एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
इस प्रकार महाराज पृथु--द्वारा अभिनन्दित भगवान् ने भी प्रसन्न हो राजा को, जिनका
हृदय शुद्ध था।
अहो, राजा का भगवान् मधुसूदन और उनके भक्तों के प्रति कितना दृढ़ और अनन्य
प्रेम था! वे भगवान् सबके हृदय की बात जानने वाले हैं। अतः उन्होंने राजा के निष्कपट
प्रेम भाव को देख लिया और वे प्रसन्न हो गये। वे, जो सबके नियन्ता
"भगवान् ने कहा कि हे वीर, हे राजा ! मैं तुम्हारे इस यज्ञ से बहुत ही प्रसन्न हूँ--जिसमें
कि यज्ञ--कर्ता ने भी, अर्थात् तुमने भी अपने हृदय में मेरे प्रति अनन्य भक्ति भाव को ही
सब कुछ मान कर यज्ञ किया था।"
जो पुरुष इस प्रकार निष्काम भाव से यज्ञ करता है,
वह सब प्रकार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
इस प्रकार के पुरुष को सब प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं।
इस प्रकार के पुरुष को सब प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं।
जो लोग इस संसार में, अर्थात् इस लोक--परलोक में, अर्थात् इस
लोक--परलोक में, अर्थात् इस लोक--परलोक में, अर्थात् इस लोक--परलोक में, अर्थात् इस
लोक--परलोक में, अर्थात् इस लोक--परलोक में, अर्थात् इस लोक--
अध्यात्मशास्त्र कहता नहीं विभावभावों जानो, किन्तु यह जीवविभावभावों को क्यों जानेगा
जानेगा? विभावभाव तो अपने रूपको नहीं जानते किन्तु जीव, स्वरूप को और विभाव भावको
सब प्रकारोंसे जान रहा है, इससे सिद्ध होता है कि सब प्रकार ज्ञाना ही काम रहा
है। पर्याय स्वभाव रूप परिणत ज्ञान हुआ विभाव भाव नहीं था किन्तु ज्ञानका ही रूप था।
ज्ञान जब इस बातको जान लेताहै कि यह सब विभाव भाव तो केवल ज्ञेय ही हैं ज्ञेयका
स्वभाव ज्ञायक भावका नहीं हो सकता है, ज्ञान का स्वभाव तो, ज्ञायक ही
रूप है तब ज्ञानी का ज्ञान विभावोंसे भिन्न अपने ज्ञायक भाव में लीन हो जाता है,
इसमें विभावका विभावपनाभी नष्ट हो जाता और केवल ज्ञानका रूप बना रहता है।
ज्ञान जब विभाव में ज्ञानकी ही कल्पना कर लेता है तब वह विभाव रूप
हुआ! जो ज्ञान यह या उस ज्ञान रूप हुआ उस ज्ञानका कभी नाश नहीं हो
सकता। जो इस ज्ञान को विभाव से भिन्न है, जान लेता, सो वह ज्ञान,
वह ज्ञेय, वह दृष्टा, विभावको त्याग देता है सो ऐसा विभावका त्याग
केवल ज्ञानका ही काम होताहै न कि विभावका । जिस प्रकार
ज्ञान पर्याय का इस बात का ज्ञान हो जाता है कि विभाव केवल ज्ञेय रूप
ही है तब ज्ञानी अपने ज्ञान स्वभाव को विभाव से सर्वथा भिन्न ही
मान लेता है ज्ञान में विभाव का प्रवेश नहीं होने देता है। जब ज्ञानको यह
मालूम हो जाताहै कि इस विभावका मेरे साथ सम्बन्ध ही नहीं केवल ज्ञेयका ज्ञायक
रूप सम्बन्ध है तब विभाव अपने आप नष्ट हो जाताहै तब ज्ञानका ही परिणमन
सब प्रकार विभावों रूप से न होकर केवल ज्ञाना रूप ही होता रहताहै
जो सर्व तरह से, ज्ञान मात्र ही, उस ज्ञान में विभावका
लेश मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता है, ज्ञानी पुरुषोंका उपदेश
ही इस बात का रहता है कि अपने ज्ञायक भाव को सर्वथा विभाव से भिन्न
ही जानो क्योंकि विभाव मात्र पराधीन परिणाम हैं जिनसे कि कभी भी
ज्ञान का लाभ नहीं हो सकता केवल ज्ञानका विभाव-भाव केवल
ज्ञेय रूप होकर केवल ज्ञाता रूप ही रहता है उस रूप कभी नहीं हो सकता
केवल यह अज्ञान भाव है।
सब ही प्रकार से यह ज्ञान ही सिद्ध होता है कि संसार में
विभाव, जो भी काम इस के द्वारा होता वह केवल ज्ञान का ही
चमत्कार है न कि अज्ञानका, अज्ञानका तो कोई रूप नहीं,
जो कुछ रूप है सो ज्ञान ही का है? विभावका नाश होने पर ज्ञान ही तो
रहा, सो अज्ञानका नाश हो ही गया, फिर क्या, केवल ज्ञान; केवल
ज्ञान का ही काम विभाव रूप से ज्ञान को भिन्न करना है, सो ज्ञान ही
तो ज्ञायक है, सो ज्ञान ही ज्ञायक भाव से भिन्न कभी नहीं
सब प्रकार अज्ञानका ही त्याग हो जाना संभव है जो कि ज्ञान
द्वारा ही ज्ञानका स्वभाव अपने ही रूपमें परिणत हो जाता है।
ज्ञानी सब विभावों को अपने रूप से भिन्न ही समझ कर कभी विभाव
रूप नहीं परिणमता किन्तु अपने ही ज्ञान स्वभाव में ही लीन
रहता है तब ज्ञान को विभाव रूप कौन कहेगा? जब ज्ञान विभावका नाश
कर केवल अपने स्वरूप मात्रमें परिणत हो जाता है तब कौन विभाव कह
सकता है तब विभाव कहाँ रहा ? ज्ञानी ज्ञान मात्र ही रहा फिर
ज्ञानका विभाव का सम्बन्ध कहाँ से हो सकता है?
जब ज्ञान ही ज्ञान रूप में लीन हो जाता तब ज्ञान
का ही काम होता है तब ज्ञान विभाव रूप से ज्ञान को ही भिन्न
ज्ञान रूप करता है तब यह ज्ञान ही तो ज्ञानका सब कुछ काम
ही तो करता है, इस बात, को जान कर ज्ञानी सब रूप से अपने
ज्ञायक... से ही परिणत होता है सो ज्ञान ही ज्ञेय, ज्ञान ही ज्ञाता
होता है।
अब दो गाथा द्वारा इस विषय-को
ही और स्पष्ट करते हैं कि।
सब ज्ञानी जो कि हैं, वे पुद्गल-कर्म फल को जानते हुए
ही रहते, उनका वे कभी परिणमन नहीं करते न ही बँधते हैं,
जिससे कि केवल ज्ञानका रूप ही बना रहता है जो कि ज्ञान केवल ही ज्ञानी
रूप होता है न अज्ञान रूप, सो सब प्रकार से, जो कुछ भी ज्ञान
का काम रहा सो, सो ज्ञानीका ज्ञान ही।
300
उन्होंने उत्तर दिया, "इसका निश्चय तुम ही कर सकते हो कि न्यायालय किस बात को उचित
समझता अथवा धर्म संगत कि हम ईश्वरकी आज्ञा मानें अथवा"
सात्विकों हो ! परमात्मा किस बात को उचित समझता अथवा धर्म संगत मानेगा
पश्चात्तापियों को तो इस विषय में कोई भ्रम हो ही नहीं सकता कि वे अपने प्यारे प्रभुकी
आज्ञा मानेंगे या उनके जो निर्दोषों को तो सताते किंतु अपने को उस प्रभु का भक्त या
सेवक बताने का दम्भ भरते हैं।
यह बात भी; कि क्या सात्विक कहलाने वाले लोग अथवा वे लोग जो सत्य का दम
भरते, वाद-विवाद से जन मन को भ्रमित अथवा उद्विग्न करना चाहते हैं? अथवा वे शांत हो
जाते हैं? ईश्वर उनकी रक्षा करता? उनका यह मत था कि जब सब लोग वाद-विवाद को
ही न केवल त्याज्य किन्तु अशांति का रूप मानते हों तो, वे शांति भंग करने वालों की
सभा में न तो भाग लेते थे और अपनी सभा में उनको स्थान न देते थे। इसके साथ ही
वे ? यह निश्चय कर ही चुके थे कि यह वाद--विवाद विवादकर्ताओं अथवा उनका अनु--
सरण करने वाले निष्कलंक जन के लिए नहीं, अपितु उन लोगों के लिए ही था जिनका
