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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

३१८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- गुण-
ननु ध्वंसोऽपि न व्यापारोऽस्तु, न च निर्व्यापारस्य चिरध्वस्त-
स्य कथं कारणत्वमिति वाच्यम्, अनन्यथासिद्धनियतपूर्ववर्ति-
त्वस्य तत्रापि सत्त्वात्, अव्यवहितपूर्ववर्तित्वं हि चक्षुःसंयोगा-
देः कारणत्वे न तु सर्वत्र कार्यकालवृत्तित्वमिव समवायिकार-
णस्य कारणत्व इत्यत आह, कर्मनाशेति ।
शंका-यदि ऐसाहै तो ध्वंसकोभी व्यापार मत मानो; एवं कारणके मध्यमें कहींभी
व्यापार माननेकी आवश्यकता नहींहै. यदि कहो कि-निर्व्यापार चिरविनष्ट यागादि
क्रियासे स्वर्गादिकारणता कैसे होगी ? तो कारणता नाम 'अनन्यथासिद्धत्वे
सति कार्यनियतपूर्ववर्तित्व ' मात्रका है; सो ऐसी कारणता यागादिमेंभी
विद्यमान है. अव्यवहित पूर्ववर्तित्वरूप धर्म चक्षुःसंयोगादिगत कारणताका घटक है
अर्थात् यदि रूपादि साक्षात्कारके प्रति चक्षुःसंयोगादिको कारणता कहनी होय तो
ऐसे स्थलमें अव्यवहित पूर्ववर्तित्वका निवेश करना उचित है. सर्वत्र उसका कुछ उप-
योग नहीं; जैसे समवायिकारणगत कारणताका कार्यकालवृत्तित्वघटक है, सर्वत्र नहीं.
समाधान-इसका उत्तर ' कर्मनाशा ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्वयं देतेहैं.
यदि ह्यपूर्वं न स्यात्तदा कर्मनाशाजलस्पर्शादिना नाश्यत्वं ध-
र्मस्य न स्यात् । न हि तेन यागादिनाशः प्रतिबन्धो वा कर्तुं-
शक्यते, तस्य पूर्वमेव वृत्तत्वादिति भावः ।
भाषा-यदि यागादिजन्य धर्मात्मक अपूर्व न होय तो कर्मनाशाजलस्पर्शादिसे उसका
नाशभी नहीं हुआचाहिये, परन्तु नाश होना तो शास्त्रसिद्धहै और कर्मनाशाजलके स्प-
र्शादिसे यागादिका नाश वा उसका प्रतिबन्ध तो कहही नहीं सकते;क्योंकि यागादिका
कर्मनाशा जलस्पर्शसे पूर्ववृत्तित्व है अर्थात् यागक्रिया बहुतकाल प्रथम होचुकी है;
इसलिये भिन्नकालीन पदार्थोंका परस्पर प्रतिबध्यप्रतिबन्धकभाव या नाश्यनाशक-
भाव कहना उचित नहीं.
एतेन देवताप्रीतिरेव फलमित्यपास्तम् । गङ्गास्नानादौ सर्वत्र
देवताप्रीतेरसम्भवात् देवतायाश्चेतनत्वेऽपि तत्प्रीतेरनुद्देश्य-
त्वात्, प्रीतेः सुखस्वरूपत्वेन विष्णुप्रत्यादौ तदसम्भवात् ।
जन्यसुखादेस्तत्राभावात् तेन, विष्णुप्रीतिजन्यत्वेन पराभिमत-
स्वर्गादिरेव विष्णुप्रीतिशब्देन लक्ष्यते ॥ १६१ ॥ १६२ ॥

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३१९
भाषा-कई विद्वान्‌लोग यागादि शुभक्रियाका देवताप्रीतिरूपही फल मानतेहैं.
