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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पक्ष में सूर्य की किरणें पी जाती हैं। वैसा भी यह निगम है-
यमक्षितिमक्षितयः पिबन्ति" अर्थात् जिस 'अक्षितिम्'
(अक्षय) चन्द्रमा को 'अक्षितयः' (अक्षय) सूर्य की रश्मिएं
पान करती हैं। बदीमें चन्द्रमाको पान करके वे सूर्यकी किरणें
फिर शुक्ल पक्ष (सुदी) आने पर उसे पुष्ट कर देती हैं।
वैसा भी यह निगम है।— "यथा देवा अंशुमाप्याय-
यन्ति" अर्थात् जिस प्रकार ये सूर्य की किरणें 'अंशुम्'
चन्द्रमा को 'आप्याययन्ति' पुष्ट करती हैं, हे यजमान ! उसी
प्रकार 'देवाः' देवता तुझे पुष्ट करें ॥ ६ ॥
(खं० ७)
[नि०] अध्रिगुः ॥४३॥ आङ्गूषः ॥४४॥
(निरु०) अध्रिगुर्मन्त्रोभवति । गवि अधिकृतत्वात्
अपिवा प्रशासनमेव अभिप्रेतं स्यात्, तच्छब्दवत्त्वात्
"अध्रिगो शमीध्वं सुशमि शमीध्वं शमीध्वमध्रिगो"
इति ॥ अग्निरपिअध्रिगुः- उच्यते।"तुभ्यंश्चोतन्त्य-
ध्रिगोशचीवः ।"
अधृतगमनकर्मवन् ।
इन्द्रोऽपि अध्रिगुः उच्यते ॥
"अध्रिगाव ओहामिन्द्राय" (ऋ०सं० १, ४, २७, १)
इत्यपि निगमो भवति ।
आङ्गूषः स्तोम आघोषः ।

हिन्दी निरुक्त (१५७) ५ अ० २पा० ७ खं०
“एनाङ्गूषेण वयमिन्द्रवन्तः” (ऋ०सं०१,७,२३,४)
अनेन स्तोमेन वयम् इन्द्रवन्तः ॥ ७(११) ॥
'अध्रिगु' (४३) यह अनवगत और अनेकार्थ है ।
'अध्रिगु' मन्त्र होता है। क्यों कि-वह गो (वाणी) में
अधिकृत (स्थित) रहता है । अर्थात्-'अधिगु' शब्दसे 'अध्रिगु'
होता है । अथवा प्रशासन माना जासकता है कि-'अध्रिगु'
नाम वाला कोई देवताओं में शमन करने वाला देव विशेष
है, क्यों कि मन्त्र में शमन करने वाले के लिये ही 'अध्रिगो'
सम्बोधन आया है ।-
“अध्रिगो शमीध्वम्” अर्थात्-हे अध्रिगो ! तुम सब
शमन (पशु का संस्कार विशेष) करो । “सुशमि शमीध्वम्”
सुन्दर शमन हो, वैसे ही शमन करो “शमीध्वमध्रिगो !”
हे अध्रिगो ! तुम सब शमन करो ।
यहां मन्त्र में 'अध्रिगु' पद से संबोधन करके पुनः पुनः
शमन करने की प्रेरणा की गई है, इससे यही अवगम होता
है कि-शमन कर्म करने वाले का ही यह नाम है ॥
अग्नि भी 'अध्रिगु' कहा जाता है “हे अध्रिगो”
(अधृतगमन !) नहीं जाने वाले “शचीवः” हे (कर्मवन्)
कर्मवाले ! या कर्मवीर ! 'तुभ्यम्' तेरे लिये (स्तोकासः) घृत
और मेदा की विन्दुएं “श्चोतन्ति” झरती हैं । इस प्रकार
यहां 'अध्रिगो' सम्बोधन अग्नि को किया गया, इस से अग्नि
'अध्रिगु' है ॥
इन्द्र भी 'अध्रिगु' कहलाता है। क्योंकि=इसके गमन को
किसीने धारण नहीं किया है ।

“'अभ्रिगवे' (अधृतगमनाय) दूसरेसे नहीं धारण किये हुए
गमन वाले 'इन्द्राय' इन्द्र के लिये 'ओहम्' मैं (हवियों को
देता हूँ ।) इस प्रकार इन्द्रका विशेषण होनेसे 'अभ्रिगु' इन्द्र
का नाम है ॥
'आङ्गूषः'(४४) यह अनवगत है । स्तोम ( मन्त्र समूह ) अर्थ है । 'आघोषः'
यह शब्दसमाधि है ।
'आंगूष' क्या ? स्तोम ( मन्त्रसमूह ) । वह क्यों ? आघोष
( फैलकर गूंजने वाला ) है ।
“एन” (अनेन) इस “आङ्गूषेण”(स्तोमेन) मन्त्र समूह
से “वयम्” हम “इन्द्रवन्तः” इन्द्र वाले हैं ॥ इस प्रकार
`यह मन्त्र में 'आङ्गूष' शब्दसे स्तोम कहा गया है ॥ (११) ॥
(निघ०-) आपान्तमन्युः ॥४५ ॥ श्मशा
॥४६॥
[निरु०-] “आपान्तमन्युस्तृपलप्रभर्मा धुनिः शिमी-
वाञ्छरुमाँ ऋजीषी । सोमो विश्वान्यतसा वनानि
नार्वागिन्द्रं प्रतिमानानि देभुः ॥” (ऋ० सं० ८, ४,
१४, ५)
आपतितमन्युः तृप्रप्रहारी क्षिप्रप्रहारी (सिप्र-
प्रहारी) सोमोवा इन्द्रोवा ॥
'धुनि.' धुनातेः ।
'शिमी'-इति कर्मनाम । शमयतेर्वा। शक्नोतेर्वा ।
ऋजीषी सोमः, यत् सोमस्य पूयमानस्य अति-

