अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
होगा? सुनो, इस आत्मकथा लेखक लोग का इतिहास भी तो समझो। कभी-कभी तो
होगा? सुनो, इस आत्मकथा लेखक लोग का इतिहास भी तो समझो। कभी-कभी तो
ऐसा स्वर सुनाई पड़ेगा जिसके हर एक शब्द को सुन कर पाठक भय विह्वल हो उठेगा या
ऐसा स्वर सुनाई पड़ेगा कि वह, रोने लग जाय। सहानुभूति का भाव तो जागना ही चाहिये
हृदय से। सुनो
देखो, प्रत्येक आत्मकथा लेखक अपने सुख का वर्णन जितनी प्रसन्नता पूर्वक करता है
सम्भवतः दुःख का उल्लेख वह उतनी प्रसन्नता से न कर सके। यदि दुःख का उल्लेख वह
कर भी देवे, उस अवस्था को वह दुःख न समझेगा या समझेगा भी! तात्पर्य यह प्रत्येक
आत्मकथा में? लेखक ने तो अपने सुख को सब सुखों से बढ़कर माना ही, दुःख
को, प्रत्येक दुःख को एक प्रकार का सुख ही मान कर चला, लेखक तो यह सदैव चाहेगा
प्रत्येक दशा में कि वह, चाहे या न चाहे लोग उसकी प्रशंसा ही करें और उसका रोब
मान कर चलें सब लोग अथवा संसार; लेखक तो यह कभी चाहेगा ही न कि कोई
उसकी पोल खोले या कोई उसके छिद्रों की खोज करता फिरे या कोई उस पर छींटा
कसे; वह सब से तो यही चाहेगा! पाठकगण, आत्मकथा तो हर कोई लिख लेता होगा
पर सच तो यह लिखना प्रत्येक जन के वश की बात नहीं हो सकती। सच और झूठ, इन
दोनों पक्षों को, चाहे वह जन कितना बड़ा क्यों न हो लेखक, यह लिखना
आत्मकथा के हर लेखक प्रत्येक आत्मकथा रूपी ग्रन्थ में कभी नहीं सम्भव कर
सकेगा
आत्मकथा क्या सचमुच लिखा गया! क्या आत्मविश्वास प्रत्येक जन लिख
सका है या सच मान कर अपने को त्याग कर सकेगा या त्याग सकेगा भी तो वह जन
जो सब कुछ त्याग चुका अथवा जिसने अ--कथ्य व्यथा को जन--जन-तक भेजा हो,
जिसने अपना सब कुछ दे कर सोचा भी कुछ हो, तो पाठक गण! आत्मकथा लिखना
हर जन का काम अथवा विचार वश का काम नहीं हो सकता और सम्भव भी नहीं, सुनो,
सुनो, कभी--तो हर एक जन आत्मकथा को, स्वयं आत्मकथा मान प्रत्येक प्रत्येक
जन के भावों को तो क्या हर जन प्रत्येक सम्भावना के आधार पर भी नहीं लिख
पा रहा होगा या तो केवल उस बात जिसके आधार पर, वह स्वयं चलता ही अथवा
उसने सब पर उस बात अथवा उस भाव को लादना चाहा होगा। और यह भी तो
सच, कि जब--तो जन आत्मकथा के नाम पर भी अपने आप को नहीं समझ पाता होगा,
वह तो स्वयं एक जन के आगे आत्म--कथा कहने का भी साहस नहीं कर पाता होगा
या समझा सकेगा! इस का भी रहस्य छिपा रहा न हो। जब भी जन अपने को
आदरणीय समझ बैठा अथवा किसी को बना बैठा हो तो समझ लीजिये सब, प्रत्येक
बात सत्य मान कर चला जा रहा होगा न?
आत्मकथा पढ़ना सहज जन सम्भव
पर उस जन द्वारा लिखा हुआ प्रत्येक जन के लिये आदरणीय होना कठिन
जान पड़ा
प्रत्येक जन अपने रूप आकार को समझ कर प्रत्येक ही जन से आदरणीय हो
अथवा ऐसा भाव प्रत्येक जन के मन उपजा करे या ऐसा समझ प्रत्येक ही जन करे।
प्रत्येक ही समय सब अपने सुख साधन रूप में देखना चाहे आत्मकथा को तो
आत्मकथा न कह कर जन को आत्मकहानी कहना उचित होगा।
स्वयं का आत्मकथा या प्रत्येक का जन कहा जा सकता है। आत्मकथा का रूप तो
सुनो, इस आत्मकथा को भी समझ कर ही प्रत्येक को समझना चाहिये कि यह रूप
ऐसा सब विचार प्रत्येक आधार को ले कर बन सका हो अथवा न बन सका
पाठक समझता समझे चाहे जन उस बात को समझे आत्मकथा-सम्बन्धी
रूपान्तर हो तो सब जन न केवल--तो आत्मकथा रूप को समझेगा ही, पर
आत्मकथा ग्रन्थ को भी जन समझेगा; आत्मकथा प्रत्येक जन समझे न
समझे; प्रत्येक आत्मकथा ग्रन्थ एक कथा--कहानी न हो सकेगा"
"कथा-कथन के नाम जन-जन के मन का भ्रम दूर करना प्रथम तो प्रत्येक
ग्रन्थ लेखक का कर्तव्य या आधार होना चाहिये ग्रन्थ द्वारा"
"प्रत्येक, हर दशा में इस रहस्य जन को; हर प्रत्येक बात को समझ ले,
ऐसा सोचे"
यह सोच कर कह कर
जन रूप का मन सब प्रकार शांत समझ कर बोला पाठक।
जन बोला सुनो, जो बात कहना है, आत्मकथा रूप सुनो; प्रत्येक को सुख तो
मिल ही रहा सब कुछ पढ़ने पर क्या केवल सच ही जान, प्रत्येक को तो केवल
असत्य ही मिलेगा
48
जब जीवन का रस उडे, प्रार्थना का संस्पर्श पाकर
तब समझो कि, प्रभु कृपा तुम्हारे ऊपर
केवल प्रार्थना सुनकर हम रस मग्न अथवा विह्वल नहीं होते, प्रार्थना गाकर मस्त होना, यह भक्ति
नहीं, केवल भक्ति का यह आभास भर स्वर ताल युक्त संगीत-रचना श्रवण का उल्लास
मात्र, गायन कला मात्र का रसपान मात्र कहा जावे तो बहुत ठीक रहेगा, भक्ति तो
वह लय; केवल भक्ति स्वरूप रस, शब्द का स्पर्श, संगीत रचना लय रूप रस का पान कराती
रहकर उस अनंत सत्ता का स्मरण कराती है, वह स्मरण क्षणिक अथवा दीर्घकालीन
रहकर विलीन हो जाने वाला नहीं रस, न विकार रह, न भय युक्त विचारशीलता हो, राग-
द्वेष, काम-क्रोध का रस सब वासना तिरोहित हो कर केवल एक अपनी मूल सत्ता तथा
अस्तित्व का न हो कर विराट् चेतना केवल... ॥
वह रस विह्वल रूप ही भक्ति का सच्चा प्रभाव कहा जावे
केवल प्रार्थना का पाठ मात्र, केवल मंदिर निर्माण ही बहुत उत्तम स्थल कहा गया मगर
उस रूप तथा क्रिया का-अभ्यास मात्र करके ही सब-कुछ समझ बैठना तथा सोचना मात्र है
इस भाव युक्त प्रार्थना का प्रभाव आंतरिक रूप से जीवन सुधार तथा रूप तथा सत्य
जीवन तथा प्रत्येक समाज के सभी प्रकार हित, उन्नति संबधी बात; इस आंतरिक प्रभाव
प्रभाव से जीवन सुधरता है, केवल विचार सम्बंधी सुधार प्रत्येक समय सब के रस का आधार
