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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri
१२ नीतिवाक्यामृतम्
कदर्य का अर्थसंग्रह राजा, दायाद और चोरों की निधि है। अर्थात् ऐसा
धन चोर, पट्टीदार अथवा राजा के ही काम आता है।
इत्यर्थसमुद्देशः।
३. कामसमुद्देशः
काम का स्वरूप—
आभिमानिकरसानुविद्धा यतः सर्वेन्द्रियप्रीतिः स कामः ॥ १ ॥
तन्मयता के साथ जिससे समस्त इन्द्रियों को परितृप्ति और प्रसन्नता हो
उसे 'काम' कहते हैं।
विशेषार्थ—काम शब्द का अर्थ इच्छा और अभिलाष है। स्त्री का पुरुष
के प्रति, पुरुष का स्त्री के प्रति मिलन का अभिलाष ही धर्म और अर्थ के
प्रसङ्ग में काम शब्द का अर्थ है। दूसरे शब्दों में यही अभिलाष अनुराग है।
स्त्री पुरुष के अनुराग में एक अनिर्वचनीय स्वाभाविक तल्लीनता होती है
जिसका परिचय यहां 'आभिमानिक' शब्द के द्वारा कराया गया है।

  • काम-सेवा का प्रकार—
    धर्मार्थाविरोधेन कामं सेवेत ततः सुखी स्यात् ॥ २ ॥
    धर्म और अर्थ का ध्यान रखते हुए काम का सेवन करने से मनुष्य सुखी
    रहता है।
    "त्रिवर्ग" पालन का क्रम—
    समं वा त्रिवर्गं सेवेत ॥ ३ ॥
    त्रिवर्ग का सेवन समरूप से करना चाहिए।
    विशेषार्थ—धर्म अर्थ और काम का सम्मिलित नाम त्रिवर्ग है। जितना
    समय धर्मचिन्तन में लगावे उतना ही अर्थ चिन्तन में तथा काम-चिन्तन में
    भी लगावे।
    अर्थ धर्म और काम में से किसी एक के प्रति अधिक अनुरक्ति का दोष—
    एकोह्यत्यासेवितो धर्मार्थकामानामात्मानमितरौ च पीडयति ॥ ४ ॥
    धर्म, अर्थ और काम इन तीनों में से एक का अधिक सेवन करने से
    एक की तो वृद्धि होती है किन्तु दो को बाधा पहुँचती है।
    आत्म-सुख की अवहेलना कर धनोपार्जन करना अनुचित है—
    परार्थं भारवाहिन इवात्मसुखं निरुन्धानस्य धनोपार्जनम् ॥ ५ ॥
    अपना सुखभोग त्याग कर धन का उपार्जन करना दूसरे के लिये बोझा
    ढोने के समान है।
    Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

कामसमुद्देशः १३
ऐश्वर्य की सफलता—
इन्द्रियमनः प्रसादनफला हि विभूतयः ॥ ६ ॥
ऐश्वर्यं का फल इन्द्रियों और मन की प्रसन्नता है। जिस ऐश्वर्यं से अपनी
इंद्रियां और मन प्रसन्न न रह सके वह ऐश्वर्यं व्यर्थं है।
अजितेन्द्रिय होने का दोष—
नाजितेन्द्रियाणां कापि कार्यसिद्धिरस्ति ॥ ७ ॥
जिन की इन्द्रियां वश में नहीं हैं, उनको किसी भी कार्यं में सफलता
नहीं मिलती।
इन्द्रिय जय का स्वरूप—
इष्टेऽर्थेऽनासक्तिर्विरुद्धे चाप्रवृत्तिरिन्द्रियजयः ॥ ८ ॥
प्रिय वस्तु में अधिक आसक्त न होना और प्रतिकूल में प्रवृत्त न होने का
नाम इन्द्रिय जय है।
विशेषार्थ—प्रतिकूल कार्य में मनुष्य स्वभावतः नहीं प्रवृत्त होता उसके
विषय में यहां विशेष रूप से लिखने का तात्पर्यं "कामसमुद्देश" प्रकरण की
दृष्टि से यह है कि प्रिय प्रेयसी पर अधिक अनुरक्त न होना और प्रतिकूल पर-
दारा के सेवन में प्रवृत्त ही न होना वास्तविक इन्द्रिय विजय है। अथवा
प्रिय पर अधिक अनुरक्त न होना और प्रतिकूल से घबड़ाना नहीं इन्द्रियजय
का लक्षण है।
अर्थशास्त्र के अध्ययन से "इन्द्रियजय"—
अर्थशास्त्राध्ययनं वा ॥ ६ ॥
अथवा अर्थशास्त्र का अध्ययन भी इन्द्रिय जय का कारण है।
नीतिशास्त्राण्यधीते यस्तस्य दुष्टानि खान्येपि ।
वशगानि शनैर्यान्ति कशाघातैर्हया यथा ॥
काम के दोष—
योऽनङ्गेनापि जीयते स कथं [पुष्टाङ्गानरातीन् जयेत् ॥ १० ॥
कामदेव को महादेव जी ने भस्म कर दिया था इस लिये उसकी 'अनङ्ग'
संज्ञा है। यहां शाब्दिक चमत्कार पूर्वक कहा गया है कि जो बिना अङ्गवाले
से भी जीता जा सकता है अर्थात् काम के वशीभूत हो जाता है वह पुष्ट अङ्ग
वाले शत्रुओं को कैसे जीत सकता है।
कामी पुरुष असाध्य रोगी है—
कामासक्तस्य नास्ति चिकित्सितम् ॥ ११ ॥
अत्यन्त कामी पुरुष को विनाश से बचाने के लिये कोई चिकित्सा
( उपाय ) नहीं है।

१४ नीतिवाक्यामृतम्
स्त्रियो पर अत्यासक्ति के दोष—
न तस्य धनं धर्मः शरीरं वा यस्यास्ति स्त्रीष्वत्यासक्तिः ॥ १२ ॥
स्त्रियों पर अत्यन्त यासक्त पुरुष के धन धर्म और शरीर का क्षय हो
जाता है ।
परस्त्रीगमन के दोष--
विरुद्धकामवृत्तिः समृद्धोऽपि न चिरं नन्दति ॥ १३ ॥
विरुद्ध कामवृत्ति अर्थात् परस्त्री में रत पुरुष समृद्धिशाली होते हुये भी
चिरकाल तक समृद्धि का उपभोग नहीं कर पाता ।
धर्म अर्थ और काम की क्रमिक श्रेष्ठता—
धर्मार्थकामानां युगपत्समवाये पूर्वः पूर्वो गरीयान् ॥ १४ ॥
धर्म, अर्थ और काम इन तीनों का कार्य एक साथ प्राप्त होने पर क्रमशः
पूर्व-पूर्वं गुरुतर है काम की अपेक्षा अर्थ और अर्थ की अपेक्षा धर्म का सेवन
श्रेष्ठ है ।
समयानुसार अर्थसेवन को प्रधानता--
कालसहत्वे पुनरर्थ एव ॥ १५ ॥
( धर्मकामयोरर्थमूलत्वात् )
यदि धर्म, अर्थ और काम का कर्त्तव्य एक साथ उपस्थित हो और धर्म
तथा काम के कर्त्तव्य का पालन समयान्तर में भी किया जा सकता हो तो
अर्थ-कर्त्तव्य को ही प्रधानता देनी चाहिए क्योंकि अर्थ समुद्देश के प्रारम्भ में
ही कहा गया है—यतः सर्वं प्रयोजन सिद्धिः सोऽर्थः । द्रव्य होने पर ही धर्म
और काम का सुचारु-संपादन हो सकता है ।
इति कामसमुद्देशः
४. अरिषड्वर्गसमुद्देशः
राजाओं के छः आभ्यन्तर शत्रु—
अयुक्तितः प्रणीताः काम-क्रोध-लोभ-मद-मान-हर्षाः क्षितीशानामन्त-
रङ्गोऽरिषड्वर्गः ॥ १ ॥
युक्ति-पूर्वक प्रयोग न करने पर राजाओं के लिये काम, क्रोध, लोभ, मद
मान और हर्ष ये छह भीतरी शत्रुसमूह हैं ।
कामासक्ति का दोष—
परपरिगृहीतासु, अनूढासु च स्त्रीषु दुरभिसन्धिः कामः ॥ २ ॥
दूसरे के द्वारा ग्रहण की गई स्त्री अथवा कुमारी कन्या पर आसक्ति ही
काम है ।