लक्ष्य प्रभु सेवा अथवा प्रभु के आज्ञा अनुसार आचरण न होकर
केवल विवाद ही था। इसके साथ ही यह निष्कर्ष भी, कि विवाद के विषय में तर्क
वितर्क का कोई अन्त नहीं, जिससे जन मानस में भ्रम के अतिरिक्त, लाभ तो हो नहीं सकता
कि केवल वाद विवाद अथवा द्वन्द्व उत्पन्न होता रहता था। फिर भी, यह विचारणीय रहा
कि यह निर्णय या नियम-विधान उस जन संघ द्वारा निष्पादित सम्मत्ति सम्मत माना
गया जिसे केवल प्रभु शरण और प्रभु के आज्ञा-पालन की अपेक्षा थी अथवा उन पर थोप
दिया गया जो प्रभु की ओर से जन व जन के कल्याण के लिए केवल शान्ति चाहते थे।
फिर भी, ईश्वर उनकी आत्मा-व्यवस्था को भली प्रकार से जानता था, जिन्होंने प्रभु
आज्ञा को सर्वोपरि मानकर प्रभु के आदेशों द्वारा जन, जो सम्भवतः इस कारण वंचित
किया गया समझा जाने लगा कि वे सात्विक विचारों तथा निष्ठा अथवा ईश्वर
उपासक होने के अधिकारी हैं, जन हितैषी बनते हुए ही ईश्वर कृपा के योग्य
स्वीकार किए।
इस प्रकार यह भी स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि सात्विक जन प्रभु की सेवा
और जन समाज के प्रति कर्त्तव्यनिष्ठ रहकर, निष्ठा पूर्वक प्रभु की इच्छा जानकर
ही पद आगे बढ़ा सकते अथवा अपना कर्त्तव्य पालन सम्पन्न कर ही रहे थे। इससे
सात्विक मत वाले व्यक्ति अपने ही प्रभाव को खोते जा रहे थे जिसकी वे कभी
उप
युक्त व्यवस्था या पद मान कर लाभ उठा रहे थे। इधर, जो जन सात्विकों
व्यवस्था द्वारा या प्रभु की शरण आकर अपना कल्याण चाहते थे वे प्रभु की कृपा से,
न केवल लाभ प्राप्त कर रहे थे वरन् प्रभु की असीम कृपा से धन्य भी हो रहे थे।
वे लोग उन धर्म-ग्रन्थों द्वारा प्रभु की कृपा को जान पाए थे, जिसे वे सदा प्रभु कृपा
का साधन ही समझते रहे थे अथवा मानते आ--रहे थे।
इतिहास के आधार पर हम यह जान ही रहे हैं कि धर्मशास्त्रियों या अन्य
जन, जो धर्मशास्त्रों को पड़े; स्वयं सात्विक जन तो प्रभु जन को ही प्रभु
भक्तिकारी मान रहे थे, इस पर जोर दे रहे; फिर भी प्रभु का प्रभाव बढ़ रहा
इतिहास के साक्षी धर्म शास्त्र हैं। प्रभु जन उनकी आज्ञा मानकर जन का
कल्याण कर रहे थे और सात्विक लोग धर्मशास्त्रों द्वारा प्रभु की कृपा से
वंचित हो जाने का भय भी जन समाज में फैलाकर समाज सुधार नहीं कर पा
रहे थे, पर ईश्वर सत्य बात प्रभु जन द्वारा ही जनसाधारण तक, सात्विक
धर्मशास्त्रियों द्वारा ही नहीं, वरन् सब साधारण जन द्वारा भी पहुंचा
रहे थे जो प्रभु सेवा से सम्बद्ध थे या जो जनसाधारण द्वारा प्रभु के रूप
तक पहुंच रहे थे। प्रभु के भक्त जन
कृपा प्राप्त कर, ईश्वर आज्ञा का उल्लंघन
न कर धर्मशास्त्रों को महत्व देते हुए धर्मशास्त्र अनुसार ही अपने
पथ पर अग्रसर होकर प्रभु को ही प्रभु मानते हुए ही प्रभुकार्य सम्पन्न कर रहे
थे। प्रभु जन को जब कभी सात्विक लोग सभा विचार-विमर्श में बुलाते
थे तब वे उस जन सभा में उपस्थित होकर केवल प्रभु महिमा ही गाते थे, जन
का हित कैसे किया जावे उस पर ही वे बल देते थे। जन सात्विक जन, प्रभुभक्त
जन, सब प्रभु के प्रभुत्व स्वीकारकर, सत्यता पूर्वक प्रभु की सेवा
करते हुए प्रभु के लिए अपने प्राणों को भी न्योछावर कर देने को तैयार रहते
अथवा प्रभु का आज्ञाकारी आचरण ही श्रेष्ठ
301
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302
की दया, उनका प्रेम, उनका त्याग, इन सबके कारण जो स्थान इन लोगों का इन लोगों
अथवा समकालीन जगत् के अन्य लोगों अथवा उनके परवर्ती लोगों के हृदय सिंहासन
अथवा मानस में, प्रभाव रूप में था, कालान्तर में वह उनका स्वरूप न रहने पर भी,
न केवल सुरक्षित रहेगा, प्रत्युत आगे चलकर जब लोग इस बात पर ध्यान देंगे, तब
उनके प्रभाव का क्षेत्र और भी विस्तृत रूप में दृष्टि गोचर हो उठेगा, इस बात इसमें
दो मत नहीं हो सकते और जो कुछ भी कहा गया, वह सब उनके समकालीन भी सत्य
था।
महापुरुषों के प्रभाव का क्षेत्र सीमित रूप से समकालीन कालजयी अथवा समस्त
ही युग का होता है। उदाहरण रूप में जब स्वामी दयानन्द जी को ही लें, तो समकालीन तो
जन समाज उनका था, पर उनका रूप क्या था और उनके प्रभाव स्वरूप ही उनका व्यक्तित्व
था, उसका स्पष्ट रूप--उस रूप विशेष का प्रभाव व गुण--तो बाद वाले लोग भली
प्रकार समझकर अपनाते चले आ रहे
यथा मन पर जो छाप थी, कार्य कारण रूप दिखाई
दे रहा स्वरूप स्पष्ट हो सकेगा। अतः जो कुछ स्वामी जी समकालीनता के
संदर्भ में कहा! सब सत्य ही था, अतः जन मानस व पर प्रभाव समय बीतने
कालान्तर में बना ही बना क्या रहेगा और अधिक उजागर होकर प्रकाश देगा, जो
प्रेरणास्पद सिद्ध हो रहा है, यह निश्चित रूप जाना जा रहा इसलिए
स्वामी जी, तत्कालीन सम्पूर्ण भारत देश के कोने-कोने में भ्रमण कर अपने
ही नहीं, सामाजिक जीवन धार्मिक विचार धारा को ही एक नया स्वरूप दिया ही नहीं वरन्
राजनीतिज्ञों को जागृत कर, जन आन्दोलनकारी बना ही तो रहे स्वामी जी देश को
अमर कर जीवन दान दे कर चले; देश का जीवन बदले; उनके इस विस्तृत
व्यक्तित्व को जहां तक, हो उजागर कर
अपना लक्ष्य सिद्ध करें, यही सच्चा हमारा कर्तव्य
"यथा शक्ति सब रूप से यथा ज्ञान यत्न से सब दिशा सफल करना"
का नाम है।
303
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305
लेकिन जब वो वापस अपने कमरे की ओर लौट रहे थे तब वे एक कोने में सिसकियों की आवाज
सुनकर अपने कदम वापस मोड़ते हुए दो-दो सीढ़ियां फांद कर ऊपर वाली बालकनी पर पहुंचे तो वहां पर
उनके बड़े भाई विनोद कुमार रो रहे थे।... रोते-रोते वे कह रहे थे कि बाबू जी, काश!... आपके
पास अगर पैसा होता तो... वे सिसकते हुए कह रहे थे कि उनका सपना था कि वे
एक सी ए बनें लेकिन सिर्फ अपनी गरीबी की वजह से वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, वो अपनी पढ़ाई
जारी नहीं रख पा रहे थे। विनोद भैया बी.कॉम. पास थे लेकिन परिवार की माली हालत ऐसी
नहीं थी कि वे सी.ए. की पढ़ाई कर सकें। वे अपने सपनों को यूं टूटते हुए नहीं देख पा रहे थे।
विनोद भैया को रोते देखकर वे खुद नहीं रोये, पर उनके दिल को बहुत ठेस पहुंची, और उस
दिन के बाद से विनोद भैया की रुलाई कैलाश के दिल पर पत्थर की तरह हमेशा-हमेशा के
लिए जम गई। वो रात उनके लिए टर्निंग-प्वाइंट बन गई जिसने उन्हें आगे बढ़ने के लिए न
