निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( ७५ ) ७ अ० ४ पा० ५ ख०
“यस्तु०” किन्तु जो सूक्त को भजता है-सूक्तों में जिस
की प्राधान्य से स्तुति होती है और जिसके लिये हविः का
निर्वाप होता है, वह यही (पार्थिव अग्नि है, और ये दूसरे
(मध्यम उत्तम) ज्योति इस अग्नि नाम से निपात को ही
भजते हैं-उन में यह (अग्नि) नाम गौण रूपसे ही आता है
॥ ५ (१८) ॥
व्याख्या
अष्टधा व्याख्या । (१) अभिधान (देवता का नाम) ।
(२) अभिधेय (उस नामका मुख्य या प्रसिद्ध अर्थ) । (३)
अभिधानव्युत्पत्ति (उसी नाम की व्युत्पत्ति) । (४) प्राधा-
न्यस्तुति का उदाहरण (उस नाम से उस देवता की ऋचा)
(५) तन्निर्वचन (उस ऋचा की व्याख्या) । (६) विचार
(प्रश्नोत्तर) । (७) उपपत्ति (युक्ति) । (८) अवधारणा
(एक पक्ष की स्थिति) ।
‘अग्नि’ शब्द में अष्टधा व्याख्या का प्रदर्शन (१) ‘अग्नि’
यह अभिधान । (२) यह पार्थिव अग्नि मुख्य अर्थ । (३)
“अग्रणीर्भवति” यह ‘अग्नि’ नाम की व्युत्पत्ति । (४)
“अग्निमीळे०” यह ऋचा उदाहरण । (५) ‘अग्निं याचामि’
यह मन्त्र की व्याख्या । (६) “स न मन्येत अयमेव
अग्निः” (वह शिष्य न मानेगा यही अग्नि है) यह
विचार । (७) यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निरुप्यते (जो सूक्त
को भजता हो, जिसके लिये हविः का निर्वाप हो) यह उप-
पत्ति । (८) “अयमेव अग्निः” (यही अग्नि ‘अग्नि’
शब्द का मुख्य अर्थ है) यह अवधारणा ।
हिन्दी निरुक्त ( ७६ ) ७ अ० ४ पा० ५ खं०
'अग्नि' पद के अर्थ में मतभेद ।
१-आत्मवित् के मत में 'अग्नि' आत्मा है । “ एकं
सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ” [ऋ०सं० २,३,२२,६]
'एक होते हुए आत्म वस्तु को मेधावी ब्राह्मण बहुत प्रकार
से कहते हैं' यह मन्त्र दर्शन उनके मत में प्रमाण है ।
२-याज्ञिकों के मत में-जिसका कोई स्थान विशेष
माना हुआ नहीं, जिनका 'अग्नि' यह नाम ही जाना हुआ
है, ऐसा देवताविशेष लोक और वेद में प्रसिद्ध, कर्म का
अङ्ग 'अग्नि' शब्द का अर्थ है ।
३--नैरुक्त मतमें-जिसका यह पृथिवी लोक स्थान नियत
है, जिस का हविर्वहन आदि विशेष कर्म नियत है, जो
मध्यम उत्तम ज्योतियों से अन्य है, ऐसा यह पार्थिव अग्नि
'अग्नि' शब्द का अर्थ है ॥
नैरुक्त मत से प्रकरण का आरम्भ ।
क्योंकि नैरुक्त आचार्य तीन ही देवता मानते
हैं इससे आचार्य अपने मत के अनुसार ही इस प्रकरण का
आरम्भ करते हैं- “अग्निः पृथिवीस्थानस्तं प्रथमं
व्याख्यास्यामः” अग्नि पृथिवी स्थान का है, इससे पहिले
उसी को व्याख्यान करेंगे ।
निर्वचन का प्रयोजन ।
प्रायः देवताओं के जितने नाम हैं वे सब परोक्षवृत्ति हैं ।
मन्त्रों में जिन नामों से उनकी स्तुतियां आती है, उनमें स्तो-
ता ऋषि छिपाए हुये जैसे देवतात्तत्व को देखते हैं - जैसे कूट
हिन्दी निरुक्त ( ७७ ) ७ अ० ४ पा० ५ खं०
शब्दों में वक्ता का अभिप्राय गुप्तजैसा रहता है, और उसे उस
छिपे हुये अर्थ को देखते हुये प्रीति होती है-वैसे ही देवता-
ओं को अपने ऐसे कूट नामों से बहुत प्रीति है, और जो
प्रत्यक्षवृत्ति शब्द हैं, उनसे वे अप्रसन्न रहते हैं, “परोक्ष-
प्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः” ‘परोक्षप्रिय जैसे,