रिच्यते तत् ऋजीषम्,-अपार्जितं भवति, तेन ऋ-
जीषी सोमः ॥
अथापि ऐन्द्रो निगमो भवति-“ऋजीषी वज्री”
( ऋ० सं० ४, २, ११, ४ ) इति । हर्योः अस्य स
भागः, धानाश्च इति ॥
'धानाः' भ्राष्ट्रे हिता भवन्ति । फलेहिता भवन्ति
इति वा ।
“बब्धां ते हरी धाना उप ऋजीषं जिघ्रताम् ॥”
इत्यपि निगमो भवति ।
आदिना अभ्यासेन उपहितेनउपधामादत्ते ।
बभस्तिः अत्तिकर्मा । सोमः सर्वाणि अतसानि
वनानि । न अर्वाक्-इन्द्रं प्रतिमानानि दम्भ्नुवन्ति
यैः (ये) एनं प्रतिमिमते न-एनं तानि दम्भ्नुवन्ति,
अर्वागेव एनमप्राप्य विनश्यन्ति-इति ॥
इन्द्रप्रधाना-इत्येके नैघण्टुकं सोमकर्म उभयप्र-
धाना इत्यपरम् ॥
'रमशा' शु अश्नुते इतिवा । श्माश्नुते इतिवा ॥
“अवरमशा रुधद्द्वाः ।” (ऋ० सं० ८, ५, २६, १) ।
अवारुधत् रमशा वाः-इति ॥ ८ ( १२ ) ॥
इति पञ्चमाध्यायस्य द्वितीयः पादः समाप्तः॥ ५, २ ॥

हिन्दी निरुक्त ( १६० ) ५ अ० २ पा० ७ खं०
‘आपास्तमन्धु’ ( ४५ ) यह अनवगत है और पक्ष में अनेकार्थ है।
‘आपातितमन्यु’ यह अगम है।
अर्थ:- ‘आपास्तमन्धुः’ संग्राम में शत्रुओं द्वारा उत्तेजित
अथवा क्रोधित हुआ हुआ ‘तृपलप्रभर्मा’ (तृपप्रहारी = क्षिप्र-
प्रहारी) शीघ्र प्रहार करनेवाला सोम अथवा इन्द्र-‘धुनिः’
(यदि सोम है।) पात्रों का कंपाने वाला (यदि इन्द्र)
शत्रुओं का कंपाने वाला ‘शिमीवान्’ अपने अधिकार-युक्त
कर्मवाला ‘शरुमान्’ हिंसावान् ‘ऋजीषी’ (सोम पक्षे-) खूखस-
वाला (इन्द्र पक्षे-) जिस के घोड़ों का ऋजीष (खूखस) भाग
होता है, (इस प्रकार आधी ऋचा सोम अथवा इन्द्र की है।)
(केवल सोम पक्ष में ३रा पाद्-) ऐसे गुणों से युक्त ‘सोमः’
सोम ‘विश्वानि’ सब ‘अतसा’ (अतसामि) कभी न घटने
वाले ‘वनानि’ वनों को अथवा जलों को अपनी महिमा से
व्यापन करता (व्याप लेता) है। क्यों कि वह उन का
अधिपति है। इस प्रकार पहिले के साके के दो पादों को ले
कर तीन पाद् सोम के होते हैं। (केवल इन्द्र पक्ष में ४था
पाद्-) ‘इन्द्रम्’ इन्द्र को ‘न प्रतिमानानि’ नहीं मान
(स्तुति) करने वाले ‘अर्वाक्’ पहिले ही (इन्द्र के मिलने से)
‘देभुः’ दब जाते (तिरस्कृत हो जाते) हैं। इस प्रकार इस
मन्त्र में तीन पाद् सोम के और तीन पाद् इन्द्र के हैं, तथा
यह मन्त्र दो देवताओं का (उभय दैवत) है॥
निरुक्तार्थ:- ‘आपातितमन्यु’ आगिरा है क्रोध जिस को,
तृपप्रहारी क्षिप्र (शीघ्र) प्रहार करने वाला अथवा सोम
अथवा इन्द्र॥
‘धुनि’ कंपाने वाला। ‘धुञ्’ कम्पनार्थक (स्वा० उ०)
धातु का है।