केवल प्रेरित किया, पर यह अहसास भी कराया कि वे आगे बढ़ेंगे, पर तब ही जब वे बाबू जी, अपने
परिवार को खुश रख सकेंगे, अपने परिवार के लिए कुछ ऐसा कर सकेंगे जिससे कि वे उन सभी
जरूरतों को पूरा कर सके जिसकी आज कमी थी।
कैलाश जी ने तय किया कि पढ़ाई तो आगे जारी रखनी ही है, लेकिन साथ-साथ परिवार
की आर्थिक मदद भी करनी होगी। अब सवाल यह था कि पढ़ाई और काम में तालमेल कैसे
बिठाया जाए और ऐसा क्या किया जाए जिससे कुछ आमदनी भी हो सके? उस समय, जब कैलाश जी
दसवीं कक्षा में थे तब वे मात्र 15 साल के थे। उनके पास न तो कोई बड़ी पूंजी थी और न ही
ऐसा कोई हुनर जिसके बल पर कोई बड़ा काम शुरू कर सकते। उनके पास था तो सिर्फ
विश्वास जिसने हमेशा उनका साथ दिया। उन्हें पता था कि काम में शर्म कैसी और काम छोटा
या बड़ा क्या होता है? और जब, इरादे नेक हों और दिल में कुछ कर गुजरने की तमन्ना हो,
रास्ता खुद ब खुद बन जाता है। उन्हें उन दिनों पता चला कि दिल्ली की एक जानी-मानी
कंपनी में टाइपराइटर की मरम्मत का काम होता है और अगर वे यह काम सीख लें, तो इसे वे
पार्ट टाइम कर सकते हैं जिससे उनकी पढ़ाई का हर्ज भी नहीं होगा और घर भी चल पाएगा।
उन्होंने हिम्मत बांधी, उस कंपनी में पहुंचे और काम सीखने की गुजारिश की। कंपनी वालों को
उनके इरादों और उनकी लगन पर भरोसा हो गया और उन्होंने कैलाश जी को काम सिखाना
शुरू कर दिया। कैलाश जी ने लगन से काम सीखा और दो महीने में ही टाइपराइटर रिपेयरिंग
का काम सीख लिया। काम तो सीख लिया, पर टाइपराइटर कहां से लाएं और कैसे बेचें? इन दोनों
प्रश्नों के उत्तर खोजने में उन्हें ज्यादा देर नहीं लगी। उन्होंने पुरानी दिल्ली के कबाड़ियों
से टाइपराइटर खरीदने का मन बनाया।
जेब में पैसे बहुत कम थे इसलिए कबाड़ियों से टाइपराइटर तो खरीदे जा सकते थे, पर
कैलाश जी जब कबाड़ी की दुकान पर गए तो देखा कि वहां पर काफी संख्या में पुराने, खराब
टाइपराइटर ऐसे ही पड़े हुए थे। कबाड़ी से बात करने पर पता चला कि बहुत-सी कंपनियों में
टाइपराइटर खराब होने पर या उन्हें बदलने के लिए लोग इन्हें कौड़ियों के भाव बेच देते हैं। कैलाश जी
के लिए यह फायदे का सौदा था। उन्होंने कबाड़ियों से खराब टाइपराइटर खरीदे और अपनी
लगन और मेहनत से उन खराब टाइपराइटरों को ठीक किया और अपनी पहली कमाई का जरिया
बनाया। उन्होंने तय किया था कि वे सिर्फ टाइपराइटर ठीक ही नहीं करेंगे, बल्कि अपनी
कमाई से बाबू जी के ऊपर परिवार चलाने की जिम्मेदारी के बोझ को भी हल्का करेंगे।
कैलाश जी जब टाइपराइटर ठीक करते थे तो इस बात का ध्यान रखते थे कि टाइपराइटर
पूरी तरह से सुधरे, ताकि ग्राहक को कोई शिकायत न रहे। इसके साथ ही, वे इस बात का
भी ध्यान रखते थे कि उनके किसी भी काम से उनकी पढ़ाई का नुकसान न हो इसलिए वे
टाइपराइटर रिपेयरिंग का काम केवल खाली समय में ही करते थे। अपने इस पार्ट-टाइम
काम से जो आमदनी होती थी, उससे वे अपनी पढ़ाई का खर्च तो निकालते ही थे, साथ ही घर के
खर्चों में भी बाबू जी का हाथ बंटाते थे। कैलाश जी का जीवन काफी व्यस्त हो चला था। वे सुबह
कॉलेज जाते, दोपहर में टाइपराइटर रिपेयरिंग का काम करते, शाम को घर लौटते और रात को
पढ़ाई करते थे।
अपनी कड़ी मेहनत और लगन से उन्होंने टाइपराइटर रिपेयरिंग के काम को धीरे-
धीरे इतना बढ़ा लिया कि अब वे न केवल टाइपराइटर रिपेयर करते थे, बल्कि उन्हें ठीक
करके बेचते भी थे। टाइपराइटर बेचने के लिए वे कंपनियों के दफ्तरों में जाते और उन
कंपनियों को अपने टाइपराइटर दिखाते। अपनी इस छोटी-सी उम्र में कैलाश जी ने टाइपराइटर
बेचने के बिजनेस को काफी अच्छी तरह से समझ लिया था।
टाइपराइटर के साथ-साथ कैलाश जी ने देखा कि कंपनियों को कई और चीजों की
भी जरूरत होती है जैसे टाइपराइटर के रिबन, कार्बन पेपर, स्टेशनरी आदि। कैलाश जी ने सोचा,
क्यों न टाइपराइटर रिपेयरिंग के साथ-साथ इन चीजों की भी सप्लाई शुरू की जाए। बस,
यह सोचते ही उन्होंने इन चीजों को भी अपनी सप्लाई में शामिल कर लिया और इस तरह धीरे-धीरे उनका
306
विचार करने लगा कि, यदि मुझे एक ऐसी कन्या मिले, जो सब काम काज गृहस्थी का भली भांति
जानती हो।
निदान उसने, अपने पिता द्वारा बात, कही कि मेरा विवाह करा दिया जाय।
तब उसके पिता अपने पुत्रके लिये ऐसी कन्या खोजने लगे कि, उसकी शिक्षा ऐसी मिली
होती कि वह उस बालकके घर गृहस्थीका काम काज--सीखना, पकाना इत्यादिक सब काम
भली भां तिसे करती अपने पतिको हरप्रकार से सुख देती, ना ऐसा कि, लाड़िली
की भां तिसे घर के कामकाज करने में आलस्य करतीहुई केवल बातें बनाती, अथवा
हर समय दर्पण ही में अपना मु ख देखा करती या हर प्रकार से गृहस्थीका सब काम बिगाड़
दिया करती होती।
सौभाग्य से ऐसा ही हुआ कि एक कु लीन जन की सुशीला और बुद्धिमती कन्या मिली
जिसे उसने सब बातों में चतुर और अपनी कन्या को भली भांतिसे गृहस्थ सम्बन्धी काम
का, न बहुत कुछ पढ़ा लिखाकर जैसाकि इस समय में देखा जाता है बल्कि
अपना काम काज, सब निज हाथ से करना सिखाया था जिसमें सब प्रकार वह उस कुल
रीति पर सब कुछ काम करे, जो उस बालिका कुल सम्बन्धी
सो इस कन्या का भी जब उक्त बालकके साथ सम्बन्ध हो गया तो यह भी समझी
कि मेरा ससुराल में बहुत धन और सुख ऐश्वर्य होगा, क्योंकि वह पढ़ी तो थी नहीं
कि जिस से कुछ संसार का गुण दोष जान सकती--जिस कारण स्वाभाविक सब के मन
ऐसा विचार उठा ही करता है। अब जब समय आया, तब दो चार दिन पाछे उसने
अपने पिता के घर सब काम काज अपने मन भाता सीखा था, सो सब काम अपने
पति के लिये सब सुख देने योग्य समझ कर किया करती पर इस ओर इसके
सुसरालके सबही मनुष्य इस पर बहुत ही अप्रसन्न
रहते कि देखो हमारा लड़का दिन रात जो जो कमाकर लाता है, सो सब
व्यर्थही बिगड़ता जा रहाहै। क्या यह सब हम को खाने को मिलता कि जोप्रतिदिन
अनेक प्रकारके भोज, नाना प्रकारकी मिठाई और कई तरह की तरकारी आदि,
सब नित्य पकाई जाती हैं। भला हम को तो केवल रूखा सूखा, मोटा झोटा? हमारे सब
कपड़े, फटेही चले जा रहे हैं। भला हम को तो कुछ नहीं मिलता? हमारा ऐसा कमाऊ
लड़का सब कुछ अपने घर ले जाकरपकाता खिलाता रहे तो, हमारा क्याभला? हमारा
लड़का अपनीगृहस्थी लिये बैठा रहे तो हम को क्या सुख हो सकताहै हमारी ऐसी
कमाईसे ? हमारी कमाईतो इस समय तबही है, जबकि हमको सब कुछसुख मिलै?