इस पूर्वकथनसे उसकाभी खण्डन किया; क्योंकि गंगास्नानादि सर्वत्र
शुभकार्योंमें देवताप्रीतिका होना असम्भव है. यद्यपि देवता चेतन है इसलिये प्रीति
होनेका सम्भव होसकता है तथापि यागस्नानादिक्रिया कर्त्ताका देवताप्रीति
उद्देश्य नहीं है और ‘ प्रीति ’ नाम सुखविशेषका है, सो विष्णुप्रीतिआदिकोंमें उसका
होना असम्भव है; क्योंकि विष्णुआदिको ईश्वररूप होनेसे उनमें जन्यसुखका अभाव
है; इसलिये ‘विष्णुप्रीति’ शब्दसे विष्णुप्रीतिजन्यत्वेन मीमांसकोंके अभिमत स्वर्गादि-
काही लक्षणया बोध होता है ॥ ६१ ॥ ६२ ॥
अधर्मो नरकादीनां हेतुर्निन्दितकर्मजः ॥
प्रायश्चित्तादिनाश्योऽसौ जीववृत्ती त्विमौ गुणौ १६३
भाषा-नरकादि दुःखके साधनका नाम ‘अधर्म’ है और निषिध्यकर्मोंसे उसकी
उत्पत्ति होती है. प्रायश्चित्तादि आचरणसे उसका नाश होता है. यह धर्माधर्मरूप
दोनों गुण केवल जीवमात्रमें रहतेहैं ॥ ६३ ॥
अधर्मो नरकादीनामिति । नरकादिसकलदुःखानां नारकी-
यशरीरादीनां च साधनमधर्म इत्यर्थः । तत्र प्रमाणमाह, प्राय-
श्चित्तेति । यदि ह्यधर्मो न स्यात्तदा प्रायश्चित्तादिना नाश्यत्वं
न स्यात्।नहि तेन ब्रह्महननादीनां नाशः प्रतिबन्धो वा विधातुं
शक्यते तस्य पूर्वमेव विनष्टत्वादिति भावः । जीवेति । ईश्वरस्य
धर्माधर्माभावादिति भावः ॥ १६३ ॥
भाषा-नरकमें होनेवाले सम्पूर्ण दुःखोंका तथा नारकीय शरीरादिकोंका कारणी-
भूत अधर्म है. ‘ प्रायश्चित्त ’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार उसमें प्रमाण दिखलातेहैं.
यदि अधर्म कुछ वस्तु न होय तो प्रायश्चित्तादिद्वारा उसके नाशका विधानभी नहीं
हुआ चाहिये. उस प्रायश्चित्तादिसे ब्राह्मणवधादिका नाश अथवा प्रतिबन्ध तो विधान
करही नहीं सकते; क्योंकि ‘ तस्य ’ उस ब्रह्महननादि कर्मका तो पूर्वही विनाश हो
चुका है. मूलगत ‘जीववृत्ति’यह पद कहनेका भाव यह है कि-ईश्वरमें धर्माधर्मादिका
सर्वथा अभाव है ॥ १६३ ॥
इमौ तु वासनाजन्यौ ज्ञानादपि विनश्यतः ॥
भाषा-यह धर्माधर्म दोनों वासनासे उत्पन्न होतेहैं और इन दोनोंका आत्मज्ञान
सेभी विनाश होता है.

३२० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
इमौ धर्माधर्मौ । वासनेति । अतो ज्ञानिना कृते सुकृतदुष्कृतक-
र्मणी न फलायालमिति भावः । ज्ञानादपीति, अपिदिना भोग-
परिग्रहः ।
भाषा-मूलगत ' इमौ ' पदसे धर्माधर्मका ग्रहण है. ये दोनों वासनाजन्य हैं;
इसीलिये ज्ञानीपुरुषके किये पुण्यपापादि कर्मफल प्रदानके लिये समर्थ नहीं
होते, भाव यह कि-ज्ञानीपुरुषमें ज्ञानद्वारा वासनाका क्षय हुआ है, इसलिये
उसकी शुभाशुभरूपा क्रिया केवल प्रतीतिमात्र है,भोगोपयोगिनी नहीं है.“ज्ञानादपि”
यहां 'अपि' शब्दसे भोगका परिग्रहण करना.
