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सर्वकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 322 में से

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विचार करने लगा कि, यदि मुझे एक ऐसी कन्या मिले, जो सब काम काज गृहस्थी का भली भांति
जानती हो।
निदान उसने, अपने पिता द्वारा बात, कही कि मेरा विवाह करा दिया जाय।
तब उसके पिता अपने पुत्रके लिये ऐसी कन्या खोजने लगे कि, उसकी शिक्षा ऐसी मिली
होती कि वह उस बालकके घर गृहस्थीका काम काज--सीखना, पकाना इत्यादिक सब काम
भली भां तिसे करती अपने पतिको हरप्रकार से सुख देती, ना ऐसा कि, लाड़िली
की भां तिसे घर के कामकाज करने में आलस्य करतीहुई केवल बातें बनाती, अथवा
हर समय दर्पण ही में अपना मु ख देखा करती या हर प्रकार से गृहस्थीका सब काम बिगाड़
दिया करती होती।
सौभाग्य से ऐसा ही हुआ कि एक कु लीन जन की सुशीला और बुद्धिमती कन्या मिली
जिसे उसने सब बातों में चतुर और अपनी कन्या को भली भांतिसे गृहस्थ सम्बन्धी काम
का, न बहुत कुछ पढ़ा लिखाकर जैसाकि इस समय में देखा जाता है बल्कि
अपना काम काज, सब निज हाथ से करना सिखाया था जिसमें सब प्रकार वह उस कुल
रीति पर सब कुछ काम करे, जो उस बालिका कुल सम्बन्धी
सो इस कन्या का भी जब उक्त बालकके साथ सम्बन्ध हो गया तो यह भी समझी
कि मेरा ससुराल में बहुत धन और सुख ऐश्वर्य होगा, क्योंकि वह पढ़ी तो थी नहीं
कि जिस से कुछ संसार का गुण दोष जान सकती--जिस कारण स्वाभाविक सब के मन
ऐसा विचार उठा ही करता है। अब जब समय आया, तब दो चार दिन पाछे उसने
अपने पिता के घर सब काम काज अपने मन भाता सीखा था, सो सब काम अपने
पति के लिये सब सुख देने योग्य समझ कर किया करती पर इस ओर इसके
सुसरालके सबही मनुष्य इस पर बहुत ही अप्रसन्न
रहते कि देखो हमारा लड़का दिन रात जो जो कमाकर लाता है, सो सब
व्यर्थही बिगड़ता जा रहाहै। क्या यह सब हम को खाने को मिलता कि जोप्रतिदिन
अनेक प्रकारके भोज, नाना प्रकारकी मिठाई और कई तरह की तरकारी आदि,
सब नित्य पकाई जाती हैं। भला हम को तो केवल रूखा सूखा, मोटा झोटा? हमारे सब
कपड़े, फटेही चले जा रहे हैं। भला हम को तो कुछ नहीं मिलता? हमारा ऐसा कमाऊ
लड़का सब कुछ अपने घर ले जाकरपकाता खिलाता रहे तो, हमारा क्याभला? हमारा
लड़का अपनीगृहस्थी लिये बैठा रहे तो हम को क्या सुख हो सकताहै हमारी ऐसी
कमाईसे ? हमारी कमाईतो इस समय तबही है, जबकि हमको सब कुछसुख मिलै?
हमारे लड़केने अपना अलग घर बसाया? अब हमको क्या सुखहोगा। हमारे लड़के की ऐसी
गृहस्थी से? हमारी सब आशा मिट्टीमें मिल गई, ना ऐसा हुआ, बहुलड़केके पास
सुखपूर्वक आनन्द में रहे, ना हमको कुछ उनसे सुख मिले? सो ऐसा ही
विचार कर सबही जन बहुत ही अप्रसन्न
रहने लगे और, "नाक भोंहें चढ़ाते"
अथवा इस बात विचार से दोनों पतिपत्नी बहुत चिन्तातुर रहने लगे कि इस दशा
में, अब हम को तो गृहस्थी आश्रम में बड़ा ही क्लेश हो रहा है। हम दोनों में एक
दूसरे को सब प्रकार से सुख देने की इच्छा रख कर भी अपने ही सुख को नहीं कर सके
जिस बात का कारण केवल अविद्या ही, अतः; विद्या ही से पिता, विद्या ही से सच्चा
गृहस्थी होना है।
जब उन को, इसप्रकार संताप होने लगा तो, उनने जो गुरु दोनों जन को पढ़ाते
सिखाते उनके पास जा कर अपनी सब कथा कह सुनाई कि हम दोनों तो सब रीतिसे
एक दूसरे को सुख के लिये यत्न करते हैं परन्तु फिर भी हमारे घर में सब ही जन
जो इस बात कारण से कि हम परस्पर प्रेमसे सब काम कर रहे हैं सो दुःख पा रहे,
अब, यह दशा देख कर हम दोनों सदा क्लेश में रहते हैं! ऐसा न होवे,
तब हां, इन दोनों को ऐसा ज्ञान क्यों न हो! विद्या ही से सब काम सिद्ध हो सके,
सो ऐसा ही दोनों जन ने कहा! कृपा कर, दोनों जनों को पढ़ा दो, सब प्रकारकी
विद्या से पूर्ण करा दीजिये, कि जिससे सब रीति से गृहस्थ धर्मके आनन्द को दोनों
जन ही भलीभांति जान सकें।
इस रीति शास्त्र का सार उन को जब गुरुने पढ़ाया, विद्या पढ़ा
कर सब बातें उन दोनों को इस रीति पर समझाई कि जिस तरह अब तक वे
घर में रहकर भी सब बातों में अनभिज्ञ होकर क्लेश पा रहे थे, सो सब दूर
होकर गृहस्थ आश्रम में, गुरु की कृपा से गृहस्थ का सब सुख होने
लगा। सो इस प्रकारके विद्या से ही मनुष्य का गृहस्थ आश्रम भी सब
प्रकारके सुख से भर जाता, सो विद्या का प्रयोजन ही ऐसा है कि मनुष्य को
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