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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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152

समझ रहे हो? बात यह नहीं रही होगी किन्तु बात यह अवश्य रही होगी कि, जो
करेगा सो भरेगा
जब हम कभी रात विश्राम करने वाली स्थिति, अर्थात् शयन, को ही यदि ऐसा
समझ बैठते कि संसार छूटने वाला ही पश्चात्, तो फिर दिन भर भी अनेक प्रकार
विकल्प उठ ही रहे होते कि, इस काम करने वाले पुत्र अथवा अन्य किसी व्यक्ति विशेष
पर कुछ न, तो चिन्ता अथवा मोह का प्रसंग बैठ जाता अतः इस चिन्ता रूपी संसार
व्यतीत हो रहा है।
निद्रा की बात तो, दो दिनके पश्चात् आ--सकती यदि शयन ही बना तो उस
समय तक चिन्ता नहि, चिन्तन भला बन सकता था, किन्तु, ही वैसा विचार न होने
कारण कि वह सब कुछ व्यर्थ समझ करके ही किया, जिससे वह चिन्ता, चिन्तन रूप
बन सकी, चिन्ता चिन्ता, ही ही बनती रही, चिन्तन तो चिन्ता से भिन्न बात,
इस पर विचार कभी तो हो सकता, विचार यह कभी क्यों नहीं हो सका कि कल-कल
में, करते-करते ही समय तो जा रहा पश्चात्-काल में, ही पश्चात्ताप करना होगा
और कुछ हाथ नहि होगा
मनुष्य यदि जान ले, समय रात को इस प्रकार से व्यर्थ गँवाने योग्य
ही तो नहीं क्या वह स्वाध्याय के कम अथवा ज्ञानार्जन रूप से ही समय लगाने का काम
नहीं कर बैठ सकता था जिससे कम से कम, कुछ चिन्तन विशुद्ध तो बन सके!
यह विचार भी यदि बना रहे तो, इस विचार का आधार भी, इस प्रकार का
बन जाता जिससे कि जो जो भी काम हो रहे वह भले प्रकार, बनते तो अवश्य
ही किन्तु उनका स्वरूप कभी बदल जाता, जिससे कि उनका लाभ कम से कम इतना तो
अवश्य मिलता कि, आगामी भव के लिये कम से कम वह स्थिति न बनती जो, कि
अब दिखाई दे, अब समय बीत चुका अथवा न केवल यह, बल्कि इसके आगे की स्थिति
भी, ऐसी बिगड़ती ही चली जाये कि जो कम करने के पश्चात् भी जो कुछ फल मिला-
जिसे आज भोग रहे हैं वह कहाँ तक सही? आगे के लिये ऐसा विचार बन नहीं पा रहा
जिससे भविष्य सुधरने की सम्भावना बन सकेगी या सम्भव समझी जा सकेगी
सम्भावना यह अवश्य बनती है, अपनी स्थिति को सुधारने योग्य इस वर्तमान
समय को बनायें, जिससे कल का, समय बिगड़ने का रूप न ले।
संसार के इस न मेले, संसार के प्रत्येक प्राणियों परिग्रह रूप फल-फूल वाले
इस विशाल कल्प-वृक्ष रूपी इस वृक्ष के फल-फूलों का रसास्वादन करने की दृष्टि
मात्र से, ही जब काम नहीं बन पा रहा अर्थात् यह, कि जब तक फल खा नहि
पाते; तो फिर क्या काम चलेगा? फिर स्वाध्याय का फल क्या होगा? ऐसा मन
अथवा प्रश्न क्यों नहि? इसका अर्थ क्या होगा यह भी?
भाई! इस बात को समझो कि, ज्ञानार्जन रूप इस कल्प वृक्ष का फल !
एक मात्र स्वाध्याय रूप औषधि द्वारा ही उपलब्ध फलवान् बनाया गया कहा, अतः यदि
औषधि का प्रयोग कम कर रहे हो, यदि उसका फल भी कम ही प्राप्त होगा,
अथवा सम्भवतः, ना मिलेगा, कयोंकि जो फल औषधि, केवल प्रभाव उत्पन्न कर सकती
विचार के फलस्वरूप स्थिति क्या होगी यह फल उस स्वाध्याय द्वारा प्राप्त फलवान्
स्थिति का फल मात्र माना जायेगा अतः विचार-युक्त होकर ही कोई कार्य यदि
किया जाये तब उसका वह फल-युक्त रूप बन जाता है तो यह समझ--ही में आयेगा! तो
ही भला होगा!
यह तो मात्र स्वाध्याय के फलस्वरूप प्राप्त उस फल-युक्त ज्ञान का फल
जिसे स्वाध्याय के फल के रूप में माना जा रहा है। पर इस बात को हम क्यों भूल
जाते हैं कि यह भी क्या? बिना किसी आधार के बिना फल देगा, फल की आशा करना
ही तो ठीक कैसे हो सकता है?
कर्म-फल, कर्म-भोग, सबको फल प्राप्त होना एक दम एक जैसा तो नहि,
पर जो जैसा कर्म करता जाता फल तो भी तो वैसा भोगने योग्य बनेगा ही, पर
स्वाध्याय का फल यदि ज्ञान मात्र प्राप्त करने के पश्चात् भी कोई मात्र यह
सोचे कि फल तो मुझे प्राप्त हो गया तो समझना रूप से ज्ञान का कोई अर्थ नहि
समझ आयेगा केवल इतना ही, कि ज्ञान, स्वाध्याय स्वाध्याय तो हुआ, पर उसका फल कुछ नहि,
ज्ञानवान्! बनकर ज्ञान प्राप्त कर, उसका स्वाध्याय तो करता किन्तु ज्ञान का
फल नहि
"उसका ज्ञान मात्र ज्ञान जानकर व्यर्थ माना गया, उसका स्वाध्याय व्यर्थ माना
गया अतः ज्ञान को व्यर्थ जानकर फल समझना होगा, जिससे कि ज्ञान का सही फल"
153

पिता-पुत्रने बातचीत बन्द कर दी। दोनों भोजन समाप्त करके बाहर आये। बाहर आकर बड़े
वैशम्पने छोटे वैशम्पसे कहा कि क्या बात है भाई? पिता-पुत्रमें यह बात क्या हुई। वैशम्पने अपनी
विपदाका हाल कहा, जिससे सुनके व चकित सा रहके मन ही मन कहने लगाकि इसपर विपत्ति पड़ी
है। वैशम्पने कहा कि भाई मुझे बड़ा सोच हुआ। उसने कहा कि तुम चिन्ता कुछ न करो। भोजनके उपरान्त
जब सब मिलने गये तब बड़े वैशम्पने पिता-पुत्र दोनोंको सम्मुख पाकर जो बातचीत कही सो हम कहते
हैं। उसने कहा कि हे तात आप बड़े हैं और हम छोटे हैं। कहिये आज कैसा, आपके भोजन करनेमें
हुआ
तब तो वह पिता-वैशम्प जो विवश होकर अपने पेट पर हाथ धरके कहने लगा कि हे तात
मुझसे भोजन न हुआ। उस बच्चे ने कहा क्यों! कहा उसने कि; विवश हुआ, वैशम्पजीने पूछा कि
आज क्या था जो आप ऐसा भोजन करके विवश हुए, कहा कि आज खीर में खाण्डके बदले किसीने नमक
डाल कर दिया इसलिये अधिक खाई गई। उस बच्चे ने भी कहा कि पिता जी मुझे भी बड़ी भारी तृष्णा
हुई सो अधिक खाकर भोजन पर विवश हो गया!
सो यह वैशम्पसहित सब कोई हंसने लगे कि जो बात पिता कही वही लरिकाने भी कही-
इसपर विचार कीजिये, जहां विषय की आसक्ति बढ़ गई और तृष्णा बढ़ गई वहां पेट भरके
भी पेटका भरना नहीं माना जाता है, इस बातको वैशम्पजीने बड़ा भारी संकट समझा। क्योंकि
पेट, सब वैशम्पका भर गया था। इसपर विचारना चाहिये-विषयासक्त जो लोग हैं उन लोगोंके
पेट तो भरते हैं पर तृष्णा वैसीही बनी रहती है। वैशम्पजीने कहा कि जिस बातको तुम आनन्द
का विलास मानते हो यह बात तो बड़े ही खेदकी जान पड़ती है, जैसा वैशम्पने कहा
सो सुन के पिता ने वैशम्पसे हाथ जोड़ कर कहा कि हे वैशम्पजी महाराज कृपा कीजिये
कि ऐसा फेर छूटे।
वैशम्प कहने लगे कि सब आसक्ति पहले त्याग दो, तदन्तर यह फेर छूटेगा। उसने
कहा
"आसक्ति का त्याग वैशम्प जी कीजिये, जिससे भोग विषय वासना छूट-ही जाय,
पर फेरके ही कारण प्राण न जाय सो उपाय कृपा कर कृपा कटाक्ष कीजिये"
वैशम्प बड़े उदारके समान अपने भक्तपर कृपा
दृष्टि करके व स्वरूप का ध्यान करके व वैराग्यके
रस सहित हो कर बोले कि, हे भक्त सुनो, जो तुमने यह विचार किया; बड़ा ही शुभ
विचारा, जिससे सब आसक्ति त्याग करनेके योग्य ही है, संसारके सब भोगोंको विष समान है,
यह तो सब दुःखका ही कारण है। संसारका स्वरूपही दुःखका स्वरूप है। जब यह विचार
दृढ़ होकर चित्त में बैठ गया सो तृष्णा जो छूटेगी, विषयों से विरक्त हो जाना ही
परम सुखका मूल कारण रूप है। इससे तू चित्त स्थिर करके जो स्वरूप का ध्यान कर रहा था
उसीपर चित्त लगाय रहो
सो यह वैशम्पका मत, महापुरुषों का मत केवल ज्ञान ही का स्वरूप है, इससे
सब को वैराग्य का स्वरूप समझ लेना चाहिये जिससे सब मोह, माया की जो छाया, इस बात
रूपी सब भरम मिट जाय। यह तन जो व है, सो विनाशी न हो, मन को स्थिर न करो,
केवल भजन ध्यान चित्त को दृढ़ करो, मन को एकांत करके ध्यान करने का अभ्यास
ही व ध्यान का उपाय वैशम्पजीने कृपा करके जो कह दिया, सो तो सच्चा ही, पर जो,
विषयाभिलाषी है, जिनके चित्त वैशम्प की कृपाका सो आनन्द लाभ नहीं उठाता सो
वैशम्प के उपदेश, पर अविश्वास ही करें
इसपर विचार करो, जो जो पद कहे सो सो, केवल मुक्ति का ही तो वैशम्पका मत
ही तो है, दूसरा अविश्वासी
सब क्या जाने कि सन् सन् का क्या पद होता? यह तो उस पुरुष जाने जो सुधी,
जो केवल ज्ञान का साधन या वैराग्य का वा ईश्वरके जो ध्यान ज्ञान को दृढ़ करके जो
ध्यान को करता, सो परम आनन्द के स्वरूपको क्यों न पाता? हां, मन विरक्त रूप
सब तृष्णा काम को त्याग कर जो एकांत व हो, सब विषयको मन की जो जो बात है
चित्त लगाय ध्यान कर सदा सन् रहकर तृष्णा को त्यागता सो ही, परम पदको प्राप्त होता व
पावता।
वैशम्प प्रभु का ध्यान कर, केवल अपने मन को जो संत, सो चित्त एकांत करि
ईश्वर का ध्यान करके परम आनन्द रूपी वैकुण्ठ को प्राप्त, सो चित्त एकाग्र करके व
सब विचार त्याग कर केवल जो ईश्वर का ध्यान ही चित्त में धार प्रभुके स्वरूपको मन में,
स्थिर करके मन ही मन व हो, सब त्याग कर चित्त लगाय वैकुण्ठ वैकुण्ठधाम पावे,
समझे? सो सोचो जरा, सब आनन्द रूप को सुख भोग सब पद को त्याग कर जो प्रभु
भजन करे वैकुंठ पद सब आनन्द दाता पाया॥
154