हिन्दी निरुक्त ( १६१ ) ५ अ० २पा० ७ खं०
'शिमी' यह कर्म का नाम है। अथवा 'शम्' (चु० उ०)
धातु से है। अथवा 'शक्' ( स्वा० उ० ) धातु से है।
'ऋजीषी' सोम होता है। क्यों कि जो सोम के छानने
से खूखस बच जाता है, वह ऋजीष कहलाता है, तथा अलग
डाल दिया जाता है, उससे ऋजीषवाला होने से ऋजीषी सोम
है। तो भी इन्द्रका निगम है—
“ऋजीषी वज्री” अर्थात् ऋजीषवाला वज्र वाला ॥
इस के दो घोड़ों का ऋजीष और धान भाग होता है।
'धाना' क्यों ? भाड़में धारण किये हुए होते हैं। अथवा
फलक या तख्ते पर रखे हुए होते हैं ॥
“ हे इन्द्र ! 'ते' तेरे 'हरी' घोड़े ' धानाः ' धानों का
'बब्धाम्' खाएँ ( और 'ऋजीषम्' सोमके खूखस को 'उप-जिघ्र-
ताम्' सूंघें"-यह भी निगम है)।
'बब्धाम्' इस पद में भक्ष्यार्थक 'भस्' धातु है,वह आदि
अक्षर दोहरा कर लगे हुए बकार से उपधा ( अन्तिम अक्षर से
पूर्व अक्षर ) अकार को लेलेता (लोपकरदेता) है। ( “घसि-
भसोर्हलि ” ( पा० ६, ४, १०० ) सूत्र से अकार का लोप,
'त' का 'ध' और 'भ' का 'ब' होता है ) इस प्रकार 'बभस्'
धातु और 'ताम्' विभक्ति से ' बब्धाम् ' यह रूप बनता है।
सोम सब अक्षय वनों को ( व्यापता है।) इन्द्र को न
मानने वाले पहिले ही नष्ट हो जाते हैं। जो इन्द्र को नहीं
मानते, वे इसे तिरस्कार नहीं कर सकते बल्कि-पहिले ही
इसे अप्राप्त होकर नष्ट हो जाते हैं।
कोई आचार्य कहते हैं-यह “ आपान्तमन्युः
२१

हिन्दी निरुक्त ( १६२ ) ५ अ० ३ पा० १ खं०
ऋचा इन्द्र को ही प्रधानता से कहती है, सोम कर्म गौणता से
है। ( इस मतमें तीसरे पाद में सोम-कर्म उपमा होजाता है।
जिस प्रकार सोम सब अक्षय धमों को व्यापता है, उसी प्रकार
“आपान्तमन्यु” आदि सकल विशेषणों वाला इन्द्र सब
जगत् को व्यापता है। इस प्रकार चारों ही पाद इन्द्र देवता
के हो जाते हैं।) ‘दोनों देवताओं की प्रधानता है’ यह
दूसरा मत है॥
‘इमशा’ (४६) यह अनवगत है। ‘श्वाशिनी’ या ‘श्माशिनी’ यह अवगत है
‘श्वाशिनी’ शीघ्र खाने वाली या शीघ्र व्यापन करने वाली कुल्या अथवा नदी
है। ‘श्माशि’ श्म (शरीर) को व्यापन करने वाली नाड़ी होती है। इस प्रकार
इसके भिन्न २ प्रकार से विभाग करने से यह ( श्मशा ) शब्द अनेकार्थ भी
होता है।
‘श्मशा’ अथवा ‘शु-अश्नुते’ जलदी व्यापन करती है।
अथवा ‘श्म-अश्नुते’ शरीर को व्यापती है।
“अवश्मशा रुधद्वाः”
‘वाः’ जल या रस ‘श्मशाः’ नदियों को या नाड़ियों को
‘अवरुधत्’ आवरण करेगा ॥ ( इस प्रकार इस मन्त्रमें ‘श्मशा’
शब्द नदी या नाड़ी का नाम होता है ) ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते पञ्चमाध्यायस्य द्वितीयःपादः समाप्तः ॥५,२॥
तृतीयः पादः।
( खं० १ )
[निघ०-] उर्वशी ॥ ४७ ॥
[निरु०-] उर्वशी अप्सराः। उरु-अभ्यश्नुते। उरु-
भ्यामश्नुते। उरुर्वा वशोऽस्याः ॥

हिन्दी निरुक्त ( १६३ ) ५ अ० ३ पा० १ खं०

अप्सराः, अप्सारिणी । अपिवा अप्स इति रूप
नाम । अप्सातेः । अप्सानीयं भवति । आदर्शनि-
यम् । व्यापनीयंवा । स्पष्टं दर्शनाय-इति शाक-
पूणिः ॥
यत्-अप्सैः-इति अभक्षस्य । “अप्सो नाम”
इति व्यापिनः ।
तद्रा भवति, रूपवती, तत् अनया आत्तम्-इतिवा
तत्-अस्यै दत्तम्-इतिवा ॥
तस्या दर्शनात् मित्रावरुणयो रेतश्चस्कन्द, तद-
भिवादिनी एषा ऋग् भवति ॥ (१३) ॥
'उर्वशी'(४७) शब्द अनवगत है । 'अप्सरा' यह अर्थ-कथन है । 'उर्वभ्या-
श्नुते' ( उरु ( महत् ) बड़े यश को व्यापन करती है ।) यह व्युत्पत्ति है ।
अथवा 'उरुभ्याम्' 'अश्नुते' (जांघों से मैथुन धर्म में पुरुष को व्याप्त लेती है ।
अर्थात्--'उर्वाशिनी' होने से 'उर्वशी' कही जाती है । अथवा 'उरुः अस्याः वश.'
क्यों कि--महान् काम (प्रयोजन) इस के वश (अधीन) है इससे यह
'उरुवशिनी' होने से 'उर्वशी' कही जाती है । ये शब्द-समाधिएं है ॥
अर्थ-'उर्वशी' (४७) अप्सरा है । क्यों कि-'उरु' बहुत
(यश) को अशन (व्यापन) करती है । (या-) उरुओं (जांघों) से
पुरुष को अशन (व्यापन) करती है । अथवा उरु (महान्)
काम इसके वश है ॥
'अप्सराः' क्यों ? अप्सारिणी या जल के प्रति नित्य ही
सरण (गमन) करती है । (क्यों कि वह उससे उत्पन्न हुई है,
इससे वही उस का प्रिय है ।) इस से 'अप्सरा' है । अथवा

