एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 153, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमझ रहे हो? बात यह नहीं रही होगी किन्तु बात यह अवश्य रही होगी कि, जो
करेगा सो भरेगा
जब हम कभी रात विश्राम करने वाली स्थिति, अर्थात् शयन, को ही यदि ऐसा
समझ बैठते कि संसार छूटने वाला ही पश्चात्, तो फिर दिन भर भी अनेक प्रकार
विकल्प उठ ही रहे होते कि, इस काम करने वाले पुत्र अथवा अन्य किसी व्यक्ति विशेष
पर कुछ न, तो चिन्ता अथवा मोह का प्रसंग बैठ जाता अतः इस चिन्ता रूपी संसार
व्यतीत हो रहा है।
निद्रा की बात तो, दो दिनके पश्चात् आ--सकती यदि शयन ही बना तो उस
समय तक चिन्ता नहि, चिन्तन भला बन सकता था, किन्तु, ही वैसा विचार न होने
कारण कि वह सब कुछ व्यर्थ समझ करके ही किया, जिससे वह चिन्ता, चिन्तन रूप
बन सकी, चिन्ता चिन्ता, ही ही बनती रही, चिन्तन तो चिन्ता से भिन्न बात,
इस पर विचार कभी तो हो सकता, विचार यह कभी क्यों नहीं हो सका कि कल-कल
में, करते-करते ही समय तो जा रहा पश्चात्-काल में, ही पश्चात्ताप करना होगा
और कुछ हाथ नहि होगा
मनुष्य यदि जान ले, समय रात को इस प्रकार से व्यर्थ गँवाने योग्य
ही तो नहीं क्या वह स्वाध्याय के कम अथवा ज्ञानार्जन रूप से ही समय लगाने का काम
नहीं कर बैठ सकता था जिससे कम से कम, कुछ चिन्तन विशुद्ध तो बन सके!
यह विचार भी यदि बना रहे तो, इस विचार का आधार भी, इस प्रकार का
बन जाता जिससे कि जो जो भी काम हो रहे वह भले प्रकार, बनते तो अवश्य
ही किन्तु उनका स्वरूप कभी बदल जाता, जिससे कि उनका लाभ कम से कम इतना तो
अवश्य मिलता कि, आगामी भव के लिये कम से कम वह स्थिति न बनती जो, कि
अब दिखाई दे, अब समय बीत चुका अथवा न केवल यह, बल्कि इसके आगे की स्थिति
भी, ऐसी बिगड़ती ही चली जाये कि जो कम करने के पश्चात् भी जो कुछ फल मिला-
जिसे आज भोग रहे हैं वह कहाँ तक सही? आगे के लिये ऐसा विचार बन नहीं पा रहा
जिससे भविष्य सुधरने की सम्भावना बन सकेगी या सम्भव समझी जा सकेगी
सम्भावना यह अवश्य बनती है, अपनी स्थिति को सुधारने योग्य इस वर्तमान
समय को बनायें, जिससे कल का, समय बिगड़ने का रूप न ले।
संसार के इस न मेले, संसार के प्रत्येक प्राणियों परिग्रह रूप फल-फूल वाले
इस विशाल कल्प-वृक्ष रूपी इस वृक्ष के फल-फूलों का रसास्वादन करने की दृष्टि
मात्र से, ही जब काम नहीं बन पा रहा अर्थात् यह, कि जब तक फल खा नहि
पाते; तो फिर क्या काम चलेगा? फिर स्वाध्याय का फल क्या होगा? ऐसा मन
अथवा प्रश्न क्यों नहि? इसका अर्थ क्या होगा यह भी?
भाई! इस बात को समझो कि, ज्ञानार्जन रूप इस कल्प वृक्ष का फल !
एक मात्र स्वाध्याय रूप औषधि द्वारा ही उपलब्ध फलवान् बनाया गया कहा, अतः यदि
औषधि का प्रयोग कम कर रहे हो, यदि उसका फल भी कम ही प्राप्त होगा,
अथवा सम्भवतः, ना मिलेगा, कयोंकि जो फल औषधि, केवल प्रभाव उत्पन्न कर सकती
विचार के फलस्वरूप स्थिति क्या होगी यह फल उस स्वाध्याय द्वारा प्राप्त फलवान्
स्थिति का फल मात्र माना जायेगा अतः विचार-युक्त होकर ही कोई कार्य यदि
किया जाये तब उसका वह फल-युक्त रूप बन जाता है तो यह समझ--ही में आयेगा! तो
ही भला होगा!
यह तो मात्र स्वाध्याय के फलस्वरूप प्राप्त उस फल-युक्त ज्ञान का फल
जिसे स्वाध्याय के फल के रूप में माना जा रहा है। पर इस बात को हम क्यों भूल
जाते हैं कि यह भी क्या? बिना किसी आधार के बिना फल देगा, फल की आशा करना
ही तो ठीक कैसे हो सकता है?
कर्म-फल, कर्म-भोग, सबको फल प्राप्त होना एक दम एक जैसा तो नहि,
पर जो जैसा कर्म करता जाता फल तो भी तो वैसा भोगने योग्य बनेगा ही, पर
स्वाध्याय का फल यदि ज्ञान मात्र प्राप्त करने के पश्चात् भी कोई मात्र यह
सोचे कि फल तो मुझे प्राप्त हो गया तो समझना रूप से ज्ञान का कोई अर्थ नहि
समझ आयेगा केवल इतना ही, कि ज्ञान, स्वाध्याय स्वाध्याय तो हुआ, पर उसका फल कुछ नहि,
ज्ञानवान्! बनकर ज्ञान प्राप्त कर, उसका स्वाध्याय तो करता किन्तु ज्ञान का
फल नहि
"उसका ज्ञान मात्र ज्ञान जानकर व्यर्थ माना गया, उसका स्वाध्याय व्यर्थ माना
गया अतः ज्ञान को व्यर्थ जानकर फल समझना होगा, जिससे कि ज्ञान का सही फल"
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