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सर्वकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 220 में से

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पृष्ठ 46

३० नीतिवाक्यामृतम्
भस्मनीव निस्तेजसि को नाम निःशङ्कः पदं न कुर्यात् ॥ ४० ॥
बिना आग की भस्म पर कौन नहीं निडर होकर पैर रखेगा ।
पाप के लिये अपवाद—
तत्पापमपि न पापं यत्र महान् धर्मानुबन्धः ॥ ४१ ॥
वह पाप पाप नहीं है जिसके करने से महान् धर्म होता है ।
विशेषार्थ—किसी एक दुष्ट का वध कर देने से हजारों-लाखों की यदि
सुरक्षा होती हो तो उसका वध पाप कर्म नहीं होगा ।
अन्यथा पुनर्नरकाय राज्यम् ॥ ४२ ॥
अन्यथा अर्थात् उपर्युक्त रीति-नीति से दुष्ट दमन न करने पर राजा का
राज्य उसके लिये नरक के समान ही दुःखकारक हो जाता है ।
अधिकार प्राप्ति से दोष—
बन्धनान्तो नियोगः ॥ ४३ ॥
अधिकार बन्धन है ।
विशेषार्थ—मनुष्य को अधिकार मिलने पर अनेक प्रकार के कर्त्तव्यों के
बन्धन में बंध जाना पड़ता है ।
दुष्टों की मित्रता का परिणाम—
विपदन्ता खलमैत्री ॥ ४४ ॥
दुष्टों की मित्रता का अन्त विपत्ति में होता है ।
स्त्रियों पर विश्वास करने का फल—
मरणान्तः स्त्रीषु विश्वासः ॥ ४५ ॥
स्त्रियों पर विश्वास करना अन्त में मृत्यु का कारण होता है ।
इत्यान्वीक्षिकी समुद्देशः ।
७. त्रयीसमुद्देशः
त्रयी का अर्थ—
चत्वारो वेदाः, शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दोज्योतिषमिति
षडङ्गानीतिहास-पुराण मीमांसा-न्याय-धर्मशास्त्रमिति चतुर्दश विद्यास्था-
नानि त्रयी ॥ १ ॥
चार वेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त छन्द, ज्योतिष, ये षडङ्ग
और इतिहास-पुराण, मीमांसा, न्याय और धर्मशास्त्र इन चौदह विद्या स्थानों
को त्रयी कहते हैं ।