विद्यावृद्धसमुद्देशः १५
विना विचार के क्रोध का फल—
अविचार्य परस्यात्मनो वाऽपायहेतुः क्रोधः ॥ ३ ॥
शत्रु की और अपनी शक्ति का विचार न करके क्रोध कर बैठना राजा के
नाश का कारण बन जाता है ।
लोभ का स्वरूप—
दानार्हेषु स्वधनाप्रदानं परधनग्रहणं वा लोभः ॥ ४ ॥
जो दान के योग्य हैं उनको दान न देना और दूसरे के धन को ले लेना
लोभ है ।
मान का स्वरूप—
दुरभिनिवेशामोक्षो यथोक्ताग्रहणं वा मानः ॥ ५ ॥
दुराग्रह न छोड़ना और शास्त्रोपदेश तथा शिष्टोपदेश को न स्वीकार
करना मान है ।
मद का स्वरूप—
कुलबलैश्वर्यरूपविद्यादिभिरात्माहङ्कारकरणं परप्रकर्षनिबन्धनं वा
मदः ॥ ६ ॥
कुल, बल, ऐश्वर्य, रूप और विद्या आदि का अपने में अहङ्कार रखना
और दूसरे के उत्कर्ष और अभ्युदय का खण्डन करना मद है ।
हर्ष का स्वरूप—
निर्निमित्तमन्यस्य दुःखोत्पादनेन स्वस्यार्थसंचयेन वा मनः प्रति-
रञ्जनो हर्षः ॥ ७ ॥
बिना कारण ही दूसरों को दुःख देना और अर्थसंग्रह से पुलकित होना
हर्ष है ।
इत्यरिषड्वर्गसमुद्देशः
५. विद्यावृद्धसमुद्देशः
राजा का लक्षण—
योऽनुकूलप्रतिकूलयोरिन्द्रयमस्थानं स राजा ॥ १ ॥
जो अपने अनुकूल आचरण करने वालों के प्रति इन्द्र के समान सुखदायक
हो सके और प्रतिकूल आचरण करने वालों के प्रति यमराज के समान कठोर
दण्ड दे सके वह राजा है ।
राजा का धर्म—
राज्ञो हि दुष्टनिग्रहः शिष्टपरिपालनं च धर्मः ॥ २ ॥
दुष्टों का दमन और शिष्ट पुरुषों की रक्षा राजा का कर्त्तव्य है ।

१६ नीतिवाक्यामृतम्
राजा के अयोग्य कार्य—
न पुनः शिरोमुण्डनं जटाधारणादिकं वा ॥ ३ ॥
शिर मुंड़ाना अथवा जटा आदि धारण करना राजा का काम नहीं है।
राज्य का स्वरूप—
राज्ञः पृथ्वीपालनोचितं कर्म राज्यम् ॥ ४ ॥
पृथ्वी पर रहने वालों का पालन-पोषण सम्बन्धी कार्य करते रहना ही
राजा का राज्य है।
पृथ्वी का सच्चा स्वरूप—
वर्णाश्रमवती धान्य-हिरण्य-पशु-कुप्य-वृष्टिप्रदानफला च पृथ्वी ॥५॥
जिस पर चारों वर्ण और चारों आश्रमों के लोग रहते हों अनेक प्रकार
के अन्न जिस पर उत्पन्न हों, और सोना-चांदी, तरह-तरह के पशु पक्षी और
तांबा आदि अन्य धातुओं की प्रचुर मात्रा में जहाँ प्राप्ति हो वह पृथ्वी है।
ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्राश्च वर्णाः ॥ ६ ॥
"आश्रम" के भेद—
ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थी यतिर इत्याश्रमाः ॥ ७ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण हैं तथा ब्रह्मचारी, गृहस्थ,
वानप्रस्थ और सन्यास ये चार आश्रम हैं।
"उपकुर्वाणक" ब्रह्मचारी का स्वरूप—
स उपकुर्वाणको ब्रह्मचारी यो वेदमधीत्य स्नायात् ॥ ८ ॥
जो वेदाध्ययन करने के अनन्तर विवाह करे उसे उपकुर्वाणक ब्रह्मचारी
कहते हैं।
( स्नान की शास्त्रीय परिभाषा )
स्नान विशेष का लक्षण—
स्नानं विवाहदीक्षाभिषेकः ॥ ९ ॥
विवाह संस्कार की दीक्षा के समय विशेष प्रकार के मन्त्रों से किया गया
अभिषेक-जल-प्रोक्षण स्नान है।
नैष्ठिक ब्रह्मचारी का स्वरूप—
स नैष्ठिको ब्रह्मचारी यस्य प्राणान्तिकमदारकर्म ॥ १० ॥
जो मृत्युपर्यन्त विवाह न करे वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी है।
पुत्र की परिभाषा—
य उत्पन्नः पुनीते वंशं स पुत्रः ॥ ११ ॥
उत्पन्न होकर जो अपने सदाचार आदि से कुल को पवित्र करे वह
पुत्र है।

