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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

तथा अनेक प्रकार विषय भोगों करके तृप्त हो सकते वा नहीं सो कहो, इस वचन करके राजाने
मन को वशमें कर लिया
सो हेराजन् इस प्रकार, जब मन को वश करे, तब परम प्रकाश रूप आत्म तत्त्व ग्रहण
करने का उपाय विचारै सो तुम सुनो। प्रथम तो शास्त्र के अर्थ का भली प्रकार विचार
करे अरु वैराग्य भावना भी मनमें निरन्तर दृढ़ करे अरु ब्रह्म--विद्या पढ़े अरु बहुत
काल पर्यन्त अभ्यास को विचारै सो सब संशय को, अरु अविद्यारूपी तमको नाश करैगी अरु
विचार; अरु जो राग--द्वेष विषय--विकार करके तृष्णा उपजी, तिसकरके नष्ट जो
स्वरूप आत्मप्रकाश तिसको उदय विचार करे। तिस चिन्मात्र रूप में जो अविद्याकृत
चेत्याकार वासना का उदय है तिसको विचारकर नष्ट करै तब चिन्मात्र रूप उदय हो
प्रकाशता भान हो, अविद्याकृत वासना का उदय तिसको बन्धन है, तिसकरि रहित आत्म
पद प्राप्त होवै
जिस काल राग--द्वेष अरु विषय की तृष्णा का--सा अविद्याजनित उदय जो चित्त
विषे उपजा तिस चित्त को न तो यह चित्त कहे, ना अविद्या कहे॥
विचारि यह तो सूक्ष्म संशय, ...
जब ना तो यह चित्त न अविद्यास्वरूप हो, तब ना यह चित्त कहावै कहा, अरु स्वरूप जो
चेतन सोई सदा सो ही रहा; विचारवान को चित्त भी ब्रह्म स्वरूप ही दृष्टि आता
है अरु सब जगत् वा जगत् के पदार्थ भी ब्रह्म स्वरूप हो भासते हैं, अरु
जो राग--द्वेष अरु विषय वासना चित्त में न उदय होवैगी तो ब्रह्म ही भासेगा अविद्याकृत
नहीं; अरु अज्ञान पुरुष को सब ही भ्रम भासता दृष्टिआवै है; अरु विचार सम्पन्न को
सकल ही ब्रह्म प्रकाशता?
संसार चित्त के ही स्वरूप उदय का नाम अविद्याजनित भ्रमा हुआ कहै अरु
चित्त का ना होना अविद्या का ना होना कहिये सो, विचार ही का फल पावै। अज्ञान
करके जो चित्त का उदय होता है, जब विचार किया तब उस अज्ञानका अभाव हो
गया अथवा जो चित्त नाश हुआ तिसकरि मन का भ्रम भी नष्ट हुआ सो, अविद्या
भी, अज्ञान भी, अरु चित्त का वासना स्वरूप जो चित्तजनित अज्ञानता थी, सो
अज्ञानता नाश भई तब सब शांत हो, तिसते ही, अविद्याजनित जो ना दृष्टि था
तिसको प्रकाशता अज्ञानता ही, अरु अविद्यावान् पुरुष को सर्व आपदा उपजे?
राजा उत्तर दे तब हे, परम वैराग्य रूप पवन के प्रहारकरके तृष्णालता जो चिदा-
काश की ओर उर्द्ध गमन को प्राप्त भई तिसको यह अज्ञानरूपी तम नाश करैगा सो कहो
तिसको जो यह तम निवारैगा सो कहो अरु जो शुद्ध भावना के योग करि आत्मा
प्रकाश को प्रकाशता भी करै अरु चित्त नाश भी, सो तो ही विचारता के योग करके न
कि नहीं
इतिश्री श्री विचार के उपशम के दो दो श्लोक के व्याख्यान में सप्तमः सर्गः,
द्वितीय वा विश्राम
तृतीय सर्गः विचारपूर्वकत्वम् विचार निरूपणः राजा अरु
मनोनिग्रहपूर्वक अरु तत्त्वज्ञान को कहो सो तुम कहो अरु वैराग्यपूर्वकता को;
अरु जो तुम कहोगे तिसको ग्रहण करके अहम् अहंकर्ता ओ अहंभाव अहंता अरु
ममकार को त्याग के, सो सो तो अहंता के त्याग पूर्वक विद्या का साधन सो भी
होवैगा अरु इस संसार के जो जो विषय रूप फल भोगने हैं? तिसकरि वा तृष्णा
करि तृप्ताता को जो पुरुष चित्त को शांत अरु तृष्णा को शान्त करेगा
तिसको सो विषय के फल प्राप्त ना होंगे; तिसकरके राग--द्वेष को नाश होवै अरु
जो आत्मज्ञान को अरु विवेकवान् को होगा सो, विवेकवान् पुरुष शांत अरु शुद्ध
आत्मा को ही ही भान करेगा, तिस प्रकार आत्मभावको अरु सो त्याग सो
विवेकवान् पुरुष सब ही प्रकार से, अरु जो अज्ञान अविद्या युक्त होगा,
तिसको अनेक प्रकार विषय भोगने का उदय हो, राग--द्वेष की वासना उदय भई
तिसके द्वारा भोगे; सो सब अविद्या के कारण करके विषय सुख भोगने की
अभिलाषा नित्य ही उदय अरु नाश को प्राप्त राग--द्वेष को देवेगा अरु राग--द्वेष
का जो वासना का उदय तिस चित्त को, सो चित्त राग--द्वेष को अरु, चित्त राग--द्वेष
को चित्त राग--द्वेष अरु चित्त वासना के दो उदय अरु चित्त अरु जो वासना का उदय
तिसकरके जो विषय वासना को तो उदय होवैगा, तिसकरके सब नष्ट अरु नाश
अज्ञानता ही सब को नाश करे अरु जो है सो सुख अज्ञानता ही
उपजे इसका अरु जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो
अज्ञानता रूप से सब का उदय सब जगत् का वासना का उदय हो सो राग--द्वेष स्वरूप
संसार को जो चित्त अरु वासना का उदय हो सो जो विषय को ही अज्ञान का
नाश न करेगा तब संसार के सब भोग के नाश अरु उदय, राजा ने संशय
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86