हिन्दी निरुक्त ( १६४ ) ५ अ० ३पा० १ खं०
'अप्सः' यह रूप का नाम है । 'अ-प्सा' ( निषेधार्थक 'अ'कार
पूर्वक 'प्सा' भक्षणार्थक ( अदा० प० ) धातु ) का है क्योंकि-
वह अप्सानीय या अभक्षणीय ( नहीं खाने योग्य ) है । क्यों ?
आदर्शनोय है, अर्थात्-साम्हने से खड़ा होकर नेत्र से देखने
योग्य ही है, किन्तु मुख से खाने योग्य नहीं । अथवा वह
स्वयम् प्रकाश-स्वभाव होने से किरणों से व्यापने योग्य नहीं
है । “देखने के लिये स्पष्ट (प्रकट) ही होता है”-यह शाकपूर्णि
आचार्य मानते हैं ।
जिससे कि-मन्त्रों में 'अप्सः' यह शब्द अभक्ष्य का
वाचक देखा गया है, इससे ठीक कहा है कि-“अपिवा अ-
प्स इति रूपनाम” क्योंकि-“अप्सोनाम” इस मन्त्र में
यह व्यापी या व्यापक का नाम है ॥ ( न्याय शास्त्र में भो
रूप को व्याप्यवृत्ति या अपने आधार में व्यापकर रहने वाला
गुण माना है । ) ॥
इस प्रकार 'अप्सरा' शब्द के 'अप्स' भाग की व्याख्या
हुई अब 'रा' भाग की व्याख्या करते हैं-
“तद्रा भवति रूपवती ” 'र' का यहां मतुप्प्रत्यय
के समान अर्थ है, अर्थात् 'वाला' । इससे 'तद्रा' उस ( रूप )
वाली या 'अप्स' वाली होनेसे 'अप्सरा' है । अर्थात् रूपवाली
अथवा 'रा (अदा०प०) धातु है, उसके योगसे 'अप्सरा' शब्द
होता है-अर्थात् 'अप्स' ( रूप ) को 'रा' ग्रहण करने वाली
होने से 'अप्सरा' है । अथवा विधाताने इसे 'अप्स' ( रूप )
'रा' दिया है. इससे यह 'अप्सरा' है ।
उस के दर्शन से मित्रावरुण देवताओं का वीर्य झरगया
था, उसको कहने वाली यह ऋचा है- ॥ १ ( १३ ) ॥

हिन्दी निरुक्त ( १६५ ) ५ अ० ३ पा० २ खं०
( खं० २ )
(निघ०-) वयुनम् ॥ ४८ ॥
[निरु०] “उतासि मैत्रावरुणो वसिष्ठोर्वश्या
ब्रह्मन्मनसोऽधिजातः। द्रप्सं स्कन्नं ब्रह्मणा दैव्येन
विश्वेदेवाः पुष्करेत्वाऽददन्त ॥” [ ]
अप्यसि मैत्रावरुणो वसिष्ठोर्वश्या ब्रह्मन्! मनसो
ऽधिजातः, द्रप्सं स्कन्नं ब्रह्मणा दैव्येन ।
द्रप्सः संभृतः । प्सानीयोभवति । सर्वे देवाः
पुष्करे त्वा अधारयन्त ॥
‘पुष्करम्’ अन्तरिक्षम् । पोषति भूतानि ।
उदकं पुष्करम् । पूजाकरम् पूजयितव्यम् । इद
मपि पुष्करम्-एतस्मादेव । ‘पुष्करं’ वपुष्करंवा ।
पुष्पं पुष्पतेः ॥
‘वयुनं’ (४८) वेतेः । कान्तिर्वा । प्रज्ञा
वा ॥ २ (१४) ॥
“उतासि” यह ऋचा पुत्रसहित वसिष्ठ की आर्ष है, और उसी की अथवा
इन्द्र की स्तुति है ।
अर्थः-हे ‘वसिष्ठ!’ ‘उत’ (अपिच) और भी (त्वम्)
तू ‘मैत्रावरुण’ मित्रावरुण देवताओं का पुत्र है । किससे ?
‘उर्वश्याः’ उर्वशी अप्सरासे । क्या संघर्ष या मैथुन से ? हे
‘ब्रह्मन्’ ‘मनसः ‘अधिजातः’ मनसे हुआ है । क्या निर्बीज ?
‘द्रप्सं-स्कन्नम्’ वीर्य (मित्रावरुणों का) गिरा, (उर्वशीके दर्शन