विद्यावृद्धसमुद्देशः १७
ऋतुप्रद ब्रह्मचारी का लक्षण—
कृतोद्वाहः कृ (ऋ) तु प्रदाता ऋतुप्रदः ॥ १२ ॥
विवाह करके ऋतुकाल में जो स्त्री गमन करता है उसकी ऋतुप्रद
(कृतप्रद) संज्ञा है।
पुत्रोत्पत्ति के अभाव में ऋणग्रस्त की दशा का होना—
अपुत्रो ब्रह्मचारी पितॄणामृणभाजनम् ॥ १३ ॥
जो ब्रह्मचारी पुत्रोत्पादन नहीं करता वह पितरों का ऋणी बना रहता है।
अनध्ययनो ब्रह्मणः ॥ १४ ॥
ब्रह्मचारी होकर वेदाध्ययन न करे तो वह ब्रह्मा के प्रति ऋणी होता है।
अयजनो देवानाम् ॥ १५ ॥
जो ब्रह्मचारी यज्ञ नहीं करता वह देवताओं का ऋणी होता है।
नैष्ठिक ब्रह्मचारी के लिये आत्मा ही पुत्र है—
आत्मा वै पुत्रो नैष्ठिकस्य ॥ १६ ॥
मृत्यु पर्यन्त विवाह न करने वाले नैष्ठिक ब्रह्मचारी के लिये आत्मा ही
पुत्र है।
विशेषार्थ—आत्मचिन्तन करने के कारण वह पुत्र न उत्पन्न करने आदि
के उपर्युक्त दोषों से मुक्त हो जाता है।
नैष्ठिक ब्रह्मचारी की उत्तम पवित्रता—
अयमात्मनात्मानमात्मनि संदधानः परां पूततामापद्यते ॥ १७ ॥
नैष्ठिक ब्रह्मचारी का यह व्यापक ब्रह्ममय आत्मा, आत्मशक्ति के द्वारा
अपने आत्मा में आत्मचिन्तन करता हुआ अत्यन्त पवित्र हो जाता है।
गृहस्थ का लक्षण और उसके नित्य नैमित्तिक धर्म—
नित्यनैमित्तिकानुष्ठानस्थो गृहस्थः ॥ १८ ॥
जो नित्य और नैमित्तिक अनुष्ठान करता हो वह गृहस्थ है।
ब्रह्मदेवपितृतितिथिभूतयज्ञा हि नित्यमनुष्ठानम् ॥ १९ ॥
यथाशक्ति परब्रह्म की आराधना, इष्ट देव की पूजा, पितरों को तर्पण,
अतिथि का भोजन आदि से सत्कार और वैश्वदेवों को बलि देना इनको
नित्य अनुष्ठान कहते हैं ।
दर्शपौर्णमास्याद्याश्रयं नैमित्तिकम् ॥ २० ॥
अमावास्या और पूर्णिमा आदि विशेष तिथियों पर किया जाने वाला
श्राद्ध आदि धार्मिक कृत्य नैमित्तिक कर्म है ।
वैवाहिक-शालीनो-यायावरोऽघोरो गृहस्थाः ॥ २१ ॥
वैवाहिक, शालीन, यायावर और अघोर ये चार प्रकार के गृहस्थ हैं ।
२ नी०

१८ नीतिवाक्यामृतम्
विशेषार्थ—प्राचीनकाल में अग्नि की ही प्रधान उपासना थी। यहां अग्नि
के ही प्राधान्य-अप्राधान्य से गृहस्थ के चार भेद किये गये हैं। जिसके जीवन
में विवाह के अवसर की होमाग्नि ही अभिवन्द्य हुई हो वह वैवाहिक गृहस्थ
है। शालीन वह है जिसने अग्निहोत्र व्रत लिया हो, ऐसा गृहस्थ जिसने अग्नि
की उपासना के साथ शूद्र का धन न लेने का व्रत लिया हो वह यायावर और
जो दक्षिणादान के साथ अग्निष्टोम आदि यज्ञ में तत्पर रहता हो वह अघोर
संज्ञक गृहस्थ है।
वानप्रस्थ का लक्षण —
यः खलु यथाविधि जानपदमाहारं संसारव्यवहारं च परित्यज्य
सकलत्रोऽकलत्रो वा वने प्रतिष्ठते स वानप्रस्थः ॥ २२ ॥
जो गृहस्थ लौकिक आहार-विहार और सांसारिक व्यवहार का परित्याग
कर स्त्री के साथ अथवा बिना स्त्री के विधिपूर्वक वन चला जाता है वह वान-
प्रस्थ है।
यति का लक्षण—
यो देहमात्रारामः सम्यग्विद्यानौलाभेन तृष्णासरित्तरणाय योगाय
यतते स यतिः ॥ २३ ॥
स्वदेह मात्र से आनन्दित रहने वाला जो व्यक्ति ज्ञानरूपी नौका को
प्राप्त कर तृष्णा-रूपी नदी को पार करने को योग मानकर उस योग के लिये
यत्न करता है वह यति है।
राज्य के मूल कारण और उनकी परिभाषा—
राज्यस्य मूलं क्रमो विक्रमश्च ॥ २४ ॥
वंश-परम्परा से राज्य प्राप्ति और शौर्य से उसका संरक्षण यह दो क्रम
और विक्रम राज्य के मूल हैं।
आचारसम्पत्तिः क्रमसम्पत्तिं करोति ॥ २५ ॥
वंश परम्परा से प्राप्त राज्य की वृद्धि कुलाचार पालन से होती है।
अनुत्सेकः खलु विक्रमस्यालङ्कारः ॥ २६ ॥
पराक्रम की शोभा गर्व न करने में है।
राज्य की सुरक्षा का उपाय—
क्रम-विक्रमयोरन्यतरपरिग्रहेण राज्यस्य दुष्करः परिणामः ॥ २७ ॥
क्रम और विक्रम इन दोनों में से केवल एक को स्वीकार करने से राज्य
के लिये अच्छा परिणाम नहीं होता।
विशेषार्थ—केवल आचार पालन से राज्य में दुष्टों की वृद्धि होगी और

विद्यावृद्धसमुद्देशः १६
अत्यधिक पराक्रम से लोग उद्विग्न हो जायेंगे अतः क्रम-विक्रम दोनों के ही
आश्रय से राज्य सुरक्षित रह सकता है ।
बुद्धिमान् राजा का लक्षण—
क्रम-विक्रमयोरधिष्ठानं बुद्धिमानाहार्यबुद्धिर्वा ॥ २८ ॥
बुद्धिमान् राजा क्रम-विक्रम दोनों का आश्रय लेता है । अथवा वह
अत्यन्त दृढ़ संकल्प या निश्चय वाला होता है ।
राजा के लिये विद्या और विनय की आवश्यकता—
यो विद्या विनीतमतिः स बुद्धिमान् ॥ २९ ॥
शास्त्र ज्ञान के कारण विनीत बुद्धि वाला बुद्धिमान् है ।
केवल पुरुषार्थ की निन्दा—
सिंहस्येव केवलं पौरुषावलम्बिनो न चिरं कुशलम् ॥ ३० ॥
सिंह के समान केवल पराक्रम करनेवाले राजा का स्थायी-कल्याण नहीं
होता ।
बुद्धिबल होने पर भी शास्त्रज्ञान की आवश्यकता—
अशस्त्रः शूर इवाशास्त्रः प्रज्ञावानपि भवति विद्विषां वशः ॥ ३१ ॥
बिना शस्त्र के शूर के समान बिना शास्त्रज्ञान के बुद्धिमान् भी राजा शत्रु
के वश हो जाता है ।
शास्त्र तीसरे नेत्र हैं—
अलोचनगोचरे ह्यर्थे शास्त्रं तृतीयं लोचनं पुरुषाणाम् ॥ ३२ ॥
प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आंखों से जिस का ज्ञान हो सके उसके ज्ञान के
लिये शास्त्र तीसरे नेत्र के समान हैं ।
शास्त्र न पढ़ने के दोष—
अनधीतशास्त्रश्चक्षुष्मानपि पुमानन्ध एव ॥ ३३ ॥
शास्त्र न पढ़ा हुआ पुरुष आंख वाला होते हुए भी अन्धा है ।
मूर्ख पुरुष की निन्दा—
न ह्यज्ञानादपरः पशुरस्ति ॥ ३४ ॥
मूर्ख पुरुष के अतिरिक्त दूसरा कोई पशु नहीं है ।
वरमराजकं भुवनं न तु मूर्खो राजा ॥ ३५ ॥
बिना राजा का राज्य होना अच्छा है, किन्तु मूर्ख राजा का होना अच्छा
नहीं है ।
असंस्कारं रत्नमिव सुजातमपि राजपुत्रं न नायकपदायामनन्ति
साधवः ॥ ३६ ॥
खान अथवा समुद्र से उत्पन्न रत्न को जिस प्रकार बिना खरादे हुए