प्रत्यक्षस्तुति के द्वेषी देवता होते हैं’ यह श्रुति है। क्योंकि-
देवतानाम सब परोक्षवृत्ति हैं, उनके निर्वचन से पुरुष को
आगम प्रमाणित देवता का सारूप्य मिलता है, इसी से
आचार्य “अग्निः कस्मात्” इस प्रश्न के द्वारा निर्वचन
को आरम्भ करते हैं। इसी प्रकार सब देवता पदों में उपोद्-
घात (प्रश्न) और उस के उत्तर की स्थापना देखना चाहिये।
किन्तु आत्मवित् पक्षमें सब नाम आत्मा के लिये ही हैं
इससे सब अवस्थाओं में अवस्थित आत्मा को सब नामों की
व्युत्पत्ति से निर्वचन करके यथार्थ रूपसे जानकर सर्वात्मा
आत्मा की सब अवस्थाओं की विभूतियों को अनुभव करता
है यह सब पदों की व्युत्पत्ति का प्रयोजन है। जैसे-कि-
स्मृति है-
“शब्दब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति ।”
अर्थात् शब्द ब्रह्ममें निष्णात ( पारंगत ) होकर परब्रह्म को
प्राप्त होता है। इति ॥
“अग्निमीले”
देवताकाण्ड में तीनों लोकोंके देवताओं में पहिले पृथिवी
स्थान देवता हैं, और उनमें ‘अग्नि’ देवता प्रथमहै, उधर सबवेदों
में प्रथम ऋग्वेद है, और ऋग्वेद में भी सबसे पहिले अग्नि देवताका
हिन्दी निरुक्त ( ७८ ) ७ अ० ५ पा० १ खं०
ही ‘अग्निमीळे’ यह सूक्त है, यह देवता और उदाहरण
दोनों की योग्यता को बोधन करने के लिये आचार्य ने “अग्नि-
मीळे” यही उदाहरण दिया है, सम्पूर्ण निघण्टु और सम्पूर्ण
ऋग्वेद पर ध्यान देने से यह भी प्रतीत होता है कि-निघण्टु
की रचना का घनिष्ठ सम्बन्ध ऋग्वेद से ही है ॥
विचार की आवश्यकता
यद्यपि शब्द का मुख्य अर्थ एक ही होता है, तथापि
गौण अर्थों की संख्या नहीं है । शब्द के गौण अर्थों को भी
अल्प बुद्धि पुरुष मुख्य अर्थ मान बैठते हैं, इससे विचार की
आवश्यकता हुई । और इसी से अग्नि शब्द के मुख्य और गौण
अर्थों का विवेचन किया गया है ॥ ५ ( १८ ) ॥
इति हिन्दी निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य
चतुर्थः पादः समाप्तः॥७ ४॥
अथ पञ्चमः पादः ।
( खं० १ )
(निघ०) जातवेदाः ॥ २ ॥
(निरु०) जातवेदाः कस्मात् ।
जातानि वेद ।
जातानि वा एनं विदुः ।
जाते जाते विद्यते इतिवा ।
जातवित्तो वा जातधनः ।
जातविद्योवा जातप्रज्ञानः ।
हिन्दी निरुक्त ( ७६ ) ७ अ० । पा० १ खं०
“यत्तज्जातः पशूनविन्दत इति तज्जातवेदसो
जातवेदस्त्वम्”-इति ब्राह्मणम् । “तस्मात्सर्वा-
नृतून् पशवोऽग्निमभिमर्पन्ति”-इति च ।
तस्य एषा भवति—॥ १ (१९) ॥
अर्थ :-‘जातवेदाः’ (२) [ नैरुक्त मत में माहाभाग्य से
अथवा कर्म के भेद से यह अग्नि ही है । याजक मत में नाम
के भेदसे और स्तुति के भेदसे दूसरा कोई देवता है । ] क्यों?
“जातानि वेद” वह जातों ( उत्पत्ति वालों ) को
जानता है संसार में कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे वह न
न जानता हो,—अर्थात् सर्वज्ञ है ।
“जातानि वा” अथवा जात = जो हैं, वे सब इसे
जानते हैं । ( इन दोनों व्युत्पत्तिओं में ‘जात’ शब्द पूर्व पद
और ज्ञानार्थ ‘विद्’ ( अदा० प० ) धातु उत्तर पद है ।
पहिली व्युत्पत्ति पे सबका ज्ञाता और दूसरी में सबका
ज्ञेय है । )
“जाते जाते” अथवा जात जात में विद्यमान है, इस
से ‘जातवेदस्’ है । [ इस में ‘जात’ शब्द पूर्व और सत्ताथंक