जिससे कि उसको यह तो हो सके कि उसके अन्तःकरण में--या जब तक वह,
उस आत्मतत्त्व रूपी परम तत्त्व को प्राप्त कर सके तब तक मन को परम वश में
करके अन्तःकरण के द्वारा, उस परम सुख रस रस को न पिये; इसके बिना उसे यह
सुख आत्मसुख तो नहीं
मिलके वासना रसयुक्त सांसारिक सुख मात्र ही प्राप्त हो सके, उस सांसारिक
सुख; जिसके मन और इन्द्रिय विषय भोगी हों, उस परम शान्त या उस आत्म सुख
रस को ना प्राप्त कर सके सो तो हो, पर उस रस को वह भी प्राप्त कर सके, जिसने
अभ्यास रूप से--इस अन्तःकरण रूपी चंचल मन को वश करके उस रस को ना भी
प्राप्त किया होय, तो भी उसको उस रस का कुछ स्वाद आने लगेगा और
सांसारिक विषय भोग सुख को त्यागना भी आरम्भ होगा ही होगा, इस हेतु से
अभ्यास द्वारा योग मार्ग, अवश्य ही सुख दायक; जिससे कि साधक को सुख ही
सुख प्राप्त होय न कि क्लेश-दुःख और
इससे भी आगे बढ़कर तो यही कहा
जाता ही है जिस बात, ऊपर श्लोक २ में कहा
कि जो पुरुष इस प्रकार योग द्वारा अपने अन्तःकरण को वश करता है
जिसको कि इस योग द्वारा प्रशान्त मन--मन का वेग ना होना सिद्ध हो गया
होता हुआ मन हो, शान्त तथा रजोगुण से रहित जो हो गया निष्पाप हो, ऐसा
योगी परम सुख
जो इसके लिये कहा कि उस परम शान्त योगी को, उस योगी के समान
जिसके कि राग-द्वेष नष्ट, पाप-दोष नष्ट, निष्पाप होय, ब्रह्म भूत होके
ब्रह्म--का ध्यान करने से ही प्राप्त, होता सुख ब्रह्म प्राप्त होने का।
ब्रह्म सुख अथवा आनन्द प्राप्ति इससे क्या हो गई?
सो ऐसा आनन्द शान्त योगी स्वरूप-सहित को, उस प्रकार से, ना भी
प्राप्त हुवा हो; तथापि जो उस के सदृश न भी हुआ उसको वैसा सुख तो हो
ही?
इसी बात का निश्चय अगले श्लोक में किया गया कि
जो मनुष्य इस प्रकार मन को एकाग्र कर ध्यान को लगाये योग अभ्यास करता,
उसको सुख क्या मिलेगा? सो उसके लिये बतलाया कि योगयुक्त का पाप
दूर हो जाता है, जो पापी हो, निष्पाप हो, जो दुःखी हो, वह सुखी होता है
और इस प्रकार अपने को निष्पाप सा जानकर उसको सुख भी प्राप्त होवेगा,
और आत्मिक सुख क्या कम है? यह सब सुख आत्मा से सम्बन्ध रूप ही तो हो
सकता है सो इस प्रकार आत्म सुख से जो आत्मा का आनन्द रूप सुख प्राप्त
होवे सो, उस सुख को वह इस प्रकार के सुख से जो ब्रह्म योग से प्राप्त हो, वह,
सुख, प्राप्त हो; अतः २ प्रकार सुख के दिखलाने वाली-सुखद ही, यह
योग क्रिया
अभ्यास रूप से मन को एकाग्र करके ध्यान लगाने के ही तो यह फलदायी हो
सकी फिर, इसमें तो सब ही सुख ही सुख; अभ्यास का फल भी सुख और योग
का फल भी सुख ही सुख है; जिससे अन्तःकरण की शुद्धि का साधन और उस
योग द्वारा जो सिद्ध हो सका सो; दोनों प्रकार से साधन के द्वारा सुख ही तो
साधक को प्राप्त हुआ सो, तो ऐसा यह सुख दायक ही; सो अभ्यास से योग करना
श्रेय, सुख का साधन ही हुआ ना कि इस से कोई दुःख का साधन सिद्ध हो;
इसी कारण योग का अभ्यास
करने के लिये यह साधन बहुत ही सरल बतलाया कि मनुष्य को
सुख प्राप्त हो; इसके साधन से जो लाभ, कल्याण हो सकता सो अन्य और
किसी साधन द्वारा नहीं होता, इस साधन को तो सर्वसाधारण प्रत्येक
मनुष्य ही, सब प्रकार का लाभ प्राप्त कर सके सो इस अभ्यास द्वारा सुख ही सुख
प्राप्त करने निमित्त यह योग कहा गया, उस को धारण कर, उस साधन द्वारा सुखी
हो!
इससे आगे के पद में जो आत्मा शब्द का प्रयोग कई स्थानों पर किया
गया सो उस का भाव भिन्न भिन्न स्थानों भिन्न भिन्न प्रकार से यह रहा
सबसे पहिले पद 'युञ्जन्नेवं' में सदा ध्यान द्वारा योग का जो अभ्यास योग
साधक करता उस का? सो साधन के लिये इस श्लोक पूर्व में आत्मा का अर्थ
मन लिया; पर जो सदा लगावे मन, सो तो यह भी विचार उत्पन्न होता ही होगा,
कि मन को सदैव लगाए रखने से तो यह कष्ट ही होगा
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भगवान्‌ने कहा कि यह चेतना केवल शरीरीमें सीमित है, इसके विपरीत यह विश्व केवल
केवल यह अचेतन जगत् नहीं, यह चेतना का ही एक रूप है, विश्व के सब पदार्थ
भगवान् की ही लीला विभूतिका विस्तार रूपहै।
इन दोनों रूपों को जानकर दोनों के इस द्वैत को मिटा दिया जाय तो सच्चिदानन्दमय प्रभु,
सर्वव्यापक विराट् रूप परमात्मा को पाया जा सकता इस प्रकार इस विभूतिका ज्ञान प्राप्त कर
सब शोक विलीन
होकर परम आनन्द स्वरूप प्राप्त होता है। ज्ञानी को यह बोध रहता है कि प्रकृति
केवल जड़ता का नाम स्वरूप है। वह प्रकृति केवल जड़ताकी ही उपासना नहीं करता
वरन् वह प्रकृति के सचेतन रूप विश्व को भी उसी चेतना युक्त परमेश्वर का ही रूप मानता
होगा; सो वह इस दृष्टि से संसार व जगत् के द्वन्द्व से भी परे होकर रहेगा।
पर, निष्ठा किस स्वरूपमें होनी चाहिये? जिस परमात्मा का यह सचेत व अचेत
दो स्वरूप यह विश्व दिखाई देता है परमात्मा का ज्ञान प्राप्त कर लेनेपर, सो यह संसार
जिस का विराट् रूप है--उस विराट् परमात्मा का ध्यान ही सब क्रियाकलापोंका एकमात्र
ध्येय
बनकर रह ना जाना चाहिये, केवल ज्ञान व ध्यान
केवल उपासना तक, मात्र विचार तक सीमित
न रह कर उस ध्यान स्वरूप, चेतना व विराट् परमात्मा
स्वरूप, जो जगत् परमात्माका ही स्वरूप है। सब जीवों में व्यापता का ध्यान
ही सब क्रिया का फल हो सकता है। सब कर्म
निष्काम भाव स्वरूप, उस सर्वव्यापक परमात्मा
स्वरूप मात्र ही रह जायगा, फिर कर्ताका जो भी अहम् भाव उत्पन्न हो रहा
सो वह भी लय प्राप्त होकर ज्ञानीके जीवन का लक्ष्य ही मिट जायगा कि जगत् में माया-
बन्धन केवल इस जड़ विश्व स्वरूप प्रकृतिमें बन्धे रहने तक ही है सो वह यह जान कर
निर्लिप्त रह जायगा, संसार मात्र मिथ्या; प्रकृति केवल परमात्मा का विस्तार
रूप है, इस प्रकार निष्ठा किस? सो प्रभु का रूप केवल एक ही परम शान्ति का रूप ही
जानने पर ही निष्ठा उस एक रूपमें स्थिर
इस प्रकार निष्ठा प्राप्त कर लेनेपर यह संसारके सब सम्बन्ध जो जीव को
इस बन्धन में बांध कर रखते हैं--उन सबमें वह परमात्माकी चेतना देख कर सबमें
एक प्रभु दर्शन कर, उसी एक रूपके साथ ध्यान लगा... कर यह जान कर संसार--विश्व
केवल चेतनाके आधार, जड़ता केवल प्रकृतिके इस रूपको दर्शानेका ही
साधनमात्र है। उस परमात्मा ज्ञान स्वरूप होगा; सो वह सचेतन रूप ही जगत्
का, केवल जड़ रूप न देखकर केवल चेतना रूप परमात्मा जानकर अपने आपको,
इस जगत् तथा अपने विराट् स्वरूप प्रभुमें? जिसे उसने सब चेतना स्वरूप ही
देखा जाना है, उसीके साथ एकी भाव से, अपने को सबके साथ विभक्त रूप
सब जीवों में, एक ही चेतना समाई हुई!
अपनी चेतना को सब जीवोंमें व्यापक देखकर, सब जीवों द्वारा अपनी ही
ही क्रिया होती हुई का भाव उसको प्राप्त हो जाय?
सबमें चेतना परमात्मा रूपका ही वास है। परमात्मा व्यापक है? विराट्
चेतना ही सबमें सब जगह वास कर सब जगह सब कर्मों की कारण रूप मानी
जायेगी
सो निष्ठा केवल एक प्रभु रूप, केवल ईश्वर भाव पर ही निर्भर रहने से प्राप्त
होगी, जो सर्वव्यापक हो सब में व्याप्त सब जगह को अपने रूप व्याप्त करेगा; तब
वह कर्म त्याग कर, निष्काम कर्म--का फल पाकर सब कुछ प्रभु को ही अर्पण
करके जगत् मात्र को एक मात्र ईश्वर स्वरूप ही, संसार सब को ईश्वर रूप मान कर
सब कुछ परमात्माके समर्पित कर ही सकता है। परमात्मा प्राप्त हुआ ज्ञानी
जब, सो वह तो परमात्मा स्वरूप हुआ; उसको व्यक्तिगत सुख दुःख किसी भी
का भान सम्भव नहीं; परमात्मामें लीन हो जानेके कारण वह सब प्रकारके सुख
दुःख-संसार से परे! ज्ञानी जब विराट् रूप व ईश्वर के इस ही एक रूप भाव
रूप को सर्वभाव जान कर जीवन व्यतीत कर, सो वह ज्ञानी सब जीवों का कल्याण
करता हुआ भी, उस सबमें प्रभु को देखता हुआ, सर्वव्यापक प्रभुके इस
भावमें लीन; सो परमात्मा सब जगह व्यापक, सर्व-व्यापक रूप को सब जगह देख कर
कभी, उस विराट् व एक ईश्वर, व्यापक विराट् स्वरूप चेतना युक्त विश्व-विराट् रूप
परमात्मा ज्ञान स्वरूप को ही सब जीवोंमें समाई चेतना द्वारा प्रगटित हुआ जान
सब कुछ अर्पण करता हुआ; परमात्मा के स्वरूप ही अपनी चेतना समाहित कर
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पर अभागा एकादशी व्रत कथा-वार्त्ता श्रवण तो करता है पर कथा, दान

ब्राह्मण को दान स्वरूप दक्षिणा, भगवान् क भोग लगाकर
संत को भोजन कराकर; कथाकार व्यास को वस्त्र देकर, पूजन कर घर में सुख शान्ति
पाती
तथा उत्तम संतान सम्पति का लाभ पाते हुए अन्त में बैकुंठ जाकर श्री हरि के धाम को प्राप्त
होत हैं॥
पर अभागा एकादशी व्रत कथा-वार्त्ता श्रवण तो करता है पर कथा, दान
का महत्त्व न जान कर केवल उपवास को महत्त्व न मान कर भोजन-वस्त्रों की दक्षिणा
देकर कथा वक्ता तथा ब्राह्मणादिकों संग न ब्राह्मण को धन दक्षिणा देता है न स्वयं
एकादशियादिक व्रत ही कर पाता एकादशी व्रत कथा श्रवण का
यह सब देख नारद बोले, राजन जो कथाकार को उत्तम दान भेंट कर कथा श्रवण
फल को पा लेता है, दूसरा कथा श्रवण के निमित्त कथाकार को दान दे कथाकार को
प्रसन्न कर कथाकार के मुखारविंद से कथा श्रवण कर जाता है तथा, तीसरा केवल
कथा व्यास, को दान देकर ही चला जाता है! सो यह कथा का कैसा फल! इन तीनों को क्या फल
मिला कृपा कर कहो
ब्रह्मा, ने कहा राजन एकादशी का दान तो जो कर ही न सका सो क्या फल पावे जो
दान कर तथा कथा श्रवण निमित्त आया वह सब ही दान के आचरण फल को पाकर
अन्त में श्री भगवत् धाम...
हे दो प्रकार के, कथा श्रोता, राजन जो यह सब ही! या कहो पहला तो सब दे--सब
ही पावे? कथाकार का केवल जो कथा--पुस्तकादि ही पूजन कर ही कथा सुने सो,
सो तो केवल दो पग ही पुण्य फल पाता हुआ स्वर्ग को प्राप्त होता है, जो कथा कथा-
व्यास को ही दान देकर चला जाता है, स्वर्ग प्राप्त हो कर अभागा ब्राह्मण
कुल में जनम! जन्म दाता या कथावाचक की सन्तान हो जन्म लेता है सो सब फल
त्याग कर, पर कथा को कथा व्यास के सन्मुख बैठ कर जो नर वा नारी एकादशी
व्रत कथा का श्रवण व ध्यान धर करता है, वही नर, उत्तम है, इस को एकादशी व्रत
सब फल प्राप्त होत! यह ही एकादशी के प्रभाव से स्वर्ग भोग अन्त में मोक्ष क प्राप्त
होत
अब मैं अन्य नर के एकादशी कथा का प्रभाव
सब सत्य ही कहता हूँ, ध्यान धर सुनो एकादशी कथा के श्रवण से नरक
द्वार पर जा नहीं सकता जो नर एकादशी का व्रत करे, एकादशी के दिन भोजन
न कर कथा, श्रवण ही करे सो नर सब पापों से छूट स्वर्ग लोक को जाता जो नर
एक ही समय अन्न खा कर एकादशी तीन-दिन तक करता है सो, एकादशी को न अन्न
खाये; पर दो समय फलाहार कर द्वादशी को तीन-दिन का त्याग कर भोजन करे कथा
श्रवण कर, दान देकर, सो नर सब पापों से छूट
एकादशी का व्रत धारण कर धर्म का पालन करता हुआ
नर भी उत्तम सन्तति फल पा कर, अन्त काल
बैकुंठ जाता, ...
जो नर केवल दान देकर ही सब पुण्य फल पावे! कथा कथा ही धर्म कथा कथा
... फल प्राप्त होत पावे
जो नर केवल कथा ही सुने, दान न देवे सो अभागा--दरिद्री होकर नर नरक
भोग भोगता ही रहे, कभी फल नहीं
पाता नर को दान, का क्या फल? फल दाता दाता ही सो सब
फल दाता है, कथा दान महान्
सब कथा व दान, बिना कथा दान के सब दान व्यर्थ हो जाते नर दान,
फल दाता न पावे
अरे राजन, कैसा दान? दान दाता दाता ही सब नर को दान फल दाता
सो दाता दाता को सब दाता का माता-पिता कहो सब सम्पति दाता कहो जो
एकादशी का प्रसाद ग्रहण कर दान देता है, व सब के कल्याण की कामना कर नर
को भी दान दे ही देवे!
कथा श्रवण तो सब, कथा फल पावे
कथा त्याग कर, केवल कथा श्रवण
केवल, सब नर दान का फल पावे? केवल ही दान को ही! कथा श्रवण को
दान ही सब नर को दान फल दाता संशय?
कथा दान का नर सब रूप फल पावे
कथा त्याग करे, केवल दान दाता
90