भगवान् का जन-जन्म का साथी माना गया जीवात्माका बन्धक कल्पित अज्ञान
रूपक अविद्या अज्ञान का कारण तो माना गया पर वह उस का कार्य्य तो स्वभाव ही नहीं हो
सक्ता था।
कैसा भ्रम हुआ? न ही जन, न ही मन, न ज्ञान जीवात्माका था, अथवा अनादि
अविद्या स्वयं ही थी! तो ऐसा कल्प करना अयुक्त ही कहा जावेगा कि यह अविद्या
अन-न्तता व्यापक, ज्ञान अविद्याका अ-परिमेयस्वरूप व्यापक ही ठहराया, जिस
पर ज्ञान स्वरूपका प्रभाव जीवात्माके ऊपर अपने रूपका हो जाना भी तय पाया
जावे, जिस प्रभाव रूपको ही भ्रम कहा
ज्ञान का भ्रम रूपसे ही लय हो रहा जान पड़ता है; सो, जैसा रूप व स्वरूप
गुण सर्व व्यापकता जिस प्रकार से ज्ञानका बताया जाता वैसा ही अविद्या का भी
कथन सब कुछ हुआ ही वा माना गया है, जिस से ज्ञान और विद्या सब अविद्या
रूप ही हो सकता सिद्ध होता है? ज्ञान को वा अविद्या को सब रूप माना जावे
सक्ता है वा यह अविद्या ज्ञान स्वरूप? ज्ञान का वा अविद्या रूपका प्रभाव प्रकृति
पर सब स्वरूप रहता है? प्रकृति सब ज्ञान रूप है, वा ज्ञान ही जीवात्माके वा
प्रकृति के व अविद्या स्वरूपके कारण भ्रम रूप में आ गया है।
जिस रूपको अविद्या रूप-रंगसे उत्पन्न हुआ माना गया उस रूपको रूप, नाम,
अविद्या का लय है? विद्या! यह तो रूप-रंगसे रहित केवल ब्रह्म का रूप
कल्पना मात्र कहा गया वा रूप-रंगसे यह रहित ही जो ब्रह्म था उस रूप
ज्ञान को वा लय ज्ञान कहा गया वा जिस का इस प्रकार व्यापक ज्ञान रूपी रूपक कहा
जाता है यह लय रूपक, जिस रूप अथवा, अज्ञानका नाश, जिस का अज्ञानका ही
प्रभाव कहा जाता था वह लय रूप हुआ ठहराया जा सक्ता, कैसा ही उपाय!
ज्ञान सब रूप का स्वरूप ही जब था, तो लय रूप अविद्याका था, वा लय
रूपका ही जब रूप ज्ञान स्वरूप ही माना गया, तब अविद्या का रूप ही जो लय का
माना गया वह लय रूप सब अविद्या, जो वा इस रूप-रंगसे परे, विद्या का भी लय
कथन अविद्या का लय है? जब विद्या स्वरूप ही नहीं ठहरा, जिस का भी लय
होवे? वा वह सब ही अविद्या रूपी रूप?
यह तो अविद्या व ज्ञान दोनों ही अविद्या रूपसे ही सत्य वा असत्य
जीवात्माके ही कथन रूप वा जीवात्मा रूपी मात्र लय अविद्या स्वरूपके ही
जीवात्माके ही लय हो जाने रूप पर ही अविद्या रूपी लय ही का नाम ही सत्य
का नाम रहा
ज्ञान सब प्रकार रूप सब रूप धारण किए हुए जीवात्मा का जीवात्मा
ज्ञान रूपसे ही प्रकाश पा कर ज्ञान ही का लय है? लय किसका? अविद्याका ज्ञान
रूप केवल ही जिस प्रकार अविद्या का? अविद्याका ज्ञान रूपसे ही लय होता है?
अविद्याके ज्ञान रूप सब कुछ है? वा सब जन-जन्म ज्ञान ही? वा सब लय रूप ही
माना जावे?
ज्ञान सब लय स्वरूप ही माना गया, वा लय रूप सब प्रकाश का था, सो तो
प्रकाश ही अविद्या का रूप बनकर ज्ञान रूप ज्ञान का अविद्या स्वरूप रूप-
रंग ही ठहराया, जिस को लय ही ठहराया! ज्ञान-दृष्टि सब लय रूपी,
ज्ञान का लय अविद्या रूप ही हो लय अविद्या का लय माना गया रूपसे वा, सो तो
ज्ञान सब अविद्या
हो ही गया जान पड़े, ज्ञान-दृष्टि जीवात्मा ज्ञान का लय जान पड़े, तो प्रकृति
ज्ञान ही ज्ञान रूप ही अज्ञान ही का रूपक हो गया था, पर सो तो ज्ञान ही, जो भी
कि अविद्या ही हो निकला
ज्ञान ही लय था, जिस का लय था, उस का लय अविद्या
रूपसे ही जन-जन्म से माना जा रहा था सो अविद्या ही ज्ञान सब का रूपक हो
गया जिस अविद्याको कभी जन-जन्म कहते, सो विद्या का स्वरूप ही मिटा
गया, जिस का अज्ञान व अभाव? ज्ञान को ही अविद्याका लय माना तो गया
पर सो सब लय रूप ही ठहर गया था! विद्या रूप तो अविद्या ही ठहरा जन-जन्म
तक।
ॐ तत् सत्

श्री भागवत सुधा
अष्टमोऽध्यायः जारी...
गज द्वारा प्रभु स्तुति

श्लोक 24
ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥
अन्वय एवं साधारण शब्दार्थ
ॐ नमो भगवते तस्मै (उस भगवान् को नमस्कार है)
यतः एतत् चिदात्मकम् (जिससे यह सारा जगत् चेतनामय है)
पुरुषायादिबीजाय (जो सबके आदि कारण पुरुष हैं)
परेशाय अभिधीमहि (उस परमेश्वर का हम ध्यान करते हैं)
हम उस परम पुरुष "ब्रह्म" रूपी ईश्वर का ध्यान करते हैं।

श्लोक 25
यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं ।
योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥
अन्वय एवं साधारण शब्दार्थ
यस्मिन् इदम् (जिस परमात्मा में यह जगत् स्थित रहता है)
यतः च इदम् (जिससे यह उत्पन्न हुआ है)
येन इदम् (जिसके द्वारा इस जगत् की रचना हुई है)
यः इदं स्वयम् (जो स्वयं इस संसार रूप में प्रकट होता है)
यः परस्मात् (जो प्रकृति से परे है)
च अस्मात् परः (और जीवात्मा से भी श्रेष्ठ है)
तम् स्वयम्भुवम् (उस "स्वयंभू" परमात्मा की) प्रपद्ये (मैं शरण लेता हूँ)

पहला प्रमाण यह दिया गया जिसे सब एक मत से सही मानते हैं कि जो यह जगत्
व्यक्त दिख रहा है, इसका लय किसमें होता है?
परमेश्वर ब्रह्मस्वरूप परमात्मा में। लय होने पर उसकी स्थिति कैसी हो जाती है?
अन्धकारमय जगत् का नाश करके जैसे सूर्योदय से पूर्व का समय हो जाता है। प्रकाश
नहीं रहता, केवल अन्धकार रहता है। इस अविद्या-तम से ऊपर जो ब्रह्म ज्योति
स्वरूप है, वह प्रकाश रूप ईश्वर ही है; जो इस अन्धकार से परे है। उसका अनुभव केवल
ज्ञानी
करते हैं और वही इस जगत की रचना करता है।
एक बात यह स्पष्ट हो जाती है कि यह जीव अनेक प्रकार के देवी-देवता आदि
के प्रति अपनी आसक्ति भाव रखता है, किसी से अपनी रक्षा के लिए आशा लगाए
रखता है, लेकिन इनमें से कोई भी समर्थ नहीं है। इस बात को गजराज ने भली
भांति जान लिया था, क्योंकि जब ग्राह ने उसे पकड़ा तो उसके परिवार के सभी
लोग उसे छोड़कर चले गये। वे सब अपनी रक्षा में लगे थे, लेकिन कोई भी इस
संकट से गजराज की रक्षा करने में सक्षम न था।
अन्ततः जब गजेन्द्र ने अपनी बुद्धि से निर्णय लिया कि इस लोक में कोई भी
उसकी रक्षा करने में समर्थ नहीं है तो उसने विचार किया कि कौन है जो इस ग्राह से
छुड़ा सकता है? फिर उसे पिछले जन्म की स्मृति जाग्रत हुई। उसने सोचा कि ऐसा
कोई तो है जो इस संसार में सबसे श्रेष्ठ है, सर्वव्यापी है और सबका साक्षी है।
वह परमेश्वर कैसा है? उसके रूप को कोई नहीं जानता। वह कैसा है? वह
निराकार है या साकार है? उसके प्रभाव को कौन जान सकता है? जिसने इस
संसार की रचना की है। वह इस जगत का प्रकाशक है। वह सर्वव्यापी है।
उसी को मैं नमन करता हूँ।
जिस प्रकार नाटक के विभिन्न रूपों को केवल कुशल अभिनेता ही समझ
सकता है, वैसे ही उस परमपिता परमेश्वर को केवल ब्रह्मज्ञानी ही जान सकते हैं।
वही इस अखिल ब्रह्माण्ड का स्वामी है। वह अजन्मा और अपनी शक्ति से लीला-प्रसार करता
है। वह अपनी शक्ति-माया से लीला करता है। उस असीम शक्ति के आगे मैं नतमस्तक हूँ।
मैं गजराज हूँ, इस संकट से मुझे वही प्रभु उबार सकते हैं। इसलिए मैं उनकी
शरण में जाता हूँ।