‘विद्’ (दि०आ०) धातु उत्तर पद है । ]
“जातविद्यो वा०” अथवा इसको विद्या हुई हुई है
इसे सब वस्तुओं का प्रज्ञान होगया है । [ इस पक्ष में ‘जात’
शब्द पूर्व और ज्ञानार्थ ‘विद्’ ( अदा० प० ) धातु से उत्तर
पद है । ]
“यत्तज्जान.०” जो कि- वोह उत्पन्न होता हुआ
हिन्दी निरुक्त ( ८१ ) ७ अ० ५ पा० ३ खं०
प्रहिणुत जातवेदसं कर्मभिःअभ्रनुवानम्, अपि
वा उपमार्थे स्यात्-अश्वमिव जातवेदसम्-इति ।
इदं नो बर्हिः आसीदतु-इति ।
तदेतद् एकमेव जातवेदसं गायत्रं तृचं दश-
तयीषु विद्यते यत्तु किञ्चिद् आग्नेयं तद् जात-
वेदसानां स्थाने युज्यते ।
म न मन्येत अयमेवाग्निः-इति, अपि-एते उत्तरे
ज्योतिषी जातवेदसी उच्येते । ततो नु मध्यमः ।
“अभिप्रवन्त समनेव योषाः०” इति तत् पुर-
स्ताद् व्याख्यातम् [ ७, ४, ४ ]
अथामौ आदित्यः-
“उदुत्यं जातवेदसम्०,. इति तद् उपरिष्टाद्
व्याख्यास्यामः [ १२, २, ४ ]
यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निरुप्यते अयमेव
सोऽग्निर्जातवेदाः, निपातमेव उत्तरे ज्योतिषी
एतेन नामधेयेन भजेते ॥ ३ ( २० ) ॥
इति सप्तमाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥ ७,५ ॥
अर्थ :-“जातवेदसे०,, ।
· · ( वयं ) “जातवेदसे सोमंसुनवाम” हम जातवेदस्
(अग्नि) के लिये सोम का सवन करते हैं -सोम को निचो-
हिन्दी निरुक्त ( ८२ ) ७ अ० ५ पा० ३ ख०
ड़ते हैं। “वेदः अरातीयतः निदहति” ज्ञानवान्
( जातवेदाः ) हमसे शत्रुता करने वालों को भस्म करता है।
“सः नः दुर्गाणि पर्षदति” वह ( जातवेदाः ) हमें दुर्गम
स्थानों से लंघावे “अग्निः नावा सिन्धुमिव विश्वा
( विश्वानि ) दुरिता ( दुरितानि ) अतितारयति”
अग्नि देव ( हमें ) नौका से नदी के समान सब पापों से उतारे।
यहां भाष्य अस्पष्ट है। भगवद्दुर्गाचार्य की टीका में यह मन्त्र
और इसका भाष्य दोनों नहीं हैं॥ “तस्य०” उस ( जात-
वेदस् ) की यह और ऋचा है—॥२॥
( खं० ३ )
अर्थः—प्रनूनं जातवेदसम्०” इस ऋचा का श्येन अग्नि-
पुत्र ऋषि। गायत्री छंदः।
( हे स्तोतारः ) यूयम् ऊच्यध्वे ) हे स्तुति करने वालो तुम से
कहा जाता है-- ‘नूनम्’ निश्चयही तुम सब ‘अश्वम्’ (कर्मभिः
समश्नुवानम् ) कर्मों के द्वारा सब जगत् को व्यापन करने वाले
( अपिवा उपमार्थे स्यात् ) अथवा उपमा अर्थ में हो-- अश्व-
मिव अश्व के समान ‘वाजिनम्’ ( अन्नवन्तम् ) अन्नवाले
‘जातवेदसम्’ जातवेदा ( अग्नि ) को ‘प्रहिनोत’ ( प्रहिणुत)
प्रेरणा करो। “इदम् नः बर्हिः आसदे” (आसीदतु) इस
हमारी बिछाई हुई कुशा पर ( वह जातवेदा ) बैठे॥
‘तदेतद्०’ सो यह एक ही जातवेदस् देवका गायत्री छन्द
में तृच ( तीनऋचाओं का सूक्त) दश मण्डल के ऋग्वेद में है।
किन्तु जो कुछ मन्त्रजात अग्नि देवता का है, वह सब जातवेदस्
देवके मन्त्रों के स्थानमें प्रयोग किया जाता है पढा जाता है॥
आक्षेप । “सनमन्येत०” वह (शिष्य) न मानेगा कि यही
(पार्थिव) अग्नि जातवेदाः है। क्यों कि ये और भी दूसरे (मध्यम
उत्तम) दोनो ज्योतिएं जातवेदस् कही जाती हैं।
“ततोऽनुमध्यमः” तिस कारण पहिले “मध्यम है” इस के
अनुसार ऋचा है—
“अभिप्रवन्त समनेव योषाः” यह ऋचा पहिले
व्याख्यान की जा चुकी है (७,४,४)। इस ऋचामें जातवेदा