से ।) 'दैव्येन' देवताओं की निजकी वस्तु 'ब्रह्मणा' ऋग्यजुः,
साम-रूप वेदसे स्तुति करते हुए 'विश्वे-देवाः' सब देवताओं
ने (यह वीर्य पृथ्वी में न गिरे इस लिये) 'त्वा' तुझे (उस
वीर्य के साथ) 'पुष्करे' (घड़े के ऊपर) जल या अन्तरिक्ष
में 'अददन्त' धारणकिया ।
'द्रप्स' वीर्य क्यों ? 'द्रप्स' कहलाता है । 'द्रप्स' क्या !
'रेतस्' संज्ञक रस पुरुष के सब अङ्गोंसे संभृत या इकट्ठा
किया हुआ होता है। अथवा 'क्षानीय' या स्त्रीयोनिका भक्ष-
णीय है। इस प्रकार 'द्रप्स' शब्द भरणार्थक भृञ् (स्वा०उ०)
धातु से या भक्षणार्थक 'प्सा' (अदा० प०) धातु से है।
'पुष्कर' अन्तरिक्ष होता है। क्यों कि-वह भूतों (प्राणि-
ओं) को अवकाश दान से पोषण करता है। अथवा उदकं
(जल) पुष्कर होता है। क्योंकि-उससे पूजा की जाती है, इस
से 'पूजाकर' होने से 'पुष्कर' है। अथवा स्वयम् (आप ही)
पूजनीय होने से पुष्कर है। यह पुष्कर (कमल) भी इसी से
है। क्यों ? पुष्कर कहलाता है, वह भी पूजाकर (पूजा का
साधन) या स्वयम् सुन्दर होने से पूजनीय है। अथवा 'वपु-
ष्कर' होने से पुष्कर है। क्यों कि-व्यवहार में लाने पर भी
वपुष् (शरीर) वान् हो रहता है।
'पुष्प' शब्द 'पुष्प' फूलने अर्थ में (दि० प०) धातु से है।
क्योंकि-वह फूलता है।
'वयुन' (४८) शब्द अनैकार्थ और अनवगत है। 'वी'
(अदा० प०) धातु से है। 'वेन' यह न्याय्य है। कान्ति
अथवा प्रज्ञा (बुद्धि) अर्थ है ॥ २ (१४) ॥

हिन्दी निरुक्त ( १६७ ) ५ अ० ३ पा० २ खं०
व्याख्या ।
“उतासि” ऋचा में वसिष्ठ के जन्म के साथ ‘उत’ (भी) पद
लगाया है, जिससे वसिष्ठ के नीचे वाली ऋचा में वर्णन किये
हुए और दो जन्मों की सूचना होती है ।
“विद्युतो॒ ज्योतिः॒ परिसं॒जिहा॑नं मित्रा॑वरुणा॒
यदप॑श्यतां त्वा । तत्ते॒ जन्मोंतै॒कं व॑सिष्ठाग॒स्त्यो॒ यत्
त्वा॒ विश॑ आजभा॒र (ऋ० सं० ५, ३, २३, ५ )
अर्थात् हे ‘वसिष्ठ!’ ‘यत्’ जो ‘मित्रावरुणा’ (मित्रावरुणौ)
मित्रावरुण देवताओं ने ‘विद्युतः’ विशेष रूप से देदीप्यमान
( चमकीली ) उर्वशी से ‘परि-संजिहानम्’ चारों ओर फैलती
या उत्पन्न होती हुई ‘ज्योतिः’ ज्योति को (ज्योति के रूप से)
‘त्वा’ तुझे ‘अपश्यताम्’ देखा, ‘तत्’ वह ‘ते’ तेरा ‘एकम्’ एक
‘जन्म’ जन्म है । ‘उत’ और ‘अगस्त्यः’ अगस्त्य ‘यत्’ जो
‘त्वा’ तुझे ‘विशः’ ( मनुष्यान् ) मनुष्यों के प्रति ‘आजभार’
( आहृतवान् ) लाया, यह तेरा दूसरा जन्म है ॥
इस प्रकार “उतासि” और “विद्युतः” इन दोनों
मन्त्रों में वसिष्ठ जी के तीन जन्म बताए गए हैं । पहिला
जन्म–उर्वशी से निकली हुई ज्योति मित्रावरुण देवताओं को
दिखाई दी । दूसरा जन्म–अगस्त्य के द्वारा मनुष्य जाति में
है, इसमें यह नहीं प्रतीत होता कि–यह मैथुनजन्म है या
अमेथुन ? और तीसरा जन्म–उर्वशी के दर्शन से मित्रावरुण
देवताओं का वीर्य गिरता हुआ सब देवताओं ने देखा और
उसे मन्त्रों के द्वारा स्तुति करके जल या अन्तरिक्ष में रखा ।
यहां जो तीसरा जन्म है, उस से मन्त्र के आधिभौतिक