बनकर जीवन को हर दम रूप देता है; विचार प्रभाव से मानव जीवन सब प्रकार सुखी
तथा समृद्ध, जीवन सुखद आधार बन कर सुख का न रूप बनता; प्रत्येक समय रस आंतरिक
रूप विचारधारा से प्रवाह बन कर बहे, जीवन सत्य का रस पाकर
अपने जीवन का प्रभाव भी हर आंतरिक प्रभाव को सब का सब सुख प्रदान कर सकता
तथा स्वयं सम्पूर्ण रूप से उस रस से विह्वल हो कर उस सत्ता का दर्शन करता रहता
जीवन का स्वभाव बन ही जाता केवल स्वरूप समझ कर.प्राकृतिक अनुकूलता के
इन सभी विचारशीलताओं द्वारा प्रार्थना चिंतन द्वारा विचार शक्ति प्रत्येक सम्बन्धी स्वभाव
प्राकृतिक सब प्रभाव का रस पा सके, यही विचार व प्रेरणा मानव को सर्वव्यापक
उस परमात्मा के सत्य मार्ग अथवा रूपी दिशा में? प्राकृतिक सुख अथवा न केवल उस
प्रभु परमात्मा के सत्य मार्ग अथवा दिशा अथवा
केवल एक-विचार से सब का रूप ही बना है, इस दिशा धारा का प्रभाव सब
प्राकृतिक ही तो है तथा प्रत्येक अवस्था के हर रस का हर दम भाव बना रहता है
सब संसार की हलचल केवल मन के ही प्रभाव का सहारा पा कर चलती है, प्रत्येक
मन विचारशील कार्यशील बना हुआ इस मन को सब प्रकार से शक्ति प्रदान कर
इस का संचालन ही करता हुआ चला है, प्रत्येक रूप विचारशीलता कार्यशीलता प्रभावशील
ही रूप प्रदान करता
केवल भाव अनुसार ही मानव का हर दम हर आंतरिक कार्यशीलता का रूप बनता ही
रहा, प्रभाव कार्यशीलता तथा विचारशीलता केवल एक प्रभाव मात्र का साधन बन कर
सब को इस बात की प्रेरणा देता
"भगवान्, जो कुछ भी मन अथवा चित्त कह रहा है; वह केवल अपने ही मन की
प्रेरणा स्वरूप"
"सत्य स्वरूप, प्रत्येक रूपी भावना का आचरण केवल प्रत्येक समय केवल
अपने भाव का प्रभाव मात्र कहलाया"
इसके स्वरूप का प्रभाव सम्बंध
सब प्रकार से जीवन तथा व संसार समस्त भाव तथा कार्यशीलता
विचारशीलता का प्रभाव ही तो है, जो सब परमात्मा सत्य निराकार स्वरूप का
साधन बन सकता ही नहीं, केवल उस प्रभाव का स्वरूप ही विचार का साधन बन कर
प्रत्येक प्रकार की वासना रूप मन का, सब का स्वरूप बना रहा अवश्य है, मगर प्रभु
सत्ता का न कभी भी सत्य दिशा-निर्देशन विचार रहा! जो कि मानव को हर दम सुख
सम्बंध प्रदान करता रहे; वह केवल न जाने क्यों मन-प्रवाह से सब कुछ सोचता रहा!
केवल भाव अनुसार रस स्वरूप बन सका; प्रभाव का अवलोकन सब प्रकार किया
भी, मानव उस प्रभाव तथा समस्त दिशा से हर दम रस का लाभ उठाता रहा, यह सब
विचार ही; हर मानव केवल रस धारा के काम-क्रोध तथा लोभ युक्त होकर,
कार्यशील, हर दम ही रहा!
"प्रभु प्रत्येक प्रभाव रूपी दिशा का विस्तार केवल प्रत्येक समय केवल मानव
मात्र, दिशा धारा कहलाया"
"हर भाव सत्य, हर दम सत्य दिशा कहा? सदा आधार ही सत्य सब तन-मन
का?"