२० नीतिवाक्यामृतम्
आभूषणों में नहीं प्रतिष्ठित किया जाता उसी प्रकार सुन्दर वंश में भी समु-
त्पन्न राजकुमार को सत्पुरुष लोग शास्त्रज्ञान से संस्कृत हुए बिना प्रतिष्ठित
नहीं करना चाहते ।
दुविनीत रोग के दोष—
न दुर्विनीताद् राज्ञः प्रजानां विनाशादपरोऽस्त्युत्पातः ॥ ३७ ॥
दुर्विनीत राजा से प्रजा को विनाश से अधिक दूसरे किसी उत्पात का
भय नहीं होता । दुष्ट राजा से प्रजा का क्षय अवश्यम्भावी है ।
दुर्विनीत का लक्षण—
यो युक्तायुक्तयोरविवेकी विपर्य्यस्तमतिर्वा स दुर्विनीतः ॥ ३८ ॥
जो राजा योग्य-अयोग्य का निर्णय न कर सके अथवा जिसकी बुद्धि विप-
रीत हो, बुरी बात को ही अच्छा समझे, वह दुर्विनीत है ।
'द्रव्य' और 'अद्रव्य' प्रकृति के राजा—
यत्र सद्गिराधीयमाना गुणाः संक्रामन्ति तद् द्रव्यम् ॥ ३९ ॥
सत् पुरुषों के द्वारा दिया उपदेश जिस व्यक्ति में स्थिर रह सके वह द्रव्य-
प्रकृति का पुरुष है ।
द्रव्यं हि क्रियां [विनयति नाद्रव्यम् ॥ ४० ॥
जो द्रव्य प्रकृति का है वही राज्य भोग कर सकता है अद्रव्य प्रकृति
का नहीं ।
यतो द्रव्याद्रव्यप्रकृतिरप्यस्ति कश्चित् पुरुषः संकीर्णगजवत् ॥ ४१ ॥
संकीर्ण जाति का गज जिस प्रकार गजराज नहीं हो सकता उसी प्रकार
द्रव्य प्रकृति के पुरुषों में भी द्रव्याद्रव्य की सङ्कर प्रकृति का पुरुष राजपद के
योग्य नहीं होता ।
बुद्धि के ८ गुण : उन गुणों का निरूपण—
शुश्रूषा-श्रवण-ग्रहण-धारणा-विज्ञानोहापोहतत्त्वाभिनिवेशा बुद्धि-
गुणाः ॥ ४२ ॥
बुद्धि के आठ गुण हैं, शुश्रूषा, श्रवण, ग्रहण, धारणा, विज्ञान, ऊह,
अपोह और तत्त्वाभिनिवेश । ( इनका स्पष्टीकरण अग्रिम सूत्रों में ग्रन्थकार ने
स्वयं किया है )
श्रोतुमिच्छा शुश्रूषा ॥ ४३ ॥
शास्त्रश्रवण की इच्छा ही शुश्रूषा है ।
श्रवणमाकर्णनम् ॥ ४४ ॥
शास्त्रीय प्रसङ्गों का सुनना श्रवण है ।

विद्यावृद्धसमुद्देशः २१
ग्रहणं शास्त्रार्थोपादानम् ॥ ४५ ॥
शास्त्रीय प्रसङ्गों का संग्रह करना ग्रहण गुण है ।
धारणमविस्मरणम् ॥ ४६ ॥
शास्त्रीय बातों को जान कर न भूलना बुद्धि का धारण नाम का गुण है ।
मोहसन्देहविपर्यासव्युदासेन ज्ञानं विज्ञानम् ॥ ४७ ॥
अज्ञान, सन्देह और प्रतिकूल बातों का खण्डन कर ज्ञान प्राप्त करना
विज्ञान नामक बुद्धि गुण है ।
विज्ञातमर्थमवलम्ब्यान्येषु व्याप्या तथाविधतर्कणमूहः ॥ ४८ ॥
ज्ञात विषय की अन्यत्र व्याप्ति पर विचार करना और उसी प्रकार की
अन्य कल्पनाएँ करना 'ऊह' नामक बुद्धि गुण है ।
उक्तियुक्तिभ्यां विरुद्धादर्थात् प्रत्यवायसंभावनया व्यावर्तनम-
पोहः ॥ ४९ ॥
ज्ञान के किसी निर्णीत सिद्धान्त का किसी विरोधी अर्थ द्वारा खण्डन कर
दिये जाने की संभावना में उक्ति और युक्ति के द्वारा उस विरोधी अर्थ का
निराकरण करना अपोहनाम का बुद्धि गुण है ।
अथवा ज्ञानसामान्यमूहो ज्ञानविशेषोऽपोहः ॥ ५२ ॥
अथवा सामान्यज्ञान ऊह है और विशेष ज्ञान अपोह ।
विज्ञानोहापोहानुगमविशुद्धमिदमित्थमेवेति निश्चयस्तत्त्वाभिनि-
वेशः ॥ ५३ ॥
विज्ञान, ऊहापोह और अनुगम से परिष्कृत कर 'यह ऐसा ही है' इस
प्रकार का निश्चय करना तत्त्वाभिनिवेश नाम का बुद्धिगुण है ।
विद्याएँ और उनके भेद—
याः समधिगम्यात्मनो हितमवैत्यहितं चापोहति ता विद्याः ॥ ५४ ॥
जिनको जानकर व्यक्ति अपना हित पहचान सके और अहित का निवा-
रण कर सके वे विद्याएँ हैं ।
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिरिति चतस्रोराजविद्याः ॥ ५५ ॥
आन्वीक्षिकी अर्थात् अध्यात्म विद्या या तर्कशास्त्र त्रयी अर्थात् चारों वेद,
षडङ्ग और चतुर्दश विद्याएँ, वार्ता अर्थात् कृषि पशुपालन और व्यापार तथा
दोष के अनुकूल दण्ड का विधान रूप दण्डनीति, ये चार राजविद्याएँ हैं ।
अधीयानो आन्वीक्षिकीं कार्याणां बलाबलं हेतुभिर्विचारयति, व्यस-
नेषु न विषीदति, नाभ्युदयेन विकार्यते, समधिगच्छति च प्रज्ञावाक्यवै-
शारद्यम् ॥ ५६ ॥
आन्वीक्षिकी विद्या का अध्ययन करनेवाला व्यक्ति कार्य के बलाबल का

