नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः २६१
असमान (विषम) रहने पर विषमवृत्त होता है। इसी प्रकार सभी (चारों)
पादों के असमान रहने पर भी विषमवृत्त होता है ॥ १२१ ॥
ह्रस्वाद्यमथ¹ दीर्घाद्यं दीर्घं ह्रस्वमथापि वा।
युग्मौजविषमैः पादैर्वृत्तमर्धसमं भवेत् ॥ १२२ ॥
यदि किसी वृत्त के सम तथा विषम पादों का ह्रस्व, आदि दीर्घ या ह्रस्व
स्वरूप हो तो उसे विषम वृत्त समझें ॥ १२२ ॥
पादे सिद्धे समं सिद्धं विषमं सार्वपादिकम्।
द्वयोरर्धसमं² विद्यादेष छेदस्तु³ पादतः ॥ १२३ ॥
पादों के अनुसार लक्षण करने में सभी समान पाद रहने पर समवृत्त, दो
पादों के समान रहने पर अर्धसम-वृत्त तथा सभी पादों के (या तीन पादों के)
असमान रहने पर विषमवृत्त होता है ॥ १२३ ॥
छेदतस्तु⁴ मया प्रोक्तं समवृत्तविकल्पनम्।
त्रिकैर्विषमवृत्तानां सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम्⁵ ॥ १२४ ॥
मैंने पादों के विभाजन द्वारा वृत्तों का लक्षण बतलाया। अब मैं अर्धसम
वृत्तों के त्रिकों (गणों) द्वारा बनने वाले स्वरूप को (भी) बतलाता हूँ ॥ १२४॥
पथ्या—
सौ गौ तु प्रथमे पादे स्रौ लगौ चापि⁶ द्वितीयके।
युग्मेऽर्धविषमे⁷ पादे ज्ञेया पथ्या तु सा त्रिकैः ॥ १२५ ॥
यदि (अनुष्टुप् में) पहले पाद में सगण, सगण तथा दो गुरु हों,
द्वितीय पाद में सगण, रगण लघु तथा गुरू हों तथा यही शेष सम तथा
१. ह्रस्वाद्यं नैधनाद्यं वा—क०।
२. द्वयोश्च पादयोरोज एषच्छेदस्तु वृत्तजः—क०, पादद्वयस्य संसिद्धौ
सिद्धमर्द्धसमं पुनः—ख०; ग०।
३. भेदस्तु—ग०।
४. छेदास्तु ये मया प्रोक्ताः समवृत्तविकल्पिताः। ख०; ग०।
५. अस्मादनन्तरं क—पुस्तके—
नैधनेऽन्यतरस्यां वै प्रथमे पाद इष्यते।
द्वितीये चरणे च स्यादित्यनुष्टुप् समासतः ॥ इति अधिकम्।
६. यत्र तथापरे—क०।
७. एवं युग्मोजयोर्ज्ञेयं पथ्यावृत्ते त्रिको यथा।—क०; एवं युग्मोजको ज्ञेयो—
ख०; ग०।