हमारे लड़केने अपना अलग घर बसाया? अब हमको क्या सुखहोगा। हमारे लड़के की ऐसी
गृहस्थी से? हमारी सब आशा मिट्टीमें मिल गई, ना ऐसा हुआ, बहुलड़केके पास
सुखपूर्वक आनन्द में रहे, ना हमको कुछ उनसे सुख मिले? सो ऐसा ही
विचार कर सबही जन बहुत ही अप्रसन्न
रहने लगे और, "नाक भोंहें चढ़ाते"
अथवा इस बात विचार से दोनों पतिपत्नी बहुत चिन्तातुर रहने लगे कि इस दशा
में, अब हम को तो गृहस्थी आश्रम में बड़ा ही क्लेश हो रहा है। हम दोनों में एक
दूसरे को सब प्रकार से सुख देने की इच्छा रख कर भी अपने ही सुख को नहीं कर सके
जिस बात का कारण केवल अविद्या ही, अतः; विद्या ही से पिता, विद्या ही से सच्चा
गृहस्थी होना है।
जब उन को, इसप्रकार संताप होने लगा तो, उनने जो गुरु दोनों जन को पढ़ाते
सिखाते उनके पास जा कर अपनी सब कथा कह सुनाई कि हम दोनों तो सब रीतिसे
एक दूसरे को सुख के लिये यत्न करते हैं परन्तु फिर भी हमारे घर में सब ही जन
जो इस बात कारण से कि हम परस्पर प्रेमसे सब काम कर रहे हैं सो दुःख पा रहे,
अब, यह दशा देख कर हम दोनों सदा क्लेश में रहते हैं! ऐसा न होवे,
तब हां, इन दोनों को ऐसा ज्ञान क्यों न हो! विद्या ही से सब काम सिद्ध हो सके,
सो ऐसा ही दोनों जन ने कहा! कृपा कर, दोनों जनों को पढ़ा दो, सब प्रकारकी
विद्या से पूर्ण करा दीजिये, कि जिससे सब रीति से गृहस्थ धर्मके आनन्द को दोनों
जन ही भलीभांति जान सकें।
इस रीति शास्त्र का सार उन को जब गुरुने पढ़ाया, विद्या पढ़ा
कर सब बातें उन दोनों को इस रीति पर समझाई कि जिस तरह अब तक वे
घर में रहकर भी सब बातों में अनभिज्ञ होकर क्लेश पा रहे थे, सो सब दूर
होकर गृहस्थ आश्रम में, गुरु की कृपा से गृहस्थ का सब सुख होने
लगा। सो इस प्रकारके विद्या से ही मनुष्य का गृहस्थ आश्रम भी सब
प्रकारके सुख से भर जाता, सो विद्या का प्रयोजन ही ऐसा है कि मनुष्य को
307
जीवन का स्वास्थ्य जो चेतना का रूप धारण करता है। इसके अतिरिक्त चेतना का कोई रूप
अस्तित्व में नहीं रह गया था। यह ही उसकी सीमाएं, इसके परे--जैसा भगवान् श्रीकृष्ण
को भी आभास हो रहा था विदेह स्थिति, वह संभव नहीं रह गई थी। इसलिए
कृष्ण के ऊपर कोई विपदा तो थी, पर वह विपदा एक ही थी और उसका स्वरूप
जीवन मात्र से ही बंध कर सीमित होने लगता था। इसलिए जब कभी कोई नया संकट
कृष्ण खड़ा कर सकते थे अथवा उनके सम्मुख उत्पन्न हो सकता था तभी वे चेष्टित
होते थे। इस प्रकार जब वे बलराम के समझाने पर मथुरा की ओर चलने को तत्पर हो रहे
थे। उसी समय विदा की बेला में जो संकट उनके सामने खड़ा हो रहा था, उसमें वे इस बात
को भली प्रकार समझ रहे थे कि-मथुरा की सीमाओं तक ही उनका अस्तित्व था।
सीमाओं के पार वे जा सकते थे लेकिन उस पार जाते ही विदेह की स्थिति खो जाती
थी, तो यह वास्तविकता के ऊपर चेतना का प्रहार ही माना जाएगा। कृष्ण इन सब बातों को
समझकर ही आगे बढ़ेंगे। लेकिन वे यह भी जानना चाहते थे कि
सब के सब एक साथ रोने के लिए तैयार क्यों हैं? यह कोई नया संकट नहीं
संकट से जूझने वाले सब लोग यह बात तो भली प्रकार समझ ही सकते हैं।
गोपियां तो शांत थीं।
कृष्ण ने देखा था, केवल दो गोपियां सिर झुकाए उदास मुद्रा में बैठी थीं,
जिन पर इस स्थिति अथवा विचार विशेष अथवा कृष्ण के चले जाने का कोई प्रभाव
पड़ना संभव नहीं था! राधा शांत बैठी थी, कृष्ण ने सोचा विदा तो वे लेंगे
ही, पर किससे लें, किससे पहले लें? यह बड़ा सवाल था, पर राधा सम्मुख आकर खड़ी
कृष्ण के उस प्रश्न का उत्तर दे देना चाहती प्रतीत होती थी, जो उन्होंने कभी
पूछा ही नहीं था। वह केवल यह सोचती थी, इस विदा का कोई महत्व नहीं
होगा इसलिए कि वह तो अब तक रोते रहे, पर उसने कभी एक भी आंसू नहीं,
जो उसकी इन आंखों तक आया हो, वह कभी भी रो नहीं सकती थी, रो सकती भी कैसे
जब सब लोग रोने लगेंगे तब कोई शांत बैठना चाहे तो उसे शांत बैठने देने का
अधिकार दिया जाना चाहिए अथवा नहीं? वह केवल यह कह सके, यह उसकी
शक्ति के बाहर होता जा रहा था। राधा विवश हो सकती थी, कृष्ण को भी यह
बात भली प्रकार से समझाई जा सकती थी। इस प्रकार वे सोचती थीं, तो कृष्ण भी
यह तो नहीं कह रहे थे। कृष्ण ने देखा सब कुछ शांत था। केवल यशोदानंदन
कन्हैया ऐसा नाम जिसे बार-बार पुकारा जाता था और वे रोते-रोते उस सीमा तक,
जिसमें केवल एक बात ही कही जा सकती थी। वे सब
केवल यही कह रहे, "कृष्ण केवल तुम।"
इसके बाद यशोदानंदन कन्हैया का ही अस्तित्व, कन्हैया केवल
कृष्ण ही केवल इस तरह से कन्हैया का अस्तित्व ही सब कुछ था। वह बलराम भी,
नंदबाबा भी केवल यह जानते थे। वह जानते थे। इस बात की बात भी नहीं
आवश्यकता समझी गई, पर यह भी सचमुच में संभव था, जब कृष्ण चले जाएंगे
तो, जो सब कुछ यहां शेष रह जाएगा वे केवल उस बात को, अपनी भाषा में
एक कन्हैया, एक कन्हैया, केवल कन्हैया, के रूप में व्यक्त करेंगे और इसके
बाद
एक भी नया रूप नहीं होगा, यशोदा मां का वात्सल्य जब जागृत होता तो
केवल मां, कृष्ण तक सीमित हो, उस बात को यशोदा ही कह सकती थी,
यशोदा भी इस बात को समझती थी, पर वे नंदबाबा के साथ थीं, इस बात का कोई
नया अर्थ तो नहीं हो सकता था। इस बात का अर्थ केवल इतना ही था, यह सब वे जानती
थीं, केवल उस समय यशोदा उस रूप में रोती, विवशता को ही अपना रूप दे सकी
और उस सीमा तक जहां तक
"हे कृष्ण केवल तुम।"
इसके बाद तो कुछ भी शेष नहीं था, पर उस पार जाना कोई बहुत
मुश्किल काम न होता तो शायद कृष्ण भी, जो गोकुल की सीमा लांघ न सके, उस
सीमा पार जाने का कोई प्रयास न करते या न ही गोकुल छोड़ कर जा पाते। कृष्ण
जानते थे कि मथुरा का रूप क्या हो सकता था। केवल विदेह स्थिति, जो वहां
समाप्त थी, वह सब अस्वाभाविक था, पर उस स्थिति को वास्तविकता प्रदान करने
का यश तो यशोदानंदन कृष्ण कन्हैया केवल एक रूप प्रस्तुत कर सकते थे, जो
वहां के लोगों के लिए आवश्यक नहीं था, कृष्ण केवल थे? इस सीमा को पार
कर वे वास्तविकता को स्वीकार करने के लिए नए रूप यशोदानंदन कन्हैया का
रूप प्रस्तुत करने जा रहे थे।
308
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309
कथा समाप्त हो जानेके पश्चात् उसने उस सेठ को बुलाया, और उससे कहने लगी कि तुम अपने कपड़े और
सोने का हार ले लो तथा मुझे घर पहुँचाने की कृपा करो।
सेठने इसके उत्तरमें उस वेश्या लवणवती से जो जो बातें कीं उनपर पाठक विस्मय करेंगे!