को जलधाराओं का सेवन करने वाला कहा गया है, और वह
मध्यम ही होसकता है किन्तु यह पार्थिव अग्नि नहीं ॥
अब “वोह आदित्य है” इसके अनुसार ऋचा—
“उदुत्यं जातवेदसम्० यह है। इस की व्याख्या आगे
होगी [१२, २, ४] इस मन्त्र में “जातवेदसम्” यह पद
“सूर्यम्” पदका विशेषण है, इससे जातवेदस् उत्तम ज्योति
है; यह सिद्ध होता है ॥
उत्तर “यस्तु सूक्तं भजते०” किन्तु जो सूक्त को भजता
है, और जिस के लिए हविः का निर्बाप होता है, वह यही
पार्थिव अग्नि जातवेदाः है। दूसरे (मध्यम उत्तम) ज्योतिएं
इस नामसे निपात का ही भजन करती हैं— उनका यह (जात-
वेदस्) गौण नाम है, किन्तु मुख्य नहीं ॥ ३ (२०) ॥
इति हिन्दी निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥ ७, ५ ॥
हिन्दी निरुक्त ( ८४ ) ७ अ० ६ पा० २ सं०
षष्ठः पादः ।
( खं० १ )
(निघ०-) वैश्वानरः ॥३॥
(निरु०-) ‘वैश्वानरः’ कस्मात् । विश्वान् नरान्
नयति । विश्वे एनं नरा नयन्ति-इतिवा । अपि
वा विश्वानर एव स्यात्-प्रत्यृतः सर्वाणि भूतानि,
तस्य वैश्वानरः ।
तस्य एषा भवति ॥ १ (२१) ॥
अर्थ :- ‘वैश्वानर’ क्यों ? विश्व ( सब ) नरों को नयन
करता है, इस लोक से उस लोक को लेजाता है। अथवा सब
प्रवृत्तियों में यही सब नरों को प्रवृत्त करता है, (प्रयोजक
कर्त्ता) अथवा विश्व (सब) नर इसे ले जाते हैं- जिन २
कर्मों में अङ्गभूत करते हैं, (कर्मकारक) अथवा ‘विश्वानर
ही हो। क्या ? ‘प्रत्यृतः सर्वाणि भूतानि’ सब प्राणियों में
अन्तर्गत। उसका वैश्वानर है-विश्वानर का अपत्य (पुत्र)
वैश्वानर है।
“तस्य०” उस वैश्वानर की यह ऋचा है- ॥१(२१)॥
( खं० २ )
(निरु०-) “वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम राजा हि कं
भुवनानामभिश्रीः । इतो जातो विश्वमिदं वि-
चेष्टे वैश्वानरो यतते सूर्येण (ऋ०सं० १।७,६.१)
इतो जातः सर्वमिदम् अभिविपश्यति, वैश्वानरः
हिन्दी निरुक्त \qquad ( ८५ ) \qquad ७ अ० ६ पा० २ खं०
संयतते सूर्येण, राजा यः सर्वेषां भूतानाम् अभि-
श्रयणीयः, तस्य वयं कल्याण्या मतौ स्याम-इति ।
तत् को वैश्वानरः ? 'मध्यमः'-इति आचार्याः।
वर्षकर्मणा हि एनं स्तौति ॥ २(२२) ॥
अर्थ :-“वैश्वानरस्य०” इस ऋचा का कुत्स ऋषि,
पृष्ठ्य और अभिप्लव अहनों में आग्निमारुत की प्रतिपत् है ।
'इतः' (पृथिवीलोकात् ) इस पृथिवी लोक से-औषधि
वनस्पतियों से 'जातः' उत्पन्न हुआ हुआ 'इदम्' इस 'विश्वम्'
( सर्वम् ) सबको 'विचष्टे' ( अभिविपश्यति ) अच्छी तरह
देखता है, अथवा प्रकाशक होने से दिखाता है । ( यश्च )
'वैश्वानरः' और जो वैश्वानर 'सूर्येण' सूर्य के साथ 'यतते'
( संयतते ) अपने प्रकाश के द्वारा मिलता है । ( यश्च ) और
जो 'भुवनानां' लोकों का 'राजा' राजा 'अभिश्रीः' ( अभि-
श्रयणीयः ) और आश्रयणीय है, ( तस्य ) 'वैश्वानरस्य' उस
वैश्वानर की 'सुमतौ' ( कल्याण्यां मतौ ) शुभ मति में 'स्याम'
हम होवें-हम ऐसा शुभ आचरण करें कि-उस निखिल
भुवन पतिकी हमारे ऊपर शुभ मति बनी रहे (यह प्रार्थना है)।
“तत्को वैश्वानरः” सो कौन वैश्वानर है ? 'मध्यम'
ज्योति वैश्वानर है, यह कोई नैरुक्त आचार्य मानते हैं ।
क्योंकि-वर्ष ( वृष्टि ) कर्म से ऋषि इसकी स्तुति करता है
॥ २ ( २२ ) ॥
व्याख्या
