अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
पृष्ठ 94, कुल 183 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब राजा का ध्यान भंग हो गया तो देखा कि एक सर्प आ रहा है! तो वो क्रोधित हो गया
क्योंकि उस वक्त वो रस में मग्न था, उसकी एकाग्रता भंगभंग होगई; उस वक्त राजा-
परीक्षित को ऐसा क्रोध आ ही गया
क्रोध तो आया लेकिन उसने सोचा कि जब तक मैं धनुष से बाण निकालूंगा तो इतने
समय में यह सर्प मुझे डसकर के चला जाएगा और वह सर्प तो वास्तव में निर्जीव
व्यक्ति के रूप में था ही इसलिये वो आस-पास देखे तो तीर के नीचे मरा सर्प,
उसको उठा के डाल दिया
महापुरुषों के उस समाधि अवस्था रूपी अमृत के रस भरा हुआ वातावरण को
विषमय कर दिया गया और उस वक्त वो राजा चला गया, तो शाम को, ऋषि श्रृंगी जी,
जिन्होंने उस वक्त उस बाल अवस्था के रूप में शमिक के रूप में बालक पैदा
था, जिसने समाधि रूप को उस वक्त देखा, तो जिसने देखा उस वक्त वो बच्चा
तो देखकर रोने लगा, वो कहने लगा कि जब तक पिताजी समाधि में लीन थे
तब तक तो ठीक था लेकिन अब तो यह निर्जीव अवस्था को प्राप्त होगया है, न तो
बात करते हैं, न कुछ समाधि रूपी रस का पान करते हैं, तो उस समय बच्चा रोने
की आवाज सुन कर विश्वामित्र और अन्य ऋषि लोग भी उस समय पहुंचे कि क्या
हुआ बच्चा क्यों रो रहा है, तब उसने अपने उस पिता के कंठ में सर्प बंधा
देखा तो, न जाने वो उस समय रो--या या क्रोधित हो गया तो उस वक्त वो
कौशिकी के तट पर जाकर जल लेकर आया; तो गंगाजल लेकर उसने हाथ में
कहा जल के स्पर्श मात्र तक सातवें दिन तक्षक सर्प आ करके डस लेगा और
मृत्यु
होगी, अब वो भी, तो क्रोध था? क्रोध के रूप में उस वक्त श्रृंगी ऋषि
को भी तो ज्ञान का कोई लाभ दिखाई दिया?
क्रोध हमेशा ही जब भी आता रहेगा
ज्ञान रहता नहीं, समझ चली जाएगी
केवल अपना नुकसान व दूसरे लोगी हानि
इस लिये कहा गया, क्रोध महा वैरी
सुनो, जिस वक्त शाप दिया, तो उस वक्त जब देखा तो, शमिक जी होश रूप में
आ के उस वक्त रोने लग गये कि तूने ऐसा क्या कर दिया?
शांत मन वाले जो भी थे, शमिक ऋषि जिन्होंने वो क्रोध शांत कर
दिया था अपने ही अंदर; विश्वामित्र उस वक्त पास ही खडे हुए थे, शांत ऋषि
रूप में विश्वामित्र का स्थान आता था शांत रूप के पश्चात, शांत रूप के पश्चात
दुर्वासा, वशिष्ठ रूप का स्थान आता व शांत रूप के; शांत रूप के विश्वामित्र; शांत रूप
शमिक विश्वामित्र के भी बाद; तो वो शांत रूप में थे; तो वो शांत
अवस्था में थे; तो वो तो भगवान स्वरूप अवस्था के रूप ज्ञान अवस्था में थे।
और तूने क्या कर दिया? उसने उस बालक को कहा और वो रोने लग गये कि क्या
किया तू? उसको शाप देकर तूने बहुत बुरा किया
केवल अपनी दुर्भावना व अज्ञान...
का रूप दिया तूने, जो किसी रूप में विनाश
... करने वाला होगा
तो उस वक्त शमिक ऋषि, जो बालक को डांटते, शांत विश्वामित्र जी पीछे
हटकर रो रहे थे? केवल इस कारण से, कि विश्वामित्र जी शांतिक रूप
बन गये थे विश्वामित्र जी, शांत रूप धारण विश्वामित्र के रूप में माना गया,
बाद में वो रो--या क्योंकि उस उस समय ज्ञान की हानि देखी, ज्ञान स्वरूप का
अभाव था
अतः, क्रोध हर रूप से ही मनुष्य के जीवन में ऐसा प्रभाव या ऐसा रस घोल
ही देगा
कि मनुष्य सब कुछ भुला देगा कि वास्तव रूप में क्या करना, किसी का क्या
भला और क्या बुरा!
इस लिये संत सज्जनों, क्रोध हमेशा त्याग
को अपने मन से बाहर निकालियेगा तो जीवन में कभी किसी को कष्ट नहीं हो सकता है।
जब तक मन शांत रहेगा तब तक सब कुछ सुख ही सुख होगा, किसी को कोई
दुख नहीं होगा न कष्ट होगा, सब कुछ छोड़ दें क्रोध को, सब कुछ छोड़ दें
क्रोध को छोड़ दें, सब अवगुण को, अहंकार को छोड़ दें, ईर्ष्या को
त्यागें
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