ननु तत्त्वज्ञानस्य कथं धर्माधर्मनाशकत्वं“नाभुक्तं क्षीयते कर्म
कल्पकोटिशतैरपि ” इति वचनाविरोधात्, इत्थंच तत्त्वज्ञानिनां
झटिति कायव्यूहेन सकलकर्मणां भोगेन क्षय इति चेत् । न ।
तत्र भोगस्य वेदबोधितनाशकोपलक्षकत्वात् ।
शंका-“भोगे विना कर्मोंका शतकोटिकल्पोंसेभी क्षय होना असम्भव है” इत्यर्थक
स्मृतिवचनके साथ विरोध होनेसे तत्त्वज्ञानको धर्माधर्मनाशकता कैसे होसकती है?
अर्थात् नहीं होसकती इसलिये तत्त्वज्ञानी लोगोंको एककालावच्छेदेन शीघ्रही काय-
व्यूहसे अर्थात् यावत् कर्मभोगार्थ कायकदम्बके निर्माणसे सम्पूर्णकर्मोंका भोगहीसे
नाश मानना उचित है. “समाधान-” नाभुक्तं इत्यादि वाक्यगत ' भोग ' पद
वेदबोधित नाशकमात्रका उपलक्षक है अर्थात् जैसे भोगसे विना कर्मोंका क्षय नहीं
होता वैसेही आत्मज्ञानसे विना या प्रायश्चित्तादिसे विनाभी नहीं होता.
कथमन्यथा प्रायश्चित्तादिना कर्मणां नाशः।तदुक्तम् “ ज्ञानाग्निः
सर्वकर्माणि ” इत्यादिना । श्रूयते च “ क्षीयन्ते चास्य कर्माणि
तस्मिन् दृष्टे परावरे” इति ।
भाषा-अन्यथा यदि भोगपदको आत्मज्ञानादिका उपलक्षक नहीं मानों तो
प्रायश्चित्तादिसेभी कर्मोंका नाश नहीं हुआ चाहिये. ( तदुक्तं) इसी वार्ताको भगवान्-
ने अर्जुनकोभी कहा है कि-“ हे अर्जुन!जैसे दीप्त हुआ अग्नि काष्ठको सर्वरूपसे दग्ध
करता है वैसेही ज्ञानरूप अग्निभी यावत् कर्मको सर्वरूपसे दग्ध करता है.” श्रुतिमेंभी
कहा है कि-“ उस परावरपरमात्माके दर्शनमात्रसे इस अधिकारी पुरुषके कर्मोंका
क्षय होता है.

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३२१
ननु तत्त्वज्ञाननस्ताह शरीरावस्थानं सुखदुःखादि च न स्यात्।
ज्ञानेन सर्वेषां कर्मणां नाशादिति चेत् । न । प्रारब्धेतरकर्म-
णामेव नाशात् । तत्तच्छरीरभोगजनकं हि यत्कर्म तत्प्रार-
ब्धम् । तदभिप्रायमेवं नाभुक्तमिति वचनमिति ।
शंका-यदि ऐसा है तो आत्मज्ञानी पुरुषके शरीरकी स्थिति तथा उसको सुखदुःखा-
दिका अनुभव नहीं हुआ चाहिये;क्योंकि शरीरावस्थानादिके कारणीभूत कर्मोंका सर्व
रूपसे नाश होचुका है. समाधान-प्रारब्धकर्मोंसे अन्यकर्मोंहीका आत्मज्ञानादिद्वारा
नाश होताहै, तत्तन्नरदेवा दिशरीरावच्छेदेन भोगके जनक कर्मविशेषका नाम 'प्रारब्ध-
कर्म' है. उसी प्रारब्धकर्मके अभिप्रायसेही 'नाभुक्तं' इत्यादि स्मृतिवचन है-इति
शब्दं निरूपयति, शब्दो ध्वनिश्चेति-
भाषा-'शब्दो ध्वनिश्च' इत्यादिग्रन्थसे मूलकार शब्दका निरूपण करतेहैं-
शब्दो ध्वनिश्च वर्णश्च मृदङ्गादिभवो ध्वनिः॥१६४॥
कण्ठसंयोगादिजन्या वर्णास्त कादयो मताः ॥
सर्वः शब्दो नभोवृत्तिः-
भाषा-ध्वन्यात्मक तथा वर्णात्मक भेदसे शब्द दोप्रकारका है. मृदङ्गादिसे
उत्पन्न हुएका नाम 'ध्वन्यात्मक' शब्द है ॥ १६४॥कण्ठतालवादि संयोगसे उत्पन्न
हुएका नाम 'वर्णात्मक'शब्दहै. वह वर्ण'क' 'ख' आदिभेदसे अनेक हैं; सम्पूर्णशब्द
समवायसम्बन्धसे आकाशमें रहतेहैं.