156

जिसने किसी को धोखा दिया, विश्वास तोड़ा? जिसने भूख का ग्रास छीन लिया किसीका,
किसी अशक्तपर जिसने अपनी ताकत का प्रयोग कर दिया, जिसने दो को लड़ा दिया और घर को फूंक
कर तमाशा देखा, कौन इनका न्याय करेगा? क्या न्याय प्रकृति करेगी बिना किसी माध्यमके?
माध्यम तो वह बनाए किसी को, पर जिसपर बीती तकलीफ न्यायका तो उसका कोई
सम्बंध निकलता ही, प्रतिहिंसाकी बात छोड़ दीजिये कि किसीने एक हाथ मारा तो बदले में दो
हाथ वो भी मारे, न्याय तो उसपर निर्भर न होगा न ही ऐसे न्याय को न्याय कहा
जाना चाहिये। ये, जिसे "न्याय", कहा जाता रहा है वह न्याय शब्दका वास्तविक अर्थ रखता
हीनहीं! न्याय किसी, बदले या हक लेने मात्र तक सिमट कर नहीं रह जाता बल्कि वह उस
अधिकार की रक्षा करता हुआ न केवल उस व्यक्ति को ही रक्षा देता, न केवल उस हकदार को, न
केवल उस उस हक खोने वाले को न्याय दिलाता बल्कि भविष्यमें कोई ऐसा न्याय को चुनौती न
देसके ऐसी दीवार भी खड़ी कर देता।
इस कारण न्याय की पद्धति इस रूप में नहीं सोची जा रही जैसी कि आमतौर पर सोची जा
सकती, जिसे न्याय की प्रतिष्ठा मात्र ही मान लिया
जाय। कृष्ण खड़े हुए, "आप अपने विचार बतायें बाद में इस न्याय रूप को रख दूंगा"
नन्द ने अपनी बात रखी व समर्थन मांगा व बाकी लोग भी बोले।
कुछ ने अपनी बात रखी व समर्थन मांगा व बाकी लोग भी बोले।
कुछ ने अपनी बात रखी व समर्थन मांगा व बाकी लोगोंने।
"अगर किसी का हक मार लिया हो, न केवल हक ही या उसका धन सम्पदा किसी ने
छीन लिया, या किसी दुर्बल पर या कम तादाद वालों व किसी असहाय पर वार हो, तो न केवल
उसको वो सब हक दिला दिया जाये जो कि अधिकार में था और छीन लिया गया बल्कि जिसे
हक दिया जाये-उसका हक इतना सुरक्षित हो-उसकी तरफ कोई नजर उठाकर
देखे इसके दो अंग होने चाहिए पहला यह, कि वो सशक्त होकर रहे ताकि कोई
वार न करने पाए दूसरा न्याय यह"
जो कृष्ण बाद तक लेकर चलते रहे कि सिर्फ न्याय नहीं बल्कि, जो जो
परिस्थितियां न्याय के न मिलने देनेवाली या अन्याय को जन्म देनेवाली बनी उन सब
को हल किया जाय जब तक न्याय प्रणाली पूर्ण रूप से सच होकर, हर परिस्थिति व
व्यक्ति स्वयं सक्षम न हो जाये, हर परिस्थिति व व्यक्ति अपनी सुरक्षा खुद कर सके या कर ले,
यह आवश्यकता न समझे
उस समय आस-पास के लोग कुछ ऐसा समझे, क्या बाद में आने वाली
परिस्थितियां इस कृष्ण न्याय-व्यवस्था द्वारा हल होने को सक्षम थीं या उस समय जितनी
समस्याएं थीं उनके लिए, कृष्ण न्याय प्रणाली काफी थी या उस समय अन्य लोग अपनी सोच
आस-पास सीमित रख कर सोचते रहे जो कि बाद में चल कर कृष्ण द्वारा ही हल की गयीं
लेकिन तबतक अन्य राजाओंद्वारा अपनी सत्ता बढ़ाने के मद में किया गया अनर्थ काफी
नुकसान कर चुकाथा या यह कह लें कि ऐसा चक्र-व्यूह-रचा, कौरवों ने, जिसमें खुद
उनके हितचिंतकों का ही दम घुटता नजर आ रहाथा।
ये न्याय प्रणाली क्या? कृष्ण द्वारा शुरू किया
हर व्यक्ति सक्षम हो या न हो लेकिन न्याय तो सब जगह एक जैसा मिलेगा?
या कृष्ण न्याय था, जो न्याय नहीं अन्याय? वो तो कह रहे निष्पक्ष न्याय का कोई अस्तित्व
नहीं होता, न्याय तो उस पक्ष का होगा जिसके साथ अन्याय? वो कैसा पक्ष होगा उस
पक्ष का क्या अर्थ था, वो क्या अपने आप बनेगा? या बना-बनाया रूप मिल जायेगा?
या उस समय की समस्या रूप
जब बात न्याय की आती सब इसका पक्षपात समझते, बल्कि निष्कर्ष यह न
निकाला जा रहा बल्कि यह था कि, न्याय व्यवस्था सब जन तक पहुंचे इसलिए
था, पर वो जन सब मिलकर एक समान ताकत बन सकें, जो हर जन तक न्याय पहुँचा सके
ऐसी बात, या वो ऐसी प्रणाली थी जिसमें सब को आवश्यकता के अनुसार न्याय रूप
दिया जा सकता बल्कि न्याय के पीछे एक ऐसा बल खड़ा था जोनिः-पक्षपाती भावसे
न्याय करने सक्षम बनता? क्या स्वयं कृष्ण थे? क्या कोई संगठन?
गोकुल के सब से सब साधन कृष्ण के हाथ में आ गए थे इस तरह कि
बिना किसी दबाव के सब लोग? या कृष्ण ने ऐसा सोचा जिस तरह से सब का?
यह बात आगे तय होनी थी कृष्ण द्वारा सोचे गए हर एक कदम से। पर वो जो भी
कर रहे थे उस से न केवल गोकुल की एक जुटता नजर आ रही थी बल्कि उस गोकुल
व्यवस्था द्वारा अपने विकास को भी देखा जा रहा था और कृष्ण खुद आगे बढ़ कर
कह रहे, सहायता करने विचार बदलने की।
157

