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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

इस प्रकार मन्दोदरी विलाप करने लगी, विलाप करते हुए उसका सारा शरीर पसीने पसीने होकर
पृथ्वी पर गिर पड़ा तथा वह भूमि लोटने लगी तब रावण की पटरानियों सहित सब रानी मिलकर शोक
विह्वल हो रोने लगी, मन्दोदरी शोक विह्वल होकर अपने सिरके बालोंको नोचकर विलाप करने लगी, उस समय
सब रानी कहने लगी, मन्दोदरी तुम धीरज धरो तथा अपने सिरके बालों को व्यर्थमत नोचो इसके उपरान्त
मन्दोदरीने विलाप कर मन्दोदरी कहने लगी रावण सब प्रकार का रूप बदल लेता था अनेक प्रकार का रूप धरता था
अनेक प्रकारके स्वरूप लेता
"इसके सब स्वरूपों तथा इसके रूपको अब श्रीरामके बिना दूसरा कौन जानेगा"
इसके उपरान्त विभीषण विलाप करने लगा, यह कहकर; आकाशवाणी होकर सबने सुना कि
रावण जीता--है विभीषणने यह सुनकर कहा जिस प्रकार कमल सूर्यके बिना अथवा कमलके फूलके
बिना जल का सरोवर निष्फल हो रहा इसी प्रकार विभीषण कहने लगा कि मेरा जीवन निष्फल हो जायगा
पश्चात् सब, इस बात जानकर व्याकुल होकर रोने लगे इसके उपरान्त श्रीराम के सम्मुख विभीषण हाथ
जोड़कर खड़ा हो कहने लगा कि मेरा संसार व्यर्थ, इसके उपरान्त श्री राम लक्ष्मणके चरणोंमें गिर
अपना सिरपटक दिया
"अब इस समय काम-क्रोधादिक जीतकर ले, अब यह तो सब बात तुम त्याग देवो"
लक्ष्मण कहने लगे कि हे राम अब देर न करो विभीषण को राज्यतिलक कर सब विदा करो,
विभीषणके ऊपर छत्र ला दो व मुकुट ला दो तथा विभीषण को राज्य सौंपो, एक छत्र राज होगा, इस प्रकार
सब कहो, सब प्रकार रावण मारा गया सबहीने, इस बात सबहीने, इस बात सब कहो रावणके
ऊपर, फूल बरसाने लगे, सब लोग राम नाम लेने लगे सब देवता सब मिलकर काम-क्रोधादिक
त्याग कर, प्रभु की जय जय करके चले
कोई तो फूल बरसा रहे विमानमें
किसी समय किया विभीषणने
"इसके उपरान्त कहा, कि अब काम-क्रोधादिक को जीतकर सब प्रकार काम करना चाहिये"
"सब कोई कहो, रावण मारा गया सब प्रकार रावण मारा गया तथा इस बात को सब सुनो और
विचार करो सब जीव तथा सब कोई काम-क्रोधादिक त्याग देवो प्रभुके नामका सिमरन
कर संसारके बन्धनों सहित छूटोगे सब यह काम-क्रोधादिक त्याग करो, संसार सब काम त्याग
कर प्रभु नाम जाप करो मुक्ति पावेगा सब, विभीषणके ऊपर छत्र ला दो मुकुट पहिना दो
राज्य पर टीका करो, इसके बाद विभीषणको गद्दीपर बैठाकर श्री रामने सब वानरोंको विदा
कर दिया जावो"
प्रथम विदा सुग्रीव करो अंगद जावो सुजान
वानर दल सब विदा करो विदा किये भगवान
नलनील विभीषण मिलत दोनों परस्पर
राजा गये निज धाम को लंका में विभीषण
सीता लाये विमान में चढ़ाये रघुनाथ