प्रथम पाद् की पीछे व्याख्या । क्योंकि- लोक में भी
हिन्दी निरुक्त ( ८६ ) ७ अ० ६ पा० ३ खं०
पहिले स्तुति की जाती है और पीछे मांगा जाता है, इससे
यही न्याय वेद में भी लेना चाहिये, यह दिखाने के लिये
पहिले पाद् की व्याख्या अन्य पादों की व्याख्या के पीछे
की है। पहिले पाद् में प्रार्थना और अन्य पादों में देवता
की स्तुति है ॥ २ ( २२ ) ॥
( खं० ३ )
(निरु०) “प्रनू महित्वं वृषभस्य वोचं यं पूरवो
वृत्रहणं सचन्ते । वैश्वानरो दस्युमग्निर्जघन्वान्
अधूनोत् काष्ठा अवशम्बरं भेत् ॥” [ऋ० सं० १,४,
२५,६] ॥
प्रब्रवीमि तन्महित्वं माहाभाग्यं वृषभस्य वर्षितुः
अपां, यं पूरवः पूरयितव्याः मनुष्या वृत्रहणं मेघ-
हनं सचन्ते सेवन्ते वर्षकामाः ।
‘दस्युः’ दस्यतेः क्षयार्थात् । उपदस्यन्ति अस्मिन्
रसाः। उपदासयति कर्माणि, तम्-अग्निर्वैश्वानरः
घ्नन् अवाधूनोत् अपः काष्ठाः, अभिनत् शम्बरं
मेघम् ।'
अथासौ आदित्यः-इति पूर्वे याज्ञिकाः ॥३॥
अर्थ :-“प्रनू महित्वं वृषभस्य०” इस ऋचा का
नोधास ऋषि, त्रिष्टुप् छंदः, वैश्वानर अग्नि देवता ।
( अहम् ) मैं ( तस्य ) उस 'वृषभस्य' वर्षितुः ( अपाम् )
जलके बरसाने वाले मेघके ( तत् ) महित्वं ( माहाभाग्यम् )
हिन्दी निरुक्त ( ८७ ) ७ अ० ६। पा० ४ खं०
( उस ) महिमाको ‘प्रवोचम्’ ( प्रब्रवीमि ) बखानताहूं, ‘यम्’
जिस ‘वृत्रहत्याय’ ( मेघहनम् ) मेघके हनन करने वाले को
‘पूरवः’ [ पूरयितव्या मनुष्याः ) मनुष्य ‘सचन्ते’ ( सेवन्ते )
सेवन करते हैं । “वैश्वानरः अग्निः” वैश्वानर अग्नि ने
‘दस्युम्’ रसों के नष्टकरने वाले ( अनावृष्टि के द्वारा ) ‘शम्बरम्’
( मेघम् ) मेघको ‘जघन्वान्’ ( घ्नन् ) मारते हुये ‘भेत्’ अभिन्नत्
विदारण किया और ‘काष्ठाः’ ( अपः ) ‘अवअवधूनोत्’ जलोंको
कंपाया या बरसाया ॥
पूरु क्या? पूरयितव्य = पूरण करने योग्य । कौन! मनु-
ष्य । दस्यु क्यों? उसके न बरसने से रस ( धान ) आदि
उपदस्त = क्षीण हो जाते हैं । अथवा यह कर्मों को अनावृष्टि
के द्वारा क्षीण कर देता है, इस से यह दस्यु है ।
अब ‘वोह आदित्य है’ ऐसा पुराने याज्ञिक मानते हैं ॥३॥
( खं०४ )
[निरु०] एषां लोकानां रोहेण सवनानां रोह
आम्नातः, रोहात् प्रत्यवरोहश्चिकीर्षितः, ताम्
अनुकृतिं होता आग्निमारुते शस्त्रेवैश्वानरीयेण
सूक्तेन प्रतिपद्यतेसोऽपि न स्तोत्रियम् आदियेत
आग्नेयोहि भवति, तत आगच्छति मध्यस्थाना
देवता रुद्रं च मरुतश्चततोऽग्निम् इहस्थानम् अत्रैव
स्तोत्रियं शंसति ॥ ४ ॥
अर्थः- “एषां लोकानाम्०” इन लोकों के रोहण के
क्रमसे सवनों का रोहण आम्नान (विधान) किया है-जो ही
हिन्दी निरुक्त ( ८८ ) ७ अ० ६ पा० ४ खं०
लोकों के आरोहण (चढने) का क्रम है,-पृथिवी-अन्तरिक्ष-
द्यौ, वही सबनों का भी क्रम है-प्रातः सवन- माध्यन्दिन सवन
तृतीय सवन । (उससे क्या ?) "रोहात् प्रत्यवरोहः०"
रोहणसे प्रत्यवरोहण करना ( उतरना ) इष्ट है- आरोहण के
विपरीत क्रमसे उतरना भी किसी कर्म में अभीष्ट है।
"ताम् अनुकृतिम्" उस अनुकृति ( नकल ) को होता
(एक ऋत्विज्) आग्निनमारुत (अग्निमरुत् देवोंके ) शस्त्र में
वैश्वानरीय (वैश्वानर के ) सूक्तसे आरम्भ करता है।
"सोऽपि०" वह (होता) भी स्तोत्रिय ( वैश्वानरीयसूक्त)
