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सर्वकोश
अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 183 में से

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जब यह सब कुछ परमात्मा का दिया हुआ विद्यमान रहता हुआ, इस मनुष्य शरीर
रूप उत्तम रथ द्वारा जिस ईश्वर रूपी गन्तव्य स्थान पर पहुंचना था उस गन्तव्य स्थान
परमात्मा रूपी घर को छोड़ कर उल्टे रास्ते पर चला कर जिस प्रकार रथ रूपी घोड़ों--
इन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों, मन, बुद्धि--का संचालन या निग्रह न हो, तो परिणाम यही
होगा जैसा अन्धे चालक सारथी संचालन के रथ का या तो विध्वंस रूपी विनाश
रूपी-दलदल में पड़ कर नष्ट हो जायेगा; परमात्मा साक्षात्कार रूप परम आनन्द रूपी;
मोक्ष-धाम को छोड़कर यह जीव नरक भोगेगा
इसलिये शास्त्र का कहना है जिस प्रकार मनुष्य को, उस परमात्मा का दिया हुआ
सब कुछ रथ रूपी साधन का ठीक-ठीक सदुपयोग या उपयोग न करने से तथा उस रथ रूपी
मन का भी निग्रह न हो सकने के कारण जो मनुष्य अपने उस चरम लक्ष्य परमात्मा-प्राप्ति?
सर्वोत्तम स्थिति अर्थात् मोक्ष को न प्राप्त होकर, या उस रथ पर चढ़ कर अपने घर पहुंच
कर सुख भोग न कर सके--तो परिणाम यही हो कि भवसागर रूपी संसारी दलदल में
वह पड़ कर नष्ट हो जाय तो, वह परमात्मा का दिया हुआ यह मानवरूपी साधन, या
जिस पर वह स्वयं बैठा परमात्मा के साक्षात्कार के निमित्त साधन बनकर आया था यह सब
व्यर्थ हो जायगा या उस मन-रथ पर चढ़ कर संसार में, या उस रथ पर बैठकर केवल
अधोगति कुयोनि ही; भुगतता हुआ वह कष्ट को ही भोगता हुआ भटकता रहेगा
सो, सांसारिक विषयों का ही भोग करे, वासनाओं का ही शिकार रहे,
जिससे मन का नाश न होकर, नये-नये जन्मों का कारण बन सके, कर्मसंस्कार
एकत्र होते ही रहें जिससे उस जीवात्मा सारथी को आवागमन के बन्धनों में
बंधना ही पड़े तो परिणाम यही, कि उस जीव रूपी सारथी को परमात्मा के
निकट न पहुंचकर, न मोक्ष को ही; प्राप्त होकर संसार के इस गन्दे नाले रूपी दलदल
या जन्म मरण रूपी भव-सागर में पुनः-पुनः कष्ट ही सहना
जिस तरह सारथी बुद्धि का काम है; घोड़ों को ठीक तरह से
सम्भाल कर रखना जिससे रथ अपनी राह पर ठीक-ठीक चले जिससे रथ में बैठा
हुआ स्वामी अपने अभीष्ट स्थान तक पहुंच सके, उसी तरह से जीवात्मा सारथी का
कर्त्तव्य होना चाहिये कि परमात्मा रूप स्वामी को, जो इस मानवरूपी रथ में बैठा हुआ
है, परमात्मा तक पहुंच कर मुक्ति प्राप्त करे। यदि ऐसा न किया गया तो
उसका यह शरीर रूप रथ सांसारिक दलदल में फंसकर नष्ट हो जायेगा।
जिस प्रकार यदि मन पर नियन्त्रण न हो सका, तो परिणाम यही होगा
जैसा किसी अन्धे सारथी के हाथ में घोड़े छोड़ दिये जायं, तो वह घोड़े
जिधर मर्जी होगी उधर ही ले जाकर खाई में पटक देंगे! ठीक इसी तरह
विवेकहीन मन मनुष्य को अपनी इच्छा के अनुसार ले जाता है, सब प्रकार की
दुर्दशा करता हुआ नष्ट कर देता है, अतः इस पर पूर्ण संयम रखना ही श्रेयस्कर
होगा
इसके लिये यह उपाय बताया गया कि, बुद्धि रूपी सारथी को ठीक प्रकार शिक्षा
दी जाये जिससे कि वह, सही काम करने में समर्थ हो सके ।
यदि बुद्धि रूपी सारथी, परमात्मा रूपी मालिक की आज्ञा में रहेगा
और मन रूपी लगाम को खींच कर रखेगा, तथा इन्द्रियों को, सांसारिक सुख-भोगों
की ओर जाने से रोकेगा
तब ही यह आत्मा रूपी जीवात्मा इस भवसागर रूपी भवचक्र से छूट कर परमात्मा के
उस आनन्द को पा सकेगा, अन्यथा यदि बुद्धि रूपी सारथी ठीक न होकर मन के आधीन
हो गया, फिर तो मन रूपी लगाम ढीली होकर इन्द्रियां रूपी घोड़े रथ को उस दलदल
में गिरा देंगे और आत्मा रूपी स्वामी का पतन होकर वह कभी परमात्मा को प्राप्त
न कर सकेगा और न उस परम आनन्द को प्राप्त कर सकेगा।
अतः, जीवात्मा रूपी स्वामी को, बुद्धि रूपी सारथी को ठीक मार्ग पर चलने
के लिये प्रभु की शरण में जाने को कहना चाहिये; ताकि जीवात्मा रूपी जीव,
इस भव सागर पार लग सके। क्या जीव को जन्म-मरण रूपी चक्कर से छूटना ही अभीष्ट
नहीं है? क्या वह इन सब जन्म-जन्मान्तरों के कष्ट से छुटकारा नहीं पाना चाहता? अवश्य ही
पाना चाहता है। यदि पाना चाहता है तो उसे अपने इस मानवरूपी रथ को, सही
मार्ग पर चलाना होगा ताकि वह इस सांसारिक दलदल में न फंसे और अपने अभीष्ट
परम धाम वैकुण्ठ को प्राप्त कर सके। ईश्वर की कृपा से सब काम सिद्ध हो सकते
हैं यदि मनुष्य, न उस मार्ग को! त्याग ही करेगा
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