अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 183 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्ण जी का यह भाव, जो उन दिनों अपनी माता या मौसी या किसी अन्य स्त्री सम्बन्धी
की गोद में खेलते अथवा उछलकूदते/मचलते समय था, उनकी मातृत्व-ममता का उचित या
यथेष्ट फल केवल था, सो ऐसा नहीं कहा जा सकता कि श्रीकृष्ण यशोदा को मातृत्व-ममता का
बदला चुका रहे थे। उनका भाव मातृत्व-ममता का बदला चुकाने का न था। श्रीकृष्ण का यह
भाव अपने बाल रूप द्वारा उस समय स्वयं न हो सका; पर यह तो कहा नहीं जा सकता कि
श्रीकृष्ण का यह भाव किसी के समझाने या सिखाने पर हुआ था। यह स्वाभाविक मातृत्व का
बदला था अथवा यह श्रीकृष्ण द्वारा किया गया मातृत्व का बदला था। श्रीकृष्ण ने अन्य
गोप, गोपियों को स्वयं न देकर दूसरों द्वारा दिलवाया; स्वयं, सो श्रीकृष्ण सर्वसम होने कारण, अपने
बालरूप का यश-दान तो न देकर न जाने क्या दान देते थे। यह अस्वाभाविक
ऐसी स्थिति किसी ने कभी नहीं देखी और सुनी, बालचरित्रों में तो यह स्थिति सम्भव
ही नहीं कही जा सकती। श्रीकृष्ण भगवान् के चरितामृत ग्रन्थकार भगवान् के चरित्र-वर्णन
में न जाने क्या न दिखाते यदि उन्हें यश-दान की; बालचरित्रों द्वारा तो केवल मात्र बाल भाव
द्वारा ही यश-प्राप्ति होना उचित माना जाता है। ग्रन्थकार ने इस बात को ध्यान न रखते हुए
बालचरित्रों द्वारा मातृत्व यश-दान दिलाते हुए श्रीकृष्ण को बालचरित्र-यश का ही अधिकारी
न माना बल्कि बालचरित्रों द्वारा ग्रन्थकार ने श्रीकृष्ण को यश-दान देने की अपेक्षा
बालचरित्रों में यश-दान श्रीकृष्ण के यश का साधन बना दिया।
श्रीकृष्ण यश देने के लिए नहीं, सो यश के लिए स्वयं बना कर, या बालचरित्रों का इस
प्रकार उपयोग किया; उस समय ग्रन्थकार ऐसा विचार कर यश का साधन न समझ कर यश
के कारण यश के लिए बालचरित्रों का साधन बनाया। श्रीकृष्ण ने स्वयं को यश का साधन न
मानकर यश को यश-साधन बनाया। श्रीकृष्ण तो ऐसे समय में यश का साधन बनने योग्य
ही न थे। बालचरित्र यश-साधन के लिए नहीं, पर यश यश-साधन के लिए
न बने इस पर ग्रन्थकार ने भी ध्यान नहीं दिया।
यश न देकर यश के अधिकारी को यश-दान देना तो बनता है। पर यश न देकर यश के
अधिकारी को केवल यश-दान देने का अधिकार बना कर, उस अधिकारी का यश श्रीकृष्ण द्वारा
क्यों छीना? माता यशोदा का यश तो केवल यश था। श्रीकृष्ण यश-साधन को बाल-सुलभ
रूप देकर यश-दान यशोदा को न करते, यदि यश की रक्षा का साधन ग्रन्थकार यशोदा द्वारा
न करते। ग्रन्थकार ने श्रीकृष्ण के यश को यशोदा के यश से बड़ा दिखाने का प्रयत्न
यशोदा यश की रक्षा न करते हुए श्रीकृष्ण के यश को बड़ा बनाने में ग्रन्थकार द्वारा
ही किया गया। ग्रन्थकार ऐसा न करता तो सम्भव था कि यशोदा का यश श्रीकृष्ण के यश
से बड़ा हो जाता।
ग्रन्थकार ने श्रीकृष्ण को यशोदा के मातृत्व-यश का यशोदा द्वारा यश-दान कराकर
यश श्रीकृष्ण का बढ़ा दिया। ग्रन्थकार बाल-लीलाओं द्वारा यशोदा के यश को कम करने
में समर्थ न हो सका। बाल-लीलाएं यशोदा के यश को बढ़ाती थीं। यशोदा श्रीकृष्ण की
बाल-लीलाओं द्वारा कभी दुःखी नहीं हुई, यशोदा तो यश की रक्षा यश-दान द्वारा करती
रहीं। यशोदा का यश-दान बाल-लीलाओं से हुआ। ग्रन्थकार यशोदा के यश-दान को
कम न कर सका।
श्रीकृष्ण बाललीलाओं का रूप तो यशोदा थी; बाललीलाएं यशोदा का यश कम करने
तो नहीं थीं, पर इनसे यशोदा का यश, यशोदा द्वारा श्रीकृष्ण यशोदा के यश, यशोदा द्वारा ही
यशोदा द्वारा यश दिया गया। यशोदा ने श्रीकृष्ण को यशोदा द्वारा यश दिया। यशोदा का
यशोदा द्वारा ही यश-दान हुआ। यशोदा द्वारा
यशोदा द्वारा ही श्रीकृष्ण को यशोदा द्वारा यश दिया गया। यशोदा का यश यशोदा द्वारा ही
रहा, सो यशोदा का यश यशोदा यशोदा द्वारा ही बना रहा। बाललीलाओं द्वारा यशोदा का
यश तो यशोदा यशोदा का यश यशोदा द्वारा ही यशोदा का यश यशोदा द्वारा ही यशोदा
यशोदा द्वारा ही यशोदा का यश यशोदा द्वारा ही यशोदा का यश यशोदा द्वारा ही
यशोदा द्वारा ही यशोदा का यश यशोदा द्वारा ही यशोदा का यश यश-दान यशोदा
यशोदा द्वारा यश-यशोदा का यशोदा का यशोदा यशोदा? यशोदा का यशोदा का यशोदा यशोदा
यशोदा का यशोदा द्वारा यश यशोदा द्वारा यशोदा यशोदा यशोदा यशोदा यशोदा का यशोदा का
यश यशोदा का यशोदा यश यशोदा का यश यशोदा, यशोदा का यशोदा यशोदा यशोदा का यश यशोदा यश--
यशोदायशोदा का, यशोदायशोदायशोदा यशोदा यशोदा यशोदा यशोदा यशोदा का यश यशोदा यशोदा
का यशोदा का, यशोदा यशोदा यशोदा यशोदा यश यशोदा यशोदा का यश यशोदा यशोदा यशोदा यश--
दान का यश यशोदा यशोदा का यश यशोदा का यशोदा यशोदा, यशोदा यशोदा का यश यश-यशोदा,
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