सेठने उससे कहा कि उस धर्मकथाके फल से तो मैंने अपने अन्तःकरणको शुद्ध किया है। मैं पहले
कामी था, पापकर्म करके अपना जीवन, अपनी यह देह खोता था। उस कुशीलके फलसे नरक में जाना
पड़ता था तथा इस लोक में भी दुर्गति का पात्र बनना पड़ता था, परन्तु अब मैं, धर्मकथा सुन
पवित्रात्मा बन गया हूँ! इसलिये मुझमें पाप क्योंकर सम्भवे? अब कामिनी का क्या काम है,
विषय का क्या काम, सम्पदा का क्या काम, हार का क्या काम? सो आप ले जाइये।
इन बातों को सुन वह रो पड़ी कि जिस सेठ को वेश्या बनाने आई, वही उलटा
शिक्षा दे रहा है। अपने मनमें सोच विचारकर उसने भी यह बात स्वीकार की और बोली कि
जी, आपकी बहिन अथवा बेटी हूँ--सो मुझे भी धर्मोपदेश करो, जिससे नरकके डर से बचूँ।
अब तो मेरा पाप, उस पापी जीवके सदृश नरक पहुँचाने वाला होगा? क्या उपाय करूँ? मुझे कोई
उपाय सुझाया जाय! हे भाईजी! मुझे तारिये। मुझे पवित्र बनाइये! मुझपर भी दया की
जायगी? मुझे भी धर्मका मार्ग मिल जायगा? मैं भी ऐसी पवित्र बनूँगी, कि फिर
पापस्थान में कभी पैर नहीं धरूँ। मेरा सारा जन्म पापमें क्यों बीता होगा? इस पापकर्म से
मुझे मुक्ति कैसे मिल जायगी?
इन बातों को सुन सेठजी बहुत ही प्रसन्न हुए, सो यह बात विचार-योग्य
विचारने की विचारना से भरा हुआ मनुष्य जब कभी भी उपदेश पाता है तभी चेतता
है, यह सोच सेठने भी उसे सच्चा नियम दिलाकर धर्मोपदेश दिया, अब दोनों ही के मनमें
वैराग्य जागा था, "संसार अनित्य, अशरण संसार, संसार असार।"
सेठजी तो अपने घर से ही सब धर्म कर्म के फल को जान आये थे। अब
लवणवती को साथ ले नगर की ओर आये, मार्ग में उस वेश्या लवणवती को जो
मिलें सो सब उससे कहें कि लवणवती तू सेठ के साथ कहाँ से आती है? इस पर वह
लवणवती कहने लगी, धर्मस्थान से आई हूँ। तुम भी चलो। इस तरह वह भी, इस
नवीन रीति वाली हुई--सो नगर में जाने पर ही उसने जो लम्पटों का मेला था
तोड़-फोड़ कर, धर्मका ही फल चाहा, सब ही को धर्म कहा, लम्पटों से मुख फेर
सब धन धर्म में लगाया, सो भी ऐसा कि; उस समय जो निर्धन थे, धनवान् हुए, जो
रो रहे थे सो हंसने लगे तथा सब मनुष्य ही धर्मके काम करने लगे। सेठजी के
धन का भी कोई पार नहीं था। वे भी मुक्तहस्त से दान करने लगे।
सेठने जो लवणवती वेश्या बनाई थी उसको छुड़ा दिया। सो इस प्रकार विद्या-मन्दिर
तथा औषधालय इत्यादि का सब काम ही उस पुण्य वेश्या के हाथमें सौंप दिया। इस
प्रकारके अनन्त वैभव और धन को त्याग कर, सेठने तथा वेश्या दोनोंने ही अपना परलोक
का मार्ग सुधारा।
सो भव्य जीवों को, "सद्धर्म प्रभाव से ही सुमार्ग मिलता है।"
ऊपर लिखे गये पाठ से हे भव्यो, विचार करो कि उस धनपाल सेठने
जिसे, एक ही कथा से यह लाभ हुआ, सो धर्मस्थान कभी-कभी जब जाओ तो
मन लगा कर कथा को सुनो। इस प्रकार, सुलोचना का रूप धार कर वेश्या जो उस
सेठ को रिझाने आई थी वह निष्पाप कैसे हुई? क्या लवणवती ने धर्म का नाश
कर उस सेठ को वश में किया था? क्या सेठने उस वेश्या को भोगके वश
उस रूप सुलोचना को चाहा था? सो नहीं, कभी भी नहीं, दोनों ही शुद्ध विचार
से पवित्र निकले; उस कथा को सुन कर ही दोनों ही पार हो गये।
इस लिये ऐसा धर्म जो सब पापों को दूर कर मुक्ति को पहुँचाने वाला है।
इस धर्म का ऐसा प्रभाव है कि जिसे प्राप्त कर, मनुष्य सब प्रकार के भोग-
विलास त्याग कर वैराग्य को प्राप्त होता है। जब भी जीव को धर्म का
सत्य स्वरूप मालूम होता है तब वह सब पापों को त्याग देता है। सो इस प्रकार
धर्म का फल सब जीवों को जान लेना चाहिये; यही विचार करके धर्म
का फल भी भोगना चाहिये!
अब इस कथा से निश्चय हो गया, कैसा प्रभाव इस कथा का है? उस
कथा प्रभावसे क्या नहीं हुआ, सो अज्ञानी जन इस बात को क्या जानें? अस्तु, पाठकों
को सदा धर्म कथा को ही सुनना चाहिये। यह मन कभी भी एक ओर नहीं रह सकता।
इसलिये भाई, सदा उत्तम काम को ही चित्तमें लगाये रखना चाहिये।
सो सब प्रकार ठीक।
310
लेकिन इसके विपरीत यदि वह यह समझता कि संसार का कोई पदार्थ तो क्या संसार
भरके पदार्थ एक होकर एकत्रित होंवे, तथापि मुझे ? एक आत्मावलोकन से एक रंच भी
अधिक लाभ उपजाना असम्भव क्या सर्वथा असमर्थ केवल भ्रम ही मात्र या मिथ्या, तो कभी
उसमें वा उस विषयमें चित्तवृत्ति उस को इस भ्रम वा मोह से, या अज्ञान संशय और भ्रमसे
पृथग्भूत कर इस समय अपने निज वा आत्म रूप स्थिति योग्य समय समय रूप
अभ्यास को प्राप्त कर निजस्वरूप विशुद्धता केवल केवल ही कारण था ऐसा विचार
कर, प्रथम ही अपनी शुद्ध चित्तवृत्ति रूप उस समय केवल ज्ञान का, वा केवल
सम्यक्त्व दर्शन रूप अवलोकन ही मात्र, यद्यपि इस समय--स्थिति उस समय योग्य
उस प्रकार के अभ्यास का भी अभाव था।
यथायोग्य समझ लो, केवल आत्मावलोकन उस उस सब काल मात्र में ही संभव
या सत्य और विशुद्ध केवल स्वरूप, फिर उस सत्य रूप स्वरूप मात्र विचार, केवल शुद्ध
केवल ज्ञान रूप केवल विलास केवल २ प्रकार के मात्र से ही उस का योग्य अवलोकन
यथा योग्य रहा, तब स्वावलोकन विशुद्ध केवल केवल रूप, यथार्थ सत्य ही, जो
केवल प्रत्यक्ष शुद्ध स्वावलोकन ही सब कुछ सब ही का यथार्थस्वरूप प्रत्यक्ष शुद्ध या
शुद्ध केवल रूप
यथायोग्य ही सब कुछ उस ही सब का, उस सब सत्य का, स्वरूप ही सब कुछ का
प्रकार का यथार्थस्वरूप प्रत्यक्ष सब सब सब प्रत्यक्ष केवल केवल प्रत्यक्ष सब सब प्रकार
यथार्थस्वरूप ही सब का सब रहा
इस स्वावलोकन ही से सब सब ही का प्रत्यक्ष सब ही, स्वावलोकन मात्र केवल, सब
यथार्थस्वरूप, सब स्वावलोकन का फल ही सब ही, सब स्वावलोकन ही केवल या सब
