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मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

१५६ मुहूर्त्तचिन्तामणि
यदि अयनांशयुक्त लग्न और अयनांशयुक्त सूर्य दोनों एक ही राशि में
हों तो दोनों के आपस में घटने पर शेष से गुणी हुई अपने देश की उदय
में तीस का भाग देने से जो लब्ध हो, वह सूर्योदय से लेकर इष्टकाल
होता है। यदि सायन लग्न तथा सूर्य ये दोनों एक ही राशि में स्थित
हों और सूर्य के अंशों से लग्न के अंश कम हों तो उन कम अंशों से गुणी
हुई अपने देश की उदय में तीस का भाग देने से जो लब्ध हो वह सूर्योदय
से पूर्व रात्रि का बाकी काल होता है। इसको साठ में घटाने से शेष
पूर्व दिन के सूर्योदय से लेकर इष्टकाल होता है। रात्रि में सूर्य की राशि
में छः जोड़कर उक्त रीति करने पर इष्टकाल स्पष्ट होता है। एक राशि में
स्थित सूर्य से अधिक लग्न का उदाहरण—यथा ९। २५। ६। ३६ इस
लग्न में ९। १६। ५९। २६ सूर्य को घटाया तो ०। ८। ७। १०
शेष रहे। इन शेष अंकों को लग्न तथा सूर्य के मकरराशि में रहने के
कारण मकर की ३०३ उदय से गुण दिया, तो २४६०। ११। ३०
हुए। इनमें तीस का भाग दिया तो ८२। २२। १ पलादि लब्ध हुए।
सूर्योदय से लेकर यही इष्टकाल हुआ। कम लग्न का उदाहरण—यथा
९। २६। ५०। ४० सूर्य में ९। २२। ४५। ३६ लग्न को घटाया
तो ०। ४। ५। ४ शेष रहे। इनको मकर की स्वदेशी ३०३ उदय से
गुण दिया तो १२३५। ३५। १२ हुए। इनमें तीस का भाग दिया तो ४१।
१५। १० पलादि लब्ध हुए। सूर्योदय से पूर्व इतना रात्रिशेष हुआ।
इसको साठ में घटाया तो ५९। १८। ४४। ५० दण्डादि शेष रहे। यही
इष्टकाल हुआ। रात्रि में इष्टकाल का उदाहरण तो पूर्व श्लोक में कहे हुए
उदाहरण के सायन सूर्य में छः राशि जोड़कर उक्त क्रिया करने से हो जायगा,
इसलिये यहाँ नहीं कहा ॥ १०६ ॥
शुभ कार्यों में अवश्य त्यागने योग्य दोष
उत्पातान्सह पातदग्धतिथिविद्धृष्टांश्च योगांस्तथा
चन्द्रेज्योशनसामथास्तमयनं तिथ्याः क्षयर्द्धी तथा।
गण्डान्तं च सविष्टिसंक्रमदिनं तन्वंशपास्तं तथा
तन्वंशेशविधूनथाष्टरिपुगान्पापस्य वर्गांस्तथा ॥ १०७ ॥
सेन्दूक्रूरखगोदयांशमुदयास्ताशुद्धिचण्डायुधान्
खार्जूरं दशयोगयोगसहितं जामित्रलत्ताव्यधम्।