को आदर न करेगा । क्योंकि- वह ( स्तोत्रिय ) अग्निका है
सिद्धान्ती के मत में वैश्वानर अग्नि ही है, और उसका सूक्त
आग्नेय ही हुआ, अतः द्युलोक में पृथिवी स्थान अग्नि के
सूक्त को न पढेगा । क्यों कि पढता है, इससे सिद्ध होता है
कि- वैश्वानर आदित्य भी है।) आगेका क्रमभी इसी पक्ष में
है- ) "तत आगच्छति०" वहांसे (द्युलोकसे ) आता है
मध्यस्थान देवताओं को- रुद्र को और मरुतों को ( स्तुति
करता है। "ततोऽग्निम्०" उससे (मध्य स्थानसे उतर कर)
यहां के रहने वाले स्तोत्रिय = ( स्तवनीय ) अग्नि को यहीं
शंसन करता है स्तुति करता है ॥ ४ ॥
व्याख्या ।
निरुक्त शास्त्र के सिद्धान्त में "वैश्वानर" पार्थिव
अग्नि ही है। उस पर "तत्को वैश्वानर." इत्यादि ग्रन्थ
से विचार आरम्भ हुआ है, तहां पहिले काङ्के नैरुक्तों के मतसे
हिन्दी निरुक्त ( ८६ ) ७ अ० ६, पा० ४ खं०
"प्रनू 'महित्वम्' इस निगम में वर्ष कर्म के लिङ्ग से यह
आक्षेप किया गया है कि- "वैश्वानर" मध्यम ज्योति है।
अब इस खण्डमें "वैश्वानर" आदित्य है यह पूर्व याज्ञिक-
ओं के मत से उपपादन किया है। पूर्व याज्ञिक वे हैं, जिन्होंने
विधि मन्त्र और अर्थवाद वेद के सब भागोंसे यज्ञ वस्तु को
समीचीन रीति से समझा और उसका प्रयोग भी किया या
अनुष्ठान भी किया था। वे ही ऐसा कहते हैं कि- "वैश्वानर"
आदित्य है। सुतराम् इस प्रत्यय को गौण न समझना चा-
हिये। वे लोग किस युक्ति से ऐसा कहते हैं, वही (विधि में
अनुकरण की प्रसिद्धि) इस खण्ड में दिखाई गई है।
अनुकरण। तृतीय पाद में नैरुक्तों के मत से तीन देवता-
ओं के साथ सब संसार बांट दिया है। उस बटवारे में
पृथिवी अन्तरिक्ष और द्युलोक भी बट गये हैं। वैसे ही पृथिवी
के साथ प्रातःसवन (कर्म) अन्तरिक्ष के साथ माध्यन्दिन
सवन और द्युलोक के साथ तृतीय सवन विभक्त किया गया है।
किसी कर्म में लोकों का आरोहण या चढ़ना और प्रत्य-
वरोहण या उतरना विधान किया है। किन्तु उसका साक्षात्
अनुष्ठान करना असंभव है। अतः पूर्वोक्त सवनों के अनुष्ठान
द्वारा आरोहण प्रत्यवरोहणों का अनुकरण किया जाता है।
इस अनुकरण को होता करता है जिसका यह प्रकार है-
होता पृथिवी लोक में स्थित है, अतः पहिले वह पृथिवी के
भाग प्रातःसवन के शस्त्र (मन्त्र) को पढता है। उसको पढता
हुआ वह पृथिवी पर आरूढ होता है। फिर वह माध्यन्दिन
सवन जो अन्तरिक्ष लोक का भाग है, उसके शस्त्र को पढता
है। क्योंकि उसी का क्रम है। उस शस्त्र को पढता हुआ वह
हिन्दी निरुक्त ( ६० ) ७ अ० ६ पा० ५ खं
अन्तरिक्ष में आरूढ होता है। फिर तीसरा सवन जो द्युलोक
का भाग है, उसके शस्त्र को पढता है, और उसको पढता हुआ
तीसरे लोक में आरूढ होता है। वही होता जो द्युलोक में
आरूढ है, यज्ञायज्ञिय अग्निष्टोम साम में जो आग्निमारुत
शस्त्र है, उसको उन सवनों के लोकों के प्रत्यवरोहण को करता
हुआ वैश्वानर के सूक्त से आरम्भ करता है। अर्थात्-अब
होता द्युलोक में है, वहा प्रत्यवरोहण का आरम्भ करता है,
वह प्रत्यवरोहण आरोहण के उलटे क्रम से होगा, अतः उसे
वह सूक्त पढना चाहिये, जो उस लोक के देवता (आदित्य)
का हो। उसके अर्थ यह वैश्वानर के "वैश्वानराय पृथु
पाजसे०" (ऋ० स० ३,१,३,) सूक्त को पढ़ता है। यदि
