में--तू लीन हो उसी
का नाम योग रूप? योग का नाम?
कहो, नाथ! तू, जो कि योग का रहस्य तूने ही संसार रूपी योग में
कहा, जिसे तू ही कर रहा था कि संसार रूपी ही योग है, तब जिसे योग
का रूप कहा जा रहा है तब संसार की योग रूपी तृष्णा रूपी संसार विरह
रूपी सब संसार के स्वरूप का नाश रूपी योग ही कहा गया है, हे प्रभु
रूपी नाम सदा संसार विहीन तो नहीं है, जब तू स्वयं रूप ज्ञान, प्रकाश से
ही रूप का ज्ञान प्रकाश रूपी रूप का ही रूप कहा गया है।
जो संन्यासियों के, या तपस्वियों के इस संसार से परे सब कुछ देख कर
उस पर ही रूप न मान, तू निर्गुण न कह, तू सब कुछ त्याग ही चुका है।
तू सब कुछ त्याग कर ही उस शांत रूप को पा सका है, जिसे संसार
कहा, जिस संसार का, उस संसार वासना से परे ही माना
ही गया था तब यह ज्ञान भी किसे कहा।
तू स्वयं ही ज्ञान रूप हो कर उस दिव्य प्रकाश रूप से कह रहा है,
जिसे सब जन सुन रहे हैं जिस वाणी से तू सब कुछ बोल रहा है संसार
रूप में उस ज्ञान रूपी रस की तृष्णा से, तृष्णा रूपी उस रस रूपी शब्द
से जो सब सुन रहे हैं उस सब से तू तो परे ही नहीं कहा जा, किसी भी
अवस्था का यह रस, जिसे सब सुना है, जिसे सब सुना गया है उस शब्द से
विहीन रस, जिसे संसार रूपी सब जगत के जीवन का रस स्वरूप है, जिसे
कहा है, रूपी जीवन भी
कहा जा कर शांत रूप किया जा रहा, जिसके लिए यह सब किया
गया सब कुछ हो कर भी सब उस शांत रूप में लीन था।
हे ज्ञान दाता तू इस संसार रूप से जो तृष्णा में रस ले रहा, तू तो तू
संसार में रह कर त्यागी कैसा? यह ज्ञान संसार रूपी रस से सब कुछ
भिन्न था जिस में तू उस संन्यास रूपी काम-विजेता का रूप कहा जाता
जिसे संसार से परे ही ज्ञान स्वरूप में तो कह के, शांत स्वरूप बना ही
संन्यास को कहा गया
ज्ञान रूप के परे, जिसे तू केवल एक रूप ही कह संसार रूपी
संन्यासियों, योगियों के शांत रूप, जिसे सब कहते हैं ज्ञान का स्वरूप है
उसी स्वरूप को त्याग रूप कहा है, स्वरूप त्याग ही संन्यासियों स्वरूप
कहा गया तथा उस से परे भी ज्ञान स्वरूप कहा ही गया जिस से तू भिन्न न
रहा
इस सब से शांत रूप ही जब स्वरूप प्रकाश स्वरूप से परे ही ज्ञान
रूप
केवल एकाग्रता का प्रकाश बन कर रह गया, तब संसार रूप या न
रूप या संन्यास रूप का ज्ञान सब का सब ही रह गया, उस समय में, उस
16

यद्यपि यह, परमात्मा का यह प्रिय और प्यारा धाम हर एक उच्च विचार वाले मनुष्य का निज सनातन
देश वा धाम अवश्य होगा जिसको कि मुक्ति अथवा मोक्ष कहते हैं। परन्तु जो मनुष्य इन सब बातों को
सुनी-सुनाई समझ, यथार्थ वा सत्य को सत्य समझ, प्रभु का भजन ध्यान कभी नहीं भूल कर
नित्य निरन्तर करते रहते हैं। उनका निज स्थान भी यही धाम है। तो फिर जो सब जीवों का निज
धाम ठहरा सो सबका, तो फिर यह सब का घर हुआ
सबने मिलकर उस परम पिता परमात्मा के धाम रूपी निज घर को छोड़ कर, इस नश्वर संसार में जहां
का तहां आनन्दित हो रहे, अर्थात् उस नित्य आनन्द स्वरूप प्रभु को भूल कर इस अनित्य वा
नाश स्वरूप इस माया जाल में मोह रूपी मद पी कर मस्त हो कर गाफिल हो रहे। आश्चर्य की बात
देखो मनुष्य सब कोई उस परमपिता परमात्मा को, जो सब का है, सो क्यों नहीं मानते?