विवाहप्रकरण १५७
बाणोपग्रहपापकर्त्तरि तथा तिथ्यर्क्षयोगोत्थितं
दुष्टं योगमथार्द्धयामकुलिकाद्यान्वारदोषानपि ॥ १०८ ॥
क्रूराक्रान्तविमुक्तभं ग्रहणभं यत्क्रूरगन्तव्यभं
त्रेधोत्पातहतं च केतुहतभं सन्ध्योदितं भं तथा ।
तद्वच्च ग्रहभिन्नयुद्धगतभं सर्वानिमान्संत्यजे-
दुद्वाहे शुभकर्मसु ग्रहकृतान् लग्नस्य दोषानपि ॥ १०९ ॥
अन्वय:—पातदग्धतिथिभिः सह उत्पातान्, तथा दुष्टान् योगान् अथ चन्द्रे-
ज्योशनसां अस्तमयनं तथा तिथ्याः क्षयवृद्धी, च सविष्टिसंक्रमदिनं, गण्डान्तं, तथा
तन्वंशपास्तं, अथ तन्वंशेशविधून् तथा अष्टरिपुगान् पापस्य वर्गान् सेन्दुक्रूरखगोदयांशं
उदयास्तशुद्धिश्चण्डायुधान्, दशयोगयोगसहितं खार्जूरं जामित्रलत्ताव्यधम्, तथा बाणोप-
ग्रहपापकर्त्तरि, तिथ्यर्क्षयोगोत्थितं दुष्टं योगं अथ अर्धयामकुलिकाद्यान् वारदोषान् अपि
[तथा] क्रूराक्रान्तविमुक्तभं, ग्रहणभं, तथा यत् क्रूरगन्तव्यभं, त्रेधोत्पातहतं च पुनः
केतुहतभं तथा सन्ध्योदितं भं च (पुनः) तद्वत् ग्रहभिन्नयुद्धगतभं, ग्रहकृतान् लग्नस्य
दोषान् अपि इमान् सर्वान् उद्वाहे शुभकर्मसु सन्त्यजेत् ॥ १०७-१०६ ॥
दिग्दाह प्रसिद्ध वृक्ष या मकान आदि का अकस्मात् गिरना, पानी का
बरसना, उल्कापात, बड़ी आँधी का आना, बिजली का गिरना, बिना
मेघ का गरजना, भूकम्प आना, चन्द्र-सूर्य में मण्डल होना, सियारी का
चिल्लाना, और भी ग्रामसम्बन्धी उत्पात तथा क्रान्तिसाम्य, दग्धातिथि,
व्यतीपात, वैधृति इत्यादि दुष्टयोग, चन्द्र, शुक्र, बृहस्पति का अस्त, दक्षि-
णायन, तिथि की हानि-वृद्धि, नक्षत्र, तिथि, लग्न के गण्डान्त, भद्रा,
संक्रान्ति दिन, लग्न और नवांश के स्वामी का अस्त, लग्न से आठवें वा
छठे स्थान में स्थित लग्न वा नवांश का स्वामी, लग्न में पापग्रहों के गृह,
होरा, द्रेष्काण, नवांश, द्वादशांश, त्रिंशांश, चन्द्रमा वा क्रूरग्रह से युक्त
लग्न वा नवांश, लग्नशुद्धि, सातवें स्थान की शुद्धि, पात और खर्जूर
दोष, दशयोगों के सहित जामित्र वा लत्तादोष, वेध दोष, बाणदोष, उपग्रह-
दोष, पापकर्त्तरीदोष तथा तिथि-नक्षत्र से, तिथि-वार से, नक्षत्र-वार से,
वा तिथि-नक्षत्र-वार से उत्पन्न दुष्योग, अर्द्धयाम, कुलिकादि वारदोष,
क्रूरग्रहयुक्त नक्षत्र, क्रूरग्रह का भोग किया नक्षत्र, जिसमें क्रूरग्रह आनेवाला
हो या सूर्य-चन्द्रग्रहण हुआ हो वह नक्षत्र, जिसमें पूर्वोक्त उत्पात हुए हों
या केतु का उदय हुआ हो वह नक्षत्र, सूर्य के अस्तकाल में प्रारम्भ
होनेवाला, अर्थात् सूर्य के नक्षत्र से चौदहवाँ नक्षत्र, जिसमें ग्रहों का युद्ध हुआ

१५८ मुहूर्त्तचिन्तामणि
हो वह नक्षत्र और लग्न के दोष इन सबका विवाहादि सम्पूर्ण शुभ कार्यों में
त्याग करे ॥ १०७-१०९ ॥
कन्यादि के तेल आदि लगाने की संख्या
मेषादिराशिशजवधूवरयोर्वटोश्च तैलादिलापनविधौ कथितात्र संख्या ।
शैला दिशः शरदिगक्षनगाद्रिबाणबाणाक्षबाणगिरयो ७।१०।५
१०। ५ । ७ । ७ । ५ । ५ । ५ । ५ । ७ विबुधैस्तु कश्चित् ॥ ११० ॥
इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ विवाहप्रकरणं समाप्त ॥ ६ ॥
अन्वयः—अत्र मेषादिराशिशजवधूवरयोः वटोः (बालकस्य) च तैलादिलापनविधौ
कैश्चित् विबुधैः (क्रमेण) शैलाः दिशः शरदिगक्षनगाद्रिबाणबाणाक्षबाणगिरयः (इति)
संख्या कथिता ॥ ११० ॥
मेषादि राशियों में उत्पन्न कन्या, वर और जिसका यज्ञोपवीत होनेवाला
हो उसके तेल-उबटन आदि लगाने में कुछ पण्डितों ने ७।१०।५।१०।५।७।७।५।
५।५।५।७ यह संख्या कही है, अर्थात् मेष राशिवालों को विवाह और यज्ञो-
पवीत दिन से पूर्व सात दिन, वृष राशिवालों को दश दिन, मिथुन राशि-
वालों को पाँच दिन, कर्क राशिवालों को दश दिन, सिंह राशिवालों को पाँच
दिन, कन्या राशिवालों को सात दिन, तुला राशिवालों को सात दिन,
वृश्चिक राशिवालों को पाँच दिन, धनु राशिवालों को पाँच दिन, मकर राशि-
वालों को पाँच दिन, कुम्भ राशिवालों को पाँच दिन, मीन राशिवालों को
सात दिन तेल और उबटन लगाना चाहिए ॥ ११० ॥
वधूप्रवेशप्रकरण
—:०:—
समाद्रिपञ्चाङ्कदिने विवाहाद्वधूप्रवेशोऽष्टदिनान्तराले ।
शुभः परस्ताद्विषमाब्दमासदिनेऽक्षवर्षात्परतो यथेष्टम् ॥ १ ॥
अन्वयः—विवाहात् अष्टदिनान्तराले समाद्रिपञ्चाङ्कदिने वधूप्रवेशः शुभः स्यात्,
परस्तात् [षोडशदिनेभ्यः पश्चात्] विषमाब्दमासदिने शुभः स्यात्, अथ अक्षवर्षात् परतः
यथेष्टम् [यदा कदाचित् शुभदिने] वधूप्रवेशः शुभः (स्यात्) ॥ १ ॥
विवाह के दिन से सोलह दिन के भीतर सम अर्थात् दूसरे, चौथे, छठे,
आठवें, दशवें, बारहवें, चौदहवें तथा सातवें, पाँचवें, नवें दिन में और सोलह