"वैश्वानर" आदित्य न होता, तो उसके सूक्त को आदित्य
लोक में क्यों पढ़ता, तथा ऐसा न करने से प्रत्यवरोहण का
अनुकरण भी कैसे हो सकता है। अतः "वैश्वानर" आदि-
त्य ही है, यह पूर्व याज्ञिकों का अभिप्राय है। उसी क्रम
की पुष्टि के लिये अन्तरिक्ष और पृथिवी लोक के प्रत्यवरो-
हण में उस उस के देवतोग्र्यो के शस्त्र पाठ के अनुष्ठान को
दिखाता है। शेष सुगम है ॥४॥
(खं० ५)
(निरु०-) अथापि वैश्वानरीयो द्वादशकपालो
भवति। एतस्य हि द्वादशविधं कर्म।
अथापि ब्राह्मणं भवति-“असौ वा आदित्योऽ-
ग्रिर्वैश्वानरः-इति।
हिन्दी निरुक्त ( ६१ ) ७ अ० ६ पा० ५ ख०
अथापि निवित् सौर्यवैश्वानरी भवति-“आयो-
द्यां भात्या पृथिवीम्”-इति। एष हि द्यावापृथिव्यौ
आभासयति ।
अथापि छान्दोमिकं सूक्तं सौर्यवैश्वानरं भवति,
“दिवि पृष्ठो अरोचत”-इति
अथापि हविष्यन्तीयं सूक्तं सौर्यवैश्वानरं
भवति ॥ ५ ॥
अर्थ :- “अथापि वैश्वान०” और वैश्वानर का
द्वादश कपाल ( बारह कपालों पर बनाया हुआ पुरोडाश )
होता है। क्योंकि-इस (आदित्य) का बारह ( १२ ) मासों
का विभाग करना कर्म है ।
और भी- ब्राह्मण है-वोह आदित्य अग्नि वैश्वानर है।
और भी- सूर्य वैश्वानर की निविद् [ किसी आहुति
का शस्त्र के मध्य में गिरने वाला मन्त्र ] है- 'जो द्युलोक को और
पृथिवी लोक को प्रकाशित करता है । क्योंकि-यही (आ-
दित्य) द्युलोक और पृथिवी लोक को भासन करता है।
और भी छान्दोमिक सूक्त सूर्य वैश्वानर का है।-'द्युलोक
में लगा हुआ प्रकाशता है।
और भी हविष्यन्तीय सूक्त सूर्य वैश्वानर का है-॥५॥
व्याख्या
जिस प्रकार “वैश्वानर” के आदित्य होने में वैश्वा-
नरीय सूक्त से प्रत्यवरोहण विधि का अनुकरण प्रमाण है उसी
हिन्दी निरुक्त ( ६२ ) ७ अ० ६ पा० ६ खं०
प्रकार वैश्वानर के द्वादश कपाल पुरोडाश की विधि का
अनुकरण भी प्रमाण है । क्योंकि देवताओं के गुणों की समा-
नता को लेकर ही यज्ञ में गुणों की विधि कल्पित होती हैं
इष्ट देवता में जैसे गुण होते हैं, उसके यज्ञ में वैसे ही गुणों
की विधिएं की जाती हैं । जिससे कि वैश्वानर आदित्य है
और आदित्य चैत्र आदि बारह मासों का विभाग करता है
अथवा चैत्र आदि बारह मासों में भिन्न २ स्वरूपों से बारह
प्रकार का होता है, इसी से उसका पुरोडाश बारह कपालों
पर संस्कार किया जाता है = पकाया जाता है । सुतराम्
वैश्वानर के लिये द्वादशकपाल की विधि का अनुकरण उसके
आदित्य होने को सिद्ध करता है । ब्राह्मण निविद् और सूक्त
अपने शब्दों में ही "वैश्वानर" को आदित्य कह रहे हैं॥६॥
( खं० ६ )
[निरु०-] अयमेव अग्निर्वैश्वानरः-इति शाक-
पूणिः । विश्वानरौ एते उत्तरे ज्योतिषी, वैश्वानरो
ऽयम् । यत् ताभ्यां जायते ।
कथं नु अयम्-एताभ्यां जायते, इति ? यत्र
वैद्युतः शरणम् अभिहन्ति, यावद् अनुपात्तो
भवति मध्यमधर्मैस्तावद् भवति- उदकेन्धनः
शरीरोपशमनः, उपादीयमान एव अयं सम्पद्यते
उदकोपशमनः शरीरदीप्तिः ॥६॥
अर्थ.- "अयमेव०" यही (पार्थिव) अग्नि वैश्वानर
हिन्दी निरुक्त ( ६३ ) ७ अ० ६ पा० ६ खं०
है,—यह शाकपूणि आचार्य मानता है । 'विश्वानर' ये दूसरे
(मध्यम उत्तम) ज्योति हैं, और 'वैश्वानर' यह पार्थिव
अग्नि है । क्योंकि उन (ज्योतियों) से उत्पन्न होता है !