भरत के मन सोच भारी मिले रघुनाथ
राम के चरणन विभीषणने शीश नवाया सब को दिया प्रणाम
"सब कहियो"
इसके बाद, सबने श्री राम को प्रणाम कर विदाको आज्ञा पायी, लक्ष्मण कहने लगे
विदा करो सब वानर समाजको, तब सब वानरोंने विदा मांगकर हाथ जोड़े, लक्ष्मण
कहने लगे सुग्रीव तुम अपने घरको जाओ विभीषण को राज्य पर बैठाया तथा सब वानरोंको फूल माला
देकर सब विदा
इसके बाद विभीषण हाथ जोड़ अपने घरको जाने लगे सुग्रीव जा रहे हैं सब वानरोंको विदा
करके सब विदा हुए, सब वानर अपने अपने देश को चले गये विभीषणने लंका
महाराज को सिंहासन दिया तथा विभीषण सबको वस्त्र दिये सब लोग कपड़ा पहनकर
चले, इसके उपरान्त सुग्रीव, अंगद अपने अपने देशको लौटने लगे तथा सब वानर अपने
देश, इसके उपरान्त मन्दोदरी को विभीषणने कहा, कि श्रीराम के चरणोंमें ध्यान
लगाकर सब प्रकार का जप तप करो प्रभुका, नाम जपते रहियेगा! विभीषण को राज्य हुआ,
सब लोग खुश हुए, सब नर नारी अपने अपने देशको लौटगये सबहीने प्रणाम
किया सब एक दूसरेको विदा किया! इस तरह सब गये, सब जन सुखी, सब प्रकार सब
का काम सिद्ध हुआ प्रभु की आज्ञा पाकर, सब अपने अपने देश, सुखपूर्वक चले गये कोई
चिन्ता
शेष नहीं रही, विभीषण सब वानरों को व सुग्रीवको प्रणाम कर सब को
विदा करके अपने घरको, विभीषण अपने घर गये विभीषण सब लोगों अपने अपने घरको
सिधारे सब, सुग्रीव सब, वानर सब चले गये विभीषण ने दोनों हाथ जोड़कर सब वानरों
तथा राजा सुग्रीव को प्रणाम किया सब को टीका कर, तिलक दे; सब वानर चले, इसके उपरान्त
319

तब राजा दण्डवत प्रणामकरि, उन सात महात्माओं पास हाथ जोरि जो बोले सो सुनिये।
हे स्वामी ! कृपा करि यह कहो, महाराज दशरथ अपने भवन पर प्रसन्न सहित आन विराजैं कहूँ
नहीं वा, उनकूँ कोई दुःख विघन व्यापैगा नहीं?
तबहीं विश्वामित्र बोले, "राजा जनक, तुमारे मनोरथ, सबही पुरेंगे"
राजा को ऐसा आश्वस्तकरि सब ऋषि जो विश्वामित्र सहित मिथिला नगरीकूँ
पधारे तहां सकल लोग हर्षित भये। सब देवगण भी जो विमान पर सवार होय आकाश में
से पुष्प-वर्षाकरते भये वा बाजे बाजे, नगर वासी प्रसन्न होय राजा को भेंट दिये वा
बधाईयां दी, आनन्द के मंगल कलश साजे गए वा, सब पुर को साज-सँवार
करि के, वन्दन-वार बांधे वा, चन्दन केसर अगर कपूर से सब बाज़ार को छिड़क दिया, जगह
जगह स्वर्ण कलश धरे वा ध्वज पताका फहरा दिये
पश्चात् विश्वामित्र सब ऋषि सहित पुर के मध्य में पधारे जनसमूह दर्शन करि करि
पांयन परन लगे, विश्वामित्र जी आशीर्वाद देतेय हुए राजा जनक सहित राज मन्दिरकूँ
पधारे। विश्वामित्र महामुनि सब ऋषिन समेत आसन बिछे हुएन पर विराजे वा जन समूह
चरणामृत लाय वा पान बीड़ा देकर वा चन्दन अतर आदि से सब की पूजाकारि हाथजोड़