49
जब यह बात संसार जान गया कि राम जैसा धर्मात्मा भी विपत्ति को न्योता दिए बिना रहता,
विपत्ति पड़ी, विपत्ति भोगने विवश हुए; तब सामान्य मानव का क्या कहना जिनके पग-पग प्रमाद
भरा जीवन ही अपराध बनता रहता गया जिसके कारण पग-पग वे प्राकृतिक दंड के रूप तीन प्रकार
अर्थात् आधिभौतिक और आधिदैविक व आध्यात्मिक नाम से जाने जाते कष्टों को भोगते चले आ रहे
भी भोगते चले जाते न हों; उनका कोई ऐसा उपाय तो हो न हो, पर संतोष न कर
"जो कुछ होगा, सो सब देखा जायगा न? पहले से सोचकर क्यों अपने सुख को छी-छीन
करें?"
देखा तो सब कुछ जायगा ही फिर ऐसा क्यों? पहले से सचेत हो छी-छन को, दुःख-
दारिद्रय को रोका न जाय? असम्भव बात तो थी नहीं किन्तु मानव समाज ने इस दिशा
पग ही न उठाये किन्तु-परन्तु का खेल खेलते रहकर समय बिताता रहा कि एक अध्यात्मवादी,
धर्म रक्षक, जो अध्यात्मवाद को ही सत्य, केवल सत्य मानता था समझा, जो
अध्यात्म का उद्गाता
जिसने देखा कि राम तक विपत्ति भोगने विवश हुए तब उनका अध्यात्म
कैसा जो इस प्रकार के राम को दुःख दिया न टले?
"कैसा अध्यात्म जो अपने परम भक्त को विपत्ति से बचा न सके? सो केवल मन बहलाव
बनकर रह गया जीवन का साधन नहीं"
जिसने केवल विचार तक नहीं दिया कि इस विपत्ति को मिटाने वैज्ञानिक
विज्ञान का सहारा ले दुःख दारिद्रय मिटा सुख साधन को क्यों जुटाएं?
जिसने वैज्ञानिक की खोज द्वारा सुख का साधन जुटा भी दिया पर वह केवल शारीरिक
सुख बनकर रह गया पर भीतर मन तो तब तक केवल अशान्त ही भटकता रहा; सुख साधन
भी मानव को सुख नहीं देकर केवल अशान्ति देकर सुख छीन ही तो रहे थे। तब विज्ञान के
आधार पर केवल सुख भोग ही तो हो सकता था पर भीतर का सन्तोष नहीं; तो विज्ञान
द्वारा सुख साधन पा कर सब सुखी हो सकते यह असम्भव ही बना रहा। साथ ही यह विज्ञान
ऐसा बन बैठा कि केवल धन से धन द्वारा खरीदा जा सकता था। जिसके पास धन न था
उसके लिए! तो वैज्ञानिक खोज का मानव को क्या सुख मिला जो साधन सब खरीद
सकने असमर्थ ही बना रहा
अध्यात्म से शांति न मिली; केवल जप, पूजन मात्र से शांति हो भी सकती थी,
केवल मन का वहम मात्र
फिर विज्ञान का सहारा खोजा गया क्या वह सुख दे सका?
जो भी था वह बाहर तक सिमट कर रह गया। भीतर की अशान्ति को मिटाने
विज्ञान के पास कोई उपाय न था। मानव सुखी अध्यात्म से रह नहीं सकता था; फिर
धीरे-धीरे विज्ञान का सहारा बढ़ तो चला, लेकिन अध्यात्म को छोड़ना पड़ा नहीं; सो
अध्यात्म का आडम्बर, पाखण्ड तो बढ़ता ही चला गया किन्तु उस आडम्बर
को भी सुख न--देना ही सम्भव बना
मानव को विज्ञान धीरे-धीरे पग, अध्यात्म धीरे-धीरे ढहता गया, पर
परिणाम दोनों का सन्तोष जनक न निकल कर और अशान्तिकारक सिद्ध हुआ; जिसे
केवल तन तक सुख मिला; केवल भोगों ने घेरा; पर मन फिर भी अतृप्त ही रहा। इस
प्रकार अशान्त मानव ने विज्ञान को सुख साधन माना जरूर, पर सन्तोष नहीं पाया!
