निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ४६
(ख) अथवा 'क्षोर' शब्द भक्षण अर्थवाले 'घस' धातुसे
बनता है, वास्तवमें यह शब्द 'अद्' भक्षणे (अदा०
प०) धातुसे बनता है, 'घस' उसीका आदेशमात्र है।
कोई आचार्य कहते हैं कि-'घस' धातु स्वतन्त्र है, किन्तु
'अद्' धातुका आदेश नहीं है।
जब 'घस' धातुसे क्षीर शब्द बनाते हैं, तब उससे 'ईर' प्रत्यय
जोड़ते हैं, जैसे कि, 'वश-कान्तौ' (अदा० प०) धातुसे 'ईर' प्रत्यय
लग कर 'उशीर' शब्द बन जाता है। धातुके वकारको 'उ' सम्प्र-
सारण आदेश होता है। उशीर नाम खसका है, उसमें सुन्दर
गन्ध रहता है, इससे इस नामको 'वश-कान्तौ' धातुसे बनाना
उचित हुआ।
'गो' शब्द अधिषवण चर्मका वाचक भी होता है, जिस पर
कि-'सोमयाग' में सोमलता, का रस निकालनेके लिये अभिषव
संस्कार होता है।
तात्पर्य यह है कि-जिस प्रकार, यह गो शब्द सम्पूर्ण गोका
वाचक है, उसी प्रकार गोके एक भाग-(अंश) रूप चर्मका भी
वाचक है, इसीको 'कृत्स्नवत् अभिधायक' कहते हैं।
उदाहरण-“ते सोमादो हरी इन्द्रस्य निस्वतेऽशुं
दुहन्तो अध्यासत गवि। तेभिर्दुग्धं
पपिवाञ् सोम्यं मध्विन्द्रो वर्द्धते प्रथते
वृषायते । [ऋ० सं०-८, ४, ३०, ४]
जगती छन्दः, अर्बुद नामका द्वेवेद्य ऋषि, ग्राव (पाषाण)
स्तुतिमें विनियोग।
ये सोमरसके भक्षण करनेवाले पाषाण जब अभिषव (कुट्टन)
कर्ममें प्रवृत्त होते हैं, उस समय इन्द्रके घोड़े यज्ञमें आगमनके