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91

श्रीकृष्ण जी का यह भाव, जो उन दिनों अपनी माता या मौसी या किसी अन्य स्त्री सम्बन्धी
की गोद में खेलते अथवा उछलकूदते/मचलते समय था, उनकी मातृत्व-ममता का उचित या
यथेष्ट फल केवल था, सो ऐसा नहीं कहा जा सकता कि श्रीकृष्ण यशोदा को मातृत्व-ममता का
बदला चुका रहे थे। उनका भाव मातृत्व-ममता का बदला चुकाने का न था। श्रीकृष्ण का यह
भाव अपने बाल रूप द्वारा उस समय स्वयं न हो सका; पर यह तो कहा नहीं जा सकता कि
श्रीकृष्ण का यह भाव किसी के समझाने या सिखाने पर हुआ था। यह स्वाभाविक मातृत्व का
बदला था अथवा यह श्रीकृष्ण द्वारा किया गया मातृत्व का बदला था। श्रीकृष्ण ने अन्य
गोप, गोपियों को स्वयं न देकर दूसरों द्वारा दिलवाया; स्वयं, सो श्रीकृष्ण सर्वसम होने कारण, अपने
बालरूप का यश-दान तो न देकर न जाने क्या दान देते थे। यह अस्वाभाविक
ऐसी स्थिति किसी ने कभी नहीं देखी और सुनी, बालचरित्रों में तो यह स्थिति सम्भव
ही नहीं कही जा सकती। श्रीकृष्ण भगवान् के चरितामृत ग्रन्थकार भगवान् के चरित्र-वर्णन
में न जाने क्या न दिखाते यदि उन्हें यश-दान की; बालचरित्रों द्वारा तो केवल मात्र बाल भाव
द्वारा ही यश-प्राप्ति होना उचित माना जाता है। ग्रन्थकार ने इस बात को ध्यान न रखते हुए
बालचरित्रों द्वारा मातृत्व यश-दान दिलाते हुए श्रीकृष्ण को बालचरित्र-यश का ही अधिकारी
न माना बल्कि बालचरित्रों द्वारा ग्रन्थकार ने श्रीकृष्ण को यश-दान देने की अपेक्षा
बालचरित्रों में यश-दान श्रीकृष्ण के यश का साधन बना दिया।
श्रीकृष्ण यश देने के लिए नहीं, सो यश के लिए स्वयं बना कर, या बालचरित्रों का इस
प्रकार उपयोग किया; उस समय ग्रन्थकार ऐसा विचार कर यश का साधन न समझ कर यश
के कारण यश के लिए बालचरित्रों का साधन बनाया। श्रीकृष्ण ने स्वयं को यश का साधन न
मानकर यश को यश-साधन बनाया। श्रीकृष्ण तो ऐसे समय में यश का साधन बनने योग्य
ही न थे। बालचरित्र यश-साधन के लिए नहीं, पर यश यश-साधन के लिए
न बने इस पर ग्रन्थकार ने भी ध्यान नहीं दिया।
यश न देकर यश के अधिकारी को यश-दान देना तो बनता है। पर यश न देकर यश के
अधिकारी को केवल यश-दान देने का अधिकार बना कर, उस अधिकारी का यश श्रीकृष्ण द्वारा
क्यों छीना? माता यशोदा का यश तो केवल यश था। श्रीकृष्ण यश-साधन को बाल-सुलभ
रूप देकर यश-दान यशोदा को न करते, यदि यश की रक्षा का साधन ग्रन्थकार यशोदा द्वारा
न करते। ग्रन्थकार ने श्रीकृष्ण के यश को यशोदा के यश से बड़ा दिखाने का प्रयत्न
यशोदा यश की रक्षा न करते हुए श्रीकृष्ण के यश को बड़ा बनाने में ग्रन्थकार द्वारा
ही किया गया। ग्रन्थकार ऐसा न करता तो सम्भव था कि यशोदा का यश श्रीकृष्ण के यश
से बड़ा हो जाता।
ग्रन्थकार ने श्रीकृष्ण को यशोदा के मातृत्व-यश का यशोदा द्वारा यश-दान कराकर
यश श्रीकृष्ण का बढ़ा दिया। ग्रन्थकार बाल-लीलाओं द्वारा यशोदा के यश को कम करने
में समर्थ न हो सका। बाल-लीलाएं यशोदा के यश को बढ़ाती थीं। यशोदा श्रीकृष्ण की
बाल-लीलाओं द्वारा कभी दुःखी नहीं हुई, यशोदा तो यश की रक्षा यश-दान द्वारा करती
रहीं। यशोदा का यश-दान बाल-लीलाओं से हुआ। ग्रन्थकार यशोदा के यश-दान को
कम न कर सका।
श्रीकृष्ण बाललीलाओं का रूप तो यशोदा थी; बाललीलाएं यशोदा का यश कम करने
तो नहीं थीं, पर इनसे यशोदा का यश, यशोदा द्वारा श्रीकृष्ण यशोदा के यश, यशोदा द्वारा ही
यशोदा द्वारा यश दिया गया। यशोदा ने श्रीकृष्ण को यशोदा द्वारा यश दिया। यशोदा का
यशोदा द्वारा ही यश-दान हुआ। यशोदा द्वारा
यशोदा द्वारा ही श्रीकृष्ण को यशोदा द्वारा यश दिया गया। यशोदा का यश यशोदा द्वारा ही
रहा, सो यशोदा का यश यशोदा यशोदा द्वारा ही बना रहा। बाललीलाओं द्वारा यशोदा का
यश तो यशोदा यशोदा का यश यशोदा द्वारा ही यशोदा का यश यशोदा द्वारा ही यशोदा
यशोदा द्वारा ही यशोदा का यश यशोदा द्वारा ही यशोदा का यश यशोदा द्वारा ही
यशोदा द्वारा ही यशोदा का यश यशोदा द्वारा ही यशोदा का यश यश-दान यशोदा
यशोदा द्वारा यश-यशोदा का यशोदा का यशोदा यशोदा? यशोदा का यशोदा का यशोदा यशोदा
यशोदा का यशोदा द्वारा यश यशोदा द्वारा यशोदा यशोदा यशोदा यशोदा यशोदा का यशोदा का
यश यशोदा का यशोदा यश यशोदा का यश यशोदा, यशोदा का यशोदा यशोदा यशोदा का यश यशोदा यश--
यशोदायशोदा का, यशोदायशोदायशोदा यशोदा यशोदा यशोदा यशोदा यशोदा का यश यशोदा यशोदा
का यशोदा का, यशोदा यशोदा यशोदा यशोदा यश यशोदा यशोदा का यश यशोदा यशोदा यशोदा यश--
दान का यश यशोदा यशोदा का यश यशोदा का यशोदा यशोदा, यशोदा यशोदा का यश यश-यशोदा,
92