तब विज्ञान की खोज बेकार सिद्ध होने लगी, जिसे अध्यात्म ही! तो
भी नहीं भुला सका क्योंकि वह भी केवल बाहर तक सोच कर ही रह गया था।
"सो दोनों ही बेकार सिद्ध हो गए ऐसा ही कहा जाय"
तब एक बात यह विचार विचार कर भीतर सोच समझ कर उठी; केवल भोगी
जीवन ही सब कुछ नहीं कहलाता बल्कि एक संयम भरा जीवन, जिसमें हर क्रिया
अध्यात्म को समेट कर ही हो सकी थी, न कि केवल बाहर भटक कर सब कुछ पाया
जायगा?
"आध-आध या कहें दस-दस पर शत का जो मेल बना उसी ने समाज
रचना आरम्भ कर समाज को सही दिशा प्रदान की होगी"
क्या यह अध्यात्म इस समय चल सकता था जब सब कुछ लूट रहा था, सब
मिटा जा रहा था? तब ऐसा विश्वास केवल विचार से नहीं हो सकता था जिसके
लिए किसी समाज रचना की खोज के बिना जीवन अधूरा रहता था और उस
वैज्ञानिक आधार आध्यात्मिक धीरे-धीरे रूप से समझना ही उस समय सम्भव समझा?
जिसे हर युग का सच कहा जाय।
केवल विज्ञान उस तक नहीं पहुंच सका था; तब केवल अध्यात्म
बिना विज्ञान सत्य के नहीं पा सकता; तब सब अध्यात्म खोज वैज्ञानिक
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52
ब्राह्मणों का काम ज्ञान, संन्यास देकर दूसरों का काम कर न ले अथवा संन्यासी
करेगा, न अन्य सम्प्रदाय चलेगा
ऐसा न्याय जहां वर्तमान
सरकार अपनी प्रजा का हर एक जन का हित करे
सो सब न्याय से धर्म सम्मत
न कोई राजा हो, न कोई प्रजा हो, सबही प्रजापालक बने
ऐसा भाव जहां जन का--मनुष्य समाज का हर एक का धर्म
सब एक रस हो, तब सुख शांत लय
सरकार अपनी प्रजा का हर एक जन का करे! सो सब न्याय से धर्म सम्मत सोई कर्म-योग
इसका नाम कहा, संन्यास का हर एक समाज का धर्म है, तब सुख शांत
व्यवस्था जहां समान वर्तमान वहां सब तरह का आराम मिलेगा
संन्यास साधन से जब जन को ज्ञान लाभ प्राप्त होगा, तब ज्ञान को जो ज्ञान
संन्यास कहा जाता सो ज्ञान, वह काम कर लेवे; ज्ञान सब सम्प्रदाय लय
सब ज्ञान समान एक स्थान में रहे, ज्ञान-योग का लाभ जो संन्यास--यथार्थ
संन्यास ज्ञान कहा गया सोई! सो सब सम्प्रदाय लय करके सब संसार को ज्ञान से भर
दे, संन्यास का रस, संन्यास का सुख सो सब जन को दे--तब समाज व्यवस्था ज्ञान से भर कर्म-
योग में ज्ञान लय--यथार्थ सब ज्ञान-योग साधन से जन-जन को ज्ञान दे; संन्यास
ज्ञान का अधिकार जो संसार में त्याग--का काम अथवा संसार का काम ज्ञान से होगा जहां
संन्यास को ज्ञान का हर स्थान मिलेगा वहां सब लोग ज्ञान योग को ज्ञान करके
सब ज्ञान को ज्ञान का जन जन को ज्ञान देगा सोई न लेवे; ज्ञान सब सम्प्रदाय
