एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यात्मशास्त्र कहता नहीं विभावभावों जानो, किन्तु यह जीवविभावभावों को क्यों जानेगा
जानेगा? विभावभाव तो अपने रूपको नहीं जानते किन्तु जीव, स्वरूप को और विभाव भावको
सब प्रकारोंसे जान रहा है, इससे सिद्ध होता है कि सब प्रकार ज्ञाना ही काम रहा
है। पर्याय स्वभाव रूप परिणत ज्ञान हुआ विभाव भाव नहीं था किन्तु ज्ञानका ही रूप था।
ज्ञान जब इस बातको जान लेताहै कि यह सब विभाव भाव तो केवल ज्ञेय ही हैं ज्ञेयका
स्वभाव ज्ञायक भावका नहीं हो सकता है, ज्ञान का स्वभाव तो, ज्ञायक ही
रूप है तब ज्ञानी का ज्ञान विभावोंसे भिन्न अपने ज्ञायक भाव में लीन हो जाता है,
इसमें विभावका विभावपनाभी नष्ट हो जाता और केवल ज्ञानका रूप बना रहता है।
ज्ञान जब विभाव में ज्ञानकी ही कल्पना कर लेता है तब वह विभाव रूप
हुआ! जो ज्ञान यह या उस ज्ञान रूप हुआ उस ज्ञानका कभी नाश नहीं हो
सकता। जो इस ज्ञान को विभाव से भिन्न है, जान लेता, सो वह ज्ञान,
वह ज्ञेय, वह दृष्टा, विभावको त्याग देता है सो ऐसा विभावका त्याग
केवल ज्ञानका ही काम होताहै न कि विभावका । जिस प्रकार
ज्ञान पर्याय का इस बात का ज्ञान हो जाता है कि विभाव केवल ज्ञेय रूप
ही है तब ज्ञानी अपने ज्ञान स्वभाव को विभाव से सर्वथा भिन्न ही
मान लेता है ज्ञान में विभाव का प्रवेश नहीं होने देता है। जब ज्ञानको यह
मालूम हो जाताहै कि इस विभावका मेरे साथ सम्बन्ध ही नहीं केवल ज्ञेयका ज्ञायक
रूप सम्बन्ध है तब विभाव अपने आप नष्ट हो जाताहै तब ज्ञानका ही परिणमन
सब प्रकार विभावों रूप से न होकर केवल ज्ञाना रूप ही होता रहताहै
जो सर्व तरह से, ज्ञान मात्र ही, उस ज्ञान में विभावका
लेश मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता है, ज्ञानी पुरुषोंका उपदेश
ही इस बात का रहता है कि अपने ज्ञायक भाव को सर्वथा विभाव से भिन्न
ही जानो क्योंकि विभाव मात्र पराधीन परिणाम हैं जिनसे कि कभी भी
ज्ञान का लाभ नहीं हो सकता केवल ज्ञानका विभाव-भाव केवल
ज्ञेय रूप होकर केवल ज्ञाता रूप ही रहता है उस रूप कभी नहीं हो सकता
केवल यह अज्ञान भाव है।
सब ही प्रकार से यह ज्ञान ही सिद्ध होता है कि संसार में
विभाव, जो भी काम इस के द्वारा होता वह केवल ज्ञान का ही
चमत्कार है न कि अज्ञानका, अज्ञानका तो कोई रूप नहीं,
जो कुछ रूप है सो ज्ञान ही का है? विभावका नाश होने पर ज्ञान ही तो
रहा, सो अज्ञानका नाश हो ही गया, फिर क्या, केवल ज्ञान; केवल
ज्ञान का ही काम विभाव रूप से ज्ञान को भिन्न करना है, सो ज्ञान ही
तो ज्ञायक है, सो ज्ञान ही ज्ञायक भाव से भिन्न कभी नहीं
सब प्रकार अज्ञानका ही त्याग हो जाना संभव है जो कि ज्ञान
द्वारा ही ज्ञानका स्वभाव अपने ही रूपमें परिणत हो जाता है।
ज्ञानी सब विभावों को अपने रूप से भिन्न ही समझ कर कभी विभाव
रूप नहीं परिणमता किन्तु अपने ही ज्ञान स्वभाव में ही लीन
रहता है तब ज्ञान को विभाव रूप कौन कहेगा? जब ज्ञान विभावका नाश
कर केवल अपने स्वरूप मात्रमें परिणत हो जाता है तब कौन विभाव कह
सकता है तब विभाव कहाँ रहा ? ज्ञानी ज्ञान मात्र ही रहा फिर
ज्ञानका विभाव का सम्बन्ध कहाँ से हो सकता है?
जब ज्ञान ही ज्ञान रूप में लीन हो जाता तब ज्ञान
का ही काम होता है तब ज्ञान विभाव रूप से ज्ञान को ही भिन्न
ज्ञान रूप करता है तब यह ज्ञान ही तो ज्ञानका सब कुछ काम
ही तो करता है, इस बात, को जान कर ज्ञानी सब रूप से अपने
ज्ञायक... से ही परिणत होता है सो ज्ञान ही ज्ञेय, ज्ञान ही ज्ञाता
होता है।
अब दो गाथा द्वारा इस विषय-को
ही और स्पष्ट करते हैं कि।
सब ज्ञानी जो कि हैं, वे पुद्गल-कर्म फल को जानते हुए
ही रहते, उनका वे कभी परिणमन नहीं करते न ही बँधते हैं,
जिससे कि केवल ज्ञानका रूप ही बना रहता है जो कि ज्ञान केवल ही ज्ञानी
रूप होता है न अज्ञान रूप, सो सब प्रकार से, जो कुछ भी ज्ञान
का काम रहा सो, सो ज्ञानीका ज्ञान ही।
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