तो फिर सब भाई परस्पर एक पिता के ही हुए। परन्तु जो, अब एक पिता होकर वा मानते
हुए परस्पर सब मनुष्य एक-दूसरे को देख कर जलते हैं। इसी तरह बहुत से अपने-अपने मत का घमंड कर
रहे हैं। कोई कहता, हमारा मत श्रेष्ठ है। कोई
कह रहा, हां जो हमारा मत है यही सब मतों से उत्तम है, इस प्रकार से हर कोई अपने मत
की बड़ाई निरर्थक कर रहा है। वह नहीं जानता कि जब परमात्मा एक सबको बनाने वाला सब
का एक ही पिता ठहरा
तो फिर परस्पर सब का भाई परस्पर नाता हुआ ना, फिर जो यह परस्पर का विरोध वा
द्वेष भाव सब जगह फैला दिखाई देता है इसका क्या कारण है? तो यह सब क्या
केवल अज्ञान का कारण नहीं? हां केवल अज्ञान ही!
जो मनुष्य यह जाने, समझे, विचार करके निश्चय कर लेवे कि जब परमपिता एक तो फिर सब का भाई
नाता, तो किसी को किसी से द्वेष वा विरोध करने का कोई कारण ही नहीं रह जाता क्योंकि सब भाई
एक ही माता-पिता की सन्तान हैं। जब सब एक पिता के ही हुए तो फिर, जो कोई
सब मनुष्यों को दुःख देगा सो? पिता को दुःख
ही देगा सो क्या प्रभु को यह बात स्वीकार हो सकती कदापि नहीं। यदि ऐसा होता तो वह
सब जीवों को सुख-शान्ति पहुंचाने का प्रबन्ध करता ही नहीं, जिसके लिए
सूर्य को उत्पन्न किया
जिसके प्रकाश से प्रकाश व जीवन शक्ति पाकर सब संसार के प्राणी चल फिर रहे हैं।
जो सब संसार प्रकाश पाकर के आनन्द को भोग कर प्रभु-स्मरण में लीन हो रहा है। यदि
सूर्य परमात्मा केवल अपने ही लिए प्रकाशित करता तब तो सब संसार में हाहाकार मच जाता,
सब संसार का काम, जो चल रहा है सब रुक जाता। सो प्रभु का प्रेम अपने सब जीवों के
ऊपर समान रूप से है। इसलिए सब जीवों को भी परस्पर प्रेम-भाव रखना चाहिये।
जब पिता का स्वभाव सब अपनी सन्तान के ऊपर समदृष्टि का है, तब फिर हम मनुष्यों को
सब जीवों से प्रेम का नाता जोड़ना क्या धर्म नहीं? जो कोई कहे, हमारा मत सब से श्रेष्ठ
तो श्रेष्ठ मनुष्य वह कहलाने योग्य है, जिसके हृदय में--दया हो; सब जीवों, के प्रति
प्रेम; सब जीवों, का हित चाहे; निर्बलों को निर्बल न समझे, वरन् निर्बल जानकर अधिक
प्रेम करे; किसी का दिल न दुखाये।
यह कभी न समझे कि परमात्मा केवल हमारे मत वालों का ही पिता है, औरों
का वह पिता नहीं? जब परमात्मा सबका है, तो सब मत भी तो उसी के हुए? सो कौन सा?