सब सम्प्रदाय जन को ज्ञान से भर देवे, व्यवस्था सब को सम्प्रदाय व्यवस्था से
संन्यास को जो सम्प्रदाय समाज का जो सम्प्रदाय जन सब ज्ञान लय करके जहां
जो ज्ञान व्यवस्था का रस सब व्यवस्था लय कर ज्ञान देगा, ज्ञान सम्प्रदाय सब
ज्ञान को न लय करेगा
ऐसा ज्ञान सब काल सब जन--समाज समाज का हर जन को मिले! सो सब जन
ज्ञान लाभ कर रस पावे, समाज का हर एक प्रकार से ज्ञान ले, तब सब जन
सब प्रकार से सुख शांत होकर ज्ञान लाभ करे संन्यास व्यवस्था
सब समाज को सुख शांत का व्यवस्था हो जो सम्प्रदाय जन-जन को ज्ञान
समाज व्यवस्था को सब प्रकार से ज्ञान से भर देवे, तब सब जन
सब एक रस होकर सब ज्ञान लाभ प्राप्त करेंगे सो काम ले ज्ञान कर
ऐसा न्याय जहां वर्तमान सरकार
सो सरकार, सब जन को जो सम्प्रदाय होगा, सब जन ज्ञान लय करके जो
ज्ञान सब को प्रदान करे, संन्यास ज्ञान सदा वर्तमान रहे, सो ज्ञान काम करेगा
अथवा सब जन का रस एक हो, तब सब समाज सब प्रकार से समाज का जन
जो सम्प्रदाय जन सब का हर एक काम करेगा संन्यास समाज का जो काम सब का रस
सम्प्रदाय जन सब का जो ज्ञान सम्प्रदाय सब को मिले
अथवा सब ज्ञान का ज्ञान लाभ जो जन को हर तरह ज्ञान होगा अथवा ज्ञान
जन-जन को जो ज्ञान लाभ न जन को प्राप्त होगा सो जो सब सम्प्रदाय का प्रचार
सो ज्ञान का काम करेगा सो रस
सब सम्प्रदाय सम्प्रदाय
जो जो सब रस सब प्रकार सम्प्रदाय होगा तब सब का, रस एक हो कर, काम
का रस पावे, काम सदा न बंद हो; सो रस संन्यास
सब सम्प्रदाय सम्प्रदाय
तब सब रस सब प्रकार का सब सम्प्रदाय का जो ज्ञान सो सम्प्रदाय का ज्ञान हो!
जब तक सब ज्ञान जन का सब ज्ञान सम्प्रदाय ज्ञान जन ज्ञान सम्प्रदाय का जन रस लय कर
ज्ञान रस का जन ज्ञान सब प्रकार का ज्ञान सब रस का जन ज्ञान सब ज्ञान लय
करेगा सो रस का संन्यास ज्ञान सब सम्प्रदाय का रस संन्यास को लय करेगा,
संन्यास का संन्यास का संन्यास का सम्प्रदाय सब जन ज्ञान संन्यास का रस होगा, ज्ञान
संन्यास को न संन्यास का संन्यास का ज्ञान रस ज्ञान लय संन्यास रस को रस ज्ञान
देवे; ज्ञान सब संसार को ज्ञान का ज्ञान रस ज्ञान सम्प्रदाय संन्यास का रस लय ज्ञान
देवे; ज्ञान जन सब रस सब ज्ञान संन्यास संन्यास ज्ञान को ज्ञान देवे; ज्ञान रस सब
सम्प्रदाय लय
ऐसा समाज सब प्रकार जन--ज्ञान सब प्रकार का हर तरह से हर प्रकार का
समाज सब ज्ञान लाभ पा ले; ज्ञान सब समाज को जो प्रकार सब ज्ञान लाभ करेगा
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