नभोवृत्तिराकाशसमवेतः।
भाषा-मूलगत 'नभोवृत्ति' शब्दका विवरणही आकाशसमवेत है.
दूरस्थशब्दस्याग्रहणादाह, श्रोत्र इति-
भाषा-दूरदेशमें उत्पन्न हुए शब्दका ग्रहण नहीं होसकता; इसलिये'श्रोत्र'इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार उसकी रीति कहतेहैं-
-श्रोत्रोत्पन्नस्तु गृह्यते ॥ १६५ ॥
भाषा-वह मृदङ्गाद्यवच्छेदेन उत्पन्न हुआ शब्द श्रोत्रदेशमें उत्पन्न हुआ ग्रहण
होताहै ॥ १६५ ॥
ननु मृदङ्गाद्यवच्छेदेनोत्पन्ने शब्दे श्रोत्रे कथमुत्पत्तिरत आह,
वीचीति-
शंका-मृदङ्गादिदेशमें उत्पन्न हुआ शब्द श्रोत्रदेशमें कैसे उत्पन्न होगा?
२६

३२२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
समा०-इसका उत्तर मूलकार 'वीची' इत्यादि ग्रन्थसे स्वयं लिखतेहैं-
वीचीतरङ्गन्यायेन तदुत्पत्तिस्तु कीर्तिता ॥
भाषा-वीची तरङ्गन्यायसे अर्थात् जलऊर्मितरङ्गोंके सर्व ओर प्रसरणवत् शब्दकी
श्रोत्रावच्छेदेन उत्पत्ति कथन करीहै.
आद्यशब्देन बहिर्देशदिगवच्छिन्नोऽन्यः शब्दस्तेनैव शब्देन
जन्यते तेन चापरस्त्व्यापकः। एवंकमेण श्रोत्रोत्पन्नो गृह्यत इति ।
भाषा-प्रथमशब्दसे बाह्य दशादिगवच्छेदेन शब्दान्तरकी उत्पत्ति होतीहै अर्थात्
जैसे जलमें लोष्टादिके फेंकनेसे प्रथम एक तरङ्ग उत्पन्न होताहै, पश्चात् उसी प्रथम-
तरङ्गसे चारों ओर अनेक वीचीतरङ्ग उत्पन्न हुए कूलतक जातेहैं वैसेही मृदङ्गादिके
टंकारसेभी प्रथम एक शब्द उत्पन्न होताहै पश्चात् उसी शब्दसे दशोंदिशामें शब्दा-
न्तर उत्पन्न होतेहैं. उनसे पुनः शब्दान्तरोंकी उत्पत्ति होतीहै; इसी क्रमसे मृदङ्गदेशगत
शब्द श्रोत्रावच्छेदेन उत्पन्न हुआ ग्रहण होताहै.