या किसका पृथक् है? जो परमात्मा सबका पिता है। तो यह सब मत किसके? उस एक ही
परमात्मा के ना? सो फिर मतों का झगड़ा कैसा? जो परमात्मा सब जीवों का पिता
हुआ और वह परम दयालु पिता सब का, तो फिर सब का, वह ही पिता हुआ? क्या केवल मतों
का, या सब मत वालों का?
अहो, यदि एक ही, सब मनुष्यों का सब जीवों का पिता है, तो क्या सब एक ही
रूप पिता के ही नहीं ठहरे। फिर जब सब एक पिता के ही हैं तो फिर परस्पर मतों का
झगड़ा? जो एक ही सब मनुष्यों का परमेश्वर है, जिसका नाम सब प्रकार से श्रेष्ठ है
वह एक ही सब का स्वामी है। उस एक के सिवा, न कोई इस संसार में दूसरा कोई
समर्थ? या सब पर दया करने वाला हो सकता है। सो जिस प्रकार सब संसार उस
दयालु पिता का परिवार है उसी तरह यह सब संसार भी, एक ही परमात्मा का परिवार हुआ
ना? तो फिर इस संसार के सब मनुष्यों को, परस्पर मिलकर रहना चाहिये अथवा
नहीं? निश्चय ही सब को परस्पर मिलकर प्रेम से रहना चाहिये।
जिस से इस संसार का उद्धार परमात्मा द्वारा सब का शीघ्र ही हो सके। जब
सब प्रेम भाव से रहेंगे, प्रभु प्रेम-रस का ही स्वाद आनन्द--रस--रस रूप में
सब को मिल सकेगा। प्रभु तो सर्व जीवों को ऐसा चाहता है, सो मनुष्य को ऐसा

17

इस प्रकार वह कहने लगा, 'हे! ईश्वर यह तूने क्या किया-कि तीन चार माह की अवधि को तूने कुछ
किया, उसने सोचा कि जिस प्रकार रात बीतने वाली है उसी प्रकार यह भी कुछ समय निकले गा, पर दिनपर
दिन चिन्ता उत्पन्न हो अधिक रोग होने लगा जिससे निराशा छाने लगी जिससे वह और भी रोने और
लगा, उसने समझ लिया कि अब जीवन समाप्तप्राय हो गया जो वह चाहता था उसका उल्टा ही
इस संसार का नियम है, समय समय पर जो रोग उत्पन्न अथवा समाप्त होता है, उसका
निश्चित न हो तब तो वैराग्य अथवा विवेक होना अति कठिन बात है जिससे न शोक हो और न
जिससे आनन्द प्राप्त हो सके और न ही शान्ति प्राप्त करने का कोई उपाय ही सूझता
वह किसी अनुभवी वैराग्यवान् की शरण जाकर अपनी सब व्यथा को सुनाने लगा जिससे कि शांति प्राप्त हो
सके उसका यह विचार था, कि वह मेरी व्यथा को सुन, कुछ तो दया करेगा ही जिससे मैं इस रोग से बच सकूँ,
अथवा जो कुछ भी उचित हो सकेगा वह कर सकेगा। उस वैरागी ने अपने विचारानुसार कहा, 'हे भाई
अपने चित्त को शान्ति प्रदान कर जो कुछ भी संसार में हो रहा है, परमात्मा के ही अधीन है इसलिये
कुछ सोच विचार, शोक, सन्देह अथवा चिन्ता को हृदयङ्गम मत कर केवल प्रभु का ही भजन व स्मरण कर,
