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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 230

हिन्दी। निरुक्त । ६३
उदाहरण ।
ये 'गौः' आदि २१ पृथिवीके नाम गिनाये हैं, इनमें एक 'निऋ-
ति' शब्द है । वह पृथिवी और दुःख देवताका नाम है । उन
दोनोंका कर्मसे यह भेद है कि उनमें एक पृथिवी अपने में आये
हुए प्राणियोंको सुख देनेवाली है, और दूसरी पाप-देवता, दुःख देने-
वाली । इससे उस एकही 'निऋति' शब्दका निर्वचन अर्थके उद्दे-
श्यानुसार दो प्रकारसे होता है। अर्थात्-पृथिवीके लिये 'नि' उप-
सर्ग और 'रमु, क्रीडायाम्' (भ्वा० आ०) धातुसे और दुःख देवताके
उद्देश्यसे दुःखार्थक 'ऋच्छ' [तु० प०] धातुसे निर्वचन होता है ।
देखो ! आगेजो ऋचा दिखाई जाती है, उसमें निऋति शब्दके
आधार पर पृथिवी और दुःख देवताके अभिप्रायसे दो व्याख्यान
होते हैं, जिनमें प्रत्येक व्याख्यान 'निऋति' की भिन्न भिन्न व्याख्या
करनेमें साक्ष्य देता है ॥ ३ ॥
[ ख० ४ ]
"यईं चकार न सो अस्यवेद यईं ददर्श हि
रुगिन्नु तस्मात् । समातु र्यो ना परिवीतो अन्तर्बहु
प्रजा निऋति माविवेश ॥”
(भा०) 'बहु प्रजाः कृच्छ्रम्-आपद्यते' - इति परिव्रा-
जिकाः । 'वर्षकर्म' इति नैरुक्ताः । "यईं
चकार" इति करोति-किरती सन्दिग्धौ वर्ष
कर्मणा । "नसो अस्यवेद" मध्यमः । सएव
अस्यवेद-मध्यमः,-यो ददर्श आदित्यो पहि-
तम् । समातुर्यो नौ । माता अन्तरिक्षम् !