कदम्बगोलकन्यायादुत्पत्तिः कस्यचिन्मते॥ १६६॥
भाषा-कदम्बगोलकन्यायसे अर्थात् जैसे कदम्बपुष्पमें गोलाकारता उत्पन्न
होतीहै वैसेही शब्दकी उत्पत्तिभी किसीएक विद्वान्ने मानीहै ॥ १६६ ॥
कदम्बेति । आद्यशब्दाद्दशसु दिक्षु दश शब्दा उत्पद्यन्ते, तत-
श्चान्ये दश शब्दा उत्पद्यन्त इति भावः।अस्मिन् कल्पे कल्प-
नागौरवादुक्तं कस्यचिन्मत इति ॥ १६६ ॥
भाषा-भाव यह कि-जैसे कदम्बपुष्पके मध्यमें एक कलिका पश्चात् चारोंओर
दश कलिका ऐसेही आगे चारोंओर लगनेसे एक गोल गुच्छ बनजाताहै वैसेही मृद-
ङ्गादिदेशगत आद्यशब्दसे दशोंदिशाओंमें दश शब्द उत्पन्न होतेहैं पश्चात् उस एक एकसे
पुनः दश दश शब्द उत्पन्न होतेहैं. इस रीतिसेभी शब्दकी उत्पत्ति श्रोत्रदेशमें होसक-
तीहै. मूलमें ' कस्यचिन्मते ' इस कहनेका भाव यह है कि-इस मतमें अनन्तशब्दों-
की कल्पना करनेमें कल्पना गौरव है ॥१६६॥
ननु शब्दस्य नित्यत्वादुत्पत्तिः कथमत आह, उत्पन्न इति-
शंका-शब्द तो नित्य है. आपने उसकी उत्पत्ति कैसे कही ? समाधान-इसका
उत्तर 'उत्पन्नः कः' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्वयं लिखतेहैं-
[L29

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३२३
शब्दानामुत्पादविनाशप्रत्ययशालित्वादनित्यत्वमित्यर्थः ।
भाषा- अर्थात् यावत् शब्दोंमें उत्पाद विनाश प्रत्यय विषयता है. इसलिये इनमें
अनित्यता माननी उचित है.
ननु स एवायं ककार इत्यादिप्रत्यभिज्ञानाच्छब्दानां नित्यत्वम्।
इत्थं चोत्पादविनाशबुद्धिर्भ्रमरूपैवेत्यत आह, सोऽयं क इति-
शंका-" स एवायं ककारः-अर्थात् यह वही ककार है" इत्यादि प्रत्यभिज्ञा-
त्मक ज्ञानसे शब्दोंमें नित्यता प्रतीत होती है, इसलिये उनमें उत्पादविनाशाव-
गाहिनी बुद्धि भ्रमरूपाही माननी उचित है. समाधान-इसका उत्तर 'सोऽयं कः '
इत्यादि ग्रन्थसे मूलकारस्वयं देतेहैं-
सोऽयं क इति बुद्धिस्तु साजात्यमवलम्बते ॥१६७ ॥
भाषा-"सोऽयं कः-अर्थात् यह वही ककार है" इत्याकारक बुद्धि ककारादि-
निष्ठ साजात्यका ग्रहण करतीहै ॥ १६७ ॥
साजात्यमिति।तत्र प्रत्यभिज्ञानस्य तत्सजातीयत्वं विषयो न तु
तद्व्यक्त्यभेदो विषयः, उक्तप्रतीतिविरोधात् । इत्थं द्वयोरपि प्रती-
त्योर्नभ्रमत्वमिति ॥ १६७ ॥
भाषा-ऐसे स्थलमें प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानका ककारादि सजातीयत्व विषय है,
किन्तु ककारादिव्यक्तिका अभेद विषय नहीं; क्योंकि ( उक्त ) उत्पादविनाशशाली
प्रत्ययके साथ विरोध है. ( इत्थञ्च ) इस रीतिसे प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानको साजात्याव-
गाहि माना तो उत्पादप्रतीति तथा प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञान इन दोनों बुद्धियोंको
भ्रमरूपता नहींहै ॥ १६७ ॥
ननु सजातीयत्वं सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञायां भासत इति कुत्र दृ-
ष्टमित्यत आह, तदेवेति-
शंका-'सोऽयं' इत्यादि प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानमें सजातीयत्वका भान आपने
कहां देखा है ? समाधान-इसका उत्तर 'तदेव' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार
स्वयं देतेहैं-
तदेवौषधमित्यादौ सजातीयेऽपि दर्शनात् ॥
तस्मादनित्या एवेति वर्णाः सर्वे मतं हि नः॥१६८ ॥
भाषा-"तदेवौषधं-अर्थात् यह वही औषध है" इत्यादिस्थलोंमें सजातीय