यह स्वाध्याय केवल मन को शान्त करनेकेलिए था, या यह बात व्यावहारिक रूपमें
जीवनभरके चरित पर प्रभाव डालेगी यह बात हम नहीं जानते, सम्भवतः यह केवल विचार करनेके
लिएथा? जो विवेक उत्पन्न हुआ, वह विवेक स्थायी होगा या केवल बात समाप्त होनेके
साथ ही वह विवेक समाप्त होजायगा यह बात हम नहीं कहसकते इस बात का निर्णय, सम्भवतः
उस स्वाध्यायके पश्चात् जो बात या इतिहास हमारे सम्मुख उपस्थित होताहै वह इस बात निर्णय
कर सकता है। केवल विचार तक निश्चय? या क्रियामें विवेक होगा, इसका निर्णय तो प्रत्येक का
जो काम आगे उपस्थित हुआ उससे होगा, उस समय देखना चाहिए कि विवेक प्रबल हुआ या अज्ञान
प्रबल रहा, इस बात तथापि स्पष्ट है कि धर्म-कर्म समझनेके पश्चात्के जीवनमें कुछ
लाभ होता है, कोई भी निश्चय कभी व्यर्थ तो जाता ही नहीं, परन्तु देखना चाहिएकि मनुष्य
केवल १ बार विचारकर, सदा स्थिर रहने समर्थ हो सकता नहीं तथा इसके विपरीत जो अनेक
बार बार यह स्वाध्याय करता रहेगा उसका विवेक अवश्य स्थिर हो सकता है। स्मरण रहे कि यह
क्रिया है, सदा स्वाध्याय करनेसेही यह परिणाम संभव है।
विचार तो उस समय निश्चय ही उत्पन्न हुआ, पर जब घर गए तब क्या विचार
स्थिर रहेगा अथवा विचार विलीन होगा? साधारणतया ऐसा देखा जाता हैकि जहां मनुष्य गया,
जहां संगति मिली, उस संग को देखकर विचार बदल जाता है। इसी बात का वर्णन आगेहै? या
प्रत्येक प्रसंगमें उसका विचार स्थिररहा, वह बात यहां है, सम्भवतः पहला विचार
जो चार ज्ञान-विभागों का विचार इस प्रकार का किया, उसका फल यह हुआ कि सब
तरह का निश्चय मन में उत्पन्न कर लेने पर भी चित्त का भ्रम मिटता नहीं! इस कारण और उपाय ढूंढने
तथा स्थिरता को ही प्राप्त होनेकेलिए दूसरा यत्न यहां किया गया प्रतीत होताहै।
पाठक यह देखें, स्वाध्याय का साधारण सा विचार प्रत्येक स्थिति में जो स्वाध्याय का
प्रभाव हुआ करता है, वह सब प्रभाव इस इतिहास में स्पष्ट दिखाया गयाहै। केवल एक बार, क्या
सब भ्रम दूर हुए? क्या सब प्रकार का निश्चय सदा रहा? क्या सब रंग स्थिर रूपमें उतरा?
इन सबका उत्तर पाठकको इस इतिहास में आगे चल कर देखना चाहिए। वास्तवमें यह बात ऐसी
विचार का प्रभाव था, पर जब घर पहुंचे तब माता, पिता सब साथ थे, पश्चात्का क्या
प्रभाव चित्त पर पड़ा इसका विचार भी, पाठकको ही, स्मरण रख कर विचार करना है।
केवल स्वाध्याय करनेका जो समय होता, स्वाध्याय का प्रभाव सदा ही एकरूप नहीं रहता
यह बात पाठक को अपने मन में ठीक तरह बिठानी चाहिए। जब एक विचार का प्रभाव चित्त
सदा एक सा रहना ही कठिन है तब अज्ञान का संग पाकर, वह पहला विचार नष्ट न होगा
इसका क्या भरोसा?
इस अध्याय में इस बात का विचार इस तरह का किया गया है; सब इतिहास लिखने वाले
भी भिन्न-भिन्न ढंग से वर्णन करतेहैं; प्रत्येक विचार का भिन्न प्रभाव होता,
जिसका प्रभाव पड़ता ही रहताहै; स्वाध्याय रूप जो विचार चला, उसका प्रभाव भी
मन स्थिर रहा, चित्त को शान्ति मिली ही--ऐसा इस का आशय! अब पाठक इसी पर
विचार करें तथा १ निश्चय पर पहुंचे कि, १ अध्याय का विचार ही, सब चिन्ता मिटाने
योग्य है तथा सब प्रकार का समाधान ही करनेका यह उत्तम साधनहै।
केवल इस विचार को, चित्त बार बार ध्यान में रखकर विचार करे, स्वाध्याय का ध्यान
रखे निष्ठा, सब प्रकार का लाभ स्वाध्याय का प्राप्त करनेके पश्चात् चित्त में भ्रम, यह
केवल भ्रम मात्रहै।
चित्त का समाधान हो ही तो गया होगा ही, पर यह केवल विचार के रूप स्वरूपमें था;
जब घर की चिन्ता का अवसर आ गया तथा अन्य संसार सम्बन्धी चिन्ता आ गई तब चित्त विचार
बदल गया।
प्रथम विचार गया, पुनः चिन्ता व्यापि।
प्रत्येक बात विचार द्वारा प्रकट की जा सकती है। पर जब तक मन सब तरह
निष्पक्ष भाव का न हो तबतक सत्य बातका प्रकाश मन में नहीं होसकता। चित्त में
केवल ज्ञानमात्र समझने का फल सब को सदा नहीं मिलता। स्वाध्याय करके स्वाध्याय को
भूल ही न जाना, प्रत्येक स्वाध्याय का असर मन पर रहकर सदा स्वाध्याय द्वारा प्राप्त
की हुई शिक्षाको जीवनमें लाने का यत्न सदा प्रत्येक को करते रहना सदा आवश्यक
"हे प्रभु तू सदा विवेक दे, तू सतत दया का दान दे; तू सतत शरण दे, तू सदा
निर्मल रख"
भिन्न-भिन्न स्वाध्याय का फल सदा भिन्न ही देखना चाहिए था, भिन्न-भिन्न ढंगके
ग्रन्थ का स्वाध्याय करने से सब, चित्त सदा स्वाध्याय द्वारा शुद्ध होही सकता।
इस प्रकार सब बात चित्त में रखने योग्य सब ज्ञान द्वारा मनुष्य स्थिर निश्चय पर
आ सके यह निश्चय सदा प्रत्येक को करना होगा, किसी पर विश्वास? पर विश्वास ठीक,
स्वयं पर विश्वास? विश्वास की बात पर ही प्रत्येक मनुष्य अपना निश्चय कर सकता
158

फिर उनके केवल सखाभाव को, उन भगवान् श्रीकृष्ण के साथ केवल सखा के बर्ताव को, देखकर
कहेंगे? क्या यह उनका प्रेम? या यह उन दोनों परस्पर प्रीति? केवल सखाका बर्ताव-मात्र तो
ऐसा साधारण जन भी कर दिया करते हैं। इसमें सन्देह ही क्या है। हाँ, फिर जो वह प्रेम,
जो सखा समुदाय प्रेम करता था वह सब मिट गया होता
तो वह उनका अज्ञानपना ही कहलावेगा। जिस कारण श्रीकृष्ण का प्रभाव ही,
उनकी भगवत्ता मात्र ही, उनका प्रेम ही ऐसा था कि उन गोप बालकों को
ऐसा तो ज्ञान था कि हमारे यह प्राण ही हैं। उनका तो कोई ऐसा व्यवहार ही नहीं
होता जिससे वे न जान सकें कि हम सब कुछ हैं। इसी कारण से उन गोप
गोपों का प्रेम ही तो था? पर ऐसा तो, जैसा सखाका परस्पर प्रेम होता
ऐसा व्यवहार था, परन्तु उनका प्रेम तो सदा सर्वदा केवल श्रीभगवान्
ही, उनकी प्रत्येक क्रिया सर्वदा गोप बालकों के ही हित करने को ही,
इसलिए परस्पर श्रीकृष्ण भगवान् सदा अपने भक्तों के वश सदा रहते सदा
सबही पर कृपा करते
फिर केवल वे, जो भगवान् यह बर्ताव कर रहे थे। गोप भगवान् को,
भगवान् रूप में जानते? वे जानते तो, पर उनकी अपनी प्रीति के बल
करके ही, भगवान् सब कुछ हैं। अपने बल से कुछ न था, सब भगवान्
रूप सब कुछ ही सदा था।
सो उस गोप समुदाय को, गोपियों को सदा अपनी प्राणों का आधार
श्रीकृष्ण ही जान पड़ता। इसलिए वे अपने नित्य ही कृष्ण को देख रहे
इसलिए सदा ही, उनका प्रेम नित्य नया ही बना रहता था। उन्हें सदा
श्रीकृष्ण साक्षात् ही अपने ध्यान में नित्य ही विराजमान ही रहा करते
सो उन सब को यह बात सदा याद रहती थी। अहा, सखा समाज का ऐसा
ही, सर्वदा उनके मन में भगवान् नित्य स्वरूप विराजे! सो सखा का, गोप
कुमारों का? कैसा प्रेम था? कैसा रूप था? कैसा वह बर्ताव था! वे
तो सब कुछ छोड़ अपने प्राणों को भगवान् श्रीकृष्ण अर्पित थे, सो वे बड़े ही
भाग्यवान् थे! सो उनका प्रेम तो केवल प्रभु सखा, सखीजन सब का भगवान्
रूप न होता? भला उन सब गोपों बालकों के जो प्रभु से पूर्ण रूप सम्बन्ध
रहा था, इसलिए सब ही तो प्रभु के माता-पिता सब सदा ही श्री भगवान्
रूप सब कुछ जानते थे। इसलिए वे जानते थे कि उन पर सब प्रभु कृपा
सदा ही की गई थी सो सब पर उनकी कृपा, गोकुल सब पर ही सब पर
श्रीकृष्ण की थी ही, सब लोग पूर्ण रूप श्रीकृष्ण कृपा पात्र ही तो
थे।
उस समय में तो जो बात थी, उसका सब रूप भगवान् ही सब पर कर
रहे थे। उनके रूप का--जो रूप तो सब जन का सदा बना रहा, तो ऐसा मालूम
ही न था, कि सब ओर से कृष्ण ही का रूप उन पर सर्वथा ही सब
ही हो रहा, हाँ! केवल वे तो मन में कृष्ण ही का साक्षात्कार कर
ही भगवान् सदा सब कुछ बना रहे थे। सदा ही उन पर सब भगवान्
का अनुग्रह सदा सर्वदा ही हो रहा था। भगवान् सब ही को प्रेम में ही
तो मग्न थे ही, वे तो सब कुछ लीला ही
जब भगवान् गोकुल छोड़ मथुरा को चले तब सारा गोकुल रोने लगा
और सारा समाज व्यथित हो उठा था। सब कह रहे थे कि हाय हमारे गोपाल ही
तो सब कुछ थे, अब उन भगवान् बिना, हम क्या करेंगे? सो क्या वे केवल
मात्र ही सखा थे, या उन भगवान् बिना, सब ही व्यथित? उस बात को
ज्ञान स्वरूप से जानें, भगवान् तो वास्तव में उन सबके आत्मा,
अन्तर्यामी, परमात्मा स्वरूप ही तो उनके मन में थे।
केवल ऊपर ऊपर सखा रूप ही दीखता था, भीतर-भीतर तो ज्ञान भरा
था, वे भगवान् स्वरूप ही मानते थे! इस प्रकार भगवान् को सब लोग
नित्य सब ओर सदा सर्वदा एक ही रूप में सब ही सब ओर सदा ही देखते
ही रहते थे। इसी कारण से भगवान् सदा अपने भक्तों को सब कुछ अपना
रूप ही सब कुछ दे रहे थे।
भगवान् तो उन गोप बालकों साथ ही भगवान् रूप का स्वरूप दिखाते,
जिससे वे समझ लें न कि केवल मात्र ही सखापने का भाव ही सब कुछ
नहीं, वरन् स्वयं भगवान् उनके सम्मुख प्रत्यक्ष रूप बना हुआ है। सो, सब
लोग सदा ही सब पर ही, ऐसा ही वे भगवान् श्रीकृष्ण नित्य सर्वदा सब ही
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  • Line 27: □□, □□□□□□ □□□□□□□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□ □□□ -> Correct.
  • Line 29: `□□ □□□ □□□ □□ □