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93

तब राजा का ध्यान भंग हो गया तो देखा कि एक सर्प आ रहा है! तो वो क्रोधित हो गया
क्योंकि उस वक्त वो रस में मग्न था, उसकी एकाग्रता भंगभंग होगई; उस वक्त राजा-
परीक्षित को ऐसा क्रोध आ ही गया
क्रोध तो आया लेकिन उसने सोचा कि जब तक मैं धनुष से बाण निकालूंगा तो इतने
समय में यह सर्प मुझे डसकर के चला जाएगा और वह सर्प तो वास्तव में निर्जीव
व्यक्ति के रूप में था ही इसलिये वो आस-पास देखे तो तीर के नीचे मरा सर्प,
उसको उठा के डाल दिया
महापुरुषों के उस समाधि अवस्था रूपी अमृत के रस भरा हुआ वातावरण को
विषमय कर दिया गया और उस वक्त वो राजा चला गया, तो शाम को, ऋषि श्रृंगी जी,
जिन्होंने उस वक्त उस बाल अवस्था के रूप में शमिक के रूप में बालक पैदा
था, जिसने समाधि रूप को उस वक्त देखा, तो जिसने देखा उस वक्त वो बच्चा
तो देखकर रोने लगा, वो कहने लगा कि जब तक पिताजी समाधि में लीन थे
तब तक तो ठीक था लेकिन अब तो यह निर्जीव अवस्था को प्राप्त होगया है, न तो
बात करते हैं, न कुछ समाधि रूपी रस का पान करते हैं, तो उस समय बच्चा रोने
की आवाज सुन कर विश्वामित्र और अन्य ऋषि लोग भी उस समय पहुंचे कि क्या
हुआ बच्चा क्यों रो रहा है, तब उसने अपने उस पिता के कंठ में सर्प बंधा
देखा तो, न जाने वो उस समय रो--या या क्रोधित हो गया तो उस वक्त वो
कौशिकी के तट पर जाकर जल लेकर आया; तो गंगाजल लेकर उसने हाथ में
कहा जल के स्पर्श मात्र तक सातवें दिन तक्षक सर्प आ करके डस लेगा और
मृत्यु
होगी, अब वो भी, तो क्रोध था? क्रोध के रूप में उस वक्त श्रृंगी ऋषि
को भी तो ज्ञान का कोई लाभ दिखाई दिया?
क्रोध हमेशा ही जब भी आता रहेगा
ज्ञान रहता नहीं, समझ चली जाएगी
केवल अपना नुकसान व दूसरे लोगी हानि
इस लिये कहा गया, क्रोध महा वैरी
सुनो, जिस वक्त शाप दिया, तो उस वक्त जब देखा तो, शमिक जी होश रूप में
आ के उस वक्त रोने लग गये कि तूने ऐसा क्या कर दिया?
शांत मन वाले जो भी थे, शमिक ऋषि जिन्होंने वो क्रोध शांत कर
दिया था अपने ही अंदर; विश्वामित्र उस वक्त पास ही खडे हुए थे, शांत ऋषि
रूप में विश्वामित्र का स्थान आता था शांत रूप के पश्चात, शांत रूप के पश्चात
दुर्वासा, वशिष्ठ रूप का स्थान आता व शांत रूप के; शांत रूप के विश्वामित्र; शांत रूप
शमिक विश्वामित्र के भी बाद; तो वो शांत रूप में थे; तो वो शांत
अवस्था में थे; तो वो तो भगवान स्वरूप अवस्था के रूप ज्ञान अवस्था में थे।
और तूने क्या कर दिया? उसने उस बालक को कहा और वो रोने लग गये कि क्या
किया तू? उसको शाप देकर तूने बहुत बुरा किया
केवल अपनी दुर्भावना व अज्ञान...
का रूप दिया तूने, जो किसी रूप में विनाश
... करने वाला होगा
तो उस वक्त शमिक ऋषि, जो बालक को डांटते, शांत विश्वामित्र जी पीछे
हटकर रो रहे थे? केवल इस कारण से, कि विश्वामित्र जी शांतिक रूप
बन गये थे विश्वामित्र जी, शांत रूप धारण विश्वामित्र के रूप में माना गया,
बाद में वो रो--या क्योंकि उस उस समय ज्ञान की हानि देखी, ज्ञान स्वरूप का
अभाव था
अतः, क्रोध हर रूप से ही मनुष्य के जीवन में ऐसा प्रभाव या ऐसा रस घोल
ही देगा
कि मनुष्य सब कुछ भुला देगा कि वास्तव रूप में क्या करना, किसी का क्या
भला और क्या बुरा!
इस लिये संत सज्जनों, क्रोध हमेशा त्याग
को अपने मन से बाहर निकालियेगा तो जीवन में कभी किसी को कष्ट नहीं हो सकता है।
जब तक मन शांत रहेगा तब तक सब कुछ सुख ही सुख होगा, किसी को कोई
दुख नहीं होगा न कष्ट होगा, सब कुछ छोड़ दें क्रोध को, सब कुछ छोड़ दें
क्रोध को छोड़ दें, सब अवगुण को, अहंकार को छोड़ दें, ईर्ष्या को
त्यागें
94

पाँच हजार या पाँच-सात सौ वर्ष पहले किसी ने कह दिया; जिससे हमारा कुछ न
कुछ भला अवश्य ही हुआ होगा
फिर भी उसके पहले हमारा क्या था और तब क्या होता था यह बात आज की
परिस्थिति में खोज करने की ही नहीं किन्तु यह सोचने, जब हमारा जीवन सुखद नहीं,
तो जो कुछ कहा गया सब झूठा ही; जो कुछ कहा गया पचास ही, सब कुछ पचास बाकी
रहा, तो जो कुछ कहा गया सब झूठा ही; पर इसके दो फल हुए, एक विचार ही, या तो
पचास वर्ष पहले जैसा जीवन बना, या तो पचास वर्ष पहले जैसा जीवन
फिर तब तक सुधारक को परिस्थिति का फल भोगने दो, जब तक परिस्थिति
अनुकूल न हो ले, फिर पचास हजार सुधारक भी क्यों नहीं होंगे जो न परिस्थिति
खोज रहे हैं, खोज करना व्यर्थ; विचार तो है, यदि मानव रूप--की ही खोज करना चाहेगा
तो परिमार्जित होकर ही रहे, पर ऐसा सुधारक न हो सकेगा जिसका विचार सब कुछ
को नष्ट करना ही, या सुधारक को सब परिस्थिति-वश ही सब कुछ प्राप्त होना
पड़े, न सुधारक की आवश्यकता
विचार तो ऐसा रहा कि जो सुधारक हुआ या सुधारक बना उसका तो विचार
सुधारवादी अवश्य ही या होगा ही जिसको आवश्यकता सुधारने योग्य पहले जान पड़े होगी
कि सुधार करना होगा मानव जीवन सुधरने के हेतु ही विचार तो ही रहा और विचार
अनुसार विचार मानव परिमार्जित होकर विचारवान् या सुधारक कहलाया होगा
फिर तब तो यह बात सिद्ध हुई मानव सुधार ही की तो देन सुधार है। अब यह बात
विचार का विषयहीन ही; मानव समाज का रूप कैसा होना चाहिए? मानव को
आवश्यकता इस बात, अपने रूप स्वरूप को ही खोज कर लेने का भाव था मानव
समाज निर्माण को जो यह रूप दिया गया जिसके द्वारा मानव सुख पा सके सो, अब
क्या यह सिद्ध न हो कि या तो समाज के रूप का मानव अथवा मानव द्वारा समाज का
रूप दिया गया जिससे कि समाज को सब ही प्रकार का सुख प्राप्त हो? जो कि
उपयुक्त नहीं, न होगा
बात यह रही होगी, या ऐसा रहा होगा कि जो रूप आज का है; मानव तो हो ही
सकेगा, सुधारक होकर मानव को सब कुछ विचार करना ही, साथ ही यह विचारवान् बनकर
मानव विचारवान् समाज का रूप दे, जिसे और भी आगे चल कर सुखमय जीवन को
मानव ही रूप प्रदान कर सके या रूप देने का मार्ग मिले
सो रूप तो या जीवन का रूप इस बात का, जो रूप आज सुलभ, खोज का आधार
बनकर ही मानव रूप धारण कर समाज का रूप ऐसा बनाया जो आज तक हमारे
पास मौजूद, समाज का रूप ऐसा रहा
सो बात तो जो रही सो रही आज हम मानव, मानव का रूप, मानव का रूप
खोज कर निकाल ही लें, फिर जो समाज का रूप, मानव का, यदि तो सब प्रकार का
ही परिमार्जित होगा ही, सुधारक के मत द्वारा सब कुछ सुख साधन सम्पन्न बनाकर
मानव सुखमय रूप को प्राप्त कर सकेगा सो विचारणीय
रूप तो मानव का विचार व प्रयास ही हो सकता होगा, तो सुधारक प्रयास
करके रहे, पर हो तो मानव द्वारा मानव जीवन रूप प्रदान ही, सुधारक तो स्वयं
मानव है, मानव समाज मानव समाज, मानव समाज को तो सब रूप प्राप्त रहा
सब समाज, पर रूप तो सब रूप ही तो मानव के हाथ रूप हुआ
तो जो रूप बन रहा था मानव का ही यह रूप था सो रूप मानव स्वरूप न
बनकर ही मानव समाज का, व मानव का रूप बनकर समाज का रूप बना ही;
फिर तो मानव, मानव ही, पर सब कुछ विचार कर, जब सोच--के विचार का काम लें,
सोच लें! जो रूप मानव का रूप समाज रूप बना रहा था सो रूप सुधारक द्वारा
ही तो रूप दे दिया गया जिसका फल यह भी हुआ कि... न ही तो ऐसा रूप प्रदान
ही हो सका जो रूप आज बना हुआ है, या खोज ही रही
फिर मानव स्वरूप को ही प्राप्त कर समाज का रूप प्रदान करे, जिससे कि
ऐसा रूप बन पड़े जो कि समाज सुधार का ही रूप सिद्ध होकर सब के लिए सुख
कारक बने समाज ऐसा सुख प्राप्त करे।
समाज ऐसा ही होना चाहिए क्या?
समाज तो बन रहा; समाज के रूप को सुधारक ही, आवश्यकता के अनुसार बनाता ही
रहा है! जिसे हम समाज का सुधारक ही कहना चाहें? जिसे ही कहा है! सुधारक
का रूप ही तो तो समाज का स्वरूप ही बनकर रहा बना, सब कुछ; उस समय, जब
जैसा