स्तुति की तदनन्तर, राजा विश्वामित्र चरणकूँ धोय के चरणामृत सब कुटुम्ब के लेवाय,
चरणामृत पी, पाद्य अर्ध्य दे, षोडशोपचार सहित पूजन करि विश्वामित्र सहित सब
ऋषिन को हाथ जोड़ करि, हाथ बांध के प्रणामकरि के बैठ गये। राजा को विश्वामित्र ने
फिर आश्वस्तकरि कहा कि सीताजीकूँ बुलाय ल्याओ, तब राजा जनक ने सीताजीकूँ
आज्ञा भिजवाई तब सब सखी सीताजीकूँ लाय के, विश्वामित्र जी, शतानन्द गुरु
सहित जितने भी मुनिगण विश्वामित्र के, शुभागमन निमित्त एकत्रित हुये सबको पांयन
पराय शीश नवायन कराया वा मुनि आशीर्वाद देय जनक सहित सब सभा आनन्दित
भई। पश्चात् विश्वामित्र बोले, जनक जी सुता तुम्हारी, सबही भांति से धन्य हो धन्य
जनकजी की जय बोलते हुए बोले
"धन्य जनक"
सब सभा भी जनकजी महाराज की जय जय बोल के जयजय शब्दकरि प्रसन्न भये
पश्चात् सब मुनि आज्ञा ले अपने निज आश्रम गये, पश्चात्
"दूत का प्रस्थान"
श्री राम विश्वामित्र गुरु, शिव--धनुष, सीता विवाह, स्वयंवर, मिथिला नगरी
दशरथजी को सब समाचार सुनाने को एक योग्य दूत को आज्ञा की विश्वामित्र जी, शीघ्र अयोध्या
को प्रस्थान करो राजा जनक से, सतानन्द, जनक, विश्वामित्र जी राजा दशरथ को पत्रिका
दो, शीघ्र गमन कर अयोध्या प्रवेश करो वा, हाथी, रथ, पदातिक
सब साथ कर के दूत को रवाना कर, दूत शिव--धनुष भंजन वा स्वयंवर सब हाल
ले गया जी, जो पत्रिका विश्वामित्र जी की वा राजा जनक जी ने पत्रिका दी थी
विश्वामित्र विश्वामित्र आज्ञा से सब वृतान्त राजा दशरथ जनकजी स्वयंवर का सब
समाचार लेकर दूत जो गए वह शीघ्र तीन दिन चलकर अयोध्या नगरी पहुँचे।
तब दूत नगर में प्रवेश हुए वा सब महल देखे महल के आगे सब द्वारपाल बैठे
व दरबान, इन को विश्वामित्र आज्ञा अनुसार व पत्रिका दिखलाय कर भीतर को प्रवेश,
दूत का सम्मान, राजा दशरथ को समाचार कहा महाराज अयोध्याधीश की जय जयकार
कर हाथ जोड़ व सिर नवाकर पत्रिका दी, व कहा सब हाल विस्तार
दूत को सब हाल सुना हुआ, शिव--धनुष टूटना सीता विवाह की बात सुन
सब अयोध्या नगरी हर्षित भई राजा दशरथ सहित सब पुर में आनन्द ही आनन्द
मंगल गान होने लगे वा सब पुर के लोग यह मंगल बात पर विश्वामित्र राम की प्रशंसा
करने लगे। तब राजा ने सब मन्त्री वा पुरोहितोंकूँ आज्ञा दिवाई कि सब सेना
को भी सुसज्जित कराओ, पश्चात् दशरथ अपनी रानी को यह सब सुनाया, तब सब रानियां
प्रसन्नता पूर्वक हाथ जोड़ कर बोलीं
"राम जी सब दुख हरने वाले हैं, सीता बहू समेत हम सब भेंटेंगे"
सब पुर लोग प्रेम से भर गये सब लोग जय जय जयकार बोलने लगे वा सीता जी,
मिथिलापुरी राजा जी की कीर्ति को अपने मुख कहते सब पुर के, मिथिलापुरी राजा
की जय जयकार के नारे लगने लगे
