निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६२ ) ७ अ० ६ पा० ६ खं०
प्रकार वैश्वानर के द्वादश कपाल पुरोडाश की विधि का
अनुकरण भी प्रमाण है । क्योंकि देवताओं के गुणों की समा-
नता को लेकर ही यज्ञ में गुणों की विधि कल्पित होती हैं
इष्ट देवता में जैसे गुण होते हैं, उसके यज्ञ में वैसे ही गुणों
की विधिएं की जाती हैं । जिससे कि वैश्वानर आदित्य है
और आदित्य चैत्र आदि बारह मासों का विभाग करता है
अथवा चैत्र आदि बारह मासों में भिन्न २ स्वरूपों से बारह
प्रकार का होता है, इसी से उसका पुरोडाश बारह कपालों
पर संस्कार किया जाता है = पकाया जाता है । सुतराम्
वैश्वानर के लिये द्वादशकपाल की विधि का अनुकरण उसके
आदित्य होने को सिद्ध करता है । ब्राह्मण निविद् और सूक्त
अपने शब्दों में ही "वैश्वानर" को आदित्य कह रहे हैं॥६॥
( खं० ६ )
[निरु०-] अयमेव अग्निर्वैश्वानरः-इति शाक-
पूणिः । विश्वानरौ एते उत्तरे ज्योतिषी, वैश्वानरो
ऽयम् । यत् ताभ्यां जायते ।
कथं नु अयम्-एताभ्यां जायते, इति ? यत्र
वैद्युतः शरणम् अभिहन्ति, यावद् अनुपात्तो
भवति मध्यमधर्मैस्तावद् भवति- उदकेन्धनः
शरीरोपशमनः, उपादीयमान एव अयं सम्पद्यते
उदकोपशमनः शरीरदीप्तिः ॥६॥
अर्थ.- "अयमेव०" यही (पार्थिव) अग्नि वैश्वानर