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सर्वकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 322 में से

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यह स्वाध्याय केवल मन को शान्त करनेकेलिए था, या यह बात व्यावहारिक रूपमें
जीवनभरके चरित पर प्रभाव डालेगी यह बात हम नहीं जानते, सम्भवतः यह केवल विचार करनेके
लिएथा? जो विवेक उत्पन्न हुआ, वह विवेक स्थायी होगा या केवल बात समाप्त होनेके
साथ ही वह विवेक समाप्त होजायगा यह बात हम नहीं कहसकते इस बात का निर्णय, सम्भवतः
उस स्वाध्यायके पश्चात् जो बात या इतिहास हमारे सम्मुख उपस्थित होताहै वह इस बात निर्णय
कर सकता है। केवल विचार तक निश्चय? या क्रियामें विवेक होगा, इसका निर्णय तो प्रत्येक का
जो काम आगे उपस्थित हुआ उससे होगा, उस समय देखना चाहिए कि विवेक प्रबल हुआ या अज्ञान
प्रबल रहा, इस बात तथापि स्पष्ट है कि धर्म-कर्म समझनेके पश्चात्के जीवनमें कुछ
लाभ होता है, कोई भी निश्चय कभी व्यर्थ तो जाता ही नहीं, परन्तु देखना चाहिएकि मनुष्य
केवल १ बार विचारकर, सदा स्थिर रहने समर्थ हो सकता नहीं तथा इसके विपरीत जो अनेक
बार बार यह स्वाध्याय करता रहेगा उसका विवेक अवश्य स्थिर हो सकता है। स्मरण रहे कि यह
क्रिया है, सदा स्वाध्याय करनेसेही यह परिणाम संभव है।
विचार तो उस समय निश्चय ही उत्पन्न हुआ, पर जब घर गए तब क्या विचार
स्थिर रहेगा अथवा विचार विलीन होगा? साधारणतया ऐसा देखा जाता हैकि जहां मनुष्य गया,
जहां संगति मिली, उस संग को देखकर विचार बदल जाता है। इसी बात का वर्णन आगेहै? या
प्रत्येक प्रसंगमें उसका विचार स्थिररहा, वह बात यहां है, सम्भवतः पहला विचार
जो चार ज्ञान-विभागों का विचार इस प्रकार का किया, उसका फल यह हुआ कि सब
तरह का निश्चय मन में उत्पन्न कर लेने पर भी चित्त का भ्रम मिटता नहीं! इस कारण और उपाय ढूंढने
तथा स्थिरता को ही प्राप्त होनेकेलिए दूसरा यत्न यहां किया गया प्रतीत होताहै।
पाठक यह देखें, स्वाध्याय का साधारण सा विचार प्रत्येक स्थिति में जो स्वाध्याय का
प्रभाव हुआ करता है, वह सब प्रभाव इस इतिहास में स्पष्ट दिखाया गयाहै। केवल एक बार, क्या
सब भ्रम दूर हुए? क्या सब प्रकार का निश्चय सदा रहा? क्या सब रंग स्थिर रूपमें उतरा?
इन सबका उत्तर पाठकको इस इतिहास में आगे चल कर देखना चाहिए। वास्तवमें यह बात ऐसी
विचार का प्रभाव था, पर जब घर पहुंचे तब माता, पिता सब साथ थे, पश्चात्का क्या
प्रभाव चित्त पर पड़ा इसका विचार भी, पाठकको ही, स्मरण रख कर विचार करना है।
केवल स्वाध्याय करनेका जो समय होता, स्वाध्याय का प्रभाव सदा ही एकरूप नहीं रहता
यह बात पाठक को अपने मन में ठीक तरह बिठानी चाहिए। जब एक विचार का प्रभाव चित्त
सदा एक सा रहना ही कठिन है तब अज्ञान का संग पाकर, वह पहला विचार नष्ट न होगा
इसका क्या भरोसा?
इस अध्याय में इस बात का विचार इस तरह का किया गया है; सब इतिहास लिखने वाले
भी भिन्न-भिन्न ढंग से वर्णन करतेहैं; प्रत्येक विचार का भिन्न प्रभाव होता,
जिसका प्रभाव पड़ता ही रहताहै; स्वाध्याय रूप जो विचार चला, उसका प्रभाव भी
मन स्थिर रहा, चित्त को शान्ति मिली ही--ऐसा इस का आशय! अब पाठक इसी पर
विचार करें तथा १ निश्चय पर पहुंचे कि, १ अध्याय का विचार ही, सब चिन्ता मिटाने
योग्य है तथा सब प्रकार का समाधान ही करनेका यह उत्तम साधनहै।
केवल इस विचार को, चित्त बार बार ध्यान में रखकर विचार करे, स्वाध्याय का ध्यान
रखे निष्ठा, सब प्रकार का लाभ स्वाध्याय का प्राप्त करनेके पश्चात् चित्त में भ्रम, यह
केवल भ्रम मात्रहै।
चित्त का समाधान हो ही तो गया होगा ही, पर यह केवल विचार के रूप स्वरूपमें था;
जब घर की चिन्ता का अवसर आ गया तथा अन्य संसार सम्बन्धी चिन्ता आ गई तब चित्त विचार
बदल गया।
प्रथम विचार गया, पुनः चिन्ता व्यापि।
प्रत्येक बात विचार द्वारा प्रकट की जा सकती है। पर जब तक मन सब तरह
निष्पक्ष भाव का न हो तबतक सत्य बातका प्रकाश मन में नहीं होसकता। चित्त में
केवल ज्ञानमात्र समझने का फल सब को सदा नहीं मिलता। स्वाध्याय करके स्वाध्याय को
भूल ही न जाना, प्रत्येक स्वाध्याय का असर मन पर रहकर सदा स्वाध्याय द्वारा प्राप्त
की हुई शिक्षाको जीवनमें लाने का यत्न सदा प्रत्येक को करते रहना सदा आवश्यक
"हे प्रभु तू सदा विवेक दे, तू सतत दया का दान दे; तू सतत शरण दे, तू सदा
निर्मल रख"
भिन्न-भिन्न स्वाध्याय का फल सदा भिन्न ही देखना चाहिए था, भिन्न-भिन्न ढंगके
ग्रन्थ का स्वाध्याय करने से सब, चित्त सदा स्वाध्याय द्वारा शुद्ध होही सकता।
इस प्रकार सब बात चित्त में रखने योग्य सब ज्ञान द्वारा मनुष्य स्थिर निश्चय पर
आ सके यह निश्चय सदा प्रत्येक को करना होगा, किसी पर विश्वास? पर विश्वास ठीक,
स्वयं पर विश्वास? विश्वास की बात पर ही प्रत्येक मनुष्य अपना निश्चय कर सकता
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