नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविद्यावृद्धसमुद्देशः १५
विना विचार के क्रोध का फल—
अविचार्य परस्यात्मनो वाऽपायहेतुः क्रोधः ॥ ३ ॥
शत्रु की और अपनी शक्ति का विचार न करके क्रोध कर बैठना राजा के
नाश का कारण बन जाता है ।
लोभ का स्वरूप—
दानार्हेषु स्वधनाप्रदानं परधनग्रहणं वा लोभः ॥ ४ ॥
जो दान के योग्य हैं उनको दान न देना और दूसरे के धन को ले लेना
लोभ है ।
मान का स्वरूप—
दुरभिनिवेशामोक्षो यथोक्ताग्रहणं वा मानः ॥ ५ ॥
दुराग्रह न छोड़ना और शास्त्रोपदेश तथा शिष्टोपदेश को न स्वीकार
करना मान है ।
मद का स्वरूप—
कुलबलैश्वर्यरूपविद्यादिभिरात्माहङ्कारकरणं परप्रकर्षनिबन्धनं वा
मदः ॥ ६ ॥
कुल, बल, ऐश्वर्य, रूप और विद्या आदि का अपने में अहङ्कार रखना
और दूसरे के उत्कर्ष और अभ्युदय का खण्डन करना मद है ।
हर्ष का स्वरूप—
निर्निमित्तमन्यस्य दुःखोत्पादनेन स्वस्यार्थसंचयेन वा मनः प्रति-
रञ्जनो हर्षः ॥ ७ ॥
बिना कारण ही दूसरों को दुःख देना और अर्थसंग्रह से पुलकित होना
हर्ष है ।
इत्यरिषड्वर्गसमुद्देशः
५. विद्यावृद्धसमुद्देशः
राजा का लक्षण—
योऽनुकूलप्रतिकूलयोरिन्द्रयमस्थानं स राजा ॥ १ ॥
जो अपने अनुकूल आचरण करने वालों के प्रति इन्द्र के समान सुखदायक
हो सके और प्रतिकूल आचरण करने वालों के प्रति यमराज के समान कठोर
दण्ड दे सके वह राजा है ।
राजा का धर्म—
राज्ञो हि दुष्टनिग्रहः शिष्टपरिपालनं च धर्मः ॥ २ ॥
दुष्टों का दमन और शिष्ट पुरुषों की रक्षा राजा का कर्त्तव्य है ।