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सर्वकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 322 में से

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जीवन का स्वास्थ्य जो चेतना का रूप धारण करता है। इसके अतिरिक्त चेतना का कोई रूप
अस्तित्व में नहीं रह गया था। यह ही उसकी सीमाएं, इसके परे--जैसा भगवान् श्रीकृष्ण
को भी आभास हो रहा था विदेह स्थिति, वह संभव नहीं रह गई थी। इसलिए
कृष्ण के ऊपर कोई विपदा तो थी, पर वह विपदा एक ही थी और उसका स्वरूप
जीवन मात्र से ही बंध कर सीमित होने लगता था। इसलिए जब कभी कोई नया संकट
कृष्ण खड़ा कर सकते थे अथवा उनके सम्मुख उत्पन्न हो सकता था तभी वे चेष्टित
होते थे। इस प्रकार जब वे बलराम के समझाने पर मथुरा की ओर चलने को तत्पर हो रहे
थे। उसी समय विदा की बेला में जो संकट उनके सामने खड़ा हो रहा था, उसमें वे इस बात
को भली प्रकार समझ रहे थे कि-मथुरा की सीमाओं तक ही उनका अस्तित्व था।
सीमाओं के पार वे जा सकते थे लेकिन उस पार जाते ही विदेह की स्थिति खो जाती
थी, तो यह वास्तविकता के ऊपर चेतना का प्रहार ही माना जाएगा। कृष्ण इन सब बातों को
समझकर ही आगे बढ़ेंगे। लेकिन वे यह भी जानना चाहते थे कि
सब के सब एक साथ रोने के लिए तैयार क्यों हैं? यह कोई नया संकट नहीं
संकट से जूझने वाले सब लोग यह बात तो भली प्रकार समझ ही सकते हैं।
गोपियां तो शांत थीं।
कृष्ण ने देखा था, केवल दो गोपियां सिर झुकाए उदास मुद्रा में बैठी थीं,
जिन पर इस स्थिति अथवा विचार विशेष अथवा कृष्ण के चले जाने का कोई प्रभाव
पड़ना संभव नहीं था! राधा शांत बैठी थी, कृष्ण ने सोचा विदा तो वे लेंगे
ही, पर किससे लें, किससे पहले लें? यह बड़ा सवाल था, पर राधा सम्मुख आकर खड़ी
कृष्ण के उस प्रश्न का उत्तर दे देना चाहती प्रतीत होती थी, जो उन्होंने कभी
पूछा ही नहीं था। वह केवल यह सोचती थी, इस विदा का कोई महत्व नहीं
होगा इसलिए कि वह तो अब तक रोते रहे, पर उसने कभी एक भी आंसू नहीं,
जो उसकी इन आंखों तक आया हो, वह कभी भी रो नहीं सकती थी, रो सकती भी कैसे
जब सब लोग रोने लगेंगे तब कोई शांत बैठना चाहे तो उसे शांत बैठने देने का
अधिकार दिया जाना चाहिए अथवा नहीं? वह केवल यह कह सके, यह उसकी
शक्ति के बाहर होता जा रहा था। राधा विवश हो सकती थी, कृष्ण को भी यह
बात भली प्रकार से समझाई जा सकती थी। इस प्रकार वे सोचती थीं, तो कृष्ण भी
यह तो नहीं कह रहे थे। कृष्ण ने देखा सब कुछ शांत था। केवल यशोदानंदन
कन्हैया ऐसा नाम जिसे बार-बार पुकारा जाता था और वे रोते-रोते उस सीमा तक,
जिसमें केवल एक बात ही कही जा सकती थी। वे सब
केवल यही कह रहे, "कृष्ण केवल तुम।"
इसके बाद यशोदानंदन कन्हैया का ही अस्तित्व, कन्हैया केवल
कृष्ण ही केवल इस तरह से कन्हैया का अस्तित्व ही सब कुछ था। वह बलराम भी,
नंदबाबा भी केवल यह जानते थे। वह जानते थे। इस बात की बात भी नहीं
आवश्यकता समझी गई, पर यह भी सचमुच में संभव था, जब कृष्ण चले जाएंगे
तो, जो सब कुछ यहां शेष रह जाएगा वे केवल उस बात को, अपनी भाषा में
एक कन्हैया, एक कन्हैया, केवल कन्हैया, के रूप में व्यक्त करेंगे और इसके
बाद
एक भी नया रूप नहीं होगा, यशोदा मां का वात्सल्य जब जागृत होता तो
केवल मां, कृष्ण तक सीमित हो, उस बात को यशोदा ही कह सकती थी,
यशोदा भी इस बात को समझती थी, पर वे नंदबाबा के साथ थीं, इस बात का कोई
नया अर्थ तो नहीं हो सकता था। इस बात का अर्थ केवल इतना ही था, यह सब वे जानती
थीं, केवल उस समय यशोदा उस रूप में रोती, विवशता को ही अपना रूप दे सकी
और उस सीमा तक जहां तक
"हे कृष्ण केवल तुम।"
इसके बाद तो कुछ भी शेष नहीं था, पर उस पार जाना कोई बहुत
मुश्किल काम न होता तो शायद कृष्ण भी, जो गोकुल की सीमा लांघ न सके, उस
सीमा पार जाने का कोई प्रयास न करते या न ही गोकुल छोड़ कर जा पाते। कृष्ण
जानते थे कि मथुरा का रूप क्या हो सकता था। केवल विदेह स्थिति, जो वहां
समाप्त थी, वह सब अस्वाभाविक था, पर उस स्थिति को वास्तविकता प्रदान करने
का यश तो यशोदानंदन कृष्ण कन्हैया केवल एक रूप प्रस्तुत कर सकते थे, जो
वहां के लोगों के लिए आवश्यक नहीं था, कृष्ण केवल थे? इस सीमा को पार
कर वे वास्तविकता को स्वीकार करने के लिए नए रूप यशोदानंदन कन्हैया का
रूप प्रस्तुत करने जा रहे थे।
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