वधूप्रवेशप्रकरणम् १५९
दिनों के बाद पहिले, तीसरे, पाँचवें वर्ष में, और पहिले, तीसरे, पाँचवें,
सातवें, नवें, गेरहवें मास में और पाँच वर्ष के ऊपर अपनी इच्छा के अनुसार
सम-विषम वर्ष मास दिन का विचार न करके अथवा हो सके तो करके
भी गोचर में वर की जन्मराशि से सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति के बली रहते,
दुष्ट भद्रा आदि दोषरहित काल में किया हुआ वधूप्रवेश शुभ होता
है ॥ १ ॥
वधूप्रवेश का मुहूर्त्त
ध्रुवक्षिप्रमृदुश्रोत्रवसुमूलमघानिले ।
वधूप्रवेशः सन्नष्टो रिक्तारार्के बुधे परैः ॥ २ ॥
अन्वयः—ध्रुवक्षिप्रमृदुश्रोत्रवसुमूलमघानिले वधूप्रवेशः सत्, रिक्तारार्के नेष्टः, परैः
बुधे अपि नेष्टः ॥ २ ॥
रोहिणी, तीनों उत्तरा, अश्विनी, पुष्य, हस्त, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा,
श्रवण, धनिष्ठा, मूल, मघा और स्वाती नक्षत्र में किया हुआ वधूप्रवेश शुभ
होता है । चौथ, नवमी और चतुर्दशी तिथि में; रविवार और मंगलवार में
तथा कुछ आचार्यों के मत से बुध दिन में भी अशुभ होता है ॥ २ ॥
विवाह के बाद प्रथम वर्ष के महीनों में स्वामी के घर में
स्त्री के रहने का फल
ज्येष्ठे पतिज्येष्ठमथाधिके पतिं हन्त्यादिमे भर्तृगृहे वधूः शुचौ ।
श्वश्रूं सहस्ये श्वशुरं क्षये तनुं तातं मधौ तातगृहे विवाहतः ॥ ३ ॥
इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ वधूप्रवेशप्रकरणं समाप्तम् ॥ ७ ॥
अन्वयः—विवाहतः आदिमे ज्येष्ठे भर्तृगृहे स्थिता वधूः पतिज्येष्ठं, अथ आदिमे
अधिके [अधिमासे] पतिं तथा आदिमे शुचौ श्वश्रूं आदिमे सहस्ये श्वशुरं, आदिमे
क्षये [क्षयमासे] तनुं हन्ति । तथा आदिमे मधौ तातगृहे स्थिता वधूः तातं
हन्ति ॥ ३ ॥
विवाह होने के बाद पहिले ज्येष्ठ में यदि स्वामी के घर में स्त्री रहे तो
स्वामी के ज्येष्ठ भाई को, पहिले मलमास में स्वामी को, पहिले आषाढ़ में
सासु को, पौष मास में ससुर को, पहिले क्षयमास में अपनी देह को और पिता
के घर में यदि पहिले चैत्र में रहे तो पिता को नष्ट करती है, अर्थात् विवाह
के बाद पहिले ज्येष्ठ, मलमास, आषाढ़, पूस और क्षयमास में स्त्रियों को