२२ नीतिवाक्यामृतम्
विचार तर्क के द्वारा करता है, दुःख आ पड़ने पर दुःखी नहीं होता, अभ्युदय
होने पर उन्मत्त नहीं होता और बुद्धिकौशल तथा वाक्चातुर्य प्राप्त करता है ।
त्रयीं पठन् वर्णाचारेष्वतीव प्रगल्भते , जानाति च समस्तामपि
धर्मस्थितिम् ॥ ५७ ॥
त्रयी का अध्ययन करनेवाला व्यक्ति ब्राह्मणादि चारों वर्णों के आचार-
व्यवहार में बहुत पटु हो जाता है और धर्म तथा अधर्म की स्थिति को जान
जाता है ।
युक्तितः प्रवर्तयन् वार्ता सर्वमपि जीवलोकमभिनन्दयति, लभते च
स्वयं सर्वानपि कामान् ॥ ५८ ॥
वार्ता विद्या का युक्ति-पूर्वक प्रयोग करनेवाला व्यक्ति समस्त जनवर्ग को
आनन्दित करता है और स्वयं भी सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त करता है ।
दण्डनीति की प्रशंसा—
यम इवापराधिषु दण्डप्रणयनेन विद्यमाने राज्ञि न प्रजाः स्वमर्यादा-
मतिक्रामन्ति, प्रसीदन्ति च त्रिवर्गफला विभूतयः ॥ ५६ ॥
अपराधियों के लिये यमराज के समान दण्ड का विधान करनेवाले राजा
के वर्तमान रहने पर प्रजा अपनी मर्यादा का उल्लङ्घन नहीं कर पाती और
राजा को धर्म, अर्थ और काम इन तीनों का ऐश्वर्यभोग प्राप्त होता है ।
आन्वीक्षिकी आदि विद्याओं का उपयोग—
आन्वीक्षिक्यध्यात्मविषये, त्रयी वेदयज्ञादिषु, वार्त्ता कृषिकर्मादिका,
दण्डनीतिः साधुपालनं दुष्टनिग्रहः ॥ ६० ॥
अध्यात्म-विषय में आन्वीक्षिकी, वेद यज्ञ आदि के विषय में त्रयी विद्या
और कृषि कर्म आदि के सम्बन्ध में वार्ता विद्या तथा साधुजनों का पालन
और दुष्टों का दमन करने में दण्डनीति काम आती है ।
विद्या के लाभ—
चेतयते च विद्या वृद्धसेवायाम् ॥ ६१ ॥
विद्या वृद्धसेवा में प्रवृत्त करती है ।
अजातविद्यावृद्धसंयोगो हि राजा निरङ्कुशो गज इव सद्यो
विनश्यति ॥ ६२ ॥
विद्या और वृद्धसंयोग से वञ्चित राजा निरंकुश हाथी के समान शीघ्र ही
विनष्ट हो जाता है ।
अनधीयानोऽपि विशिष्टजनसंसर्गात्परां व्युत्पत्तिमवाप्नोति ॥ ६३ ॥
विद्याओं का अध्ययन न करता हुआ भी राजा विशिष्ट व्यक्तियों के
संसर्ग से उत्कृष्ट कोटि का ज्ञान प्राप्त कर लेता है ।

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri
विद्यावृद्धसमुद्देशः २३
राजा के लिये वृद्धों की संगति से लाभ—
अन्येव काचित्खलु छायोपजलतरूणाम् ॥ ६४ ॥
इस प्रकार विशिष्ट-व्यक्तियों के संसर्ग से प्राप्त ज्ञान की शोभा जलसमीप-
वर्त्ती वृक्षों की छाया के समान कुछ अपूर्व ढंग की होती है ।
राजाओं के गुरु कैसे हों—
वंशवृत्तविद्याऽभिजनविशुद्धा हि राज्ञामुपाध्यायाः ॥ ६५ ॥
राजाओं के गुरु वे होते हैं जिनका वंश विमल हो चरित्र निर्दोष हो,
ज्ञान निर्मल हो और कुलीनता में किसी प्रकार का लाञ्छन न हो ।
शिष्टों का समादर राजा का कर्तव्य है—
शिष्टेषु नीचैराचरन्नरपतिरिहलोके स्वर्गे च महीयते ॥ ६६ ॥
शिष्ट पुरुषों के प्रति विनम्र आचरण करनेवाला राजा इस लोक और
परलोक में भी महत्त्व को प्राप्त करता है ।
राजा के द्वारा वन्दनीय व्यक्ति —
राजा हि परमं दैवतं नासौ कस्मैचित्प्रणमत्यन्यत्रगुरुजनेभ्यः ॥६७॥
राजा महान् देवतास्वरूप होता है वह अपने माता-पिता आदि गुरुजनों
के अतिरिक्त अन्य किसी को प्रणाम नहीं करता ।
अशिष्टों की सेवा कर विद्या-प्राप्ति अनुचित है—
वरमज्ञानं नाशिष्टजनसेवया विद्या ॥ ६८ ॥
मूर्ख रह जाना अच्छा है किन्तु अशिष्ट पुरुषों की सेवा करके विद्या प्राप्त
करना अच्छा नहीं है ।
अलं तेनामृतेन यत्रास्ति विषसंसर्गः ॥ ६६ ॥
विष-मिश्रित अमृत से क्या लाभ ?
गुरु और शिष्य के आचार-विचार में समानता—
गुरुजनशीलमनुसरन्ति प्रायेण शिष्याः ॥ ७० ॥
शिष्यवृन्द प्रायः गुरुओं के ही शील-सदाचार के अनुगामी होते हैं ।
प्रारम्भ के संस्कार अमिट होते हैं—
नवेषु मृद्भाजनेषु लग्नः संस्कारो ब्रह्मणाप्यन्यथा कर्तुं न
शक्यते ॥ ७१ ॥
मिट्टी के नये बर्तन में रखी गई सुगन्ध अथवा दुर्गन्धयुक्त वस्तु का
संस्कार जिस प्रकार किसी तरह से भी नहीं दूर होता उसी प्रकार नवीन पात्र-
रूपी शिष्य में गुरु के द्वारा प्रारम्भावस्था में डाला गया संस्कार ( शील-
सदाचार और ज्ञान ) ब्रह्मा के भी मिटाये नहीं मिटता ।
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२४ नीतिवाक्यामृतम्
अभिमानी नृप निन्दनीय है—
अन्ध इव वरं परप्रणेयो राजा न ज्ञानलवदुविदग्धः ॥ ७२ ॥
अन्धे के समान सदा मन्त्रियों आदि दूसरों के सहारे चलनेवाला राजा
अच्छा है किन्तु ज्ञान के लेशमात्र से अपने को महापण्डित माननेवाला अभि-
मानी राजा नहीं अच्छा होता ।
नीलीरक्ते वस्त्र इव को नाम दुर्विदग्धे राज्ञि रागान्तरम् आधत्ते ॥७३॥
नील के रंग में रंगे हुए वस्त्र पर जिस प्रकार कोई दूसरा रंग नहीं
चढ़ता उसी प्रकार 'ज्ञान-लव-दुर्विदग्ध' ( अल्पज्ञ ) राजा के भी विचारों को
बदला नहीं जा सकता ।
राजा गुणग्राही हों और विद्वान् यथार्थवादी—
यथार्थवादो विदुषां श्रेयस्करो यदि न राजा गुणद्वेषी ॥ ७४ ॥
यदि राजा गुणों से द्वेष न करनेवाला अर्थात् गुणग्राही हो तो विद्वानों को
कठोर और अप्रिय होने पर भी यथार्थ तत्त्व का निवेदन करना श्रेयस्कर है ।
स्वामी को अहितकर उपदेश नहीं देना चाहिए—
वरमात्मनो मरणं नाहितोपदेशः स्वामिषु ॥ ७५ ॥
साधु-पुरुष का स्वयं मर जाना अच्छा है, किन्तु राजा को अहित उपदेश
देना अच्छा नहीं है ।
[ इति विद्यावृद्धसमुद्देशः ]
६. आन्वीक्षिकीसमुद्देशः
अध्यात्मयोग का लक्षण—
आत्ममनोमरुत्तत्त्वसमतायोगलक्षणो ह्यध्यात्मयोगः ॥ १ ॥
चिद् रूप व्यापक आत्मा, संकल्प-विकल्प प्रवृत्ति वाला मन और शरीरस्थ
प्राणवायु इन पर समान रूप से अधिकार रखना 'अध्यात्मयोग' हैं ।
अध्यात्म के लाभ—
अध्यात्मज्ञो हि राजा सहजशारीरमानसागन्तुभिर्दोषैर्न बाध्यते ॥२॥
अध्यात्मशक्ति संपन्न राजा भीरुता, अकर्मण्यता आदि स्वाभाविक दोष,
ज्वरादि शारीरिक दोष तथा कुत्सित संकल्प करना आदि मानसिक दोषों से
एवम् आकस्मिक दुर्घटना आदि आगन्तुक दोषों से पीड़ित नहीं होता ।
आत्माराम का लक्षण—
मन इन्द्रियाणि विषयाः ज्ञातं भोगायतनमित्यात्मारामः ॥ ४ ॥