हे नर, सब कुछ त्याग कर उस, एक ओंकार पर ही मन को लगा जिससे मुक्ति प्राप्त हो सके वैराग्य
निश्चय ही मुक्ति, का साधन अथवा उपाय है! जिससे तू अपने लक्ष्य को प्राप्त करेगा, यह उपदेश तो
वैरागी ने किया, परन्तु वह व्याकुल हृदय, इन उपदेशों को हृदयङ्गम करके अपने हृदय शान्ति
सुख प्राप्त करने में असमर्थ ही रहा।
वह तो किसी ऐसे अनुभवी अथवा आत्मज्ञानी सिद्ध को, जो अज्ञानता को दूर करने में
समर्थ, आत्मस्वरूप की उपासना का ऐसा सहज मार्ग ला देवे तथा उपदेश प्रदान करे, जिससे
उस का व्याकुल चित्त अनायास पूर्ण शान्त तथा तृप्त हो सके, पर ऐसा ज्ञान प्राप्त करके, उस को अपने
ही स्वरूप तथा स्वरूप विचार होने लगा, जिससे उसका चित्त स्थिर तथा एकाग्र न हो सका
इस लिए वह क्या करता? मन ही मन में कहने लगा, कि जब तक पूर्ण शान्ति प्राप्त नहीं,
तब तक तो उसका कल्याण समझना केवल भ्रम मात्र ही होगा।
जब कोई उपाय नहीं सूझा, तब न चाहते हुए भी विवश हो कर उसने कई प्रकारों तथा
अनेक प्रकारों द्वारा, मन को सब ओर लगा कर देखा परन्तु शान्त न हो सका, तब उसने सोचा कि मैं
अपने जीवन को व्यर्थ ही नष्ट कर रहा हूँ, इस से अच्छा यही होगा कि इस शरीर को
नष्ट कर दूँ, परन्तु हाय, जीवन धारण करना भी कठिन है, न तो शान्ति प्राप्त ही हुई और
ऊपर यह रोग लग गया जिससे न इधर का न उधर का रहा। इस पर भी दयावान् प्रभु की कृपा से कई
वर्ष और व्यतीत हो गये पर चित्त की व्यथा, जो कि मानसिक थी शान्त न हुई। आधिभौतिक
या भौतिक या प्राकृतिक ही वह व्याधि नहीं थी जिससे शान्ति हो सकती, तब किसी ने
ऐसा विचार कर फल-फूल का आहार ही दो सप्ताह तक करने को कहा कि यह सब कुछ नष्ट
हो कर रोग से सर्वथा मुक्ति प्राप्त हो सकेगी।
जब ऐसा उपाय करने का निश्चय कर लिया गया तो उस ने दो सप्ताह केवल फला-
हार करना आरम्भ किया, न तो इस से कोई लाभ ही हुआ अपितु भूख की ज्वाला शान्त न होने
कारण चित्त पहले से भी, अधिक अशान्त हो गया जिससे उसका शरीर भी दिन प्रति दिन क्षीण होने
लगा।
निराश हो कर वह फिर अपने घर की ओर मुँह करके चलने के पश्चात मन में विचार करने
लगा, कि क्या परमात्मा मुझ पर दया नहीं करेगा ? क्या इस प्रकार ही मेरा सर्वनाश
होगा, परमात्मा सब कुछ करने में क्या समर्थ नहीं? क्या उसका ही यह रूप है? जो कुछ
भी, वह सब कुछ करने समर्थ है तो हेसर्वसमर्थ, मुझे तो बचा, इस से अधिक मुझे क्या
चाहिये?