केवल नाम का जप कर ले और यह समझ लेकि मुक्ति मिल जायगी; उसका विचार गलत
होगा और उसकी आत्मा अधोगति को प्राप्त हो जायगी या मुक्ति का सुख तो वह क्या जाने
नित्य ही नरकीय यातना भोग कर जब तक सृष्टि रहेगी तब पर्यन्त रोवे, फिर भी मुक्ति का
सुख जन--म पर्यन्त नहीं! मुक्ति का तो फल ही ऐसा कि सुख ही सुख का नाम मुक्ति
जन--ममरण दुःख नहीं!
पर सो मुक्ति विना अष्टांग योग सिद्ध किये कभी नहीं हो या हो सक्ती कि जैसा कि
महर्षि पतंजल जी कृत अष्टांग योगदर्शन में भी लिखा गया किंवा बताया गया है, १ यम दूसरा
२ नियम, ३ आसन फिर आगे, ४ प्रत्या-हार के नाम से, ५ प्राण संयम या
प्रणा याम फिर आगे ७ धारणा या ध्यानावस्था या ध्यान का साधन ८ समाधि का
साधन जिस द्वारा कि मुक्ति मिले, पर बिना यम, नियम के यह सब सिद्ध नहीं, तो सब
व्यर्थ ही किया या कहा गया!
नियम जब तक साधन का आधार रूप सिद्ध नहीं हो सक्ता, तब तक अष्टांग
योग सब व्यर्थ या नाम मात्र रह जायगा किंवा, नाम मात्र जप व्यर्थ, विचार का
फल
सो तो सिद्ध ही है, ना भाई! तो सुनो सब भाई, जब तक मन, वचन और
कर्म शुद्ध होकर किसी का दिल बिना अपराध किसी प्रकार से तन मन धन से न सताया,
ना ही किसी प्रकार दिल को किसी का संशय या डर रखा ना किसी को मारा व ना मारा
ना किसी का धन या माल या रूप देखा या मन में भी ऐसा भाव कभी न मन में
लाया
फिर उसको तो सब सत्य ज्ञान प्राप्त हो कर ईश्वर रूप में अपने आप को
स्थिर वा लीनकर देता है या कर लेता भया, तब क्या मुक्ति प्राप्त जन को
कहा, सो अष्टांग का फल भी तो सिद्ध भया
इसमें तो क्या संशय है? पर ऐसा तो आज कल सब जन ही क्या जो कोई
ही विरला मनुष्य दिखाई देवे कि जिस के मन वचन कर्म से किसी का
दिल किसी प्रकार दुखाया नहीं जाता होगा, ना ही ऐसा देखा जाता कि सब को
रूप या धन से देख के नियत बदल जाती दिखाई न देवे वा दिल, विचार सब
दिल अपने वशीभूत कर के रखता हो, बल्कि तो आज ऐसा कलिकाल का
समय सब तरफ फैला हुआ है जिससे कि सब ही माया जाल में फँसे, पाप
करें! जिस कारण सब ही तो नरक रूप में दुःखमय भोगें!
अब आगे ऐसा भी तो विचार देखा जाता है कि जिस तरह से जो जन
उपदेश देता फिरता है उस उपदेश पर तो विचार किया जाय तो महापाप रूप
हो जाय, सो उपदेशक जन तन-मन धन को किसी के भी छीनने को ना तो
मन में संकोच करे ना पराई रूप वा स्त्री के मिलने का भय या पाप व डर
रखे, फिर क्या हो? केवल जप पाठ-पूजा निष्फल
जिस का ना भाव सत्य ना कर्म सत्य ना विचार सत्य है, फिर तो
केवल पाखंड कहा जा सक्ता है, जिस का फल क्या मुक्ति मिलेगा? तो
ना ही विचार का फल जन व समाज, सब उपदेश का उल्टा ही फल व
असर दिखाई दे रहा है
जिस का यह भी परिणाम होगा कि, आगे जा के सब समाज ही उलट
जाय, फिर सब विचार ही बदल कर जीव केवल ही पापों को ही सब कुछ
या पुण्य ही समझ बैठेंगे, फिर तो न कोई किसी की बहिन बेटी पर
नजर पवित्र रक्खेगा ना ही सब का दिल विश्वास योग्य रह जावेगा
ना ही गुरु चेले का भेद, ना ही सब धर्म का भेद ही रह जावेगा
सो हे भगवान, यह दशा आगे जा कर संसार की ना होवे, इस से सब को
ही रक्षा से बचा कर संसार भर को सत्य मार्ग पर लावे जिससे, कि सब
जन ही पवित्र बन कर अपनी रक्षा कर सकें और सुखी हों
ऐसा जान कर, "हे सत्य स्वरूप ॐ प्रभु जी, दया दृष्टि से सब जग
को इस पाप से वा पाखंड से बचा कर ऐसा ज्ञान दे जिससे सब जन तेरा
भजन-सिमरन कर के पार उतरें और आ-गे को सब प्राणी सुख पावें और
सब पाखंड नष्ट होवें, ना ही कोई इस तरह माया जाल रूपी दल दल में
तन मन वचन द्वारा कभी फँस पावे, जिस से जीव का सदा भला होय ना
किसी तरह से भी जन दुख पावे, सदा ही सुख प्राप्त कर सकें"
ॐ तत् सत् सर्व ब्रह्म मय
"सत्य ही सब कुछ सुख का रूप"

कौन किस प्रकार ध्यान करेगा? स्मरण रहे, ध्यानसाधना का एक सरल और सीधा
उपाय यह बतलाया गया रहा कि साधक को घर से या ध्यानकक्षके उस एक कोने
को ही ही भगवान् का स्वरूप मान ले, जहाँ वह ध्यान पर बैठता रहा या जिस
कक्ष का ध्यान अभ्यास-सा करेगा या ध्यानसाधना उस भगवान् स्वरूप-
से ही स्वयं करता या करवाता रहेगा तब
प्रत्येक क्रिया चाहे वह मन से मन की बात क्यों न हो अथवा वाणी
द्वारा कही गई हो या फिर हाथ पाँव द्वारा किया गया कर्म या शरीर
सम्बन्धी कोई बात हो उसका फल या परिणाम या स्वरूप किसी और रूप में
प्रगट होने वाला ही नहीं।
ऐसा भाव, विचार लेकर मनुष्य जब, उस स्थान रूप ही भगवान् के उस
विशेष अधिकार का उस स्थान से ग्रहण करवाकर काम करेगा तब, जो जो
क्रिया उस द्वारा आगे चलकर होगी या घटती रहेगी वह सब प्रभु के स्वरूप
से उस को सम्बन्धित स्वरूप बनाती जायेगी या जो कुछ भी होगा उसका फल
भी प्रभु-कृपा द्वारा ही मिला हुआ अनुभव-स्वरूप होकर ही प्रगट हो रहा
हो या उसका कारण भी स्वरूप के द्वारा बना ही आ रहा होगा
साधक को तो अधिकार रूप में केवल यह निश्चय करना ही तो उसका या
अभ्यासका एक नियम या नियम का स्वरूप बन कर उस को साथ देगा, फिर
फिर जैसा जो भी ज्ञान का स्वरूप या प्रभु रूप अपने आप, कृपा करेगा!
उस को वह सब कुछ प्राप्त रूप में अपने आप स्वतः ही स्वाभावक रूप में
ही अपने स्वरूप से सम्बन्धित कर देगा अथवा बनता रहेगा या फिर, भगवान् रूप
कृपा, जिस भी रूप को वह रूप देना चाहेगा सो रूप अपने स्वरूप को ही
उस स्थान के रूप में, जो जो भी उस स्थान से ज्ञान स्वरूप होगा या उस
रूप स्वरूप को जो उस स्थान से प्रभु द्वारा अपने आप ही दिया जायेगा
अथवा जो अधिकार से आगे घट रहा होगा, सो उस द्वारा अपने ही
उस भगवान् रूप ज्ञान द्वारा या शक्ति के रूप में ही होगा, ना कि उस
शक्ति अथवा रूप को कोई और पा लेगा, ना उस से पृथक् ही स्वरूप बना
सकेगा। केवल भाव ही उस का ऐसा दृढ़ रूप ले चुका होगा जिसे कोई
और शक्ति या नाम से पुकारा नहीं जा सकता इसलिये उसका ध्यान रूप
ही भगवान् रूप स्वरूप का प्रकाश उस स्थान में जो उस के बैठने से सम्ब-
न्धित था, स्वाभावक प्रकाश बन भगवान् नाम-स्मरण से अपने आप प्रकाश
रूपी स्वरूप में उस को प्रकाश दे--देगा
जब नाम-स्मरण रूप से ही उस प्रभु रूप शक्ति उस को प्रकाश देगी,
जिसे वह ज्ञान स्वरूप के रूप में भगवान् का रूप समझ कर उस को
अपना आधार ही मान ले अथवा समझ ले उस का भाव या ध्यान का रूप
भी उसी प्रकार हो, जिस रूप, जिस नाम, या प्रभु-कृपा रूप से उसने
हर बात को या अपने कर्म को उस स्थान द्वारा सम्भालने का यत्न ही किया
हो सो ही भाव या उस रूप का भाव-स्मरण उस को अपने आप ही सहारा दे
कर उस को उस प्रभु रूप शक्ति का ज्ञान रूप ध्यान में ही आगे रूप
दे देगा जो उस ध्यान द्वारा उस को नाम-स्मरण द्वारा ही होगा
सो इस प्रकार ज्ञान के भाव, से उस प्रभु शक्ति द्वारा ही तो सब कुछ
हो रहा रहा या कहलाया गया रहा या हो रहा होगा सो उस सब को वह अपने
कर्म से पृथक् ज्ञान मान कर उस की ओर जब जब दृष्टि लगायेगा, तब
तब उस शक्ति द्वारा उस ज्ञान रूप भगवान् के ही तो वह सब कुछ कृपा ही
रूप ज्ञान रूप में ले कर भाव रूप शक्ति, जिस का उस स्वरूप द्वारा
प्रकाश
हो रहा होगा, प्राप्त होगा, अनुभव से, प्रकाश से, उस सब को ही
वह पा रहा या पा चुका होगा या उस--द्वारा भगवान् के प्रकाश को पा रहा
रहा या उस--द्वारा प्रकाश का स्वरूप बन पा रहा या प्रकाश का रूप बनता
होगा, सो भगवान् कृपा द्वारा ही, भगवान् के ज्ञान से ही सब कुछ,
ज्ञान स्वरूप ही बन रहा या हो रहा होगा, स्वरूप के द्वारा ही,
स्वरूप के ज्ञान रूप भाव से ज्ञान के रूप में नाम, स्वरूप से ही पा रहा,
सो सब कुछ भगवान् का, उस प्रभु का ज्ञान रहा
जिसे वह जान रहा होगा, या शक्ति स्वरूप द्वारा प्रकाश द्वारा ही
स्वाभावक शक्ति के रूप में पा रहा या प्राप्त कर रहा था।
162