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आन्वीक्षिकीसमुद्देशः २५
अपना मन, इन्द्र से भी दुर्जय इन्द्रियां, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध
आदि विषय और स्वप्रकाश रूप ज्ञान यही जिस के आत्मा के क्रीड़ा स्थान
हों वह आत्मा राम है, आत्मन्येव रमते इत्यात्मारामः ।
आत्मा का स्वरूप—
यत्राहमित्यनुपचरितः प्रत्ययः स आत्मा ॥ ४ ॥
जिस पदार्थ में मैं हूं ऐसी औपचारिक नहीं, किन्तु वास्तविक अनुभूति
हो वह आत्मा है ।
आत्मा की अमरता न मानने से दोष—
असत्यात्मनि प्रेत्यभावे विदुषां विफलं खलु सर्वमनुष्ठानम् ॥ ५ ॥
मृत्यु के उपरान्त आत्मा की सत्ता न स्वीकार करने पर बड़े-बड़े विद्वानों
का अनेक शुभ कार्यों में प्रवृत्त होना ही व्यर्थ हो जायगा ।
विशेषार्थ—चैतन्य विशिष्ट देह ही आत्मा है इसलिये जब देह नष्ट हो
गया अर्थात् प्राणी मर गया तो आत्मा भी नष्ट हो गया इस प्रकार का विचार
रखने वाले चार्वाक आदि के प्रति यहां यह कहा गया है कि यह विचार
उपयुक्त और ठीक नहीं है; क्योंकि संसार में मूर्ख नहीं अपितु बड़े-बड़े विद्वान्
यज्ञ, दान, वेदाध्ययन आदि शुभ कर्मों में इसी विश्वास से लगे रहते हैं कि
इनका उनको जन्मान्तर में इहलोक और परलोक में सुन्दर फल प्राप्त होगा ।
यदि शरीर के साथ 'आत्मा' भी नष्ट हो जाता तो विद्वान् ऐसे कार्यों को क्यों
करते ? क्योंकि जब मूर्ख से भी मूर्ख मनुष्य बिना प्रयोजन के किसी काम में
नहीं लगता तो फिर विद्वानों के विषय में तो कहना ही क्या है । अतः
जन्मान्तर में सुख का भोक्ता, द्रष्टा, व्यापक शाश्वत आत्म पदार्थ है ।
मन का लक्षण --
यतः स्मृतिः प्रत्यवमर्षणम्, ऊहापोहनम्, शिक्षालापक्रियाग्रहणं च
भवति तन्मनः ॥ ६ ॥
जिसके द्वारा हम किसी चीज को याद रख सकते हैं, चिन्तन कर सकते
हैं, तर्क और कल्पना कर सकते हैं, खण्डन-मण्डन कर निश्चय कर सकते हैं,
ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, किसी की बात-चीत को और चेष्टा को सुन-समझ
सकते हैं वह मन है ।
इन्द्रिय लक्षण —
आत्मनो विषयानुभवद्वाराणीन्द्रियाणि ॥ ७ ॥
आत्मा को शब्द-स्पर्श, रूप-रस और गन्ध का जिनके द्वारा अनुभव होता
है वे इन्द्रियां हैं ।
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा हि विषयाः ॥ ८ ॥
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध का नाम विषय है ।
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२६ नीतिवाक्यामृतम्
ज्ञान का लक्षण—
समाधीन्द्रियद्वारेण विप्रकृष्टसन्निकृष्टावबोधो ज्ञानम् ॥ ९ ॥
समाधि अर्थात् ध्यान पूर्वक चिन्तन करने से तथा आंख, कान, नाक, मुंह
हाथ आदि इन्द्रियों से देखने-सुनने आदि के द्वारा हम जो कुछ परोक्ष और
प्रत्यक्ष वस्तु के विषय में जान पाते हैं, उसी का नाम ज्ञान है।
सुख का स्वरूप—
सुखं प्रीतिः ॥ १० ॥
मन और इन्द्रियां जिससे आनन्दित हों उसका नाम सुख है।
तत्सुखमप्यसुखं यत्र नास्ति मनोनिवृत्तिः ॥ ११ ॥
वह सुख भी सुख नहीं है जिससे मन को पूर्ण आह्लाद न हो।
सुख के कारण—
अभ्यासाभिमानसंप्रत्ययविषयाः सुखस्य कारणानि ॥ १२ ॥
अभ्यास, अभिमान, सम्प्रत्यय और विषय ये सुख के कारण हैं।
अभ्यास की परिभाषा—
क्रियातिशयविपाकहेतुरभ्यासः ॥ १३ ॥
किसी परिणाम पर पहुँचने की दृष्टि से अथवा सिद्धि प्राप्त करने के
निमित्त किसी क्रिया को बारम्बार करना अभ्यास है। जैसे शास्त्र और शस्त्र
में कुशलता प्राप्त करने की दृष्टि से उनको बार बार दोहराते रहना
अभ्यास है।
अभिमान के लक्षण—
प्रश्रयसत्कारादिलाभेनात्मन उत्कृष्टत्वसंभावनमभिमानः ॥ १४ ॥
महान् व्यक्ति अथवा समाज के द्वारा आश्रय अथवा सम्मान आदि
मिलने पर व्यक्ति को अपने में जो उत्कर्ष की भावना होती है वही वस्तु-
अभिमान है।
सम्प्रत्यय का स्वरूप—
अतद्गुणवस्तुनि तद्गुणत्वेनाभिनिवेशः सम्प्रत्ययः ॥ १५ ॥
वस्तुतः जिसका जो गुण नहीं है उसमें उसगुण का अभिनिवेश अर्थात्
आग्रह करने का नाम सम्प्रत्यय है।
विशेषार्थ—सम्प्रत्यय से सुख होता है। जैसे सौन्दर्य मांसपिण्ड का
अथवा स्त्री-पुरुष का वास्तविक अथवा नित्य रहने वाला गुण नहीं है। सुन्दर
से सुन्दर मनुष्य रोगी होकर कुरूप हो जाता है, किन्तु मनुष्य स्त्री अथवा
पुरुष विशेष को सुन्दर मानकर उस पर आसक्त होता है और सुख का
अनुभव करता है । इस प्रकार मानव के अभिनिवेश का नाम सम्प्रत्यय है !