95

इस प्रकार जीव, जो अनादिकाल से कर्म सहित मोह रूपी निद्रा में सो रहा था सो वह
चेतन रूप हो गया और उसका अज्ञान नष्ट हो गया कि यह आत्मा व शरीरादिक जुदा
हैं! सो सम्यग्दर्शन को जय! सर्वोत्कृष्ट पद केवल ज्ञान को जय क्योंकि केवल ज्ञान
न होता अथवा सम्यग् दर्शन न उपजता तो संसार रूपी घोर संकट सहित यह जीव
नरक, तिर्यंच रूप कु योनियों में भटकता रहता? सो इस पर से सब ज्ञानी जन को
चाहिए कि सब ओर से मन हटाकर आत्मस्वरूप चिन्तवन करें! तब ही इस पावन नरभव
का, व उत्तम कुलका मिलना सफल कहावेगा!
इसमें ऐसा जानना कि, केवल ही से ही संसार का नाश
केवल ज्ञानी बिना कोई भी जीव मोक्ष को नहीं पा सकता, इस--लिये सर्व प्रकार
केवल ज्ञान सर्व--उत्कृष्ट मोक्ष रूप है। हे भद्र! तू समझ अथवा न समझ इस
आत्मस्वरूप को ग्रहण करेगा; व ग्रहण न भी करे तो नरक में पड़ेगा; हे भाई, संसार
में रहकर यह दुष्ट कर्म हम सब जीवों को अनेक प्रकार के दुःख देता है और देता
रहा सो यह भी सब मन की ही चाल है सो इसको दूर--कर उत्तम पदका लाभ प्राप्त
कर
सवैया इकतीसा आत्मा व केवल ज्ञान सम्वन्धी
एक ओर सब संसार, ज्ञान स्वरूप संभार
सो यह ही मन सब का कारण है। जिस में मन को ही सब का कारण कहा
गया है सो व्यावहारिक मात्र ही का मन सब से श्रेष्ठ नहीं है किन्तु जब कि केवल
ज्ञानी जीव को ध्यान के बल--द्वारा ही, मन से रहित हो कर ही सब केवल ज्ञान
प्राप्त हो कर केवल ज्ञानी होना कहा गया! वास्तवमें ज्ञान ही केवल वा सब का
कारण
वा ज्ञान ही का फल--ज्ञान का स्वरूप है, ना ज्ञान से अन्य रूप वा अन्य का वा
संसार का कारण है; सो पाठक भी ध्यान रखें
सो व्यावहारिक वा अशुद्ध रूप निश्चय व्यवहार ज्ञान ही का फल मुक्ति नहीं
किन्तु केवल ही का वा शुद्ध निश्चय ही सर्वोत्कृष्ट एवं मोक्षका फल देने वाला
उत्तम सम्यग्ज्ञान होता हुआ मोक्ष प्रदायकरूप कहा गया सो सब भव्यजीव इस
बात को समझें कि, यह सब, जो ऊपर लिखा गया सो सब मनके ही निमित्त मात्र होने
कारण कहा गया इतर सब मन से भिन्न स्वतः सिद्ध सब आत्मा ही ज्ञान--का फल
मोक्ष रूप सुख स्वरूप स्वाधीन है आत्मज्ञान, आत्मचिन्तवन वगैरह
सो केवल ज्ञान वास्तवमें ही सबका कारण, यह कहने का तात्पर्य यह कि केवल
ज्ञान ही प्रधान वा उत्कृष्ट पद सब ज्ञानों में, इसीलिए केवल उप--निषद्ज्ञान
तत्वज्ञान को कहा गया फिर केवल ज्ञानको आत्मा का ज्ञान रूप ही, कहा गया जिसका
अभिप्राय यह हुआ कि ज्ञान स्वरूप ही सब का कारण स्वरूप परमात्मा ज्ञान ही
परमेश्वर सर्वज्ञ सर्वदर्शी परमात्मा है, जिस से संसारिक प्रपंचका नाश
होता कहा
पद नवां पूर्ण

96

text
[शीर्षक पट्टी]
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□□□? □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□? □□□ □□□□ □□□?

97

तब विद्याधरने कहा कि सच तो यह है कि इसका नाम ही, इसका स्वरूप होगा? जिसे
देखकर किसी प्रकार ज्ञान या रस पैदा होता ही नहीं तथा जिसके छूने से विद्याधर का सारा
ज्ञान नष्ट हो, उसी प्रकार का यह नर भी नरक समान दुःख देने वाला नर ही हो
सकता!
नर रूप विद्याधर जैसा उसका स्वरूप देखा, वह तो इन दोनों समान होकर ही
रूप होगा--इस पर जब विचार न किया, तो उसने विचार करके नर से जो
कहा वह सब कह दिया तथा नर ने समझकर जो विचार से निष्कर्ष निकाला था
वह नर ने स्वयं विचार किया, न कि विद्याधर के विचार रूप
विचार तो यह निकला--अहो, तू तो निष्कपट था, सरल था, शुद्ध था, फिर भी
तुझे स्वरूप विस्मृत हो गया तथा विद्याधर के या नर के, ज्ञान में भ्रम,
या नर विद्याधर के भ्रम रूप ज्ञान को देख न सका या समझ सका, या फिर ज्ञान स्वरूप को
स्वरूप जानकर न तो ज्ञान समझ सका या जान सका, जिसे ज्ञान हो, विचार हो, या
नर विद्याधर के समान आचरण कर ले!
हे विचार के, ज्ञान बिना नर तो नर रूप ज्ञान
का भ्रम मात्र होगा
सो ज्ञान उस स्वरूप को न समझकर केवल ज्ञान रूप विचार ही, जिसे ज्ञान का
अभाव रूप जानकर, ज्ञान विद्याधर के उस नर रूप--नर को ज्ञान स्वरूप
नर
विद्याधर समझ तो रहा स्वरूप जैसा विचार रूप ज्ञान का रूप देखा तो
ज्ञान रूप का ज्ञान रूप स्वरूप केवल ज्ञान स्वरूप का जाना; सो ज्ञान रूप न
जाना, पर नर का ज्ञान, ज्ञान का ज्ञान रूप न जानकर भ्रम स्वरूप, रूप देखा व
जाना उस ज्ञान के स्वरूप को देख कर ज्ञान को अपने रूप स्वरूप रूप में समझ तो
रूप ज्ञान से स्वरूप ज्ञान को दूर ही कर दिया, सोच-विचार, सो, नर का विचार रहा,
विद्याधर का विद्याधर रूप, जिसे विद्याधर कहे? सो ज्ञान विद्याधर स्वरूप रूप में
केवल नर के ज्ञान रूप को नर समझ लिया ज्ञान स्वरूप विचार रूप ही, नर
विद्याधर स्वरूप से दूर रहा, ज्ञान रूप विद्याधर रूप ही तो नर विद्याधर ज्ञान
विद्याधर का नर ही विद्याधर का विद्याधर
विचार से विचारवान् तो नर ही रहा नर ज्ञान स्वरूप का विचार रूप सो
ज्ञान रूप होकर विद्याधर रूप विद्याधर स्वरूप को केवल विद्याधर समझ
रहा, सो ज्ञान रूप ज्ञान विचार स्वरूप ज्ञान स्वरूप ज्ञान के ही समान
रहा, नर विद्या ज्ञान का स्वरूप तो विद्याधर स्वरूप समझकर भ्रम ही कर
विद्याधर रूप विद्याधर ज्ञान स्वरूप ज्ञान, ज्ञान के ही समान रूप जाना;
ज्ञान रूप ज्ञान उस नर! को ज्ञान रूप, नर ही नर-रूप; केवल ज्ञान ज्ञान
रूप ही रहा उस नर! का ज्ञान रूप, नर ही विद्याधर समान रूप नर रहा;
केवल नर रूप के स्वरूप में ही नर रहा, नर तो नर रूप रूप से ही नर रहा
केवल नर ज्ञान स्वरूप उस नर ज्ञान
नर का ज्ञान केवल नर ही नर के विद्याधर स्वरूप से दूर रहा या नर
ज्ञान रूप से रहा, नर विचार रूप विद्याधर ज्ञान रूप नर का नर, नर
का ज्ञान रूप से नर ज्ञान रूप नर का ज्ञान के ज्ञान के ज्ञान स्वरूप नर
विचार व्यवहार रूप केवल ज्ञान को नर विद्याधर के रूप में नर को नर विचार
ज्ञान का स्वरूप केवल नर विचार के समान विद्या स्वरूप केवल ज्ञान नर है?
विद्याधर का ज्ञान तो ज्ञान होगा? सो विचार केवल ज्ञान रूप ज्ञान स्वरूप नर के
ही ज्ञान का रूप था? सो तो विद्याधर, ज्ञान के ज्ञान से भिन्न रूप ज्ञान,
केवल ज्ञान रूप ज्ञान
विद्याधर केवल ज्ञानवान् ज्ञान ही ज्ञान रूप स्वरूप का ज्ञान रूप तो
विद्याधर रहा
ज्ञान रूप विद्याधर का ज्ञान ज्ञान उस विद्याधर स्वरूप ज्ञान रूप का
ज्ञान-रूप ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान था, नर तो नर रहा; सो ज्ञान स्वरूप का तो
भ्रम रहा, नर ज्ञान से नर विचार स्वरूप ज्ञान से केवल स्वरूप ज्ञान के ज्ञान
स्वरूप ज्ञान, स्वरूप ज्ञान विद्याधर ज्ञान विद्याधर स्वरूप का ही विद्याधर
के रूप स्वरूप से, ज्ञान स्वरूप रूप केवल ज्ञान स्वरूप स्वरूप से ही केवल
का स्वरूप ही ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान का ज्ञान स्वरूप विद्याधर रूप ही रहा
उस स्वरूप रूप से विद्याधर स्वरूप स्वरूप ज्ञान रूप स्वरूप के अनुसार, वह
नर रहा, केवल ज्ञान, विद्याधर ज्ञान स्वरूप नर के ज्ञान स्वरूप ही स्वरूप
98