सब कुछ सब सब प्रकार से सब ही सब सब प्रकार से सब सब प्रकार का सब प्रकार
से स्वावलोकन ही से सब प्रकार से सब ही सब प्रकार सब ही सब प्रकार यथार्थ
ही स्वावलोकन सब सब प्रकार सब ही प्रकार सब ही सब प्रकार केवल सब ही प्रकार
स्वावलोकन ही सब प्रकार से प्रकार का प्रकार प्रकार केवल सब ही सब प्रकार,
केवल सब सब ही प्रकार से सब ही सब स्वावलोकन सब प्रकार से प्रकार ही का प्रकार
का प्रकार सब प्रकार से २ प्रकार का प्रकार सब ही प्रकार केवल ही प्रकार प्रकार ही
प्रकार का केवल प्रकार सब ही प्रकार से सब का सब
सो स्वावलोकन क्यों? स्वावलोकन सब प्रकार से प्रकार ही का यथार्थस्वरूप केवल सबही
सब ही सब प्रकार स्वावलंबन स्वरूप मात्र ही से सब सब सब ही सब सब ही सब, सब
सब ही, स्वरूप का सब सब सब स्वावलंबन ही केवल सब सब स्वरूप सब
स्वावलोकन ही सब ही सब सब सब स्वावलंबन स्वरूप यथार्थ
सो सब का सब ही सब स्वावलंबन का सब सब प्रकार का सब सब प्रकार ही सब
प्रकार सब ही प्रकार यथार्थ प्रकार यथार्थ ही सब ही सब प्रकार केवल ही सब
ही सब प्रकार ही प्रकार ही ही सब सब ही प्रकार ही ही सब सब सब स्वावलंब
स्वावलंब सब सब प्रकार सब सब प्रकार स्वरूप सब ही स्वरूप ही प्रकार सब
प्रकार ही सब सब प्रकार प्रकार सब सब स्वावलोकन सब सब प्रकार सब ही सब
स्वावलोकन ही सब प्रकार सब प्रकार स्वावलोकन सब
सब प्रकार का, सब प्रकार का, केवल सब सब सब ही सब सब स्वरूप का, सब
मात्र ही, केवल! केवल स्वरूप ही ही सब सब सब सब का केवल सब प्रकार
केवल स्वावलंब सब ही स्वरूप ही ही केवल सब सब ही ही सब ही स्वावलंबन
केवल स्वरूप ही सब का सब ही स्वरूप ही, सो सब स्वरूप सब प्रकार
स्वावलंब सब सब सब सब ही स्वरूप के स्वावलंबन से, स्वरूप सब ही स्वरूप सब
सब प्रकार सब सब ही ही स्वावलंबनस्वरूप सब ही स्वावलंबन सब प्रकार सब
सब ही सब प्रकार स्वावलंबन रूप केवल सब प्रकार का, केवल! केवल स्वरूप ही ही
सब सब सब प्रकार स्वरूप ही सब प्रकार सब स्वावलंबन का सब प्रकार सब प्रकार
केवल सब प्रकार
सब सब प्रकार सब स्वावलंबन स्वरूप ही सब प्रकार प्रकार सब स्वावलंबन ही
प्रकार प्रकार ही प्रकार सब सब सब प्रकार ही प्रकार सब स्वावलंबन ही सब
प्रकार सब सब ही सब सब सब प्रकार ही स्वरूप सब सब प्रकार प्रकार सब
स्वावलंबन ही सब प्रकार सब ही सब स्वरूप का, सो केवल स्वरूप
"स्वरूप स्वरूप ही के केवल स्वरूप का"
यथार्थ सब ही? सो केवल ही केवल ही सब सब सब २ मात्र, सो ही
स्वावलंबन केवल केवल प्रकार स्वावलंबन प्रकार सब सब सब प्रकार रहा, सो ही! प्रकार
सब प्रकार प्रकार सब ही प्रकार सब ही प्रकार का स्वावलंबन रूप
311
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312
दाता उस रूप को नहीं जानता जिसे जीवने रूप समझा रखा था इसीलिए दाता को यह सब
अस्वाभाविक सा प्रतीत होता था क्योंकि वह तो अद्वैतवादी सत्य का साधक प्रतीत होता
इसलिए वह तो सदा यही सोचता कि इस तरह शारीरिक सुख भोगने इच्छा जो भी जीव
धारण करता रहता वह तो न जाने किस संसार में, जो इस दृश्य संसार जैसा नहीं था तथा
जो चेतना का प्रतिरूप या छाया रूप रहा होगा, जो कभी वर्तमान जगत् का न होकरके भी
चेतनावस्थास्वरूप अपनी छाप इस पर छोड़ ही जाता होगा, काल्पनिकस्वरूप जैसा बनकर
दाता समझ रहा था कि संसारियों का सोचना तो संसार के विषय वासना युक्त व्यवहार
पर अवलम्बित या आधारित रहा होगा पर जिसे मुक्ति अथवा निर्वाण स्वरूप माना गया उसे
मानना चाहिए था, उस संसार के समस्त शारीरिक व्यवहार स्वरूप को तुच्छ समझना
तो स्वाभाविक रूप रहा होगा पर जिसे जीवन समझा जाता रहा, मुक्ति उस जीवन के समस्त
सांसारिक व्यवहारों का अंत, भले ही वह कुछ काल तक सांसारिक या वैयक्तिक या फिर
पारिवारिक रूप रहा
मुक्ति का तात्पर्य क्या? दाता तो यह समझ रहा था कि जीवने मुक्ति को,
जो साकार रूप दिया था उस रूप में जीव को कभी न कभी उस संचित शक्ति का रूप
दिया होगा, जिसे वह पुनः प्राप्त न कर सका तथा जीवन भर असीम दुख सहता
था, पर जो सब कुछ सह कर उस रूप को प्राप्त करता था, मुक्ति स्वरूप अवश्य ही
बन कर सब कुछ त्यागने का मन बना लेता होगा या, जो पा कर खोता होगा, जो पा
कर खो चुका होगा उसने जीवन भर मुक्ति रूप पाने का साधन अवश्य खोज लिया
ही होगा, उस खोज के आधार, जो भी स्वरूप या विचार रहा होगा उसी रूप
दाता को देखना चाहिए जीवन रूप को, जिसे वह समझ सकने योग्य
दाता विचार तो कर रहा था पर जीवन उस रूप से परे तथा दाता रूप से भिन्न
एक साकार रूप धारण किए हुए, जिसे वह समझने अथवा मानने योग्य न तो
शक्ति रखता था
"तू साकार हो या निराकार अपना बता"
या तो दाता को मन ही मन यह तय करना था या तय हो कर ही सब कुछ तय
करना था या जीवन-मरण रूप चक्कर को देखना था, जीवन-मरण का यह रूप जो
दाता देख रहा था स्वाभाविक ही प्रतीत होकर दाता को सम्मोहित सा, पर सब
कुछ रूप तो नहीं हो जाता यदि न दिखता दाता के सामने, मुक्ति का यही रूप
ही साकार रूप बना रहता तो दाता? क्या जीवन-मरण के बंधन से दाता को भी
बांध कर तो नहीं रखा जाएगा? तो दाता क्या तय करेगा? जो भी तय हो कर भी
सत्य न होगा जीवन-मरण रूप तो दाता का तय न तय ही रहेगा रूप तो तय रूप
अथवा जो नहीं होगा, तो स्वाभाविक रूप लेगा? या रहेगा ही? या दाता का भी
एक न रूप, साकार न हो होकर सम्मुख आकर जीवन रूप को ही स्वरूप का
ही रूप तो देकर रहेगा ही, या वास्तविक रूप बन दाता को घेरना प्रारंभ करेगा? या
दाता स्वयं ही, जो कुछ रूप नहीं समझ पाया होगा? या दाता ही
दाता रहेगा ही, या वास्तविक रूप जिसे समझना चाहिए?
