सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 322 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 161

केवल नाम का जप कर ले और यह समझ लेकि मुक्ति मिल जायगी; उसका विचार गलत
होगा और उसकी आत्मा अधोगति को प्राप्त हो जायगी या मुक्ति का सुख तो वह क्या जाने
नित्य ही नरकीय यातना भोग कर जब तक सृष्टि रहेगी तब पर्यन्त रोवे, फिर भी मुक्ति का
सुख जन--म पर्यन्त नहीं! मुक्ति का तो फल ही ऐसा कि सुख ही सुख का नाम मुक्ति
जन--ममरण दुःख नहीं!
पर सो मुक्ति विना अष्टांग योग सिद्ध किये कभी नहीं हो या हो सक्ती कि जैसा कि
महर्षि पतंजल जी कृत अष्टांग योगदर्शन में भी लिखा गया किंवा बताया गया है, १ यम दूसरा
२ नियम, ३ आसन फिर आगे, ४ प्रत्या-हार के नाम से, ५ प्राण संयम या
प्रणा याम फिर आगे ७ धारणा या ध्यानावस्था या ध्यान का साधन ८ समाधि का
साधन जिस द्वारा कि मुक्ति मिले, पर बिना यम, नियम के यह सब सिद्ध नहीं, तो सब
व्यर्थ ही किया या कहा गया!
नियम जब तक साधन का आधार रूप सिद्ध नहीं हो सक्ता, तब तक अष्टांग
योग सब व्यर्थ या नाम मात्र रह जायगा किंवा, नाम मात्र जप व्यर्थ, विचार का
फल
सो तो सिद्ध ही है, ना भाई! तो सुनो सब भाई, जब तक मन, वचन और
कर्म शुद्ध होकर किसी का दिल बिना अपराध किसी प्रकार से तन मन धन से न सताया,
ना ही किसी प्रकार दिल को किसी का संशय या डर रखा ना किसी को मारा व ना मारा
ना किसी का धन या माल या रूप देखा या मन में भी ऐसा भाव कभी न मन में
लाया
फिर उसको तो सब सत्य ज्ञान प्राप्त हो कर ईश्वर रूप में अपने आप को
स्थिर वा लीनकर देता है या कर लेता भया, तब क्या मुक्ति प्राप्त जन को
कहा, सो अष्टांग का फल भी तो सिद्ध भया
इसमें तो क्या संशय है? पर ऐसा तो आज कल सब जन ही क्या जो कोई
ही विरला मनुष्य दिखाई देवे कि जिस के मन वचन कर्म से किसी का
दिल किसी प्रकार दुखाया नहीं जाता होगा, ना ही ऐसा देखा जाता कि सब को
रूप या धन से देख के नियत बदल जाती दिखाई न देवे वा दिल, विचार सब
दिल अपने वशीभूत कर के रखता हो, बल्कि तो आज ऐसा कलिकाल का
समय सब तरफ फैला हुआ है जिससे कि सब ही माया जाल में फँसे, पाप
करें! जिस कारण सब ही तो नरक रूप में दुःखमय भोगें!
अब आगे ऐसा भी तो विचार देखा जाता है कि जिस तरह से जो जन
उपदेश देता फिरता है उस उपदेश पर तो विचार किया जाय तो महापाप रूप
हो जाय, सो उपदेशक जन तन-मन धन को किसी के भी छीनने को ना तो
मन में संकोच करे ना पराई रूप वा स्त्री के मिलने का भय या पाप व डर
रखे, फिर क्या हो? केवल जप पाठ-पूजा निष्फल
जिस का ना भाव सत्य ना कर्म सत्य ना विचार सत्य है, फिर तो
केवल पाखंड कहा जा सक्ता है, जिस का फल क्या मुक्ति मिलेगा? तो
ना ही विचार का फल जन व समाज, सब उपदेश का उल्टा ही फल व
असर दिखाई दे रहा है
जिस का यह भी परिणाम होगा कि, आगे जा के सब समाज ही उलट
जाय, फिर सब विचार ही बदल कर जीव केवल ही पापों को ही सब कुछ
या पुण्य ही समझ बैठेंगे, फिर तो न कोई किसी की बहिन बेटी पर
नजर पवित्र रक्खेगा ना ही सब का दिल विश्वास योग्य रह जावेगा
ना ही गुरु चेले का भेद, ना ही सब धर्म का भेद ही रह जावेगा
सो हे भगवान, यह दशा आगे जा कर संसार की ना होवे, इस से सब को
ही रक्षा से बचा कर संसार भर को सत्य मार्ग पर लावे जिससे, कि सब
जन ही पवित्र बन कर अपनी रक्षा कर सकें और सुखी हों
ऐसा जान कर, "हे सत्य स्वरूप ॐ प्रभु जी, दया दृष्टि से सब जग
को इस पाप से वा पाखंड से बचा कर ऐसा ज्ञान दे जिससे सब जन तेरा
भजन-सिमरन कर के पार उतरें और आ-गे को सब प्राणी सुख पावें और
सब पाखंड नष्ट होवें, ना ही कोई इस तरह माया जाल रूपी दल दल में
तन मन वचन द्वारा कभी फँस पावे, जिस से जीव का सदा भला होय ना
किसी तरह से भी जन दुख पावे, सदा ही सुख प्राप्त कर सकें"
ॐ तत् सत् सर्व ब्रह्म मय
"सत्य ही सब कुछ सुख का रूप"