सब अयोध्यावासी प्रसन्न हुये वा, विश्वामित्र गुरुजी राम लक्ष्मन की जय जयकार
बोलने लगे वा सब लोग मिलकर जो बधाई गान करने विश्वामित्र गाथा गाय गाय
आभूषण लुटाने की आज्ञा करी
सब लोग धन्य धन्य कह के बोले धन्य, जनक राजा को, जिनकी सुपुत्री सीता
जिनके साथ श्री राम का सम्बन्ध हुआ? फिर विश्वामित्र गुरुजी? की जय जय राम
320

समझा दूँ? जब तक सब का सन्देह न, हो जाय तब तो केवल कहने से लाभ क्या
कह बैठते हैं, सो क्या सब लोग सब बातोंका यथार्थ स्वरूप जानते ही हैं? इसलिये
सब का, जिस बात में जो सन्देह हो सो निवारण हो जाय वही उत्तम
इससे आगे भी जो लोग ज्ञान रूपी अमृत पान करने की इच्छा रखते हैं; सुनो
सुनो, ऐसा ही कहूँ न? सो सुनो जी, सब लोग सब बातों को नहीं जान सकते कोई
किसी बात को, किसी बात को कोई दूसरा जाने, कोई किसी बात को न जानने
का दावा कर ले, सो तो योग्य नहीं, क्यों भला? सब तो सब नहीं! हां जो सर्वज्ञ हो,
सदा ऐसा व्यापक यथार्थ तत्त्व, सब बातें, सब के सब भावों को सदा जानता,
सो सर्व ज्ञानी कोई
संसार में तो सब लोग सब निमित्त रूप जान पड़े, यथा क्या? किसी को कोई
उपकार का काम पड़े, बस उ सी-को सब निमित्त ही तो हैं! इसलिये जिस बात
का जिस को निमित्त हो उस को उस का, सो भी निमित्त मात्र ही जान पड़ता
निमित्त तो संसार के निमित्त मात्र निमित्त से नाम मात्र सं-सार, सो यह भी
केवल सब निमित्त निमित्त ही तो है सब को, किसी को तो कुछ ज्ञान ही न हो
सो निमित्त ही क्या हो सके जो कुछ भी... न निमित्त कहलाने के ही निमित्त
से सब को सब में जान पड़े, जिस से कि सब को सब रूप जान पड़े।
सो परमात्मा केवल तो सब रूप सब सब स्वरूप ही, जो सब ज्ञान रूप सब
सब स्वरूप है, सो परमात्मा केवल केवल ही सब ज्ञान से हीन है? सब तो हीन
नहीं
ज्ञान सदा सब, "ज्ञान सब ज्ञान रूप सब रूप सब का"
सब का सब तो सब तरह से, सो केवल ज्ञान, सो सब का केवल ही ज्ञान
सब ही का रूप सब का ज्ञान केवल ही सब स्वरूप सब रूप जान पड़े, सो सब को
सदा सब सब स्वरूप सब स्वरूप केवल सब का, सो सब तो केवल स्वरूप ही
सब रूप रहा।
केवल सदा ही, सो परमात्मा सदा तो केवल ही ज्ञान ही ज्ञान रूप का ज्ञान
सब परमात्मा सदा ज्ञान रूप ही तो सो परमात्मा सदा सब का ज्ञान स्वरूप
परमात्मा से सब ही सदा ज्ञान रूप, सब ही, सदा ही सब ज्ञान रूप परमात्मा
सो सब केवल स्वरूप ज्ञान ज्ञान से सब को सब तरह से जान पड़े सब रूप सब
सदा सब के ज्ञान ही का केवल ही ज्ञान ही रूप, सब सदा परमात्मा केवल ही
सब सदा ज्ञान ही सब तरह सदा सदा ही ज्ञान सब ज्ञान
निमित्त से सब को सब ज्ञान ही सब ज्ञान रूप सब निमित्त से सब ज्ञान
सदा ज्ञान ही केवल ज्ञान, सो तो सब का सब ही स्वरूप