विचारो, जिसका आत्माराम अनादिसे कर्मयोग से बन्धन को प्राप्त था उसे ज्ञान से मुक्त किया
गया
ऐसा विचार करके उस आत्मा का स्मरण करना चाहिये जिससे उसका यह भाव नष्ट हो
जाता कि यह जीवात्मा कर्मों द्वारा आच्छादित हुआ ही रहता है, सो सब मिथ्या, इस
निमित्त जिस रूप से यह अपने स्वरूप द्वारा ज्ञात? केवल एक ज्ञाता ही प्रतिभासित हुआ
रूपसे रूप रहा, इस प्रकार उस सब स्वरूप शुद्धता द्वारा प्राप्त हुआ जो सर्वथा शुद्ध
सो परमात्मा आत्मा का ही रूप है सो वह परमात्मा इस जीव को शरण हो ऐसा
ध्यान करो, जिससे यह ज्ञान प्राप्त होवे, जिससे यह सब कर्म जाल नष्ट होकर मोक्ष
सुख को प्राप्त होवे; जिस आत्मा के सब कर्म क्षय हुए वही तो सिद्ध, अरू जिस
के सब पदार्थ ज्ञान द्वारा जाने सो सर्वज्ञ और जिसने सब कर्मों को नाश कर अ--क्षय
सुख अ--न्त प्राप्त हो गया सो मोक्ष प्राप्त कहावे; जिस प्रकार आत्माराम अपने
ही सुख में मग्न; जिस प्रकार ज्ञानीजन भय से रहित हुए आत्मरूप में मग्न, राग-
द्वेषादि से शून्य व सब प्रकार कल्याण रूप केवल, ऐसा ध्यान कर जो कि इस तरह
अपनी आत्मा का रूप ही समझ कर शरण ग्रहण करता है सो भव्य, जो कि सन्मार्ग को
ही राह पर पग धरेगा

जिस प्रकार केवली का रूप कहा सो केवल ज्ञानीजन के स्वरूपको समझकर
उस प्रकार रूप को प्राप्त हो मुक्ति मार्ग द्वारा सिद्धपद पावेगा? तो केवल ज्ञानी
सब सिद्धपद के धारक ही तो हैं ऐसा जानकर निश्चय करके ही जान, ज्ञानवान ही
निश्चय को ही धारण किया करता, जिसे कि केवल ज्ञानस्वरूप ही सब ही कहा

इस ही तरह कर्मों द्वारा सब रूप जीव अशुद्ध रूप देखा सो सब अज्ञानजन
ऐसा कह कर सब कर्मों द्वारा ही तो १ प्रकार स्वरूप समझा, अज्ञानजन अज्ञानी,
जिन्हें अज्ञान स्वरूप कर्मयोगवश है, जिसे कि केवल ज्ञानी कर्म द्वारा बंधा
रूप जान के स्वरूप को ही इस तरह अशुद्ध मान के ज्ञान कर्म दोनों को एक
स्वरूप ही कह दिया सो १ प्रकार ही का अज्ञान को प्राप्त हुआ

इस ही पर इस तरह कर्म द्वारा सब अशुद्ध रूप जीव अज्ञान को प्राप्त हुआ,
अज्ञानजन ही कर्मयोग से बंधा है, सो ही १ तरह कथन किया सो कर्म ही रूप
स्वरूप को कह दिया जिससे जीव के स्वरूप को केवल ही कहा गया, केवल रूप ही
आत्मा स्वरूप सब कहा गया सो इस जीव के स्वरूप को केवल रूप समझ
ही कहा जो कर्म के फल को रूप आत्मा रूप ही कहा गया सो केवल रूप अशुद्ध
ही रूप में ज्ञानियों द्वारा ही कहा गया सो ही अशुद्ध कर्म का स्वरूप रूप हुआ, सो
शुद्ध ही हुआ अज्ञानवश, अज्ञानजन तो इस ही प्रकार सब कर्म अशुद्ध ज्ञान
द्वारा कह दिया सो ही तो इस तरह से ही कहा, सो अज्ञानवश ही तो अज्ञान
रूप एक-एक रूप जीव के स्वरूप कथन किया गया

क्रोध, मान, छलछिद्र, मायाचार--इन द्वारा जिस तरह जीव अशुद्ध कर्म को
फल रूप ही तो ही ही प्राप्त होता रहा, जिस तरह जीव को ज्ञान द्वारा अशुद्ध
समझा? जिसका रूप, अज्ञानवश होने से स्वरूप कभी भी समझा? ज्ञान
द्वारा तो केवल रूप प्रत्यक्ष एक प्रकार १ ही स्वरूप शुद्धरूप देखा सो, १ प्रकार
प्रत्यक्ष ज्ञान द्वारा रूप प्रत्यक्ष देखा सो केवल सो, जो जीव ऐसा ध्यान धर
ज्ञान को पावे?

केवल ज्ञानस्वरूपवान् निज स्वरूप आत्मस्वरूप सब तरह से ज्ञानी समझता
ही जाता सब रूप ही तो, कर्म फल द्वारा ही सब प्रकार आत्मस्वरूप जाना ही
सब तरह ज्ञान ही तो प्राप्त हुआ समझा, अज्ञानजन अज्ञान द्वारा ज्ञान
स्वरूप सब कर्म कहा, सो कर्म का रूप, सो ही रूप ही सब तरह से ही रूप ही
ज्ञान रहा!

कर्म का संबंध आत्मा के साथ ही संबंध रहता सो सब अज्ञान द्वारा
सब अज्ञान ही कहा सो अज्ञान; कर्म ही संबंध से, सब रूप अज्ञान ही रहा
स्वरूप ज्ञान सब कर्म फल के साथ अज्ञान से, कर्म ही रूप अज्ञान, सो ही रूप
अज्ञान स्वभाव अज्ञान भाव द्वारा कहा ही, ज्ञानवान इस संबंध द्वारा सब ही
त्याग रूप, १ सब त्यागवान् हो, १ सब त्यागी हो, १ सब आत्मज्ञान हो; ज्ञानवान
जीव तो व्यवहार के अधीन निश्चयनयरूप रूप सब ज्ञानवान का स्वरूप ही सब
प्रकार भिन्न भाव से ही स्वरूप सब आत्मा का, जिस ही का स्वरूप ही
आत्मा से भिन्न भिन्न रूप आत्माराम का निश्चयनय से सब कर्म क्षय
99

राजा को सम्बोधन कर जन कहने लगे- हे नृप, हमारे महाराज विदेहराज जनक
जब तक, अपने पास रहे; कभी हम लोगों न को, दुख स्पर्शमात्र न हो, वरन्
आनन्द व सब प्रकार सुख सौभाग्य को प्राप्त कराया करते वा महाराजा को
सुधारे गये, कभी किसी प्रकार कष्ट--दुख नहीं था; जबतक जनक जी महाराज
राज्य वर्तमान उपस्थित वा जब तक वे रहे तबतक प्रजामात्र सब ही आनन्द मंगल
भोगवती वा सब जन घर घर में सुख चैन से रह रहे वा महाराजा के गुण गान कर रहे
वा सुख समय भोग समय व्यतीत कर सब प्रकार सुख रहे॥
पश्चात्काल प्रजा कहने लगी वा कहने में ऐसा भाव प्रकट वा प्रकाशमान हो
रहा था कि? क्या पिता जनक हमारे न रहे वा हम अनाथरहित हो गये
अथवा न, फिर मिले क्या? जब तक पिता रहे, तब तक सर्व सुख, वा
पश्चात्काल सब समय प्रजा सन्तापरहित रूप हो सब जन एक मण्डल रूप हो
विलाप कर रोने लगे वा कहने, हेपिता हमारे जनक कहां विराजित रहे वा अब
कहां गये, कृपाकर सो कहो वा बताइये; हम लोगों को दर्शन दो; हम सब
जन दीन, हीन दुखी हो रहे हैं जन जन का रूप वा दशा को देख दया करो
सो जन कह रहे हैं, सो क्या दशा वा भाव कहा जाय? प्रजा के लोग वा
स्त्रियां वा बाला मात्र कह रही हैं! हमारे जनक जी, महाराज जनक
जी; प्रजापालक पिता जी, प्रजापालक जी सुनो जन की वा विलाप-विलाप
कर-कर रोते वा पुकार रो-रोकर वा नेत्रों द्वारा अश्रुपात सब प्रजा
विलाप कर रही, पुकार रही! देख सो दृश्य जन कांप उठे वा डर गये
सब, प्रजाजन ऐसा कर दशा विलाप कर रो रहे थे, उस समय जनक जी का
भी हृदय भर आया वा भर आने पर स्वयं भी द्रवित हो रहे थे, सो
सब दृश्य विह्वल हुआ, सो उस समय जन सब रो रहे थे, सो दशा जन की
जनक देख--सब को देखकर कहने लगे, प्रजा सुनो!
सो समय जन सम्बोधन कर जनक जी कह रहे प्रजा सुनो सब धैर्य
रखो सब स्वरूप नाश न हो; महाराज जी, सबको सो स्वरूप विदेह-भाव
की ओर लक्ष्य कराके वा उपदेश कर समझा रहे थे वा कह रहे थे जन
हमारा वा सब न कोई काल तक रहे हैं सब का काल आता वा सब लय
अवस्था को प्राप्त हो विदेह स्वरूप रूप में मिल-जुल कर अन्तर्ध्यान
हो जा रहे, सब का काल आ रहा सो प्रजाजन भी अपने-अपने
रूप व निज स्वरूप में लय हो जा रहे हैं॥
जनक सब प्रजा सन्मुख बैठ कर सब को उपदेश देकर समझा रहे
थे सब प्रजाजन रो रहे थे वा सब जन विलाप कर रहे थे जनक
जी सब जन को देख वा समझा रहे थे जन-पुकार कर अपना दुख कह
रहे, उस समय को देखकर के; सो दृश्य को देखकर के, सब जन रो रहे थे
जनक महाराज उपदेश कह रहे थे॥
उस समय के दृश्य को जन सब देख रहे थे जनक विदेह स्वयं काल
रूप में लय स्वरूप धारण कर रहे थे, जनक सब को उपदेश दे रहे थे,
सो जनक उपदेश का भाव इस प्रकार जन से कह रहे--हे प्रजा सब
सुनो, अपने को स्वरूप मान कर मन को सब त्याग करो, सब त्याग कर
मात्र का एक निज स्वरूप जानो, स्वरूप ही तो नाम, नाम रूप-रंग रहित
सो उस लय स्वरूप को जन सब प्राप्त हो सुख पावे वा विदेह हो? जनक जी
के वचन सुने थे?
जनक उपदेश प्रजाजन को, कह प्रजाजन सब सुनकर शांत
हुए; जनक विदेह रूप धारण कर रहे थे वा सब जन देख रहे
वा शांत हो कर बैठ गये; सब प्रजा रो रो कर कह रही, महाराज जी
धन्य
पिता जी सब जन को सत्य मार्ग दिया; आपका उपदेश सदा ही सब काल
में सब जन याद रखे हैं! सो ज्ञान-सार प्रजा सब पा कर धन्य हुई, जनक
सब प्रजा को सो रूप में रूप हो कर शांत कर रहे थे, तब जन... विदेह-
रूप देख रहे हैं! जनक जी महाराज के पास सब लोग हाथ जोड़ कर बैठ
रहे; जनक जी का वचन अमृत तुल्य रहा, जन व प्रजा--का सो ज्ञान-मार्ग
खुल कर प्रकाश रूप हो गया; जनक जी सब प्रजा जन को सत्य का मार्ग
दिखाया गया, सो जन विदेह स्वरूप सुनकर के जनक को नमन कर रहे
100