कैसे यह (पार्थिव अग्नि) उन (विद्युत् और आदित्य)
से उत्पन्न होता है ? जहां वैद्युत (बिजली की) अग्नि
किसी आश्रय (काष्ठ या जल) में आती है, जब तक मनुष्यों
से ग्रहण नहीं की जाती है, मध्यमधर्मा ही रहती है-उस में
विद्युत् का स्वभाव ही रहता है । [स्वभाव कौनसा ?] जल
से जलना और पार्थिव वस्तु तृण काष्ठ आदि से बुझना ।
जैसे ही मनुष्य उसे लेलेते हैं, उदक (जल) से बुझने और
कठोर (काष्ठ आदि) से जलने लगती है ॥ ६ ॥
व्याख्या
अब भाष्यकार कुछ नैरूक्तों और पूर्व याज्ञिकों के उन
मतों को खण्डन करते हैं, जिनमें "वैश्वानर" विद्युत् अथवा
आदित्य ठहरता है । इसके लिये आप अपने सहमत शाक-
पूणि आचार्य के मतको उद्धृत करते हैं, जिस में कि-पहिले
"वैश्वानर" के पार्थिव अग्नि होने में छः प्रमाण दिये हुये
हैं और फिर उक्त दोनों विपक्षों के सब हेतुओं का खण्डन
भले प्रकार से किया है । तथा और २ भी आवश्यक प्रमाण
दिये हैं । भाष्यकार शाकपूणि के मत को इस विषय में बड़ा
युक्तिसम्पन्न और पर्याप्त समझते हैं, इस लिये उसके मतके
दिखा देने के साथ ही इस विषय और अध्याय को समाप्त
कर देंगे ।
शाकपूणि का मत और स्वपक्ष मण्डन ।
हिन्दी निरुक्त ( ६४ ) ७ अ० ६ पा० ७ खं०
शाकपूणि आचार्य कहते हैं कि- "वैश्वानर" शब्द ही
इस बात में साक्ष्य देता है कि-यह पार्थिव अग्नि ही वैश्वा-
नर है । क्योंकि-'विश्वानर' नाम और 'अण्' तद्धित (प्रत्यय)
के योग से 'वैश्वानर' शब्द बनता है । 'विश्वानर' नाम
विद्युत् तथा आदित्य का है उनका पुत्र होने से पार्थिव अग्नि
'वैश्वानर' कहलाता है । व्याकरण की रीति से यह अर्थ
युक्तिसंगत है ।
विद्युत् का अपत्य पार्थिव अग्नि ।
विद्युत् (बिजली) अन्तरिक्ष लोक का तेज है । जब
वह ओषधि वनस्पतियों पर गिर जाता है, तो उसी का
पार्थिव अग्नि बन जाता है। जब तक वह आकाश में रहता
है, पानी से जलता है और काष्ठ आदि पार्थिव कठोर वस्तु-
से बुझता है, और जब पृथिवी में आकर पार्थिव अग्नि बन
जाता है, तब पानी से बुझने लगता है और काष्ठ से जलने
लगता है । इससे ये दोनों आपस में भिन्न २ हैं और पिता
पुत्र हैं ॥६॥
( खं० ७ )
(निरु०-) अथ आदित्यात्। उदीचि मथसमा-
वृत्ते आदित्ये कंसं वा मणिं वा परिमृज्य प्रति-
स्वरे यत्र शुष्कगोमयम् असंस्पर्शयन् धारयति
तत् प्रदीध्यते, सोऽयमेव सम्पद्यते ।
अथाऽपि आह-"वैश्वानरो यतते सूर्येण-"
इति । नच पुनः आत्मना आत्मा संयतते, अन्ये-
नैव अन्यः संयतते ।
हिन्दी निरुक्त ( ६५ ) ७ अ० ६ पा० ७ खं०
इतः इमम् आदधाति ।
अमुतः अमुष्य रश्मयः प्रादुर्भवन्ति, इतः अस्य
अर्चिषः, तयोर्भासोः संसङ्गं दृष्ट्वा एवम्-अव-
क्ष्यत् ॥ ७ ॥
अर्थ :- “अथ आदित्यात्” अब आदित्य से (पार्थिव
अग्नि का जन्म कहते हैं-) । उत्तर दिशा में 'पहिले पहिल
आए हुये आदित्य में (आदित्य के साम्हने) कंस (कांसी)
को और मणि (तैजस = आतिशी कांच आदि) को साफ
करके धूप में जहां सूखा गोबर हो उससे न बुझाता हुआ (जैसे
कि-उस पर उसकी छाया पड़े) आदमी धारण करता है, तो
वह जलने लगता है-उस कांसी या कांच के द्वारा सूर्य से उस
गोबर में तेज उतर आता है, यह यही (पार्थिव अग्नि)
बन जाता है।
और भी मन्त्रद्रष्टा = ऋषि कहता है- “वैश्वानरो०”
वैश्वानर सूर्य के साथ मिलता है। और फिर अपने से आप
(कोई) मिलता नहीं, (किन्तु) दूसरे से ही दूसरा मिलता है।
“इतः इमम्०” इस सूखे गोबर से उत्पन्न अग्नि को
(काष्ठ आदि से) रख लेते हैं। (यह प्रकार आदित्य से
पार्थिव अग्नि की उत्पत्ति का है।)
“अमुतः” उस (आदित्य मण्डल) से उस (आदित्य)
की रश्मियें (किरणें) प्रकट होती हैं, इस (पार्थिव अग्नि)
से इसकी अर्चिषं (ज्वालाएं) निकलती हैं; उन दोनों
प्रकाशों का संयोग देख कर (ऋषि ने) ऐसा कहा होगा-