अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
पृष्ठ 90, कुल 183 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण को दान स्वरूप दक्षिणा, भगवान् क भोग लगाकर
संत को भोजन कराकर; कथाकार व्यास को वस्त्र देकर, पूजन कर घर में सुख शान्ति
पाती
तथा उत्तम संतान सम्पति का लाभ पाते हुए अन्त में बैकुंठ जाकर श्री हरि के धाम को प्राप्त
होत हैं॥
पर अभागा एकादशी व्रत कथा-वार्त्ता श्रवण तो करता है पर कथा, दान
का महत्त्व न जान कर केवल उपवास को महत्त्व न मान कर भोजन-वस्त्रों की दक्षिणा
देकर कथा वक्ता तथा ब्राह्मणादिकों संग न ब्राह्मण को धन दक्षिणा देता है न स्वयं
एकादशियादिक व्रत ही कर पाता एकादशी व्रत कथा श्रवण का
यह सब देख नारद बोले, राजन जो कथाकार को उत्तम दान भेंट कर कथा श्रवण
फल को पा लेता है, दूसरा कथा श्रवण के निमित्त कथाकार को दान दे कथाकार को
प्रसन्न कर कथाकार के मुखारविंद से कथा श्रवण कर जाता है तथा, तीसरा केवल
कथा व्यास, को दान देकर ही चला जाता है! सो यह कथा का कैसा फल! इन तीनों को क्या फल
मिला कृपा कर कहो
ब्रह्मा, ने कहा राजन एकादशी का दान तो जो कर ही न सका सो क्या फल पावे जो
दान कर तथा कथा श्रवण निमित्त आया वह सब ही दान के आचरण फल को पाकर
अन्त में श्री भगवत् धाम...
हे दो प्रकार के, कथा श्रोता, राजन जो यह सब ही! या कहो पहला तो सब दे--सब
ही पावे? कथाकार का केवल जो कथा--पुस्तकादि ही पूजन कर ही कथा सुने सो,
सो तो केवल दो पग ही पुण्य फल पाता हुआ स्वर्ग को प्राप्त होता है, जो कथा कथा-
व्यास को ही दान देकर चला जाता है, स्वर्ग प्राप्त हो कर अभागा ब्राह्मण
कुल में जनम! जन्म दाता या कथावाचक की सन्तान हो जन्म लेता है सो सब फल
त्याग कर, पर कथा को कथा व्यास के सन्मुख बैठ कर जो नर वा नारी एकादशी
व्रत कथा का श्रवण व ध्यान धर करता है, वही नर, उत्तम है, इस को एकादशी व्रत
सब फल प्राप्त होत! यह ही एकादशी के प्रभाव से स्वर्ग भोग अन्त में मोक्ष क प्राप्त
होत
अब मैं अन्य नर के एकादशी कथा का प्रभाव
सब सत्य ही कहता हूँ, ध्यान धर सुनो एकादशी कथा के श्रवण से नरक
द्वार पर जा नहीं सकता जो नर एकादशी का व्रत करे, एकादशी के दिन भोजन
न कर कथा, श्रवण ही करे सो नर सब पापों से छूट स्वर्ग लोक को जाता जो नर
एक ही समय अन्न खा कर एकादशी तीन-दिन तक करता है सो, एकादशी को न अन्न
खाये; पर दो समय फलाहार कर द्वादशी को तीन-दिन का त्याग कर भोजन करे कथा
श्रवण कर, दान देकर, सो नर सब पापों से छूट
एकादशी का व्रत धारण कर धर्म का पालन करता हुआ
नर भी उत्तम सन्तति फल पा कर, अन्त काल
बैकुंठ जाता, ...
जो नर केवल दान देकर ही सब पुण्य फल पावे! कथा कथा ही धर्म कथा कथा
... फल प्राप्त होत पावे
जो नर केवल कथा ही सुने, दान न देवे सो अभागा--दरिद्री होकर नर नरक
भोग भोगता ही रहे, कभी फल नहीं
पाता नर को दान, का क्या फल? फल दाता दाता ही सो सब
फल दाता है, कथा दान महान्
सब कथा व दान, बिना कथा दान के सब दान व्यर्थ हो जाते नर दान,
फल दाता न पावे
अरे राजन, कैसा दान? दान दाता दाता ही सब नर को दान फल दाता
सो दाता दाता को सब दाता का माता-पिता कहो सब सम्पति दाता कहो जो
एकादशी का प्रसाद ग्रहण कर दान देता है, व सब के कल्याण की कामना कर नर
को भी दान दे ही देवे!
कथा श्रवण तो सब, कथा फल पावे
कथा त्याग कर, केवल कथा श्रवण
केवल, सब नर दान का फल पावे? केवल ही दान को ही! कथा श्रवण को
दान ही सब नर को दान फल दाता संशय?
कथा दान का नर सब रूप फल पावे
कथा त्याग करे, केवल दान दाता
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