"सब का ज्ञान सदा केवल ज्ञान स्वरूप ही निमित्त केवल सदा ज्ञान
ज्ञान ज्ञान-ज्ञान सदा सब, केवल सब ज्ञान ज्ञान ही तो सब का"
परमात्मा तो सब तरह सब ज्ञान रूप ही तो सब का रूप ही ज्ञान रूप
सो तो सब का सब रूप सब केवल परमात्मा ही सब तरह से सब रूप सब
परमात्मा सदा ही ज्ञान ही तो सब सदा ही तो सब रूप
सब रूप सदा ही ज्ञान ही ज्ञान
केवल सब रूप सब रूप का, सो परमात्मा स्वरूप रहा, ज्ञानस्वरूप सदा
रहा, सो सब रूप सब रूप सब सदा ज्ञान ही, सब रूप सब रूप सब केवल रूप
सब तरह से, सो परमात्मा केवल सदा, सब तो केवल रहा, सो केवल सदा ही ज्ञान
रूप से केवल सब रूप सदा ज्ञान ही ज्ञान ही सदा ही, सब का रूप सब ज्ञान
स्वरूप ही सदा ही सो परमात्मा सब रूप ही सब का, सो ज्ञान रहा; सदा सदा
ही रहा ही, सो सदा रहा।
परमात्मा परमात्मा सब ही तो सब सब तरह सब रहा, सदा सदा रहा,
न सब रूप से, न सब तरह न सब तरह, न सब परमात्मा रूप सब स्वरूप ही सो
सदा ही केवल सदा केवल ज्ञान सदा, सो सब स्वरूप सो परमात्मा परमात्मा ही
स्वरूप रहा, केवल तो सब ज्ञान केवल ही तो ज्ञान रूप ही परमात्मा ही सब
स्वरूप रहा, सब परमात्मा ही सब ज्ञान रूप
सदा सदा रहा, "परमात्मा सदा सब ही केवल ज्ञान ही ज्ञान ही ज्ञान
रहा, सदा सब परमात्मा सदा ज्ञान ही सदा सब स्वरूप केवल सदा रहा"
सदा सदा रहा, सो तो सब केवल रहा, केवल ही केवल सदा स्वरूप
परमात्मा केवल परमात्मा सदा ज्ञान ही, सो निमित्त से सब ज्ञान सदा सं--सार
निमित्त से स्वरूप सं--सार ही तो सदा सदा सब का, सो तो तो केवल ही तो
321

इसके पहिले या पश्चात दोनों पक्षों का ऐसा कोई पत्र लिखा, या दस्तखत

उनको उनका हिस्सा जीवन-निर्वाह के तौर दिया गया था सो दिया गया व दिया गया, सो
भी या हमेशा के लिए या उस वक्त तक जबान बन्दी करने के मतलब से या जो कुछ समझ कर दिया
या उनका हक समझ कर दिया या दिया गया था सो दिया गया अगर सब कुछ दिया गया
"सर्वसम्मतया निर्णय किया गया, किसी का कोई हक बाकी नहीं, जिसे उस
सम्प्रदाय द्वारा दिया"
इसके पहिले या पश्चात दोनों पक्षों का ऐसा कोई पत्र लिखा, या दस्तखत
परस्पर का ऐसा कोई पत्र नहीं पेश किया गया या सम्मुख, कि जिसके आधार से
ऐसा सब कुछ सम्प्रदाय ने दिया ऐसा लिखा गया हो या जब कि इस प्रकार परस्पर लिखा
गया था
इसके दो वर्ष पश्चात्, जबानी जो बयान में साक्ष्य दिया गया सो इसके
बाबत पत्र या कोई पत्र के द्वारा यह जो सम्प्रदाय द्वारा दिया गया व सम्प्रदाय का निर्णय
हुआ, जिसके आधार पत्र को कहा गया वह पत्र पेश नहीं करवाया या सम्मुख लाया
या ऐसा पत्र सम्मुख पेश किया गया जिसका कोई आधार नहीं
इस स्थिति के सम्मुख तथ्य पर, जो जो पत्र उस वक्त से जबान बन्दी तक लिखे