पदार्थोंमेंभी प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञान देखनेमें आता है. इसलिये सम्पूर्ण वर्ण अनित्यही
हैं. यह हमारा सिद्धान्त है ॥ १६८ ॥
यदौषधं मया कृतं तदेवान्येनापि कृतमित्यादिदर्शनादिति-
भावः ॥ १६८ ॥ ॥ इति सिद्धान्तमुक्तावल्यां गुणनिरूपणम् ॥
भाषा-‘जो औषधी मैंने करी थी वही औषधी दूसरे पुरुषनेभी करीहै’ इत्यादि
स्थलमें सजातीयत्वका भान होताहै. भाव यह कि-जो औषधी मैंने करी है
वस्तुतः वह औषधी वह नहींहै जो कि, दूसरेने करीहै; किन्तु उसी जातिकी दूसरी
औषधी है-इति ॥
इति श्रीमहामहोपाध्यायविद्यानिवासभट्टाचार्यपुत्रश्रीयुतवि-
श्वनाथपञ्चाननभट्टाचार्यविरचिता न्यायसिद्धान्तमु-
क्तावली संपूर्णा ।
कतार सर्वलोकानां भर्तारं सर्वप्राणिनाम् ॥
हर्तारं सर्वविघ्नानामाश्रये जानकीप्रियम् ॥ १ ॥
संसाराम्बुधितारणैकतरणी पूताप्रिया यस्य गीः
श्रेष्ठाचारविचारणैकजननी लोकोत्तरा यस्य धीः ॥
तुर्कव्यूहविनाशनेऽतिसबला तेजोमयी यस्य भी-
र्वन्द्योऽसौ गुरुनानको गुरुवरो गोविन्दसिंहस्तथा ॥ २ ॥
श्रीठाकुरपदबोध्यं स्वर्वाङ्किरणापहृतदासहृद्ध्वान्तम् ॥
त्रेधा नमामि सततं श्रीसद्गुरुनिहालसिंहार्कम् ॥ ३ ॥
: श्रीकाश्यां निवसन्तो विज्ञाः श्रीशिवकुमारमिश्राद्याः ॥
मूर्द्धा मे ते मान्या हृदा तु गुरुराममिश्रवराः ॥ ४ ॥
भूतबाणग्रहक्षौणी वैक्रमे वत्सरे वरे ॥
पौषशुल्कांद्वितीयायां ग्रन्थः पूर्तिमगादयम् ॥ ५ ॥
इति श्रीमद्दुःखभञ्जन्याश्रमाधिपतिनिर्मलोदग्रपूज्यपादश्रीठाकुरनिहालसिंहपादपाथो
जप्रैष्यगण्डासिंहपरनामक गोविन्दसिंहसाधुकृते आर्यभाषाविभूषितन्यायमु-
क्तावलीप्रकाशे गुणनिरूपणम् ॥ समाप्तश्चायं ग्रन्थः ॥ इतिशम् ॥
पुस्तक मिलनेका पता-खेमराज श्रीकृष्णदास,
“ श्रीवेङ्कटेश्वर ” छापाखाना, खेतवाड़ी--बम्बई.

or (d) Jain Philosophy & Literature
Syadvada Manjari
Sutra Kratanga I–VI
Uttaradhyayana I–X

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    books are recommended for study.
  1. Mrs. Sinclair Stevenson, Heart of Jainism
  2. Dharma Bhushana Nyayadipika
  3. Jacobi Translation of the Jaina
    Sutras (Sacred Books of the East
    Series)
  4. Jacobi Articles in Hastings Encyclo-
    paedia of Religion & Ethics
    Paper IV History of Sanskrit Literature
    The following books not to be regarded as text
    books are recommended for study
    Macdonell A History of Sanskrit Literature
    Ghate Lectures in Rigveda
    Deussen Philosophy of Upanishads
    Deussen The Cambridge History of India
    Hopkins, The Great Epic of India
    Keith Indian Drama.
    Paper V General Principles of Comparative
    Philology with Illustrations from the
    development of the Indian Sanskrit
    Languages; Vedic Grammar.
    The following books not to be regarded as
    text books are recommended for study
    Macdonell – Vedic Grammar for Students
    Uhlenbeck – Manual of Sanskrit
    Phonetics
    Woolner – Introduction to Prakrit
    Bhandarkar – Wilson Philological Lectures
    Grierson – Articles in Encyclopaedia Britannica
    Gune – Introduction to Philology

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