जो भी हो या वास्तविक रूप ही तो तय करना था, पर यह समझ में
दाता के तो आ ही गया, पर दाता का तय रूप उस रूप के रूप में जो, दाता
तय करपाता या न, उस पर निर्भर था उस रूप उस रूप को दाता क्या
कहता, सम्भवत या तो अद्वैत, रूप तय रूप धारण कर दाता स्वरूप को घेर
रहा होगा तथा उस स्वरूप को दाता देख सकने योग्य रूप जीवन-मरण न होता
तो, मुक्ति रूप को दाता या तो या जीवन-मरण स्वरूप को देख रहा, जो रूप
दाता के सामने प्रकट हुआ
दाता बोल उठा, "तू अपना बता"
अब तो या तो दाता को समझना तय ही था जीवन स्वरूप, मुक्ति, दाता या
वास्तविक रूप का अस्तित्व या मुक्ति स्वरूप का सम्मुख स्वरूप या जो
जीवन रूप दाता के सम्मुख अठखेलियां करता हुआ जीवन-मरण रूप में, दाता
स्वरूप को समझना या तो स्वीकार करना रूप या तो समझना दाता रूप रूप रहा
ही था, जिसे जीवन दाता देख रहा था तो, रूप तो वास्तविक रूप दाता स्वरूप
दाता बनता ही, दाता रूप में ही सही था, मुक्ति रूप उस दाता रूप बन ही
रहकर दाता रूप ही तो बनता, दाता तो सब देखता रहता था दाता स्वरूप,
दाता का अस्तित्व खत्म था
जो भी हो दाता रूप तय नहीं था, दाता रूप था, दाता रूप का स्वरूप
जो दाता रूप में ही तो अपना स्वरूप समझ कर दाता को सम्बोधित किया था
313
लेकिन क्या यह सब केवल किसी सीमा विशेष तक ही संभव नहीं रह जाता?यदि हाँ तो केवल
तब ही व्यक्ति निष्पक्षता की स्थिति को पा सकता है। जब किसी एक को त्यागने की विवशता
सामने खड़ी हो? निष्पक्षता की स्थिति केवल किसी की या तो या की अवस्था में
केवल तभी तक संभव है। व्यक्ति को अपने ही के संबंध में कभी कभी ऐसे ही कष्ट के
पार गुजरना
हो तो निष्पक्ष हो जाना कोई सरल बात नहीं है। इसके तो अपने ही किसी ऐसे संबंध
और निष्पक्षता के दो पाटों स्वरूप स्थिति पैदा होने लगती है, जैसे कि किसी व्यक्ति
को अपने किसी अति प्रिय सम्बन्धी जिसे वह बहुत चाहता हो उससे ही यह बात पता चले
कि वह न केवल गलत काम कर रहा है पर वह स्वयं भी निष्पक्षता के मार्ग से भटक रहा
अथवा उस पर किसी गंभीर आरोप के ही परिणाम स्वरूप उस व्यक्ति से अपना नाता संबंध
तोड़ लेना पड़ता रहा हो अथवा निष्पक्षता की खातिर न केवल उसे ऐसा करना पड़ा हो
बल्कि न केवल अपने ही सम्बन्धी, निष्पक्षता न्याय स्वरूप न केवल इस बात की पहल
उस की ओर से निष्पक्षता के रूप में हुई हो, बल्कि निष्पक्ष न्याय विचार पक्षधरता
दोनों ही में निष्पक्षता को हीन करने का आधार अथवा कारण तो बन ही रहा
निष्पक्षता तक पहुंचे बिना ही ऐसे-तैसे ही यह व्यक्ति ही, ऐसे-तैसे ही अपनी
निष्पक्षता को स्वयं सिद्ध कर
"हो सकता है, निष्पक्ष न्याय हेतु"
पर इस सब स्थिति के ही आधार विशेषाधिकार स्वरूप ही, यह निष्पक्षता केवल
तब निष्पक्ष तब मानी जाती जब तक किसी गलत न्याय की निष्पक्षता न होकर उस व्यक्ति
विशेष तक ही न रहकर उस विशेषाधिकार सब--विशेषाधिकार का रूप लिए हुए
भले ही वह उस के पक्ष में ही रहकर केवल निष्पक्षता का दावा करता रहता
निष्पक्ष न्याय न्याय न रह केवल पक्षधर केवल बनता, जो कि तब न्याय पक्ष बन जाता
न्याय केवल तब तक ही संभव निष्पक्ष माना जाता जब तक न्याय स्वरूप ही बना?
निष्पक्षता का यह रूप कि निष्पक्षता ही निष्पक्षता का ही रूप बन न्याय केवल
का आधार बना रहता न कि इस तरह निष्पक्ष माना जाने वाला न्याय पक्ष का रूप ले
सकता, न्याय निष्पक्ष न्याय बना रहता तो सही, न्याय स्वरूप, सब पर एक सा ही
निष्पक्ष कहा गया निष्पक्षता न्याय निष्पक्षता निष्पक्ष न्याय तो वह रूप है जो न्याय
का न्याय ही स्वरूप, उस सब से, निष्पक्ष सब पक्ष रूप को भी कह दे, ना कि सब
न्याय स्वरूप केवल न्याय स्वरूप बन ही न सके निष्पक्षता का ही रूप बना रहे।
निष्पक्ष पक्ष न्याय स्वरूप ना बनने से उस न्याय स्वरूप निष्पक्षता न्याय केवल
एक पक्ष के रूप बन कर केवल बन कर रह जाता निष्पक्ष ना कहला
न्याय रूप रहता ही? जहां न्याय ही ना हो वहां निष्पक्षता का रूप बन सब
पक्ष एक जैसा न्याय ना बने सब पर एक सा न्याय ना निष्पक्ष बन कर सब को
न्याय तो सब देवेगा, सब न्याय केवल सब न्याय का केवल ना बन कर, मात्र
निष्पक्ष न्याय का एक स्वरूप बनेगा, सब न्याय केवल मात्र सब न्याय के ही रूप
निष्पक्ष न्याय स्वरूप बन ही ना सकेगा, निष्पक्षता केवल ना बन, ना बनेगी,
ना केवल न्याय ही बन सब को न्याय देवेगा, ना केवल सब न्याय केवल बन ही
सकेगा निष्पक्ष तो सब न्याय के ही बन कर न्याय स्वरूप रहे।
जो सब न्याय स्वरूप, सब पर एक सा निष्पक्ष ही न्याय का स्वरूप ना बन सके
तो सब का भला कैसे हो सब न्याय सब को एक सा ना बने तो सब न्याय सब
का निष्पक्षता रूप, या विशेषाधिकार रूप ना बन सब न्याय का ही रूप बने,
न्याय तो सब एक समान
सब निष्पक्षता सब निष्पक्षता न तो व्यक्ति का सब का, न केवल न्याय ही
सब को निष्पक्षता दे सकता ना ऐसे-वैसे ही न्याय का रूप हो सब व्यक्ति सब
सब सब व्यक्ति केवल सब सब का रूप, न्याय सब व्यक्ति को केवल निष्पक्ष ही
सब बना सके
ऐसा न्याय बने, "प्रत्येक व्यक्ति सब को निष्पक्ष रूप"
जिस पर ना सब रूप का सब रूप ना बन सके; केवल न्याय केवल
ही ना बन कर निष्पक्ष सब पक्ष रूप को सब न्याय सब न्याय का न्याय स्वरूप न
बन केवल निष्पक्षता निष्पक्षता का नाम मात्र रूप केवल निष्पक्ष का न्याय रूप ही
निष्पक्षता को स्वयं रूप सब सब निष्पक्षता का नाम मात्र निष्पक्ष न्याय, केवल
स्वरूप का रूप ना रूप में सब के साथ ही, सब निष्पक्षता सब निष्पक्ष हो
सके सब रूप ही तो निष्पक्ष रूप
314
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- पृष्ठ संख्या: 315 (नीचे दाईं ओर)
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इस प्रकार जब अलग-अलग काम हो, अलग-अलग काम का भाव आध्यात्मिक साधना
का आधारभूतस्वत्व रूप समझना ही वास्तव में ईश्वर भक्ति माना जायगा, किसीका भी
अपमान न होगा, किसी काम पर भी यह भाव आयेगा, किसीका भी काम छोटा या निष्फल
नहिं रहा, प्रत्येक का ही काम परमेश्वर के सम्मुख रहने और उस की सन्निधानता रूप
एक आधार का सम्पादक माना ही जाय सब काल में, किसीका भेद ही न रहा-सबके
ही निष्काम कर्मयोग रूप अभ्यास के फल से सब को ही परम शान्ति प्राप्त हो सके
और उस परमपिता परमात्मा का साम्राज्य ही सत्य रूप, सब काल में सब प्रकार
सत्य स्वरूप ही माना जाय और सब काल अथवा में, जब तक संसार रहे, तब तक ईश्वर भक्ति
ही रहेगी
"सब को ईश्वर का प्रकाश रूप स्वरूप माना गया"
इस ऊपर लिखे हुए, प्रमाण के साथ, सब मत पंथ भी काम में, जो साधन का
फल आत्मिक शान्ति रूप अथवा स्व स्वमान्य को ठहराया गया हो, सब प्रकार यथार्थ माना
सब मतों द्वारा गया है, वास्तव में सब काल रूप साधन ईश्वर सम्बन्धी प्रमाण रूप
का आधार ही अभ्यास रूप से आत्मिकस्वरूप के प्रकाश रूप में ही सब मतों द्वारा
माना गया, तो सब मतों का परम आधार ही आत्मिक सत्य रूप
प्रकाश ही आत्मिक रूप से सब मत पंथ वालों को प्रिय है, तो जो भी जिस भी
प्रकार उस प्रकाश रूप परमात्मा रूप को ही मान कर ही उस का ही अभ्यास करता
हुआ उस परम प्रकाश को आत्मिक रूप से ही प्राप्त करना चाहता है उसका यह भाव
सब प्रकार से ही सत्य समझा गया सब काल रूप में, जब कि आत्मज्ञान रूप सब
प्रमाण सब को ही एक ही भाव में सत्य ज्ञान-स्वरूप रूप परमात्मा का माना
गया और सब मत पंथों के तत्व रूप आधार को सत्य ही मान कर सब प्रकार से ही
अभ्यास को सब काल स्वरूप माना तो जो विरोध का भाव सब काल प्रत्येक मतों
का आपस में चला आ रहा माना, उसका आधार किस पर ही माना गया? प्रत्येक मत ही
सब प्रकार के अभ्यासक गण, केवल शास्त्र के ही वचन द्वारा अपने मत की
बड़ाई करते हुए दूसरों रूप अपने विरोधी माना गया अथवा सब गैर-मुसलमानों
को काफिर माना गया
जिस प्रकार, "सब संसार का प्रकाश रूप माना गया"
सब परमात्मा का प्रकाश रूप ही सब मत पंथ वाले आधार रूप मानकर सब प्रकार
विरोध भाव को क्यों रूप बना रहे? उसका भाव यही था, केवल शास्त्र की बड़ाई
द्वारा ही, किसी भी प्रमाण को आत्म-साक्षात्कार यथार्थता के सम्मुख नहीं माना गया
केवल ही अपने ही सम्प्रदाय शास्त्रार्थ परम्परा के अनुसार बड़ाई का रूप सब
ने ही, सब का आधार ही केवल अपने साम्प्रदायिक स्वरूप को ही ठहराया, उस कारण
सब सम्प्रदाय, सब काल ही एक दूसरे दृष्टिकोण सम्प्रदाय रूप से असत्यता
ठहराकर सब को आपस में अधर्मी रूप मान करके आपस में विरोधी भाव रूप हो रहे
थे सो, अज्ञानता के कारण ही, सब काल ऐसा रूप ही संसार में देखा गया
इस अज्ञानता का आधार केवल ही अपने साम्प्रदायिक स्वरूप का रूप ही प्रमाण
ठहराया गया और सब को अधर्म रूप ही माना गया, तो जो आत्मिक सत्य का प्रमाण
था, केवल शास्त्र ज्ञान रूप का आधार परमात्मा के प्रकाश रूप द्वारा प्रत्येक
का आधार तो एक रहा, सब संसार का, सब प्राणियों का ही, जो ज्ञान-रूप सब का
मूल सब का कारण प्रकाश रूप ही रूप सम्प्रदायों का आधार बताया, उसी ज्ञान
सम्बन्धी भाव को, त्याग दिया गया
जिस का अभ्यास ही आत्मिक रूप सब मत या पंथ परमात्मा सम्बन्धी भाव
द्वारा सब सम्प्रदाय को ही सब ही आत्मज्ञान का अभ्यास रूप सब को सब ही काल
रूप में सब काल अभ्यास द्वारा, केवल, केवल, ही ज्ञान द्वारा पाया
जिस का प्रकाश ही परमात्मा स्वरूप रहा, तो फिर झगड़े का क्या रहा? क्या सब एक
रूप ही, सब परमात्मा रूप ही सब ज्ञान रूप नहीं है? तो फिर झगड़ा ही कैसा?