ऐसा कहकर आर्तभाव से ईश्वर को पुकार कर रोने लगा, उसका रोना व्यर्थ
न समझा गया, ईश्वर अथवा परमात्मा ने जो दयालु तथा कृपालु है सब
पर, उस पर भी असीम कृपा करके उस के सब क्लेश मिटाकर उसे मुक्ति का
अधिकारी बना दिया।
आज वह ऐसा दृश्य देखता है जिसे देख कर स्वयं चकित रह गया
कि उसका तो कोई अस्तित्व ही नहीं रह गया, वह केवल ही केवल आनन्द का
स्वरूप बन गया, वह सब कुछ शांत हो चुका था। वह पूर्ण रूप से शून्य हो चुका
जिस कारण वह केवल, आत्-मरूप आनन्दमय होने के कारण अब कुछ
शेष न बचा! सब ही आश्चर्य! सब ही आश्चर्य के सिवाय कुछ न रहा जिस कारण,
केवल आनन्द ही उस का अपना ही स्वरूप बन चुका था जिस में वह लीन
होकर स्वयं आनन्दमय हो गया।
18

प्रार्थना पत्र लिखनें वाले जितने समझदार या योग्य या बड़े थे, वह समझ सकते
थेकि श्री स्वामी जी महाराज वैदिक धर्म प्रचारार्थ समस्त भारत वर्ष का भ्रमणकर रहे थेऔर
जहांभी, जबभी, उनको इस कार्यके विस्तार निमित्त या प्रचारार्थ या धर्मार्थ जहाँपर जाना
पड़ जाय वहाँही आवश्यक समझकर अवश्य जाते थे।
इसलिए यह उचित थाकि, वह स्वामी जी की हर बातको वा धर्म प्रचार के कार्य को
समझबूझ कर काम लें, उचित समय देखकर ही श्री स्वामीजी को आमंत्रण के पत्र भेजें
जिससे श्री स्वामीजी के प्रचार कार्य में रूकावट न पड़कर विशेष लाभ पहुंचे। यह स्वामी जी
स्वयं ही तय कर लेते थेकि किस कार्य को प्रथम करें; अथवा किस बात को किस समय करें,
जिस समय जिसे जैसा समझा उन्होंने वैसा ही कार्य को किया या किया था, इसलिए यह तो उचित
बात थी परंतु इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिये थाकि स्वामीजी अहंकारी थे।
उस समय भी प्रत्येक स्थान पर दो प्रकारके विचारके लोग विद्यमान थे। कुछ स्वामी
जी, उनके मत विचार, वैदिक धर्म मत, स्वामी जी विचार और आदेश! को सर्वथा श्रेष्ठ
मानकर उनके आदेश अनुसार अपने कार्यों को करते थेतथा वैदिक प्रचार कार्य में हर प्रकार
से तन मनधन द्वारा सहायता कर स्वामीजी के कार्यको आगे बढाने का यत्न करते थे। परंतु,
इसके विपरीत जो स्वामी जी, उनके मत तथा वैदिक विचार प्रचार के पक्ष में नहीं थेवे
प्रत्येक बात में उनका विरोध ही करते!
उस समय में कुछ ऐसे आर्यसमाजी विद्वान भी थेजो स्वयं को बहुत बडा विद्वान
मानते, दूसरों को मूर्ख, स्वयं को धनी, श्री स्वामी जी तथा अन्य लोगों को निर्धन
तथा हीन समझ कर बात करते, या व्यवहार करते तथा यह यत्न करते कि किसी प्रकार,
स्वामीजी के प्रचार कार्य को हानि पहुंचे, ताकि, उस स्थान पर उन लोगों का! दबदबा या
प्रभाव बना रहे। इस कारण ऐसे लोग प्रचार कार्य में बहुत बाधाएं उत्पन्न करते तथा
स्वामी जी केविरुद्ध षड्यंत्र भीरचते, यह बात सर्वथा सत्य थी!
इन कारणों केहोते, स्वामी जी महाराज को उस समय हर स्थान पर बाधाएं
तथा कठिनाइयां झेलनी पड़तीं व कार्य में तरह तरह की बाधा उत्पन्न की जातीं।
परंतु, वे अपने निश्चय पर अडिग रहे, वे अपने धर्मप्रचार कार्य को कभी न रोकते
या बदलते थे। इस प्रकार दोनों दलों के होने से, यह स्पष्ट होता गयाकि उस समय
भी, समाज में परस्पर विरोधी मत फैल रहे थे। इससे स्पष्ट होता थाकि स्वामी
महाराज किस प्रकार निर्भय होकर धर्म का प्रचार कररहे थे।
स्वामी जी प्रचार का कार्य कर रहेथेऔर वह प्रचारक रूप मेंआदर पा रहेथे।
परंतु समाज में अन्य व्यक्ति ऐसे भी थेजो केवल स्वामीजी का सत्कार करके ही रुक
