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सर्वकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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लेकिन क्या यह सब केवल किसी सीमा विशेष तक ही संभव नहीं रह जाता?यदि हाँ तो केवल
तब ही व्यक्ति निष्पक्षता की स्थिति को पा सकता है। जब किसी एक को त्यागने की विवशता
सामने खड़ी हो? निष्पक्षता की स्थिति केवल किसी की या तो या की अवस्था में
केवल तभी तक संभव है। व्यक्ति को अपने ही के संबंध में कभी कभी ऐसे ही कष्ट के
पार गुजरना
हो तो निष्पक्ष हो जाना कोई सरल बात नहीं है। इसके तो अपने ही किसी ऐसे संबंध
और निष्पक्षता के दो पाटों स्वरूप स्थिति पैदा होने लगती है, जैसे कि किसी व्यक्ति
को अपने किसी अति प्रिय सम्बन्धी जिसे वह बहुत चाहता हो उससे ही यह बात पता चले
कि वह न केवल गलत काम कर रहा है पर वह स्वयं भी निष्पक्षता के मार्ग से भटक रहा
अथवा उस पर किसी गंभीर आरोप के ही परिणाम स्वरूप उस व्यक्ति से अपना नाता संबंध
तोड़ लेना पड़ता रहा हो अथवा निष्पक्षता की खातिर न केवल उसे ऐसा करना पड़ा हो
बल्कि न केवल अपने ही सम्बन्धी, निष्पक्षता न्याय स्वरूप न केवल इस बात की पहल
उस की ओर से निष्पक्षता के रूप में हुई हो, बल्कि निष्पक्ष न्याय विचार पक्षधरता
दोनों ही में निष्पक्षता को हीन करने का आधार अथवा कारण तो बन ही रहा
निष्पक्षता तक पहुंचे बिना ही ऐसे-तैसे ही यह व्यक्ति ही, ऐसे-तैसे ही अपनी
निष्पक्षता को स्वयं सिद्ध कर
"हो सकता है, निष्पक्ष न्याय हेतु"
पर इस सब स्थिति के ही आधार विशेषाधिकार स्वरूप ही, यह निष्पक्षता केवल
तब निष्पक्ष तब मानी जाती जब तक किसी गलत न्याय की निष्पक्षता न होकर उस व्यक्ति
विशेष तक ही न रहकर उस विशेषाधिकार सब--विशेषाधिकार का रूप लिए हुए
भले ही वह उस के पक्ष में ही रहकर केवल निष्पक्षता का दावा करता रहता
निष्पक्ष न्याय न्याय न रह केवल पक्षधर केवल बनता, जो कि तब न्याय पक्ष बन जाता
न्याय केवल तब तक ही संभव निष्पक्ष माना जाता जब तक न्याय स्वरूप ही बना?
निष्पक्षता का यह रूप कि निष्पक्षता ही निष्पक्षता का ही रूप बन न्याय केवल
का आधार बना रहता न कि इस तरह निष्पक्ष माना जाने वाला न्याय पक्ष का रूप ले
सकता, न्याय निष्पक्ष न्याय बना रहता तो सही, न्याय स्वरूप, सब पर एक सा ही
निष्पक्ष कहा गया निष्पक्षता न्याय निष्पक्षता निष्पक्ष न्याय तो वह रूप है जो न्याय
का न्याय ही स्वरूप, उस सब से, निष्पक्ष सब पक्ष रूप को भी कह दे, ना कि सब
न्याय स्वरूप केवल न्याय स्वरूप बन ही न सके निष्पक्षता का ही रूप बना रहे।
निष्पक्ष पक्ष न्याय स्वरूप ना बनने से उस न्याय स्वरूप निष्पक्षता न्याय केवल
एक पक्ष के रूप बन कर केवल बन कर रह जाता निष्पक्ष ना कहला
न्याय रूप रहता ही? जहां न्याय ही ना हो वहां निष्पक्षता का रूप बन सब
पक्ष एक जैसा न्याय ना बने सब पर एक सा न्याय ना निष्पक्ष बन कर सब को
न्याय तो सब देवेगा, सब न्याय केवल सब न्याय का केवल ना बन कर, मात्र
निष्पक्ष न्याय का एक स्वरूप बनेगा, सब न्याय केवल मात्र सब न्याय के ही रूप
निष्पक्ष न्याय स्वरूप बन ही ना सकेगा, निष्पक्षता केवल ना बन, ना बनेगी,
ना केवल न्याय ही बन सब को न्याय देवेगा, ना केवल सब न्याय केवल बन ही
सकेगा निष्पक्ष तो सब न्याय के ही बन कर न्याय स्वरूप रहे।
जो सब न्याय स्वरूप, सब पर एक सा निष्पक्ष ही न्याय का स्वरूप ना बन सके
तो सब का भला कैसे हो सब न्याय सब को एक सा ना बने तो सब न्याय सब
का निष्पक्षता रूप, या विशेषाधिकार रूप ना बन सब न्याय का ही रूप बने,
न्याय तो सब एक समान
सब निष्पक्षता सब निष्पक्षता न तो व्यक्ति का सब का, न केवल न्याय ही
सब को निष्पक्षता दे सकता ना ऐसे-वैसे ही न्याय का रूप हो सब व्यक्ति सब
सब सब व्यक्ति केवल सब सब का रूप, न्याय सब व्यक्ति को केवल निष्पक्ष ही
सब बना सके
ऐसा न्याय बने, "प्रत्येक व्यक्ति सब को निष्पक्ष रूप"
जिस पर ना सब रूप का सब रूप ना बन सके; केवल न्याय केवल
ही ना बन कर निष्पक्ष सब पक्ष रूप को सब न्याय सब न्याय का न्याय स्वरूप न
बन केवल निष्पक्षता निष्पक्षता का नाम मात्र रूप केवल निष्पक्ष का न्याय रूप ही
निष्पक्षता को स्वयं रूप सब सब निष्पक्षता का नाम मात्र निष्पक्ष न्याय, केवल
स्वरूप का रूप ना रूप में सब के साथ ही, सब निष्पक्षता सब निष्पक्ष हो
सके सब रूप ही तो निष्पक्ष रूप

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