जब सब परमात्मा का स्वरूप है! फिर सब का भाव एक ही परमात्मा स्वरूप प्रकाश
ही रहा है? सब को एक ही तो, जिस भी रूप से, उस ईश्वर को ही न पा, सब
मत वाले उस प्रकाश को पायेंगे? फिर झगड़ा कैसा है? केवल ही केवल नाम,
रूप-रंगों का भिन्न स्वरूप है? गुण-धर्मों का भेद कहां रूप दिखता?
सब ही ईश्वर के काम को ही सब अपने स्वरूप को साधन माना है, जिस
प्रकार काम ही, अपने भाव द्वारा अपने काम रूप को ईश्वर का ही रूप मान कर
यथार्थता से, हर प्रकार सब काम को केवल फल-दाता सब का जन-दाता ही
317
विचार कर मनुष्य किसी शुभ संकल्प रूप धन द्वारा अपनी आत्मा का उद्धार कर सकता है। अन्यथा
वह दुर्गति को पाता।
सम्भवतः, स्वामी जी सोचते थे; यद्यपि समाज की शक्ति क्षीण, उत्साह मन्द हो चुका था
तथा लोग मोह निद्रा में सो कर अकर्मण्य बनते थे, परन्तु धर्म कथा द्वारा उनके हृदय में ज्ञान,
दया, वैराग्य तथा भक्ति भाव उत्पन्न हो सकता, इसलिए लोग धर्म
कथा श्रवणोत्सुकता को जब देश-देश में जा कर देखते थे समाज की दुर्दशा जागृत
थी, अज्ञान अन्धकार से समाज को जगाने का यत्नशील हुआ करते थे। अनेक सम्प्रदाय बनते
जाते थे तथा वे सम्प्रदायवादी ही, विशेष कर अद्वैतवाद या मायावादका पाठ
ही जन साधारण जन को पढ़ा कर निष्क्रिय बना रहे थे। जब तक जैन धर्म प्रचार
तथा श्वेताम्बर सम्प्रदाय, स्थानक, तेरहपंथ अनेक शाखा तथा उपशाखा का सम्प्रदाय फल
फूला, स्वामी जी इन सम्प्रदायों की क्रिया रूप धर्म का फल शून्य ही, पा रहे थे।
ऐसा था, इस पर भी वे जैन धर्म सम्प्रदाय का रूप धारण किये
"सच्चे जैन ही स्वरूप का उपदेश देना अपना कर्तव्य था।"
इस प्रकार विचार कर, जनसाधारण वर्ग के अन्तर आत्मा जगाना आवश्यक समझकर ही
केवल साधुवर्ग तक उपदेशामृत रस जन जन्य पाकर ही जन कल्याण की आशा ही
कल्याण रूप हो सकती
साधक लोक को उपदेश देने का जो भाव था सो केवल जन कल्याण की भावना थी।
सम्प्रदाय की सीमा रूप मर्यादा रक्षा करना उद्देश्य न था, इस कारण कभी कभी वे
समाज के उन अंग को भी जो जैन मर्यादा तथा आचार विरुद्ध था, उस पर चोट
किया कर सुधारने का यत्न भी करते थे, जन जन को न तो सम्प्रदाय विशेष माना
अथवा प्रचारित करते थे। केवल जनसाधारण आत्मा कल्याण तथा जन कल्याण की दृष्टि
सब में साम्य भाव लाते हुए ही वे सब धर्म का उपदेश दे रहे थे।
केवल धर्म का उपदेश ही वे देते थे। जन-कल्याण जन-मंगलकारी वाणी के
द्वारा संसार के जीव, भव्य, भव्य, अभव्य, साधारण, जन कल्याण परम्परा में सब
स्वरूप प्राप्त करने का साधन हो सकता था इसलिए उपदेश दिया करते थे जन, जन
की आवश्यकता थी, सो उनकी दशा सुधारने उपाय करने, सब का भला करने का धर्म
ही जन हित रूप धर्म कहा गया, इस से, वे केवल
यह धर्म का प्रचार करने का यत्न ही कर समाज का भला करने विचार करते हुए भी
जन का भला तो समाज का भला स्वयं हो जायगा न? सो विचार कर धर्म ज्ञान? का
उपदेश दे रहे थे। जन समाज की दुर्बलता को सुधारना हो तो, जन को अपनी भूल
जान कर, उस का परिहार कर लेना, यह ही आत्मोद्धार का मार्ग था सो स्वयं
धर्म कथा उपदेश द्वारा किया जा रहा, इस प्रकार विचार? सो जन समाज, अपने
कर्तव्य कर्म जाग कर जन साधारण सुधार सम्भवशील हो सकता था, इसी लिए
स्वामी ज्ञान कथा रूप में सम्प्रदाय प्रचार विचार न कर सब समाज सुधार तथा जनसा
मारक पथ का ही पथ बना रहे, जिस पथ पर सब ही जन समाज निर्भय हो कर चल
कर, आत्मिक कल्याण लाभ जनसाधारण को प्राप्त हो सकता था। यही विचार
स्वामी आत्माराम जी द्वारा
जन साधारण को समाज रीति-नीति तथा मर्यादा-विधि का जो ज्ञान था।
सो तो सब जन ज्ञात, सो प्रत्येक को ज्ञान करा, सब को ज्ञान योग्य बनाने का धर्म
उपदेश दिया जा रहा तथा समाज की उस मत को जो दुर्बल बना रहा था। धर्म ग्रन्थ-
ज्ञान का साधन तो बना ही लिया तथा जन-साधारण को सरल लोक-भाषा
शैली से अवगत करवाया भी, उस सब ज्ञान प्रचार को सब प्रकार सुगम करने ज्ञान
दान की प्रथा को भी, घर घर तक फैला
समाज का सब व्यक्ति ही आत्मवान होकर सब का संरक्षक बन सके, ऐसी
सम्भावना सम्प्रदाय से सम्भव न थी जब तक प्रत्येक व्यक्ति को यह ज्ञात न हो कि
वह जीव-जगत का रक्षक तथा पोषक ही कर्तव्यवान बने तथा आत्म-रूप ही
अपने आत्मा को सब जीव रूप में ही सब जन जाने, तभी तो हो सके! सो
उपदेश ही सब जन कल्याण वाणी का जन जन तक प्रसार किया गया
इस प्रकार उन का यह, जन जन्य जीवन का ज्ञान मार्ग सब को सब तरह से
स्पष्ट, सब जन का हो, जनसाधारण रूप से जीवन ज्ञान युक्त हो कर जन समूह,
सब जन का हो, सब को आत्म स्वरूप का ज्ञान करा कर लोक धर्म जन जन तक,
ऐसा ही मार्ग पर चलाकर जन कल्याण को ही, जन जन कल्याण कल्याण स्वरूप
लोक कल्याण का रूप देकर ही लोक रूप जन जन का जन जन को, धर्म का ज्ञान
कराना ही सम्भवता
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