तब यह जीव अपना स्वरूप भूल कर देहादि पदार्थों को, जिस तरह एक मूढ़ अपने पहने वस्त्रों तथा शरीर को
देखकर खुश या दुःखी होता है, देहादि का सुख दुःख अपने ऊपर मान कर संसारीजनों समान सुखी और
कभी महा दुःखी होता हुआ जन्म और मर कर इस भव रूप महा दुःखदायी कुण्ड में ही, अपने किये कर्मों
द्वारा ही भ्रमण करता रहता हुआ कभी स्थावर कभी त्रस रूप चौरासी-लाख योनियों विषे अनादिकाल
से ही परि भ्रमण कर रहा है। सो यह जीव अनादि से अविद्या को, जो कि अपने स्वरूप तथा देहादि को
पृथकरूप से नहीं
बतलाती स्वरूप को, जो देहादि को आत्मा मान मिथ्यादृष्टी,
कर्मबन्धकपना जीव को करती है। सो अज्ञान जन्य देहादि का वासना रूपी अन्तःकरण रूप मलिन
दर्पण समान ज्ञान है, सो मिथ्या ज्ञान है। ऐसे अज्ञान रूपी अन्धकार द्वारा आच्छादित रूप यह देहादि
विषय को उत्पन्न कर के संसारिक सुख, जो केवल अज्ञान ही द्वारा सुख रूप भास होता
हुआ क्षण भर का ही सुख है। सो इस अज्ञान देहादि सुख की लालसा रूप पिपासा द्वारा
कि जिस तरह से कि कस्तूरी मृग अपनी नाभि में, जिसे स्वयं उसने धारण कर रक्खा
उस सुगन्धित द्रव्य, जिस का वह स्वयं ही स्वामी है, उस की सुगन्ध से मोहित होकर
उस सुगन्धित वस्तु को, जंगल में ढूंढता फिरता हुआ व्याकुल रहता है कि
जिसका अन्त में, अपने ही अज्ञानान्धकारवश शिकारी के हाथ मारा, जंगल विषे ही
समाप्त हो जाता
इस अज्ञानान्धकार रूपी अविद्या को नष्ट करने वाली विद्यारूपी जो कि आत्मारूपी ज्ञान का प्रकाश
कि जिसके उदय होने से अज्ञान रूपी अंधकार नष्ट होकर जीव अपने स्वरूप को पहचान कर, अनादि
से ही जो यह जीव इस भव रूप कुण्ड विषे जन्म मरण के अनेक प्रकार दुःख भोगता चला आ रहा
उस दुःख रूपी कल्पित वासना के बन्धनों से छूट कर मोक्ष पद को प्राप्त हो जावे, जिसे प्राप्त
हो कर यह जीव, अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त हो, अपने ही स्वरूप में आनन्द, जो कि
अतीन्द्रिय सुख कहा गया है। उस आत्मानन्दमयी पद को पावे, जिसके समान कि इस
जग, में दूसरा सुख अनुभव, जिस को सांसारिक सुख कहते हैं नहीं है, बल्कि उस
सुख को, आनन्द का अंश कहा गया है।
जिस तरह से कि सूर्य उदय होने पर अन्धकार जो कि प्रकाश के अभाव रूप
केवल अज्ञान, अन्धेरा होकर प्रकाश युक्त नहीं, स्वयं प्रकाश होकर प्रकाश युक्त
तेज पुञ्ज सर्व ओर फैल जाता है, तो सूर्य रूप प्रकाश के उदय होते ही स्वयं अंधकार
रूप अन्धेरा नष्ट होकर केवल प्रकाश ही प्रकाश हो, जाता है। उसी तरह से ज्ञान रूपी
सूर्य के उदय होने से अज्ञान रूपी अन्धकार जो इस जीव को जन्म मरण आदि अनेकों
प्रकार के दुःखों का कारण था सो अज्ञान रूपी अन्धकार स्वयं नष्ट हो जाता है।
जिस तरह एक ही दीप शिखा से अनेक दीप, प्रकाश के अभाव को
दूर करते हुए सब अपने अपने प्रकाश-द्वारा, प्रकाशमय उस गृह को करते हैं। उस
समय उस अन्धकार का लेश मात्र लेश भी नहीं रहता है। इसी तरह यह जीव जब उस
परम प्रकाश को, जो कि ज्ञान रूप, जिस ज्ञान से पूर्ण होकर अपने शुद्ध स्वरूप
रूप प्रकाश को धारण कर के स्वयं ही प्रकाशित
सो अज्ञान रूपी अन्धकार जो इस जीव का अनादि से संगी था, जिस करके
आत्मा को, देहादि का संगी मान कर आत्मा द्वारा कृत शुभाशुभ ही फल को भोग
कर रहा था, जिस अज्ञानान्धकार द्वारा ही जीव मोह के वशीभूत होकर, कर्मों का
बन्ध कर के इस ही भव रूप संसार रूपी कुण्ड में ही बार बार जन्मता व मरता रहा
हुआ नाना रूप से कष्ट भोगता हुआ, अनेक योनियों में भ्रमण कर रहा था।
सो इस ज्ञान रूपी सूर्य के उदय होने से अज्ञान का यह सब खेल ही समाप्त होकर
जीव, उस मोक्ष सुख को
प्राप्त होता हुआ, जिस सुख को प्राप्त हो आत्मा को फिर से इस संसार रूपी
कुण्ड में, ना तो जन्म धारण ही कर संसार रूपी अनेक प्रकार के दुःख ही भोगने
पड़ते हैं। उस पद को प्राप्त हो सदा काल के लिये अपनी शुद्ध अवस्था को प्राप्त
होता हुआ यह जीव, अपने शुद्ध स्वरूप में लीन हुआ रहता हुआ उस आनन्द, जो कि
सुख से भी परे सुख है, जिस सुख को न तो, मन या वाणी द्वारा वर्णन किया जा
कर सत्य स्वरूप में किसी के सामने ही दर्शाया जा, सकता है। उस अतीन्द्रिय
पद मोक्ष को प्राप्त हुआ सदा विराजता है।
इस संसार का जीवात्मा रूप सूर्य जो ज्ञान के बिना बादलों में, छिप कर
रह कर अपने पद को न पा कर अज्ञान रूपी बादल के उदय से जो कि अंधकार
स्वरूप, ज्ञान रूपी न होकर; मोह रूपी जल की वर्षा अन्धकार रूपी जल द्वारा
इस जीव रूपी पृथ्वी को सींचता हुआ जिस से संसार रूपी अनेक प्रकार के कर्मों
163

