माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
पृष्ठ 120, कुल 154 में से
संदर्भ में पढ़ेंकथा का उपसंहार करते हुए श्री शुकदेव जी कहते हैं कि हे राजन् ! यह सब सुनकर
राजा ने पुनः पूछा—
हे भगवन् ! जिस समय २ या ३ वर्ष के बालक थे कृष्ण तब, तृणावर्त आया!
फिर यह बात तो समझ में आ गई कि माता यशोदा रोयीं होंगी! लेकिन जब वही
तृणावर्त का उद्धार हो गया, यशोदा जी जब अपने लल्ला को लेकर अन्दर महल गयीं
तो क्या
यशोदा जी महाराज से मिलीं, नन्द जी जब आये तो क्या कहा, कुछ
पारिवारिक बातें और कुछ नन्द जी और कंस के बीच क्या क्या हुआ फिर उसके बाद
क्या हुआ यह सब मैं जानना चाहता हूँ। शुकदेव जी कहते हैं—हे राजन् !
जब तृणावर्त मरा और सब लोग अपने-अपने घर चले गये तो केवल नन्द रानी और
यशोदा उपनन्द के घर गये। नन्द जी ने कहा, नन्द रानी से पूछा क्या
हुआ था यहाँ; सब लोग तो कह रहे हैं कि कोई बड़ा भारी चक्रवात आया था
जिसने गोकुल को घेर लिया था और सब लोग तो कह रहे हैं कि बालक भी उसी
में, जो इस बात को सुनकर, चिन्तित मन से घर की ओर भागा चला आया
और तू जब इस बालक को लिये-दिये, बैठी; तो जरा मुझे बता तो सही
माता यशोदा अपने पति नन्द जी से सारी स्थिति सम्भालते ही बोली
हे नाथ ! क्या बताऊँ जब आप गये थे तो, ऐसा ही चक्रवात, आया तो था, लेकिन
हे नाथ, कोई तो बात ऐसी जरूर है कि कोई न कोई तो मेरे कन्हैया को नजर
लगाता है। फिर नन्द जी ने यशोदा को पूछा कि, तू इस बात को कह तो रही जरूर
हो, पर क्या तुम्हें इस बात का तनिक भी अहसास हुआ है?
यशोदा हाथ जोड़कर बोलीं—नहीं, नन्द बाबा मुस्कराये बोले कि बेटा तो
ही ऐसा खूबसूरत दिया है प्रभु ने। फिर यशोदा बोलीं—नन्द रानी यशोदा को
यह भी याद आया कि अरे सुनो जी, एक बात और जब तृणावर्त चक्रवात
आया तो उसके पहले एक बात हुई थी, लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया
उस तृणावर्त नाम के दैत्य के आने से पूर्व कन्हैया भारी हो गया था,
जिसकी वजह से वह इस बालक को, लेकर बैठ नहीं सकी थी इसलिए
नीचे बैठा दिया था। नन्द जी ने यह सब सुनकर यशोदा मैया को
यह कहा कि कृष्ण में अवश्य कोई न कोई तो दैवी शक्ति विद्यमान है।
इस प्रकार बात खत्म हुई।
इधर दो मास बाद, नन्द जी, यशोदा जी, रोहिणी जी,
बलदाऊ भैया के साथ किसी उत्सव को मनाने लगे, जो जन्म दिन उत्सव
था, उस समय जब नन्द जी कुछ दान कर रहे थे और नन्द रानी भी दान
कर रहीं थीं, तो कृष्ण को सुलाने के लिये एक गाड़ी के नीचे लिटा
कर वे काम में लग गयीं, तब कृष्ण भगवान् ने रो-रो कर दूध के लिये
पाँव को ऊपर फेंका तो पाँव शकाटासुर को, उस असुर को लगा
और
उधर से वो उद्धार होकर चला गया। उधर जब यह सब नन्द जी
ने सुना और देखा तो, नन्द जी फिर सोच में पड़ गये कि यह क्या
हो रहा कन्हैया, लगता है इस बार किसी ने बुरी नजर डाली है, नजर
उतारने के लिये नन्द जी ने, गौ माता की पूँछ को लेकर सारे शरीर
पर फेरा और इस प्रकार भगवान् का नजर उतारा गया। तब
नन्द बाबा बोले कि
हे यशोदा तू हमेशा पुत्र के प्रति बहुत चिन्तित रहती है। और
गोकुल वाले सब लोग भी इस बालक को लेकर, सब ही चिन्तित और १०-१२
के समूह में सब, बात करते हैं। इसलिये हे देवी, तू अपने घर में, उस प्रभु
को याद कर जिसने हमें यह पुत्र दिया और उसे कहो कि समस्त विघ्नों से
रक्षा करे और जो भी उपद्रव हैं, उनसे भी मुक्ति देवे, ऐसा नन्द जी, ने
यशोदा को प्यार करते हुए ढांढस बंधाया।
हे परीक्षित नन्द जी तो अपने बालक कृष्ण को मात्र अपना बालक ही
समझ कर प्यार करते थे। वे, ऐसा कुछ नहीं समझ पा रहे थे कि जिनका
वे प्यार कर रहे हैं वे साक्षात् परम ब्रह्म हैं। अतः नन्द जी को
क्या आश्चर्य हो सकता? हे राजन् ! तो नन्द जी की ऐसी, बात को सुनकर
यशोदा भी कुछ देर बाद चिन्ता-मुक्त हो गयी।
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