नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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विद्यावृद्धसमुद्देशः २३
राजा के लिये वृद्धों की संगति से लाभ—
अन्येव काचित्खलु छायोपजलतरूणाम् ॥ ६४ ॥
इस प्रकार विशिष्ट-व्यक्तियों के संसर्ग से प्राप्त ज्ञान की शोभा जलसमीप-
वर्त्ती वृक्षों की छाया के समान कुछ अपूर्व ढंग की होती है ।
राजाओं के गुरु कैसे हों—
वंशवृत्तविद्याऽभिजनविशुद्धा हि राज्ञामुपाध्यायाः ॥ ६५ ॥
राजाओं के गुरु वे होते हैं जिनका वंश विमल हो चरित्र निर्दोष हो,
ज्ञान निर्मल हो और कुलीनता में किसी प्रकार का लाञ्छन न हो ।
शिष्टों का समादर राजा का कर्तव्य है—
शिष्टेषु नीचैराचरन्नरपतिरिहलोके स्वर्गे च महीयते ॥ ६६ ॥
शिष्ट पुरुषों के प्रति विनम्र आचरण करनेवाला राजा इस लोक और
परलोक में भी महत्त्व को प्राप्त करता है ।
राजा के द्वारा वन्दनीय व्यक्ति —
राजा हि परमं दैवतं नासौ कस्मैचित्प्रणमत्यन्यत्रगुरुजनेभ्यः ॥६७॥
राजा महान् देवतास्वरूप होता है वह अपने माता-पिता आदि गुरुजनों
के अतिरिक्त अन्य किसी को प्रणाम नहीं करता ।
अशिष्टों की सेवा कर विद्या-प्राप्ति अनुचित है—
वरमज्ञानं नाशिष्टजनसेवया विद्या ॥ ६८ ॥
मूर्ख रह जाना अच्छा है किन्तु अशिष्ट पुरुषों की सेवा करके विद्या प्राप्त
करना अच्छा नहीं है ।
अलं तेनामृतेन यत्रास्ति विषसंसर्गः ॥ ६६ ॥
विष-मिश्रित अमृत से क्या लाभ ?
गुरु और शिष्य के आचार-विचार में समानता—
गुरुजनशीलमनुसरन्ति प्रायेण शिष्याः ॥ ७० ॥
शिष्यवृन्द प्रायः गुरुओं के ही शील-सदाचार के अनुगामी होते हैं ।
प्रारम्भ के संस्कार अमिट होते हैं—
नवेषु मृद्भाजनेषु लग्नः संस्कारो ब्रह्मणाप्यन्यथा कर्तुं न
शक्यते ॥ ७१ ॥
मिट्टी के नये बर्तन में रखी गई सुगन्ध अथवा दुर्गन्धयुक्त वस्तु का
संस्कार जिस प्रकार किसी तरह से भी नहीं दूर होता उसी प्रकार नवीन पात्र-
रूपी शिष्य में गुरु के द्वारा प्रारम्भावस्था में डाला गया संस्कार ( शील-
सदाचार और ज्ञान ) ब्रह्मा के भी मिटाये नहीं मिटता ।
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu