निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ २ अ० २ पा० २ खं० ।
अथापि ऽअस्य एको रश्मिः चन्द्रमसं प्रति
दीप्यते, तद्-एतेन उपेक्षितव्यम्, आदित्यतः-अस्य
दीप्तिर्भवति,—इति ।
“सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वः [ य० वा० सं०
१८, ४० ]
इत्यपि निगमो भवति । [ प्रयोजनम् ]
सोऽपि गौः उच्यते । [ यथा ]
“अन्वाह गोरमन्वत”
इति तद् उपरिष्टाद् व्याख्यास्यामः ।
सर्वेऽपि रश्मयः गावः उच्यन्ते ॥ २ ॥ [ यथा ]
अनुवाद ।
[ मन्त्रार्थ ] 'प्रत्येक धनुषमें बँधी हुई गो, या ताँत मिमाती, है,
फिर पुरुषोंको भक्षण करनेके लिये पक्षी या बाण गिरते हैं'
[ भाष्य- ] वृक्ष वृक्ष, = धनुष धनुषमें । 'वृक्ष' व्रश्चन या काटने-
से है । बधी हुई गो, या तांत शब्द करती है । मोमयति धातु शब्दा-
र्थक है । फिर 'वि' पुरुषोंके खानेके लिये गिरते है । 'वि' यह पक्षी-
का नाम है । 'वि' शब्द गत्यर्थक 'वी' [ अदा० प० ] धातुसे बनता
है । और यहांपर इषु या वाण का नाम भी होता है । इसी
धातु से ।
आदित्य भी 'गो' कहलाता है । [ जैसे- ]
“उतादः परुषे गवि” [ ऋ० स०, —४, ८, २२, ३. ]
[ मन्त्रार्थ-] 'धार' या प्रकाश वाले, गमन शील [मण्डल] मे' ।