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आन्वीक्षिकीसमुद्देशः २७
विषय का लक्षण—
इन्द्रियमनस्तर्पणो भावो विषयः ॥ १६ ॥
जिस भाव अथवा पदार्थ से इन्द्रिय और मन को तृप्ति अथवा सन्तोष हो
उसका नाम विषय है।
दुःख का स्वरूप—
दुःखमप्रीतिः ॥ १७ ॥
अप्रीति ही दुःख है।
विशेषार्थ—शीतल, मन्द, सुगंध, समीर, सुंदर प्राकृतिक दृश्य सम्मुख
होते हुए भी यदि मन आनन्दित नहीं है तो ये सुखकर पदार्थ भी दुःखकर
हैं। बहुत से आभूषणों और वस्त्रों का बोझ शरीर पर लादे रहना वस्तुतः
सुखकारक तो नहीं होता, किन्तु उस सज्जा से मन को प्रसन्नता होती
है अतः वह सुख माना जाता है। इन्हीं बातों को दृष्टिगत कर आगे का
सूत्र है।
तद्दुःखमपि न दुःखं यत्र न संक्लिश्यते मनः ॥ १८ ॥
वह दुःख भी दुःख नहीं है जिसमें मन को क्लेश न हो।
दुःख के चार भेद—
दुःखं चतुर्विधं सहजं दोषजमागन्तुकमन्तरङ्गञ्चेति ॥ १९ ॥
दुःख चार प्रकार के हैं सहज, दोषज, आगन्तुक और अन्तरङ्ग।
सहजं क्षुत्तर्षपीडा मनोद्भवं चेति ॥ २० ॥
भूख, प्यास और मनरूपी पृथ्वी पर उत्पन्न होनेवाले क्रोध ईर्ष्या आदि
सहज दुःख हैं।
दोषजं वातपित्तकफवैषम्यसंभूतम् ॥ २१ ॥
वात, पित्त और कफ के विकृत होने से उत्पन्न होनेवाले दुःख दोषज
दुःख हैं।
आगन्तुकं वर्षातपादिजनितम् ॥ २२ ॥
वर्षा और धूप आदि से उत्पन्न दुःख आगन्तुक दुःख है।
न्यक्कारावज्ञेच्छाविघातादिसमुत्थमन्तरङ्गजम् ॥ २३ ॥
धिक्कार, अपमान, और इच्छाओं के पूर्ण न होने से उत्पन्न दुःख अन्त-
रङ्गज दुःख हैं।
सदा खिन्न रहने से दोष—
न तस्यैहिकमामुष्मिकं च फलमस्ति यः क्लेशायासाभ्यां भवति
विप्लवप्रकृतिः ॥ २४ ॥
निरन्तर क्लेश और अधिक परिश्रम से जिनकी प्रकृति सदा खिन्न
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२८ नीतिवाक्यामृतम्
रहती है उनको ऐहलौकिक और पारलौकिक कोई भी सुख नहीं प्राप्त होते ।
कुत्सित पुरुष का लक्षण—
स किंपुरुषो यस्य महाभियोगे सुवंश धनुष इव नाधिकं जायते
बलम् ॥ २५ ॥
अच्छी किस्म के बांस से बनाये गये धनुष पर बाण चढ़ाते समय जिस
प्रकार अधिक दृढ़ता प्रतीत होती है उसी प्रकार महान् आपत्ति आने पर
जिस पुरुष में दृढ़ता न उत्पन्न हो, स्थिरता और गम्भीरता न हो वह पुरुष
कुत्सित पुरुष है ।
इच्छा का लक्षण—
आगामिक्रियाहेतुरभिलाषो वेच्छा ॥ २६ ॥
भविष्य में होने वाली क्रिया का जो कारण है वही अभिलाष अथवा
इच्छा है ।
आत्मनो प्रत्यवायेभ्यः प्रत्यावर्त्तनहेतुर्द्वेषोऽनभिलाषो वा ॥ २७ ॥
दोषों से बचने के उपाय—
अपने को प्रत्यवाय अर्थात् दोषों से बचाये रखने के लिये दो उपाय
हैं । प्रथम उन दोषों और बुराइयों से घृणा करना दूसरा उन दोषों को
करने की इच्छा ही न करना ।
उत्साह का लक्षण—
हिताहितप्राप्तिपरिहारहेतुरुत्साहः ॥ २८ ॥
जिस भाव के कारण मनुष्य की भलाई हो और बुराई दूर हो उसका
नाम उत्साह है ।
प्रयत्न की परिभाषा—
प्रयत्नपरिनिमित्तको भावः ॥ २९ ॥
मनुष्य के हृदय में कार्य करने के निमित्त जो भाव उत्पन्न होता है उसी
का नाम प्रयत्न है ।
संस्कार की दो परिभाषाएं—
सातिशयलाभः संस्कारः ॥ ३० ॥
राजा अथवा जनता से अतिशय आदर आदि की प्राप्ति संस्कार हैं ।
अनेकजन्मकर्माभ्यासवासनावशात् सद्योजातादीनां स्तन्यपिपासा-
दिकं येन क्रियते इति संस्कारः ।
अनेक जन्म में किये गये कर्मों के अभ्यास की वासना के वश होकर
तुरन्त उत्पन्न हुए प्राणी के मन में जो दूध पीने आदि की प्रवृत्ति होती है—
वह संस्कार है ।