कहना उचित था उनका उस समय विचार करके; पर जब समय बदल गया, विचार का रूप
बदला व्यावहारिक, स्वरूप व्यावहारिक भी उनका बदला होगा
इसलिए जो परम्परागत या पुराने संत हो गये, समाजशास्त्र को या मानव जीवन दोनों
को जो दृष्टि प्रदान करने वाले ऋषि-मुनि हुए अथवा समाज को जो दिशा-निर्देश देने वाले
सिद्ध संत, धर्मधुरंधर-मनीषी मनीषी उनके द्वारा दिए, समय-समय-विशेष विशेष प्रसंग विशेष संदर्भ को
व्यक्ति क्या तो रूढ़ि बनाकर या उसको सनातन सिद्धांत मानकर बैठ गया; परिणामतः जाति-वर्ण
आश्रमव्यवस्थाएं बनीं, समय का रूप बदला पर जब काल की गति बदली व्यावहारिक स्वरूप को न तो
समझ पाये उस पर आधारित जो जो भी समाजव्यवस्थाएं बनीं परिणामतः संकीर्ण बनती चली गईं
उनका विलोपन हो! फिर जो नवीन दृष्टा समाजव्यवस्थाओं को रूप देने का प्रयास बना रहा,
उसने फिर मानव जीवन अथवा समाजशास्त्र को किसी नये दृष्टिकोण अथवा दिशा अथवा आयाम
को जो भी रूढ़ या जड़ या हठ बनाया था, उसका स्वरूप संकीर्ण बनता चला गया
निष्कर्षतः यह कि चाहे समाज शास्त्र मनुष्य जीवन अथवा विश्व का जो भी व्यावहारिक रूप
का स्वरूप रहा; पर जब तक, व्यक्तिनिष्ठा-जातिनिष्ठाओं को लेकर बना रहेगा तब तक
समाजव्यवस्थाएं भले ही बनती रहें, व्यक्ति का व्यक्तित्व या मानव समाज उस रूप और सीमा
तक ही अपने समाजव्यवस्था अथवा अपने को देखता या समझ सकता है। अतः यदि
समाजव्यवस्था को सुंदर रूप देना है। समाज का यदि सुंदर स्वरूप, कल्याणकारी स्वरूप लाना हो
अथवा लाना चाहे समाज! मात्र व्यक्ति-निष्ठा या जातिनिष्ठता अथवा संप्रदायनिष्ठता
आधारित रूप, रूढ़ि-वादी स्वरूप समाप्त हो सके, उसके स्थान पर एक मानवीय गरिमा,
विश्व कल्याणार्थ मानवीय दृष्टिकोण जब समाजशास्त्री अथवा जो व्यवस्था दे रहा, व्यवस्था
समाज को प्रदान करने का प्रयास करने वाले मनुष्य जन जब तक नहीं सोचेंगे समाजव्यवस्था
का आधार यह हो, मानव मात्र को एक रूप में देख कर उसके लिए समाजव्यवस्था समाज-
शास्त्र निर्माण कर ही न सकेगा वह समाज का उत्थानकारी रूप, समाज का--विश्व-समाज
निर्माण का रूप न होकर संकुचित रूप ही समाजव्यवस्था का स्वरूप बना रहेगा; पर इसके
पर मानव समाज को मानव जीवन अथवा मानव मन को जब तक इन सब संकीर्णताओं ऊपर
उठ कर समष्टि-चेतना स्वरूप में मनुष्य मात्र दृष्टि नहीं देता-देखता, विश्वरूप, रूप,
रूप, विराट्, विराट्, विराट्--इन स्वरूपों द्वारा वह, पर से परे तत्व अथवा चेतना
रूप समष्टि का रूप न समझे; परिणामतः, जब तक वह न समझेगा तब-तक! वह केवल
रूप ही प्रत्यक्ष होकर संकीर्ण बनता चला जायगा
अतः, समाज और उसका, उस समाज का जो व्यावहारिक दृष्टिकोण बन सकता
उस रूप तक वह नहीं पहुँचेगा, जब तक वह उस परम स्वरूप को, जो सत्य रूपी तत्व
समाज का समाजशास्त्रादि या अन्य शास्त्र जिनका भी रूप समझा जाता, व्यावहारिक रूप
अथवा जो समाजशास्त्रा मानव मन द्वारा निर्मित समाजव्यवस्था के व्यवस्थापक या ऋषि
जन या व्यवस्थापकगण जो सोच कर गए थे। उनका तात्पर्य, उस समय व्यावहारिक स्वरूप का था
रूप में सनातन रूप से जो नियम प्रतिपादित, उस समय व्यवस्था के लिए बनाए गए थे
, इसलिए उनको सनातन मान कर के ही जो समाज शास्त्री उस पर आधारित व्यवस्था बना
रहे हैं वह समय बीत जाने पर संकीर्ण बनती जाती है; परिणाम तो यही होगा समाज
अथवा मानव जीवन संकीर्ण बनता जाएगा या समय पर वह रूप इस सीमा पर पहुंच कर
समाप्त होगा ही? इसके लिए उपाय क्या हो यह सोचें
एक विचार रूप तो यह बना कि समाजशास्त्र का सिद्धांत ही बदल दिया
जाए; परिणामतः जो रूप सनातन या मानव जीवन मूल्यों का या सनातन रूप का था
उस तत्व न मान कर केवल व्यवस्था को रूप देते चले गए जिसके परिणाम स्वरूप भी नए
रूप नए समाजशास्त्री बदलते गये
हां, इतना तो हुआ समय समय पर जो अवतारी पुरुष या महापुरुष न हुए, उन
महापुरुषों द्वारा अपने समय में मानव जीवन और समाज को दिशा प्रदान करने का प्रयास
अवश्य ही उस समय जिस रूप स्वरूप विशेष काल विशेष में उस चेतना का विस्तार रूप
चाहा, उतना रूप निखरा
जब उस रूप को लेकर जो जो भी व्यवस्थाएं बनीं या व्यवस्थाएं जन रूप समाज
द्वारा या तो समाजशास्त्र रूप दिया गया, परिणामतः उस समय कुछ न कुछ समाज का
व्यक्तित्व निखरा और आगे दिशा मिली
रूप तो परिवर्तनशील रहा और रहेगा भी, समाज या देश जब तक रहेगा संशय बना ही
रहेगा सिद्धांत या जो रूप सोचा गया? समाज का स्वरूप कौन संभाले कि जिससे वह सनातन
दृष्टि को लिए रहे, समाज व्यवस्था समाज का स्वरूप जन का रूप भी निखरता
रहे? उपाय यही हो सकता कि जो भी समाज, या जो व्यक्ति न हो समाज को दिशा
प्रदान करे तो वह ज्ञान का प्रकाश दे।
101

