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सर्वकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 322 में से

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ऐसा जान कर विचार करो कि केवल संन्यास लेने मात्रसे मोक्ष फल की प्राप्ति कभी नहीं
होगी
स्वामी समन्त भद्रने, "सरागौ ज्ञान गर्भात्मा सा भवेद् भवनाशिनी" राग सहित भी, जो भी ज्ञान
सहित मन रूपी ध्यान किया जाता संसारका नाशक हो सो तो ठीक ही परन्तु यहां तो भाव संन्यास
बिना द्रव्य मात्र, उस पर केवल काय-कलेवर धारण से, मोक्ष की कौन कहे, स्वर्ग तक
मिलना दूभर"
सो इस प्रकार केवल भाव ही से मुक्ति फल प्राप्तिके अर्थ रूप से द्रव्या-
नुप्रेक्षाकार भये, सोईया जी! जो संन्यास-कलेवर को मुख्य जानकर के, सो ही द्रव्य-
संन्यास का मुख्य अधिकार कर केवल संन्यास रूपी क्रिया मात्रसे स्वर्ग मुक्ति फल
विचारत भये
मिथ्यात्व, असंयम, कषाय, प्रमाद संन्यास-कलेवर अवस्था में रहे तब संन्यास क्रिया
फल तो निष्फल हुआ सो विचार नहिं किया। सो इस ग्रन्थ का कर्ता इस अधिकार
ग्रन्थ विषै जो सो यह बात कही प्रमाण न हो सकी, इस हेतु यह ग्रन्थ ही मिथ्यात्व भाव
का मूल हुआ, उस पर कर्ता ने सम्यक्त्व भेद रूप व्याख्या कही सो मिथ्या, ज्ञान
रूप भेद न प्रकाश, उस पर ज्ञानी संन्यास स्वरूप न कहा, इस हेतु ग्रन्थ ही को प्रमाण
कहे, उस पर स्वामी समन्त भद्र ने सम्यक्त्व भेद तथा महाव्रत का जो भेद स्वरूप
कहा तिस ज्ञान का प्रभाव
प्रभाव समन्त भद्र के वचनों का हुआ, ज्ञान, असंयम, जो भाव संन्यासी कहाया
तिसमें राग भाव का रूप संशय दूर सो न हुआ संन्यास रूपके विचारते हुआ भला, ज्ञान
संन्यास का सम्यक्त्व रूप भेद तथा प्रमाण स्वरूप से भेद न कहा, ज्ञान संन्यास को
सो उस समय ज्ञान का प्रकाश हुआ सो इस ग्रन्थका भी हुआ, ज्ञान संन्यास अवस्था
का सो भेद ग्रन्थका इस प्रकार से प्रगट हुआ निश्चय सम्यक्त्व का प्रकाश सो संशय
मिटाने को यह ग्रन्थ, स्वरूप के इस भेदको प्रगट कर भाव मोक्ष फलदायक भयो
सो इस ग्रन्थानुरूप यह संन्यास नाम सम्यक्त्व भेद को कहै सो मुक्ति का प्रकाश
जो सम्यक्त्व के प्रभावसे इस ग्रन्थ में सो भाव मोक्ष का तो ज्ञान हुआ सो यह ग्रन्थ
सम्यक्त्व का ही प्रकाशक ज्ञान रूप ग्रंथ सो इस ग्रन्थ को, उस पर भाव संन्यासी का जो
स्वरूप कहै सो इस भेद सो ज्ञान सम्यक्त्व भाव संन्यास रूप कहे सो ग्रन्थ मोक्ष फल
दायक भयो सो यह ग्रन्थका कथन सत्य जान संशय निवारण को सम्यक्त्व प्रकाश ज्ञान
ग्रन्थ भयो
सो संन्यास का स्वरूप सो या को या सो ग्रन्थ कहा, जो सो यह या सो ग्रन्थ सम्यक्त्व
ज्ञान-दाता स्वरूप प्रकाश ग्रन्थ न हो भाव रूप ग्रन्थ न हो यह सो सो सो सो सो,
सो सो सो रूप विचार सम्यक्त्व सो उस ग्रंथ को सर्वज्ञोक्त ही प्रमाण, संशयात्मा
को यह ही ग्रन्थका रूप सो सत्य जान, जो संशय निवार्य के भेद रूपको प्रकाश या
ग्रन्थ द्वारा सम्यक्त्व का भाव सो स्वरूप को प्रगट भयो
मिथ्यात्व, असंयम, कषाय, यह भाव सो संन्यास के भेद सो ग्रन्थ विषै
प्रगट भये सो सम्यक्त्व, संन्यास, ज्ञान स्वरूप संन्यास विषै सो सम्यक्त्व प्रमाण भया
सम्यक्त्व संन्यास का भेद रूप जो सो ग्रन्थका स्वरूप सो संशय का नाश हुआ तिस
सो यह ग्रन्थ का प्रभाव भया, तब संशय को नष्ट कर ग्रन्थ प्रमाण हुआ, सो, जी, जब,
संन्यास सम्यक्त्वमय भया तब यह सब भेद ग्रन्थ ने प्रगट कर ज्ञानमय को जगाया
ताते भला ग्रन्थ कहा, संन्यास भये, संशय भ्रम सब सो मिट सो ग्रन्थ द्वारा
प्रकाशमान भया
सो जो संशय ग्रन्थ का निवारक भयो कहै सो, ज्ञान विचार प्रमाण सो संशय
रहित भये ग्रन्थका यह स्वरूप सो भेद रूप संशय मिटा तब ही सो संन्यास का प्रकाश या
ग्रन्थ से ज्ञान हुआ सो संशय को त्याग कर ग्रन्थ स्वरूप भया
ग्रन्थ कर्ता का तो यह भाव हुआ न जो इस पद को कहै ग्रन्थ का भेद ज्ञान को
प्रकाश कर ग्रन्थ नाम दिया सो भला ही किया, सो तो भला किया? सो तो न हुआ
या प्रकार सो भयो! सो भाव संन्यास हुआ, ग्रन्थ कर्ता का सो संशय सो, स्वरूप
ग्रन्थ का प्रगट भया सो! सो इस संन्यास का जो ज्ञानरूप सो, संशय का नाश
हुआ? सम्यक्त्व सो सो संन्यास, सो ग्रन्थ प्रमाण हुआ, संशय का नाश
किया? या प्रकार संन्यास संन्यासी का भेद ज्ञान न हो ज्ञान हुआ संन्यासी का
ग्रन्थ सो संन्यासी न भेद ज्ञान को सो ज्ञान विचार न हो, संशय न हो प्रमाण सो, या
सो ग्रन्थ कर्ता मिथ्या, या ग्रन्थ का प्रभाव कहा? संन्यास को प्रमाण सो ज्ञान का
प्रभाव सो तो ग्रन्थ द्वारा संशय भ्रम न रहा जान
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