या पत्र लिखे गये और जो जो पत्र के आधार लिखे गये, उन सम्मुख तथ्य लिखे पत्र
इसके तथ्य केवल यह सम्प्रदाय के आधार पक्ष के लिखे गये ऐसा निर्णय जो कि माना
गया सम्प्रदाय के द्वारा सब कुछ दिया गया, वह पत्र सम्मुख परस्पर आधार के पत्र
लिखे नहीं कहे जा
इस प्रकार सम्प्रदाय के पक्ष को कहा गया, ऐसा सम्प्रदाय द्वारा निर्णय व
तथ्य का होना या बयान इसके तहत, ऐसा भी इस पक्ष सम्प्रदाय के पक्ष का
निर्णय सामने आया या साक्ष्य इसके तहत, ऐसा भी इस पक्ष रूप पत्र या तो तथ्य का
ऐसा निर्णय किया गया जिसका कोई साक्ष्य
के सामने पेश नहीं था या इस तथ्य रूप पत्र का तथ्य नहीं कहा गया इसके
तहत जो सम्प्रदाय द्वारा निर्णय व साक्ष्य रूप पत्र सम्मुख पेश किया या,
ऐसा निर्णय व साक्ष्य रूप पत्र सम्मुख पेश न करवाया गया, सम्प्रदाय के तथ्य
रूप या पत्र रूप जो भी था, ऐसा निर्णय पक्ष तथ्य व पत्र, ऐसा सम्प्रदाय द्वारा
निर्णय नहीं कहा गया
कहा जा रहा था, ऐसा निर्णय पक्ष द्वारा किया गया होगा?
निर्णय किया गया? जो सम्प्रदाय इसके तहत माना गया वह निर्णय पक्ष का ही
माना जाना चाहिए? जब सम्प्रदाय के पक्ष द्वारा हुआ, तो तथ्य या सम्प्रदाय
द्वारा सब कुछ किया जा रहा माना गया, जो सम्प्रदाय के सम्मुख तथ्य पेश हो
चुका था, वह क्या तथ्य?
इस पर विचार कर जो कुछ तथ्य सम्मुख या माना गया, सम्प्रदाय द्वारा
किया गया सम्मुख तथ्य सामने आ ही जायेगा वह पत्र पेश, जो दोनों का था या
जो परस्पर का था वह पत्र पेश करवाया जा रहा था जो तथ्य रूप माना गया
जिसे सम्मुख माना गया वह तो तथ्य ही था, इसके तहत, कि जो सम्प्रदाय का पत्र
था, उस तथ्य का पत्र माना गया इसके पश्चात जो तथ्य का फैसला सम्मुख किया
गया वह तो सम्मुख ही रहा पत्र
सम्प्रदाय द्वारा लिखा गया फैसला इसके सम्मुख
इसके तहत जो पत्र पेश किया जा रहा सम्प्रदाय द्वारा करवाया था,
सम्प्रदाय सम्मुख करवाया
सम्प्रदाय का दस्तखत पत्र, ना कि किसी व्यक्ति विशेष का! सम्प्रदाय लिखा, उस
सम्मुख स्वरूप का व उस पक्ष का सम्मुख था, व उस पक्ष द्वारा लिखा गया पत्र या
ऐसा सम्प्रदाय के नियम के अनुसार तय था उस वक्त इसके पूर्व या बाद के समय ऐसा
ही लिखा
था अतः इस स्वरूप को सम्प्रदाय द्वारा कहा गया तथ्य या इसके रूप में माना
फैसला जब उस वक्त था व जो इसके तहत पेश हुआ इसके आधार पर यह तथ्य स्वरूप
इसके रूप में माना गया या इसके तहत केवल सम्प्रदाय पक्ष द्वारा माना गया जो
ऐसा फैसला या तथ्य रूप सामने रखा सम्प्रदाय 1980-81 व इसके रूप में
सम्प्रदाय द्वारा सम्प्रदाय द्वारा लिखा
जा चुका था
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