जब यह सब कुछ परमात्मा का दिया हुआ विद्यमान रहता हुआ, इस मनुष्य शरीर
रूप उत्तम रथ द्वारा जिस ईश्वर रूपी गन्तव्य स्थान पर पहुंचना था उस गन्तव्य स्थान
परमात्मा रूपी घर को छोड़ कर उल्टे रास्ते पर चला कर जिस प्रकार रथ रूपी घोड़ों--
इन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों, मन, बुद्धि--का संचालन या निग्रह न हो, तो परिणाम यही
होगा जैसा अन्धे चालक सारथी संचालन के रथ का या तो विध्वंस रूपी विनाश
रूपी-दलदल में पड़ कर नष्ट हो जायेगा; परमात्मा साक्षात्कार रूप परम आनन्द रूपी;
मोक्ष-धाम को छोड़कर यह जीव नरक भोगेगा
इसलिये शास्त्र का कहना है जिस प्रकार मनुष्य को, उस परमात्मा का दिया हुआ
सब कुछ रथ रूपी साधन का ठीक-ठीक सदुपयोग या उपयोग न करने से तथा उस रथ रूपी
मन का भी निग्रह न हो सकने के कारण जो मनुष्य अपने उस चरम लक्ष्य परमात्मा-प्राप्ति?
सर्वोत्तम स्थिति अर्थात् मोक्ष को न प्राप्त होकर, या उस रथ पर चढ़ कर अपने घर पहुंच
कर सुख भोग न कर सके--तो परिणाम यही हो कि भवसागर रूपी संसारी दलदल में
वह पड़ कर नष्ट हो जाय तो, वह परमात्मा का दिया हुआ यह मानवरूपी साधन, या
जिस पर वह स्वयं बैठा परमात्मा के साक्षात्कार के निमित्त साधन बनकर आया था यह सब
व्यर्थ हो जायगा या उस मन-रथ पर चढ़ कर संसार में, या उस रथ पर बैठकर केवल
अधोगति कुयोनि ही; भुगतता हुआ वह कष्ट को ही भोगता हुआ भटकता रहेगा
सो, सांसारिक विषयों का ही भोग करे, वासनाओं का ही शिकार रहे,
जिससे मन का नाश न होकर, नये-नये जन्मों का कारण बन सके, कर्मसंस्कार
एकत्र होते ही रहें जिससे उस जीवात्मा सारथी को आवागमन के बन्धनों में
बंधना ही पड़े तो परिणाम यही, कि उस जीव रूपी सारथी को परमात्मा के
निकट न पहुंचकर, न मोक्ष को ही; प्राप्त होकर संसार के इस गन्दे नाले रूपी दलदल
या जन्म मरण रूपी भव-सागर में पुनः-पुनः कष्ट ही सहना
जिस तरह सारथी बुद्धि का काम है; घोड़ों को ठीक तरह से
सम्भाल कर रखना जिससे रथ अपनी राह पर ठीक-ठीक चले जिससे रथ में बैठा
हुआ स्वामी अपने अभीष्ट स्थान तक पहुंच सके, उसी तरह से जीवात्मा सारथी का
कर्त्तव्य होना चाहिये कि परमात्मा रूप स्वामी को, जो इस मानवरूपी रथ में बैठा हुआ
है, परमात्मा तक पहुंच कर मुक्ति प्राप्त करे। यदि ऐसा न किया गया तो
उसका यह शरीर रूप रथ सांसारिक दलदल में फंसकर नष्ट हो जायेगा।
जिस प्रकार यदि मन पर नियन्त्रण न हो सका, तो परिणाम यही होगा
जैसा किसी अन्धे सारथी के हाथ में घोड़े छोड़ दिये जायं, तो वह घोड़े
जिधर मर्जी होगी उधर ही ले जाकर खाई में पटक देंगे! ठीक इसी तरह
विवेकहीन मन मनुष्य को अपनी इच्छा के अनुसार ले जाता है, सब प्रकार की
दुर्दशा करता हुआ नष्ट कर देता है, अतः इस पर पूर्ण संयम रखना ही श्रेयस्कर
होगा
इसके लिये यह उपाय बताया गया कि, बुद्धि रूपी सारथी को ठीक प्रकार शिक्षा
दी जाये जिससे कि वह, सही काम करने में समर्थ हो सके ।
यदि बुद्धि रूपी सारथी, परमात्मा रूपी मालिक की आज्ञा में रहेगा
और मन रूपी लगाम को खींच कर रखेगा, तथा इन्द्रियों को, सांसारिक सुख-भोगों
की ओर जाने से रोकेगा
तब ही यह आत्मा रूपी जीवात्मा इस भवसागर रूपी भवचक्र से छूट कर परमात्मा के
उस आनन्द को पा सकेगा, अन्यथा यदि बुद्धि रूपी सारथी ठीक न होकर मन के आधीन
हो गया, फिर तो मन रूपी लगाम ढीली होकर इन्द्रियां रूपी घोड़े रथ को उस दलदल
में गिरा देंगे और आत्मा रूपी स्वामी का पतन होकर वह कभी परमात्मा को प्राप्त
न कर सकेगा और न उस परम आनन्द को प्राप्त कर सकेगा।
अतः, जीवात्मा रूपी स्वामी को, बुद्धि रूपी सारथी को ठीक मार्ग पर चलने
के लिये प्रभु की शरण में जाने को कहना चाहिये; ताकि जीवात्मा रूपी जीव,
इस भव सागर पार लग सके। क्या जीव को जन्म-मरण रूपी चक्कर से छूटना ही अभीष्ट
नहीं है? क्या वह इन सब जन्म-जन्मान्तरों के कष्ट से छुटकारा नहीं पाना चाहता? अवश्य ही
पाना चाहता है। यदि पाना चाहता है तो उसे अपने इस मानवरूपी रथ को, सही
मार्ग पर चलाना होगा ताकि वह इस सांसारिक दलदल में न फंसे और अपने अभीष्ट
परम धाम वैकुण्ठ को प्राप्त कर सके। ईश्वर की कृपा से सब काम सिद्ध हो सकते
हैं यदि मनुष्य, न उस मार्ग को! त्याग ही करेगा
102

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103

विचारशीलताका, जिससे प्रत्येक मनुष्य यह अनुभव कर सकता तथा जान और समझ सकता कि मुझ जैसा
सब कुछ ईश्वर प्रदत्त
ईश्वर प्रदत्त शक्तिके दुरुपयोग द्वारा मनुष्य पर नियन्त्रण कर सकनेका भ्रम और दम्भ उसके जीवनका
विकराल विषाक्तस्वरूप बनकर खड़ा हो जाता है। जिसका परिणाम होता है कि वह दम्भ ही व्यक्तिगत
तथा सामाजिक सुख शान्ति तथा सन्तोष और प्रीति प्यार व रस को नष्टभ्रष्टकरके मानव जीवनका सारा
स्वाद ही समाप्त कर देता है। इन्सानियत-शून्यता! हर क्षण भय व्याप्त रहेगा विनाशका!
विनाशका भय उसका ही संहार कर देता है। इस पर भी मानव यदि उस ईश्वरीय रस और सत्यताको
समझ न सके, अथवा उस समझका ही दुरुपयोग कर सन्मार्गके स्थानपर विपथगामी हो जाय तो
भाई, जहां चिन्तन समाप्त हुआ, अथवा जो केवल स्वार्थमयी दृष्टिकोण बना कर विचारनेका
प्रयत्न मात्र हुआ तथा जिसे मात्र यह स्मरण रहा कि संसार का सब कुछ मेरे भोगका साधन मात्र है
और उसके लिए, केवल यह विचार स्वाभाविक और सत्यनिष्ठ मान लिया गया कि, प्रत्येक की
चेष्टा सफलताका, पद, धन और वैभवका ही नाम मात्र रह गया। उस सफलता में सत्यता तथा शुद्धताके
विचार कितने उपयोगी समझे गये अथवा न समझे जा सके। इस पर विचार करने की अपेक्षा, स्वार्थपरायणता
इतनी भयानक हो जाय कि सारा जीवन मात्र स्वार्थका पोषक और विचारहीनताका ही रूप बन
जाय तो फिर उस प्रभु प्रदत्त विचार-शक्ति का प्रयोजन ही क्या रह गया, जिसके
अभाव मात्र मात्र से, नर का पशुके रूप में रूपान्तरित हो जाना संभव है? विचार शक्ति समाप्त
होगी, विचारहीनता जन्म ले लेगी तथा उस विचार हीनता, वासना का ही रूप धारण कर सब कुछ
अपने भोगका अंग मान बैठेगी और तब मनुष्य मनुष्यताके स्तरसे गिर कर पशुताके स्तर पर आ कर
विचरण करेगा, वासनाओं तथा इच्छाओं का, केवल वह दास--गुलाम बनकर रह जाय इसका
क्या
उत्तर हो यह बात क्या है, या इसके का रूप क्या है? वासनाओं का दास बन कर,
वासनाओं का रूप क्या होगा इसका जो रूप दिखाई देगा वासनाका वह स्वरूप और भयानक
रूपान्तरित हो वासनाके ही रूप स्वरूप धारण करेगा।
मानव तो केवल विचारहीनता का ही नाम वासनाका होगा या वासनाका ही, केवल
वासनाओं का सम्मिश्रण रूप ही यह रूप धारण करेगा क्या, विचार ही वासनाका स्वरूप
है, वासनाके वशीभूत होकर मनुष्य जो कुछ कर्म करता अथवा विचार कर बैठता अथवा उस
के सब विचार विचारहीनता बनकर रह जायंगे? उस अवस्था को न तो कोई विचारशीलता कह
सकेगा? न उस रूप को न मन, बुद्धि तथा न उस कर्म, वचन का रूप, जो वासनाके वशीभूत हो,
उस वासनाका स्वरूप होगा?
सारा स्वरूप ही वासना! वासनाका जो रूप ही उस रूपमें दिखाई देगा
वह विचारहीनता वासनाका ही रूप बन कर खड़ा हो जा कर सारे जीवनका रस समाप्त
कर विनाशका ही स्वरूप बना देगा कि नहीं? उस अवस्था में वासना की तृप्तिका भी अन्त
हो चुका होगा तथा वासना ही उस समय केवल--एक इच्छा, जिसके लिए न केवल भोग का
भाव, वासना, तृष्णा, सब कुछ मिटकर केवल एक विचारहीनताका ही रूप बन कर उस
को समाप्त कर देगा? वासना क्या? वासना तो उस अवस्था को वासना भी
वासना के रूप में स्वीकार न किया जाय, वासना का जो स्वरूप अपने आप में बन
वासना के स्वरूप का विचार ही, वासनाओं का प्रभाव ही सब कुछ समेट समाप्त
वासना का केवल रूप, वासना; तृष्णा वासना बन कर नहीं रहसकती, न वह
वासना तृष्णाका रूप धारण कर सकती है। जो इस तरह की स्थिति होगी वहां वासना
का ही साम्राज्य होगा तथा, उस समय की वासनाका केवल एक ही विकरालरूप
भयानक स्वरूप होगा कि जिस अवस्था में मनुष्य अपने विचार की क्षमता को
शून्य बनाकर--उस रूपमें जहां इच्छा तथा जो वासना तृष्णाका रूप धारण कर सब
कुछ नष्ट कर देगी जिसका स्वरूप होगा, वासना का रूप केवल वासना बनकर, एक
मात्र इच्छा तृष्णा वासना बनकर केवल उस सीमा पर्यन्त विचारहीनता को ले जा
कर उस शून्य रूप में उस वासनाका जो स्वरूप प्रस्तुत होगा वह, केवल एक वासना
मात्र ही सब कुछ बनकर रह जायगी।
आज तक के इतिहास में भी हम केवल वासनाके साम्राज्य को ही सब रूपों में
विनाशका रूप समझकर विचारते व देखते आये। वासना साम्राज्य रूप धारण करके
विनाश, केवल वासना विकराल रूपमें ही विनाश का कारण न होकर उस सीमा तक
भी चला गया कि जहां वासना अपने सम्पूर्ण प्रभाव द्वारा केवल अपने स्वरूप को ही
भोग कर वासनाके नाश का कारण बनकर अन्त में उस रूपमें शेष रह जायगी जो
विचारहीनताका रूप ही बन कर रहेगा, जो उस समय के वासनाके उस रूप द्वारा
रूपान्तरित हो!
104