अर्थ के पक्ष में एक ऐसे विज्ञान की सूचना भी मिलती है,
जिसमें गर्भाशय से अन्यत्र भी वीर्य रक्षित हो कर शरीर को
उत्पन्न कर सकता है, अस्तु, अमेथुन सृष्टि पर अविश्वास करने
वाले वैदिक इस पर ध्यान देवें । पुराणों में भी वसिष्ठ जी की
उत्पत्ति उर्वशी से कही गई है, वह भी प्रपृच्छ है ।
मन्त्रों का विषय अनेक प्रकार का होता है-यहाँ पर
“उतासि” मन्त्र का वसिष्ठ ही ऋषि (वक्ता) है, और उसी
के लिये 'असि' यह मध्यम पुरुष या 'युष्मद्' (तू) शब्द है,
यह परस्पर विरुद्ध है, कि-वही वक्ता और वही श्रोता ?
किन्तु मन्त्र नित्य हैं, इन में यह दोष नहीं है, वास्तव में
कोई श्रोता और वक्ता हो तो यह दोष आसकता है । किसी
बात को किसी तरह भी कहने में वेद स्वतन्त्र है अथवा स्वयम्
पुरुष भी अपने आपे को कभी कुछ कहने लगता है, उसी
प्रकार यह मन्त्र भी है ॥ २ (१४) ॥
(खं० ३)
(निघ०-) वाजपस्त्यम्॥४६॥ वाजगन्ध्यम्
॥५०॥ गध्यम् ॥ ५१ ॥ गधिता ॥ ५२ ॥
कौरयाणाः ॥ ५३ ॥ तौरयाणाः ॥ ५४ ॥
अह्रयाणाः ॥ ५५ ॥ हरयाणाः ॥ ५६ ॥
आरितः ॥ ५७ ॥ ब्रन्दी ॥ ५८ ॥
(निरु०-) “स इत्तमोऽवयुनं ततन्वत्सूर्येण वयुन-
वच्चकार । (ऋ० सं० ४, ६, ११, ३)

हिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ५ अ० ३ पा० ३ खं०
सतमः अञ्जानं ततन्वत् सतं सूर्येण प्रज्ञानवत्
चकार ॥
'वाजपस्त्यं' वाजपतनम् ।
“सनेम वाजपस्त्यम् ” (ऋ०सं० ७, ४, २४, ६)
इत्यपि निगमो भवति ॥
‘वाजगन्ध्यम्’ गध्यत्युत्तरपदम् ।
“अश्याम वाजगन्ध्यम्” (ऋ०सं० ७,४,२४,६)
इत्यपि निगमो भवति ॥
'गध्यं' गृह्णातेः ।
“ऋज्रावाजं न गध्यंयुयूपन् ” (ऋ०सं० ३, ५,
१९, १) इत्यपि निगमो भवति ॥
गध्यति र्मिश्रीभावकर्मा ।
“आगधिता परिगधिता” (ऋ० सं० २, १,
११, ६) इत्यपि निगमो भवति ॥
'कौरयाणः' क्रुतयानः ।
“पाकस्थामा कौरयाणः” (ऋ०सं० ५,७,२९,१)
इत्यपि निगमो भवति ॥
'तौरयाणः' तूर्णयानः ।
“सतौरयाण उपयाहि यज्ञं मरुद्भि रिन्द्र
सखिभिः सजोषा ” [ ऋ० सं० ]
२२

हिन्दी निरुक्त ( १७० ) ५ अ० ३ पा० ३ खं०
इत्यपि निगमो भवति ॥
'अह्रयाणः' अह्हीतयानः ।
“अनुष्ठयाकृण्वद्यह्रयाण” (ऋ०सं०३,४,२५,४)
इत्यपि निगमो भवति ॥
'हरयाणः' हरमाणयानः ।
“रजतं हरयाणे” ( ऋ० सं० ६, २, २५,, २ )
इत्यपि निगमो भवति ॥
“य आरितः कर्मणि कर्मणि स्थिरः” (ऋ०सं०
१, ७, १२, ४ ) । प्रत्युतः स्तोमान् ॥
'बन्दी' बन्दते मृदुभावकर्मणः- ॥ ३ [१५] ॥
अर्थः—हे भगवन् ! इन्द्र! जैसा कि-हम तुझे वर्णन कर
चुके हैं 'सः' सो तूने इत् ( एतत् ) इस ' अवयुनम् ' अज्ञान
रूप 'तमः' अँधेरे को 'ततन्वत्' फैलाया । 'सः' सो तूने ही
'तम्' उस (इस) लोक को 'सूर्येण' सूर्यरूप अपने प्रकाश से ' व-
युनवत्' ( प्रज्ञानवत् ) ज्ञानयुक्त 'चकार' किया। इस प्रकार
इस मन्त्र में ' तम फैला कर सूर्य से वयुनवत् करता है, इस
सम्बन्ध के द्वारा 'वयुन' शब्द प्रज्ञान ( प्रकाश ) का वाचक
होता है ॥
' वाजपस्त्य ' ( ४६ ) क्या ? वाजपतन । वह क्या ?
जिस पर वाज ( अन्न ) समझ कर देवता पतन करें ( गिरें) ।
' हम ' वाजपस्त्यम् सोम को ' सनेम ' भजें '—यह भी
निगम है ।
'वाजपस्त्य'-देवता लोग सोम को अपना वाज ( अन्न)