जाते, कार्यकर्ताओं के समान वह देश भर में प्रचार कार्य को आगे बढाने में रुचि
न लेतेथे। इस प्रकार स्वामी जी को ही अधिक कष्ट उठाने पड़ रहेथे।
श्रीस्वामीजी के मन में यह अभिलाषा थी किउनका प्रचार स्थायी होवे, जिससे कि
देश का उद्धार हो। वे यह चाहते थेकि लोग केवल उन तक ही सीमित न रहें, अपितु स्वयं
भी हर कार्य को करने में समर्थ हों, वे इस बातके विरोधी थे, कि कोई मनुष्य
केवल अपने कोही ईश्वर का दूत समझे अथवा उन पर विश्वास न करे। वे तो यह
भी कह चुके थेकि वे भी, स्वयं को ईश्वर--दूत न मानकर केवल एक साधारण मनुष्य
ही मानते--उन का उद्देश्य समाज को वैदिक धर्म की ओर ले जाने का था।
स्वामी जी, इस बातके समर्थक कभी नहीं हो सकते थेकि
जो स्वामी जी कहें! केवल उसी बात को धर्म का अंग माना जाय और अन्य
प्रत्येक मनुष्य को इस बात की छूट नहोकि वह स्वयं धर्म की व्याख्या कर सके
सके; इसलिए जब भी कोई बात या विषय ऐसा आता जिससे यह शंका उत्पन्न होती--
स्वामी जी अपने विचार को सब पर थोप रहेहैं तो स्वामी जी इसका विरोध करते थे
तथापि स्वामी जी का, प्रत्येक स्थान पर यही यत्न होता थाकि वैदिक धर्म की सत्य
व्याख्या सबके सम्मुख हो, जिससे प्रत्येक व्यक्ति धर्म के सत्य स्वरूप को समझ
सकेऔर पाखण्ड तथा रूढियों का अंत हो सके।
इन घटनाओं का सार यही निकलता हैकि स्वामीजी के व्यक्तित्व को लेकर उस समय
समाज में तरह तरह के विचार काम कररहे थे।
वैदिक प्रचार को उस समय केवल स्वामी जी ही आगे बढा रहेथे। प्रश्न
उठता हैकि यदि स्वामी जी ऐसा न करते तो क्या आज वैदिक धर्म जीवित रहपाता
अथवा स्वामी जी के प्रचार का कोई स्थायी प्रभाव न हुआ होता? इस प्रश्नपर
विचार करने से स्वामी जी के जीवन का महत्त्व स्वतः ही स्पष्ट होजाता है... वे
युग-युग तक याद किये जाते रहेंगेऔर उनका कार्य सदा अमर रहेगा।
19

इस घटना का प्रभाव जो पड़ा स्वभावतः... वह तो इस प्रकार प्रकाश में आ ही गया।परन्तु इस
का एक प्रभाव जो जन मत पर पड़ाथा, वह प्रभाव उस समय तक के किसी घटना द्वारा भी
साधारण जनता पर पड़ा, सर्वथा नवीन, अकल्पित कालीन, समस्त भारत पर प्रभाव था।
यह कहना भूल है, महामना श्री जी राम-दास स्वामी का ही केवल प्रभाव था, जिस
से समूचे भारत में हिन्दू चेतना जाग उठी। केवल एक ही कारण कभी भी ऐसा काम नहीं कर
ले यह बात ठीक है। पर इस घटना विशेश का जो प्रभाव पूरे भारतवर्ष पर हुआ वह कम नथा।
दक्षिण छोर से उत्तर कटक तक इस घटना का समाचार फैल ही रहा था। इस घटना का प्रभाव
क्या
था इसका फल यह देखना होगा कि इस अधिकार चेष्टा से उत्पन्न शक्ति से क्या लाभ
हुआ था? केवल एक घटना मात्र से सम्पूर्ण देश में ही तो स्वराज्य का संचार नहीं हुआ
था, पर इस से इस भावना युक्त सारा भारत हो तो अवश्य ही जासकता था। हाँ, यह बात
तो जरूर हुयी। हिन्दू भावना को इस प्रकार आगे आने का मार्ग मिल ही गया। इस महान
परिणाम का सार तो यही था, कि भारत भर की जनता को विश्वास हो चलाथा कि जिस
बात को, वह असम्भव
समझती थी वह पूरी तरह से एक दम से सत्य सिद्ध हो चली थी। उस घटना ने
प्रत्येक हिन्दू के हृदय में उत्साह भर दिया था, वह यह बात भली ही तरह
सोचने
पर विवश हो गए, कि जब एक हिन्दू राजा ने इन यवनों द्वारा अपमानित हो
अपने स्वाभिमान को न छोड़ा, फिर अन्य क्यों न छोड़ें, विचारें वे?