ऐसा जान कर विचार करो कि केवल संन्यास लेने मात्रसे मोक्ष फल की प्राप्ति कभी नहीं
होगी
स्वामी समन्त भद्रने, "सरागौ ज्ञान गर्भात्मा सा भवेद् भवनाशिनी" राग सहित भी, जो भी ज्ञान
सहित मन रूपी ध्यान किया जाता संसारका नाशक हो सो तो ठीक ही परन्तु यहां तो भाव संन्यास
बिना द्रव्य मात्र, उस पर केवल काय-कलेवर धारण से, मोक्ष की कौन कहे, स्वर्ग तक
मिलना दूभर"
सो इस प्रकार केवल भाव ही से मुक्ति फल प्राप्तिके अर्थ रूप से द्रव्या-
नुप्रेक्षाकार भये, सोईया जी! जो संन्यास-कलेवर को मुख्य जानकर के, सो ही द्रव्य-
संन्यास का मुख्य अधिकार कर केवल संन्यास रूपी क्रिया मात्रसे स्वर्ग मुक्ति फल
विचारत भये
मिथ्यात्व, असंयम, कषाय, प्रमाद संन्यास-कलेवर अवस्था में रहे तब संन्यास क्रिया
फल तो निष्फल हुआ सो विचार नहिं किया। सो इस ग्रन्थ का कर्ता इस अधिकार
ग्रन्थ विषै जो सो यह बात कही प्रमाण न हो सकी, इस हेतु यह ग्रन्थ ही मिथ्यात्व भाव
का मूल हुआ, उस पर कर्ता ने सम्यक्त्व भेद रूप व्याख्या कही सो मिथ्या, ज्ञान
रूप भेद न प्रकाश, उस पर ज्ञानी संन्यास स्वरूप न कहा, इस हेतु ग्रन्थ ही को प्रमाण
कहे, उस पर स्वामी समन्त भद्र ने सम्यक्त्व भेद तथा महाव्रत का जो भेद स्वरूप
कहा तिस ज्ञान का प्रभाव
प्रभाव समन्त भद्र के वचनों का हुआ, ज्ञान, असंयम, जो भाव संन्यासी कहाया
तिसमें राग भाव का रूप संशय दूर सो न हुआ संन्यास रूपके विचारते हुआ भला, ज्ञान
संन्यास का सम्यक्त्व रूप भेद तथा प्रमाण स्वरूप से भेद न कहा, ज्ञान संन्यास को
सो उस समय ज्ञान का प्रकाश हुआ सो इस ग्रन्थका भी हुआ, ज्ञान संन्यास अवस्था
का सो भेद ग्रन्थका इस प्रकार से प्रगट हुआ निश्चय सम्यक्त्व का प्रकाश सो संशय
मिटाने को यह ग्रन्थ, स्वरूप के इस भेदको प्रगट कर भाव मोक्ष फलदायक भयो
सो इस ग्रन्थानुरूप यह संन्यास नाम सम्यक्त्व भेद को कहै सो मुक्ति का प्रकाश
जो सम्यक्त्व के प्रभावसे इस ग्रन्थ में सो भाव मोक्ष का तो ज्ञान हुआ सो यह ग्रन्थ
सम्यक्त्व का ही प्रकाशक ज्ञान रूप ग्रंथ सो इस ग्रन्थ को, उस पर भाव संन्यासी का जो
स्वरूप कहै सो इस भेद सो ज्ञान सम्यक्त्व भाव संन्यास रूप कहे सो ग्रन्थ मोक्ष फल
दायक भयो सो यह ग्रन्थका कथन सत्य जान संशय निवारण को सम्यक्त्व प्रकाश ज्ञान
ग्रन्थ भयो
सो संन्यास का स्वरूप सो या को या सो ग्रन्थ कहा, जो सो यह या सो ग्रन्थ सम्यक्त्व
ज्ञान-दाता स्वरूप प्रकाश ग्रन्थ न हो भाव रूप ग्रन्थ न हो यह सो सो सो सो सो,
सो सो सो रूप विचार सम्यक्त्व सो उस ग्रंथ को सर्वज्ञोक्त ही प्रमाण, संशयात्मा
को यह ही ग्रन्थका रूप सो सत्य जान, जो संशय निवार्य के भेद रूपको प्रकाश या
ग्रन्थ द्वारा सम्यक्त्व का भाव सो स्वरूप को प्रगट भयो
मिथ्यात्व, असंयम, कषाय, यह भाव सो संन्यास के भेद सो ग्रन्थ विषै
प्रगट भये सो सम्यक्त्व, संन्यास, ज्ञान स्वरूप संन्यास विषै सो सम्यक्त्व प्रमाण भया
सम्यक्त्व संन्यास का भेद रूप जो सो ग्रन्थका स्वरूप सो संशय का नाश हुआ तिस
सो यह ग्रन्थ का प्रभाव भया, तब संशय को नष्ट कर ग्रन्थ प्रमाण हुआ, सो, जी, जब,
संन्यास सम्यक्त्वमय भया तब यह सब भेद ग्रन्थ ने प्रगट कर ज्ञानमय को जगाया
ताते भला ग्रन्थ कहा, संन्यास भये, संशय भ्रम सब सो मिट सो ग्रन्थ द्वारा
प्रकाशमान भया
सो जो संशय ग्रन्थ का निवारक भयो कहै सो, ज्ञान विचार प्रमाण सो संशय
रहित भये ग्रन्थका यह स्वरूप सो भेद रूप संशय मिटा तब ही सो संन्यास का प्रकाश या
ग्रन्थ से ज्ञान हुआ सो संशय को त्याग कर ग्रन्थ स्वरूप भया
ग्रन्थ कर्ता का तो यह भाव हुआ न जो इस पद को कहै ग्रन्थ का भेद ज्ञान को
प्रकाश कर ग्रन्थ नाम दिया सो भला ही किया, सो तो भला किया? सो तो न हुआ
या प्रकार सो भयो! सो भाव संन्यास हुआ, ग्रन्थ कर्ता का सो संशय सो, स्वरूप
ग्रन्थ का प्रगट भया सो! सो इस संन्यास का जो ज्ञानरूप सो, संशय का नाश
हुआ? सम्यक्त्व सो सो संन्यास, सो ग्रन्थ प्रमाण हुआ, संशय का नाश
किया? या प्रकार संन्यास संन्यासी का भेद ज्ञान न हो ज्ञान हुआ संन्यासी का
ग्रन्थ सो संन्यासी न भेद ज्ञान को सो ज्ञान विचार न हो, संशय न हो प्रमाण सो, या
सो ग्रन्थ कर्ता मिथ्या, या ग्रन्थ का प्रभाव कहा? संन्यास को प्रमाण सो ज्ञान का
प्रभाव सो तो ग्रन्थ द्वारा संशय भ्रम न रहा जान
164

लेकिन सम्प्रदाय का प्रचार जितना तीव्र गति से उस समय संसार व्यापि हो सकेगा, उस
समय संसार में कोई भी धर्म-मत सम्प्रदाय ऐसा न रह जाय जो उसके सम्मुख टिक
सके सो, तुम यह विचार करो, कि उस समय उस नवीन धर्म-सम्प्रदाय द्वारा धर्म वृद्धि
हो सकेगी? सच तो ऐसा होगा, कि सम्प्रदाय का प्रचार धर्म का संहार होगा।
अतः सत्य सिद्धान्त प्रकाशीय व्यवस्था द्वारा जब धर्म-सम्प्रदाय का नाम मात्र
रहेगा और धर्म-सम्प्रदाय का संसार भर से सर्वथा लोप हो जायगा सो, यह सम्पूर्ण
का कल्याण होगा सो यह कल्याण ही सब धर्मों का, वा धर्म का सार और सब ही धर्मों
का मुख्य लक्ष्य है, सो जिस का यह लक्ष्य सत्य है सो प्रकाश स्वरूप परमेश्वर का
सब प्रजाओं को ही हो रहा है जिस उपाय द्वारा सब ही एक मत हों व सत्य ज्ञान को
प्राप्त हो सके जैसा सम्पूर्ण विश्व को प्रकाश करने के लिये एक ही सूर्य सब का प्रकाश
करने वाला बनाया है॥
सोचो, नवीन धर्म-सम्प्रदाय तो तब बनता होता कि जब कि कोई नवीन धर्म
होता सो, यह स्वाभाविक धर्म सब काल रूप, वा सनातन सिद्ध स्वरूप का एक रूप
सब सत्य धर्म-सम्प्रदाय से परे है सो सब का कर्त्ता सब को ही दे रहा है, धर्म-
सम्प्रदाय तो धर्म की हानि के हेतु हैं, इससे सब काल व्यापि सनातन धर्म स्वरूप
सुख दायक सब काल रहने वाला सत्य धर्म स्वरूप है सब का रक्षक प्रकाशक दयाल
सो केवल प्रकाश ही सब पर दया का प्रकाश कर रहा है सब धर्मों सम्प्रदायों
द्वारा फैला हुआ जो अविद्या का घोर अन्धकार है उससे सर्वथा लोप, सब प्रजा मुक्त
हो, यह विचार करोगे?
ईश्वर सत्य ज्ञान रूप, धर्म का सत्य धर्म-सम्प्रदाय से परे सो, सम्पूर्ण
विश्व का प्रकाश प्रकाशक दयाल सबका परम कल्याण ही सोच कर ज्ञान रूप सत्य रूपी
प्रकाशक दयाल सबका जो नाश कर सकता सो ही रक्षा! सूर्य ही केवल है! धर्म
स्वरूप परमेश्वर दयाल सबका जो संहार करता सो ही रक्षक! प्रकाश ही केवल सब
का! जो सत्य न्याय पर चल कर व सत्य व्यवहारों को ही सब को सब देगा।
जो जिस पर निर्भर है सो केवल सम्पूर्ण विश्व का रक्षक दयाल सबका
केवल एक धर्म काम-धंधा, धन-दौलत सब कुछ संसार का नाश ही करता रहेगा॥
सब कुछ ईश्वर का दिया हुआ संसारिक व्यवहार केवल करने के लिये दया
पूर्वक, विचार युक्त केवल कल्याण करने वाला बनाया है, केवल सत्य स्वरूप दयालु
प्रकाशक सब का यह प्रकाश सर्वत्र समान ही कर रहा है जो सब को ज्ञान व सब को सब
प्रकार सत्य सुख प्रकाशक की दया प्रकाशक सब पर सब का सब हो रहा है॥
विचार ही सब कुछ सत्य है सब कुछ व सब संसार व्यापि दया केवल दयालु व
केवल दया प्रकाशक दयालु का रूप ही दया का प्रकाश दयालु दयाल, दयाल सब
कल्याणकारी है॥
"सत्य ज्ञान प्राप्त रूप से समस्त माया का प्रभाव ही ज्ञान रूपी प्रकाश से ही
संपूर्ण विश्व सर्व प्रकार से सब काल में सर्वत्र व्यापि"
सो सब का ईश्वर सब प्रकार सब का सब काल में, केवल सर्वत्र व्यापि ही सब
व्यापि प्रकाश दयालु दयाल का रूप सब दया का प्रकाश हो रहा है सो सब काल
में स्वाभाविक रूप से ही सत्य प्रकाश रूप सब स्वाभाविक प्रकाशक का व सत्य
स्वरूप का, जो जो भी सम्प्रदाय-भाव सो सब सब माया के सब जाल रूप
केवल मिथ्या, अविद्यामय विचार॥
सो जिस प्रकार से सूर्य सब दिशाओं को सर्वदा, केवल ही सब काल व्यापि
ही सब प्रकार के अन्धकार को नाशवान कर देता हुआ सब समय सब व सब दिशाओं
का सब प्रकाश करता है, व जिस रूप द्वारा दिन-दुपहर सब प्रकाशक
ज्ञान सब व सब रूप सब कुछ सब का केवल ज्ञान ही सब का सब हो रहा है सब
सत्य ही समस्त सब सब का ज्ञान रूप, सब प्रकाशक केवल क्या? व सब का
सत्य, व ज्ञान रूप प्रकाश सो, जो सम्पूर्ण संसार में? सब ही सब का,
सब विश्व सब सब सत्य प्रकाश सब सब का सब काल रूप सब कल्याणकारी प्रकाश
विश्व का प्रकाशक रूप दया रूप, केवल सब रूप से प्रकाश सब का सब
प्रकाशक सब रूप रूप, सब सब का प्रकाशक रूप॥
केवल, सर्वशक्तिमान, प्रकाश ज्ञान का प्रकाशक केवल ही सब रूप से
स्वाभाविक है, सो प्रकाश केवल सब रूप सब का रूप सब का रूप ही सब का
स्वाभाविक रूप सब सब सब ज्ञान केवल सब का रूप व सब, केवल ही रूप॥
165

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□□ □□□? □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□? □□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□
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□□□□□... □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□
167