हिन्दी निरुक्त ( १०१ ) ५ अ० ३ पा० ३ खं०
समझ कर उस पर पतन ( गमन ) करते हैं, इसी से सोम
वाजपस्त्यं है। इस प्रकार शब्दकी समानता और अर्थ की
उपपत्ति होने से यहां 'वाजपस्त्य' नाम सोम का है।
'वाजगन्ध्य' (४८) इसमें 'गध्' (दि०प०) धातु उत्तरपद है-
'वाज' शब्द और 'गध्' धातु के मेल से है।
यह शब्द भी पूर्वोक्त "सनेम वाजपस्त्यम्” निगम का ही है, केवल
भेद यह है कि-मन्त्र मे समाम्नाय के क्रमकी अपेक्षा विपरीत क्रम से आता
है । "वाजपस्त्यम्" (४६) "वाजगन्ध्यम्" (५०) यह समाम्नाय ( निघण्टु )
का क्रम है, और निगम में-"अश्याम वाजगन्ध्य, सनेम वाजपस्त्यम्" (ऋ०सं०
७, ४, २४, ६) अर्थात्-"हम 'वाजगन्ध्यम्' वाज ( अन्न ) की गन्ध वाले
(सोम) को पावें, हम वाजपस्त्य ( जिसे देवता अपना अन्न समझ कर पाते
है, ) को भजें" यह क्रम है । अतः समाम्नाय ओर निरुक्त के आचार्य का भेद
अभेद का यह भी विचार स्थल है । देखो चतुर्थाध्याय की भूमिका ॥
“अश्याम वाजगन्ध्यम्” (हम) 'वाजगन्ध्यम्' सोम
को 'अश्याम' भजें । यह भी निगम है ॥
'गध्य' (५१) यह शब्द अनवगत है । ग्रहणार्थक 'ग्रह'
(क्र्या० उ०) धातु का है । (ग्रहणीय ( ग्रहण करने योग्य )
यह अर्थ की प्रतीति है ।)
“हे इन्द्र ! युद्ध में शत्रुओंके समान अपनेको “युयूषन्”
भिड़न्त करने की इच्छा करता हुआ “ऋज्रा” सीधे राह से
“वाजे-न” अन्न के समान 'गध्यम्' ग्रहण-योग्य वस्तु को
सम्मुख भाव से भज" यह भी निगम है ॥
'गधिता' (५२) शब्द में 'गध्' (दि०प०) धातु अप्रतीतार्थ है । इस
का अर्थ जान नहीं पड़ता । सो मिश्रीभाव अर्थ में है । मिश्रीभाव मिलाने
का नाम है ।

हिन्दी निरुक्त ( १७२ ) ५ अ० ३ पा० ३ खं०
'गध्यति' ( 'गध्' दि० प० ) धातु मिश्रीभाव (मिलाने)
अर्थ में है ।
"आगधिता" सम्मुखता से पकड़ी हुई "परि-
गधिता" (परिष्वक्ता) दोनों भुजाओं से सुख से लिपटाई
हुई । यह भी निगम है ॥
यहां मैथुन के संबन्ध से और शब्द की समानतासे 'गध्'
धातु का मिश्रीभाव या मिलाना अर्थ है ।
'कौरयाण' (५३) क्या ? कृतयान वह क्या किया
हुआ यान ।
“यं मेदुरिन्द्रो मरुतः पाकस्थामा कौरयाणः ।
विश्वेषां त्मना शोभिष्ठमुपेव दिवि धावमानम् ॥
( ऋ० सं० ५, ७, २९, १ )
मेधातिथि कण्व ऋषि की यह ऋचा है । इससे आकाशयान की
प्रशंसा की है ।
'यम्' जो यान 'मे' मुझे 'इन्द्रः' इन्द्र ने और 'मरुतः'
मरुतों ने 'दुः' दिया है, वह 'पाकस्थामा' बड़ा पक्का (दृढ)
है, 'कौरयाणः' अनेक सुधारों से सत्कार किया हुआ है,
अतएव 'विश्वेषाम्' सब यानों के मध्य में 'त्मना' अपने स्व-
रूप से 'शोभिष्ठम्' बहुत सुन्दर (अनेक रत्नों से चित्र विचित्र)
और 'दिवि' आकाश में 'उपधावमानम्' दौड़ने वाला है ॥
यह भी निगम है ।
'तौर्याण (५४) क्या ? तूर्णयाम वह क्या ? शीघ्र चलने
वाले यान वाला
“ हे इन्द्र ! 'सः' सो तू 'मरुद्भिः' 'सखिभिः' मरुत् सखा-

हिन्दी निरुक्त ( १७३ ) ५ अ० ३ पा० ३ खं० '
ओं सहित 'सजोषः' प्रसन्न होता हुआ 'तौर्याणः' अपने यान
(विमान) को दौड़ाता हुआ 'यज्ञम्' हमारे यज्ञ को 'उप-
याहि' आ ॥ यह भी निगम है ॥
'अह्रयाण' ( ५५ ) क्या ? अह्रीतयान वह क्या ? अल-
ज्जितयान=दूसरे यान से न लज्जित होने वाला यान ।
“ हे अग्ने ! 'अनुष्ठुया' (अनुष्ठानेन) कर्मसे वह ‘कृणुहि'
कर, जो हम चाहते हैं। हे 'अह्रयाण' ! अलज्जित-यान (नहीं
लज्जित होने वाले यान वाले ! ) ” यह भी निगम है ॥
'हरयाण' (५६) क्या ? हरमाण-यान वह क्या ? जिस
का यान सदा चलता ही रहे ।
“ ऋज्र मुक्षण्यायने रजतं हरूयाणे ।
रथं युक्त मसनाम सुषामणि” (ऋ०सं० ६,२,२५,२)
विश्वमना वैयश्वः ऋषि की यह ऋचा है। उष्णिक् छन्द है। इससे
यान की स्तुति की जाती है। वह कहता है—
“ हमने 'हरयाणे' नित्य चलू यान वाले 'सुषामणि'
सुन्दर सामवेद वाले 'उक्षण्यायने' 'उक्षणयायन' नाम वाले
यजमान में (से) 'ऋज्रम्' सीधा चलने वाला 'रजतम्' चांदी
का 'रथम्' रथ 'युक्तम्' घोड़ोंसे जुड़ाहुआ (असनाम) पाया । ”
यह भी निगम है।
यहां शब्द की समानता और अर्थ की योग्यता से
"हरयाण" शब्द "हरमाणयान" से प्रतीत होता है।
भगवद् दुर्गाचार्य ने 'उक्षणयायन' नाम किसी यजमान
विशेष का बताया है। किन्तु 'उक्षन्' नाम बैल का है, और
यान नाम सवारी का है, इन दोनों के योग से 'उक्षणयान

