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सर्वकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 322 में से

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कौन किस प्रकार ध्यान करेगा? स्मरण रहे, ध्यानसाधना का एक सरल और सीधा
उपाय यह बतलाया गया रहा कि साधक को घर से या ध्यानकक्षके उस एक कोने
को ही ही भगवान् का स्वरूप मान ले, जहाँ वह ध्यान पर बैठता रहा या जिस
कक्ष का ध्यान अभ्यास-सा करेगा या ध्यानसाधना उस भगवान् स्वरूप-
से ही स्वयं करता या करवाता रहेगा तब
प्रत्येक क्रिया चाहे वह मन से मन की बात क्यों न हो अथवा वाणी
द्वारा कही गई हो या फिर हाथ पाँव द्वारा किया गया कर्म या शरीर
सम्बन्धी कोई बात हो उसका फल या परिणाम या स्वरूप किसी और रूप में
प्रगट होने वाला ही नहीं।
ऐसा भाव, विचार लेकर मनुष्य जब, उस स्थान रूप ही भगवान् के उस
विशेष अधिकार का उस स्थान से ग्रहण करवाकर काम करेगा तब, जो जो
क्रिया उस द्वारा आगे चलकर होगी या घटती रहेगी वह सब प्रभु के स्वरूप
से उस को सम्बन्धित स्वरूप बनाती जायेगी या जो कुछ भी होगा उसका फल
भी प्रभु-कृपा द्वारा ही मिला हुआ अनुभव-स्वरूप होकर ही प्रगट हो रहा
हो या उसका कारण भी स्वरूप के द्वारा बना ही आ रहा होगा
साधक को तो अधिकार रूप में केवल यह निश्चय करना ही तो उसका या
अभ्यासका एक नियम या नियम का स्वरूप बन कर उस को साथ देगा, फिर
फिर जैसा जो भी ज्ञान का स्वरूप या प्रभु रूप अपने आप, कृपा करेगा!
उस को वह सब कुछ प्राप्त रूप में अपने आप स्वतः ही स्वाभावक रूप में
ही अपने स्वरूप से सम्बन्धित कर देगा अथवा बनता रहेगा या फिर, भगवान् रूप
कृपा, जिस भी रूप को वह रूप देना चाहेगा सो रूप अपने स्वरूप को ही
उस स्थान के रूप में, जो जो भी उस स्थान से ज्ञान स्वरूप होगा या उस
रूप स्वरूप को जो उस स्थान से प्रभु द्वारा अपने आप ही दिया जायेगा
अथवा जो अधिकार से आगे घट रहा होगा, सो उस द्वारा अपने ही
उस भगवान् रूप ज्ञान द्वारा या शक्ति के रूप में ही होगा, ना कि उस
शक्ति अथवा रूप को कोई और पा लेगा, ना उस से पृथक् ही स्वरूप बना
सकेगा। केवल भाव ही उस का ऐसा दृढ़ रूप ले चुका होगा जिसे कोई
और शक्ति या नाम से पुकारा नहीं जा सकता इसलिये उसका ध्यान रूप
ही भगवान् रूप स्वरूप का प्रकाश उस स्थान में जो उस के बैठने से सम्ब-
न्धित था, स्वाभावक प्रकाश बन भगवान् नाम-स्मरण से अपने आप प्रकाश
रूपी स्वरूप में उस को प्रकाश दे--देगा
जब नाम-स्मरण रूप से ही उस प्रभु रूप शक्ति उस को प्रकाश देगी,
जिसे वह ज्ञान स्वरूप के रूप में भगवान् का रूप समझ कर उस को
अपना आधार ही मान ले अथवा समझ ले उस का भाव या ध्यान का रूप
भी उसी प्रकार हो, जिस रूप, जिस नाम, या प्रभु-कृपा रूप से उसने
हर बात को या अपने कर्म को उस स्थान द्वारा सम्भालने का यत्न ही किया
हो सो ही भाव या उस रूप का भाव-स्मरण उस को अपने आप ही सहारा दे
कर उस को उस प्रभु रूप शक्ति का ज्ञान रूप ध्यान में ही आगे रूप
दे देगा जो उस ध्यान द्वारा उस को नाम-स्मरण द्वारा ही होगा
सो इस प्रकार ज्ञान के भाव, से उस प्रभु शक्ति द्वारा ही तो सब कुछ
हो रहा रहा या कहलाया गया रहा या हो रहा होगा सो उस सब को वह अपने
कर्म से पृथक् ज्ञान मान कर उस की ओर जब जब दृष्टि लगायेगा, तब
तब उस शक्ति द्वारा उस ज्ञान रूप भगवान् के ही तो वह सब कुछ कृपा ही
रूप ज्ञान रूप में ले कर भाव रूप शक्ति, जिस का उस स्वरूप द्वारा
प्रकाश
हो रहा होगा, प्राप्त होगा, अनुभव से, प्रकाश से, उस सब को ही
वह पा रहा या पा चुका होगा या उस--द्वारा भगवान् के प्रकाश को पा रहा
रहा या उस--द्वारा प्रकाश का स्वरूप बन पा रहा या प्रकाश का रूप बनता
होगा, सो भगवान् कृपा द्वारा ही, भगवान् के ज्ञान से ही सब कुछ,
ज्ञान स्वरूप ही बन रहा या हो रहा होगा, स्वरूप के द्वारा ही,
स्वरूप के ज्ञान रूप भाव से ज्ञान के रूप में नाम, स्वरूप से ही पा रहा,
सो सब कुछ भगवान् का, उस प्रभु का ज्ञान रहा
जिसे वह जान रहा होगा, या शक्ति स्वरूप द्वारा प्रकाश द्वारा ही
स्वाभावक शक्ति के रूप में पा रहा या प्राप्त कर रहा था।
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