आन्वीक्षिकीसमुद्देशः २६
शरीर का स्वरूप—
भोगायतनं शरीरम् ॥ ३१ ॥
भले-बुरे भोगों का घर ही शरीर है।
लोकायतिक का लक्षण—
ऐहिकव्यवहारप्रसाधनपरं लोकायतिकम् ॥ ३२ ॥
यह लोक ही सब कुछ है, ऐसा मानकर समस्त व्यवहारों में प्रवृत्त कराने
वाला दर्शन लोकायतिक अथवा नास्तिक दर्शन है।
राजा को लोकायत जानना श्रेयस्कर है—
लोकायतज्ञो हि राजा राष्ट्रकण्टकानुच्छेदयति ॥ ३३ ॥
लोकायत अर्थात् नास्तिक दर्शन को जाननेवाला राजा राष्ट्र की बुराइयों
को नष्ट कर देता है।
कोई क्रिया सर्वथा निर्दोष नहीं है—
न खल्वेकान्ततो यतीनामप्यनवद्यास्ति क्रिया ॥ ३४ ॥
सन्न्यासियों के भी कर्म-सत्य अहिंसा आदि सर्वथा निर्दोष नहीं होते।
अत्यन्त दयालुता के दोष—
एकान्तेन कारुण्यपरः करतलगतमप्यर्थं रक्षितुं न क्षमः ॥ ३५ ॥
केवल करुणा में तत्पर मनुष्य अर्थात् अत्यन्त दयालु हथेली में भी रखे
हुए अर्थ की रक्षा नहीं कर सकता।
प्रशमैकचित्तं को नाम न परिभवति ॥ ३६ ॥
सर्वथा शान्त चित्त रहने वाले मनुष्य का कौन नहीं अनादर करता।
अपराधी को दण्ड देना राजा का कर्त्तव्य है—
अपराधकारिषु प्रशमो यतीनां भूषणं न महीपतीनाम् ॥ ३७ ॥
अपराध करने वाले को दण्डित न करना सन्न्यासियों को ही शोभा दे
सकता है राजा को नहीं।
परिणाम शून्य क्रोध और कृपा व्यर्थ है—
धिक् तं पुरुषं यस्यात्मशक्त्या नस्तः कोपप्रसादौ ॥ ३८ ॥
जो पुरुष अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध और प्रसन्नता न प्रदर्शित कर
सके वह धिक्कार के योग्य है।
विशेषार्थ—जिसके क्रोध से न कोई डर हो और प्रसन्नता से न कोई
लाभ ही हो वह पुरुष निन्दनीय है।
जीवित मृत का लक्षण—
स जीवन्नपि मृत एव यो न विक्रामति प्रतिकूलेषु ॥ ३९ ॥
वह पुरुष जीते हुए भी मरा है जो अपने विरुद्ध आचरण करने वालों
पर किसी प्रकार के पराक्रम का प्रदर्शन न कर सके।

३० नीतिवाक्यामृतम्
भस्मनीव निस्तेजसि को नाम निःशङ्कः पदं न कुर्यात् ॥ ४० ॥
बिना आग की भस्म पर कौन नहीं निडर होकर पैर रखेगा ।
पाप के लिये अपवाद—
तत्पापमपि न पापं यत्र महान् धर्मानुबन्धः ॥ ४१ ॥
वह पाप पाप नहीं है जिसके करने से महान् धर्म होता है ।
विशेषार्थ—किसी एक दुष्ट का वध कर देने से हजारों-लाखों की यदि
सुरक्षा होती हो तो उसका वध पाप कर्म नहीं होगा ।
अन्यथा पुनर्नरकाय राज्यम् ॥ ४२ ॥
अन्यथा अर्थात् उपर्युक्त रीति-नीति से दुष्ट दमन न करने पर राजा का
राज्य उसके लिये नरक के समान ही दुःखकारक हो जाता है ।
अधिकार प्राप्ति से दोष—
बन्धनान्तो नियोगः ॥ ४३ ॥
अधिकार बन्धन है ।
विशेषार्थ—मनुष्य को अधिकार मिलने पर अनेक प्रकार के कर्त्तव्यों के
बन्धन में बंध जाना पड़ता है ।
दुष्टों की मित्रता का परिणाम—
विपदन्ता खलमैत्री ॥ ४४ ॥
दुष्टों की मित्रता का अन्त विपत्ति में होता है ।
स्त्रियों पर विश्वास करने का फल—
मरणान्तः स्त्रीषु विश्वासः ॥ ४५ ॥
स्त्रियों पर विश्वास करना अन्त में मृत्यु का कारण होता है ।
इत्यान्वीक्षिकी समुद्देशः ।
७. त्रयीसमुद्देशः
त्रयी का अर्थ—
चत्वारो वेदाः, शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दोज्योतिषमिति
षडङ्गानीतिहास-पुराण मीमांसा-न्याय-धर्मशास्त्रमिति चतुर्दश विद्यास्था-
नानि त्रयी ॥ १ ॥
चार वेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त छन्द, ज्योतिष, ये षडङ्ग
और इतिहास-पुराण, मीमांसा, न्याय और धर्मशास्त्र इन चौदह विद्या स्थानों
को त्रयी कहते हैं ।

त्रयीसमुद्देशः ३१
त्रयी विद्या से लाभ—
त्रयीतः खलु वर्णाश्रमाणां धर्माधर्मव्यवस्था ॥ २ ॥
इस त्रयी विद्या के आधार से चारों वर्ण और चारों आश्रम के लोगों की
धर्म और अधर्म की व्यवस्था होती है।
स्वपक्षानुरागप्रवृत्त्या सर्वे समवायिनो लोकव्यवहारेष्वधिक्रि-
यन्ते ॥ ३ ॥
इस त्रयी विद्या के द्वारा समस्त सम्प्रदाय के मनुष्य अपने-अपने
मतों में सानुराग प्रवृत्त होकर लौकिक व्यवहार के अधिकारी बनते हैं।
धर्मशास्त्र और वेद की समानता—
धर्मशास्त्राणि स्मृतयो वेदार्थसंग्रहाद् वेदा एव ॥ ४ ॥
धर्मशास्त्र और स्मृति ग्रन्थों में वेदों में प्रतिपादित अर्थ का ही संग्रह
हुआ है, अतः ये वेद ही हैं। अर्थात् इनके वचन वेद के तुल्य मान्य है।
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के समानधर्म —
अध्ययनं यजनं दानञ्च विप्रक्षत्रियवैश्यानां समानो धर्मः ॥ ५ ॥
अध्ययन, यज्ञ और दान ये तीन ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य के लिये
समानरूप से पालन करने योग्य धर्म हैं।
द्विजाति का अर्थ—
त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥ ६ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीन वर्णों की द्विजाति संज्ञा है।
ब्राह्मणों के नियत कर्म—
अध्यापनयाजनं प्रतिग्रहश्च ब्राह्मणानामेव ॥ ७ ॥
पढ़ाना, यज्ञ आदि कराना और दान लेना यह ब्राह्मणों का ही कर्म है।
क्षत्रियों के नियत कर्म—
भूतसंरक्षणं शस्त्राजीवनं सत्पुरुषोपकारो दीनोद्धरणं रणेऽपलायनं
चेति क्षत्रियाणाम् ॥ ८ ॥
जीवों की रक्षा, शस्त्र विद्या द्वारा जीविका चलाना, सत्पुरुषों का उप-
कार करना, दीनों का दुख से उद्धार करना और संग्राम से विमुख न होना,
क्षत्रियों के कर्म हैं।
वैश्यों के नियत कर्म—
वार्त्ताजीवनमावेशिकपूजनं सत्रप्रपापुण्यारामदयादानादिनिर्माणं
च विशाम् ॥ ६ ॥
वार्त्ता अर्थात् कृषि, पशु रक्षा और वाणिज्य, अतिथिसेवा, अन्नसत्र,
प्याऊ, पुण्यार्थ गृह धर्मशाला तथा उद्यान आदि की स्थापना एवं निर्माण
दया और दान आदि कर्मों में प्रवृत्त रहना वैश्यों के कर्तव्य हैं।