हिन्दी निरुक्त ( १७५ ) ५ अ० ३ पा० ४ खं०
“मानो मघेव निष्पणी परादाः ।” ( ऋ० सं०
१, ७, १८, ५)
स यथा धनानि विनाशयति मानस्त्वं तथा
परादाः ॥
‘तूर्णाशम्’ उदकं भवति । तूर्णमश्नुते ।
“तूर्णाशं न गिरेरधि” [ ऋ० सं० ६,३,१,४ ]
इत्यपि निगमो भवति ॥
‘क्षुम्पम्’ अहिच्छत्रकं भवति । यत् क्षुभ्यते—
४ [ १६ ] ॥
‘नियद्वृषासि’ यह सव्य आंगिरस ऋषि की ऋचा है। जगती छन्द और
इन्द्र देवता है। वह इन्द्र ही अंगिरस् का पुत्र होगया है।
अर्थ—हे भगवन् ! इन्द्र ! ‘यत्’ जो (तू) ‘श्वसनस्य’
(शब्दकारिणः) शब्द करने वाले वायु के ‘च और ‘व्रन्दिनः’
अपने तेज से फल आदि को कोमल बनाने वाले ‘शुष्णस्य’
(शोषयितुः) (आदित्यस्य) सूर्य के ‘मूर्द्धनि’ ऊपर ‘रोरुवत्’
(रोरूयमाणः) गर्जता हुआ ‘वना’ (वनानि) जलों को
‘निवृक्षासि’ (विक्षसि) फेंकता है। अर्थात् ऊपर और नीचे
जलों को फेंकते हुए तेरी शक्ति कभी घटती नहीं। यहां जिस
पक्ष में “वना” पद का ‘मेघवधेन’ (मेघ के वध से) ऐसा
निर्वचन करते हैं, उस पक्ष में ‘निवृक्षासि’ क्रिया में जोड़ने के
लिये ‘उदकानि’ (जलों को) यह पद ऊपर से ले लिया
जाता है। इस प्रकार ‘व्रन्दी’ शब्द आदित्य का विशेषण हो
कर मृदु (कोमल) भाव अर्थ के वाचक ‘व्रन्द’ (भ्वा० प०)
धातु का ही ठीक होना है।

हिन्दी निरुक्त ( १७६ ) ५ अ० ३ पा० ४खंड

“अवन्दन्त वीलिता” अर्थात्-'वीलिता' (वीलितानि
गर्वितानि) गर्ववाले असुर-कुल 'अवन्दन्त' मृदु या ढीले हो
गए । यह भी निगम है।
यहां 'वीलयति' धातु और 'व्रीलयति' धातु संस्तम्भ
या गर्व (कठोर-भाव) के वाचक होते हुए पूर्व पठित 'व्रन्द'
धातु से सम्बन्ध युक्त पढे गए हैं, इस से 'व्रन्द' धातु कोमल
भाव अर्थ का वाचक ठहरता है। क्योंकि-कठोर असुर-कुलों
का कोमल होने के अतिरिक्त क्या होता ? ।
'निष्षपी' (५६) यह अनवगत है । 'विनिर्गतसप.' यह शब्दसमाधि है ।
स्त्री-काम (पुश्चल) या जार इसका अर्थ है ।
'निष्षपी' (५६) स्त्री की कामना रखने वाला होता है।
क्योंकि-वह विनिर्गत-सप (जिस का सप (पुरुष चिन्ह)
निकला हुआ हो) ही रहता है।
'सप' शब्द स्पर्श अर्थके वाचक 'सप' (भ्वा०प०) धातु
से है। क्योंकि-उससे स्त्री योनि सपी (छूही) जाती है।
“ 'यः' जो 'निष्षपी' जार है, 'सः' वह 'मघा-इव'
(यथा धनानि) जैसे धनों को (विनाशयति) नष्ट करदेता है,
(तथा) उस प्रकार 'मा' मत् 'नः' हमें 'परादाः'बरबाद कर ॥”
'तूर्णाश' (६०) यह अनवगत है । “उदक भवति” यह अर्थ-कथन है ।
'तूर्णाश' (६०) उदक (जल) होता है। क्योंकि-वह
तूर्ण (शीघ्र) ही अशन (व्यापन) करता है।
“मेघार्थी जन 'गिरेः-अधि' मेघके ऊपर वर्त्तमान 'तूर्णा-
शम्' जलको 'इव' जैसे (आह्वयन्ति) बुलाते हैं।” यह भी
निगम है। यहां गिरि (मेघ) के सम्बन्ध से 'तूर्णाश' नाम
जलका ही हो सकता है ।