हिन्दू-धर्म रक्षक तो वह बन कर सब के सम्मुख आया ही था, इसमें सन्देह ही नहीं!
इस प्रभाव से क्या लाभ हुआ यह समझना भी सरल हीथा! केवल एक ही बात नहीं
थी, जिससे कि काम चल ही जाता था? यह बात साधारण बात नहीं, सम्पूर्ण हिन्दु
स्थान जाग उठा। केवल एक ही बात को नहीं, अब तो उसके पूरे रूप को देखा जाने
लगा। इसका फल यह था, कि अपने पूरे देश में इस ही रूप से शिवाजी को देखा जाने
लगा। इस लिये भारत व्यापक रूप से इस बात का प्रभाव पूरे देश भर पर पड़ा हुआ
था?
यह प्रभाव कैसा था, अच्छा था? तो उस समय के सब लोग कह ही सकते
होंगे यह, प्रभाव कैसा था? तो उस समय के लोग अवश्य ही इस का कुछ तो फल ही
पायेंगे!
शिवाजी का विचार तो भारत भर को एक ही रूप में देखना था। क्या प्रभाव पड़ा था?
प्रभाव पड़ा, सो तो बहुत समय पश्चात् देखने को मिला। पर बात हिन्दू चेतना
द्वारा सम्भव थी, इसलिए सभी उस विचार द्वारा बंधे थे, इस बात द्वारा स्पष्ट
देखा
गया था। जो रूप आज हिन्दू धर्म का है, वह केवल इस बात का परिणाम ही था कि
शिवाजी, के नाम से सारा भारत एक बार फिर जागृत हो ही उठा। केवल धर्म की रक्षा
अथवा हिन्दू--धर्म का ही? रक्षा कार्य नहीं, सो इसके द्वारा सब काम हुआ, जो शिवाजी
का नाम ही भारत में सदा अमर रहने वालाथा।
केवल धर्म ही नहीं पर अपने देश की रक्षा का विचार था? हर बात पूर्ण
रूप से हिन्दू धर्म के साथ ही तो जुड़ी हुई थी? केवल यह ही कारण तो नहीं
बन-सका, जिसे जानकर, कार्य द्वारा ही परिणाम प्राप्त हुआ था?
इस परिणाम को ही, सब लोग देख रहे थे। वह बात यह थी कि सब लोग
एक ऐसा समय, पा ही तो गये थे, मुसलमानों के प्रभाव से मुक्त, जो
अत्याचार आज तक फैला हुआथा उस से जन समाज पीड़ित था। उस, से छुटकारा
पाना उन सब भारतीयों अथवा हिन्दू जन को असम्भव लगता था। इस लिये, जनता
सब समय, कष्टों से ही मुक्ति के उपाय सोचती थी।
केवल यह उपाय केवल यही था, जिसका कि नाम हिन्दू धर्म का था। यह सब
लोग जान गये, कि हिन्दू धर्म को नष्ट करने का पूरा प्रयत्न मुगलों द्वारा हो रहा
था, इस लिये धर्म ही; समाज का तो अंग था, जो केवल धर्म ही; रूप
विकृत रूप से हुआ था, सो इस बात को ध्यान में रख कर ही बात की
पूरी योजना बनी थी, सो इसका फल यह था, प्रभाव था? तो अवश्य, ऐसा प्रभाव
ही जन के मन पर पड़ा था, केवल हिन्दू भावना जाग उठी, बल्कि सब ही
प्रकार लोग अपने आप को समर्थ समझने लगे थे। उन को नया रूप प्राप्त हुआ

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