जब राजा सो, पाछे जाग उठ्यो, ताहि बख्त एक रीछ-सा को जीव आय उछल
कै बैठि गयो जा राजा पास, ताकौं सो राज देखिकै डर गयो पाछे वह रीछ
बोलि उठ्यो ता सों अरे राजा तू क्यों डरै डरपो मत ताके बादि राजा कहै तूं
कौन सो बताय हमकौ रीछ कहै ता सों, जो तू यह कहै मोकौ मारि, ताहि
पहिचानि कै कही सकौंगो
"जाकौ जस जस ही जानिये लोक, जो न जानै लोक तो, ता को जानि
सकै कौन"
तब राजा सो अचरज हो सोचन को लाग्यो कि यह जीव आय कैसे वचन बोलि
उठ्यो जो यह जीव-जन्त सब हो सो ईश्वर निमित्त उपजाये अपने अपने
विषय पायकै सब भोगत सोई भोगत ही रहै, भला मनुष्य? मनुष्य सो कौन,
भला मनुष्य? मनुष्य तो काम-क्रोधदिक के वश हो काम कै, भला मनुष्य? जानि
कै पराया धन लै कै घर भरे, अपना पेट भरै, पाप-पुण्य को जानै सो, मनुष्य
जाकौ नाम है सोई यह रीछ जीव कहै जो कि ईश्वर-निमित्त यह बनाया
सोई कहै
तबै राजा कहै, "जो मनुष्य जनम लै कै, जग में सब सुख लै कर लै सब
काम सिद्ध कै, पाछे ता ईश्वरकौ भजन करि लेय"
तब ही सो अचरज हो सोच बादि कहै जो हम सब बात को समझै ऐसा
कह कर के पाछे वह रीछ सो कहै अरे भाई तू सब बात को जाणनैहारा
हो सो कहो कि हमारे मन मों इच्छा है ईश्वर को मिलने की सो कैसे हो
जाय सकैगी सो बताओ सो तब ही सो रीछ बोलि उठा अरे राजा यह बात
कहिये क्यों कर कि तू तो अहङ्कार करिकै अहङ्कार सो भरी गयो है
ऐसा क्यों? तू सब को सब जानै है, यह बात किस प्रकार? भला जब यह
बात ही तब सब काम सिद्ध हो तो बात ही क्या मनुष्य जनम पायकै
मनुष्य? ता जनम पायकै भजन किया जाय?
ऐसा रीछ सों राजा कहै, भजन बिना तो जीव का कल्याण
नहिं होय सकै, राजा फिर कहै, ईश्वर सब निमित्त है परमात्मा
सर्वव्यापी है जो सब संसार सब को बनाय राखै पायकै मनुष्य देह को
परमात्मा को भजन करिकै सिद्ध होय तव काम परमात्मा ही से सब
सिद्ध होय यह बात सत्य कहै
यह बात सुनि, राजा सो रीछ कहै, अब तू सब कुछ जानि गयो है,
अब तो भजन करि
पाछे राजा के मन में आ गई कि रीछ को मारूं! मार, तलवार निकाल
कर हाथ में लेय कर जब वार करन लगा, तलवार हाथ से ही छूट गई
लटक गया हाथ-पाँव से फिर देखा--रीछ गायब हुआ! तब राजा को समझ आई
बात, राजा विचार कर मन में बैठ गया
ज्ञान उदय होने से वह सोचे, अब तो सब बात जान गया हूं
सब भ्रम छूट गया अब तो मैं फिर राज-पाट को नहिं जाऊंगा जब
तक परमात्मा का दर्शन नहिं हो जायगा तब तक राजा तपस्या कर
के वन में रहेगा, यह बात दृढ़ कर ली उस वक्त
"हे नाथ, तू ही मेरा सब कुछ"
वो रीछ कोई और न हो कर ईश्वर का भेजा हुआ दूत था जो राजा
को जगा कर चला गया, अब तो वह राजा, जो सब से सब कुछ
जानता समझता विचार कर अपने स्वरूप को समझ कर सब से परे होकर,
उस वन में रहकर भगवान नारायण का स्मरण करने लगा और एक
दिन ज्ञान उदय होकर मुक्ति को पा गया सदा, जो भजन सो करता
उस वक्त मुक्ति स्वरूप पद को प्राप्त हुआ जो परमात्मा के धाम
को पा गया फिर कभी वह संसार चक्र में नहिं आया ॥?
इस दृष्टान्त कथानुसार सार यह निकलता है कि मनुष्य अहङ्कार
वश हो कर सब कुछ अपने को ही सर्वशक्तिमान मान बैठता है जब
तक कि भगवान का अहसास उस व्यक्ति को न हो जाय, तब तक
मनुष्य का मन शांत नहिं हो सकता जो भजन से ही हो सकता है इस
बात को सदा याद रखो, सब से बात यह सार निकसी, मन को सदा प्रभु
स्मरण में लगाये रखो जब तक सांस रहे तब तक भगवान का
सुमिरन करते रहो तो जीवन का सब काम सिद्ध होकर मुक्ति मिलेगी
168

विचार कर उसको अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसरित करना चाहिए अथवा संकट के निवारणार्थ कुछ
ऐसे कर्म करने चाहिए जिससे कि वह उस उपस्थित आपदा विपति कष्ट शोक भय का सामना करने
योग्य बन सके। यदि ऐसा न हो सके तो उस समय उसको धीर, धर्म का उपदेश या नीतिपरक
विचार सब व्यर्थ सिद्ध हो जाते हैं। उस समय व्याकुल हृदय, तन मन में उपद्रवित मनुष्य
किसी भी बात को चाहे कितनी उत्तम विचारपूर्ण क्यों न हो, ग्रहण करने की स्थिति में
नहीं रहता और वह समझाने वाले को निर्दयी पाषाण हृदय समझ कर और भी अधिक
क्षुब्ध हो कर उस मार्ग का पथिक कभी नहीं बनता जिस पर उसे
पथप्रदर्शक ले जाना चाहता है।
लेकिन उसने ऐसा नह किया और वह "हे राम, हम तो मारे गये हमें बचाओ बचाओ नहीं
चिल्लाया सिर्फ सो गया। नह सो जाना चाहिए"
कर्तव्य उपदेशक या अन्य विचार उपदेशक को चाहिए कि वह संकट के समय उस मनुष्य
जिसे वह शिक्षा देना चाहता है, उसकी रक्षा के लिए आगे बढ़े और उसे धीर व सहायता दे।
उस संकट से बचाए, तो फिर वह मनुष्य सब कुछ सुनने को तैयार हो जाएगा। यदि कोई
व्याकुल हो कर नदी किनारे खड़ा हो, उस समय उसको यह शिक्षा न देकर कि तैरना सीख
लेना था पहले ही, तैराकीसीखनेके लाभोंका वर्णन करने लगे अथवा किनारे खड़े हो कर
हाथ-पाँव मार कर बच जाओ, उपदेशक का काम यह होना चाहिए कि वह
स्वयं कूदकर या, अन्य किसी प्रकार साधन सामग्री जुटाकर उस डूबते
हुए को पार लगा दे। यदि वह डूब गया, तो फिर उस शिक्षा का उपदेश का लाभ क्या
रहा और उस मूर्ख, जो उस समय उस को ज्ञान की बात बता रहा था उसके जैसी मूर्खता
कोई नहीं, इस पर भी यदि वह तैरना जानता हो, तैरना तो, दूर की, बात रही, तैरना सिखाने का
दावा करने लगा हो। तब तो, समझ ही लेना-चाहिए कि वह सब कुछ जान बूझ
जानकर भी कुछ नहीं कर रहा है। वह तो उस पानी में डूबने वाले का सच्चा
शत्रु हुआ जिसने समय व्यतीत कर दिया उस को बात-बात फंसा कर। उस डूबते
मनुष्य को चाहिए कि तत्काल, जो कोई ऐसा ज्ञान दे रहा हो उसका दो बात उल्टी
सुना कर कह दे कि भाई तू जा, मुझे न बचा और न उपदेश दे। तेरी उपदेश भरी
वाणी तथा तेरी विद्या तुझे मुबारक हो--उपदेशक जी, उपदेश उस समय जब
सब कुछ अनुकूल तथा शान्त हो उस समय तो सब कुछ कल्याणकारी हो सकता, लेकिन
संकट काल में नहीं! उपदेश पहले दिया जाता है अथवा बाद में दिया जाता है, न कि
विपदा काल में उस समय-समय ज्ञान न दे कर तत्काल जो बन पड़े सो कर जान बचाने का
यत्न किया जा सके।
क्या, समझे?
हां प्रभु, समझ गया। कृपा कीजिए।
उपदेश पहले दिया जा चुका होता है, तो वह मनुष्य उस आपदा का
धैर्य तथा साहस के साथ सामना कर सकता था। न करने पर संकट काल आने पर वह
व्याकुल तो हो जाएगा! अब उस व्याकुल हृदय वाले, को जब उपदेश दिया गया
उपदेश का उपहास बना दिया उसने और उस उपदेश दाता, को मूर्ख
कहा गया।
संकट सिर पर आ कर खड़ा हुआ-हो, जीवन-मरण का प्रश्न बन गया हो।
उस समय ज्ञान की बड़ी बड़ी बातें करने लगो और कहो कि तुम ऐसा करो
तो यह संकट टल जाय तो यह अन्याय, यह निर्दयता, यह मूर्ख, ज्ञान-मद, विद्वत्ता,
पंडित, साधु, का पाखंड कहा जाय तो इस में किसी को संशय न होना
चाहिए। उपदेश का समय उस समय तक होता है जब तक कोई संकट न आया हो, अथवा
संकट आने से पहले ज्ञान दिया जाता है कि--इन से बचने के उपाय पहले सीख
लो--तो उसका लाभ हो? उपदेश ले कर जब संकट का सामना किया जाता तो सब
कुछ सामान्य ही रहता। पर विपदा आने पर उपदेश दिया जाता तो वह उपहास, हंसी
योग्य बन, उपहासास्पद बन जाता है। उपदेशक को सब मूर्ख जन उस समय
समझेंगे कि, अरे तू, पहले ही, जागता! उपदेश से पहले ज्ञान क्यों नहीं दिया?
उपदेश तो दिया, लेकिन उस पर विश्वास नहीं किया गया। तब संकट आया तो
व्याकुल हो उठा। पर उस समय तो सहायता की आवश्यकता थी उपदेश की तो नहीं थी।
ज्ञान का फल यही होता यदि अभ्यास में न लाया जाता तो संकट में, वह ज्ञान काम
नहीं आ सकता था, अर्जुन! उस समय सब कुछ अभ्यास काम देता है जो कि पहले
किया जा चुका हो।
विश्वासपूर्वक जो ज्ञान को अपनाता है उस--का संकट में भी मन विचलित
और भय--से ग्रस्त नहीं होता और संकट सब स्वयं हल होते जाते हैं।
169

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