१६० मुहूर्तचिन्तामणि
पिता के घर में और पहिले चैत्र मास में पति के घर में रहना चाहिए। जिन
महीनों में जहाँ रहने से जिन लोगों को दोष कहा है, उस स्त्री के यदि वे
लोग जीवित न हों तो उन महीनों में वहाँ रहने का कोई दोष नहीं है ॥ ३ ॥

द्विरागमनप्रकरण
-:०:-
चरेदथौजहायने घटालिमेषगे रवौ रवीज्यशुद्धियोगतः शुभग्रहस्य वासरे ।
नृयुग्ममीनकन्यकातुलावृषे विलग्नके द्विरागमं लघुध्रुवे चरेऽस्रपे मृदूडुभिः ॥ १ ॥
अन्वयः—अथ (वधूप्रवेशानन्तरं) ओजहायने घटालिमेषगे रवौ, रवीज्यशुद्धि-
योगतः शुभग्रहस्य वासरे नृयुग्ममीनकन्यकातुलावृषे विलग्नके लघुध्रुवे चरे अस्रपे मृदूडुभिः
द्विरागमं चरेत् ॥ १ ॥
विवाह के दिन से पहिले, तीसरे, पाँचवें आदि विषम वर्षों में तथा कुम्भ,
वृश्चिक, मेष इन राशियों में से किसी में सूर्य के रहते; सूर्य और बृहस्पति
के शुद्ध रहते; सोमवार, बुध, बृहस्पति या शुक्रवार में; मिथुन, मीन, कन्या,
तुला वा वृष लग्न में तथा अश्विनी, पुष्य, हस्त, रोहिणी, तीनों उत्तरा,
श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, मूल, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा
और रेवती नक्षत्र में स्त्री दूसरी बार अपने स्वामी के घर में जाय तो शुभ
होता है ॥ १ ॥
सम्मुख और दक्षिण शुक्र का दोष
दैत्येज्यो ह्यभिमुखदक्षिणे यदि स्याद्गच्छेयुर्नहि शिशुगर्भिणीनवोढाः ।
बालश्चेद्व्रजति विपद्यते नवोढा चेद्वन्ध्या भवति च गर्भिणी त्वगर्भा ॥ २ ॥
अन्वयः—यदि दैत्येज्यः अभिमुखदक्षिणे स्यात् (तदा) शिशुगर्भिणीनवोढाः न
गच्छेयुः । हि चेत् [यदि] बालः व्रजति तदा विपद्यते, नवोढा व्रजति तदा वन्ध्या भवति,
च गर्भिणी अगर्भा भवति ॥ २ ॥
यदि शुक्र सामने या दाहिनी ओर पडते हों तो बालकयुक्त, गर्भवती
और नववधू स्त्रियाँ दूसरी बार अपने पति के घर को न जायें; क्योंकि
सम्मुख या दक्षिण शुक्र के रहते स्वामी के घर जानेवाली बालकयुक्त स्त्री
का बालक मर जाता है, गर्भवती का गर्भ नष्ट हो जाता है और नववधू
स्त्री का यदि द्विरागमन होता है तो वह वन्ध्या होती है ॥ २ ॥

द्विरागमनप्रकरण १६१
शुक्रदोष का परिहार
नगरप्रवेशविषयाद्युपद्रवे करपीडने विबुधतीर्थयात्रयोः ।
नृपपीडने नववधूप्रवेशने प्रतिभार्गवो भवति दोषकृन्नहि ॥ ३ ॥
पित्र्ये गृहे चेत्कुचपुष्पसंभवः स्त्रीणां न दोषः प्रतिशुक्रसंभवः ।
भृग्वंगिरोवत्सवशिष्ठकश्यपात्रीणां भरद्वाजमुनेः कुले तथा ॥ ४ ॥
इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ द्विरागमनप्रकरणं समाप्तम् ॥ ८ ॥
अन्वयः—नगरप्रवेशविषयाद्युपद्रवे करपीडने विबुधतीर्थयात्रयोः नृपपीडने नववधू-
प्रवेशने प्रतिभार्गवः दोषकृत् नहि भवति । चेत् पित्र्ये गृहे स्त्रीणां कुचपुष्पसम्भवः तदा
प्रतिशुक्रसम्भवः दोषः न भवेत् । तथा भृग्वङ्गिरोवत्सवसिष्ठकश्यपात्रीणां तथा भरद्वाजमुनेः
कुले प्रतिशुक्रसम्भवः दोषः न (स्यात्) ॥ ३-४ ॥
नगर को जाने में, देश या गाँव में किसी प्रकार का उपद्रव होने
पर, देश या गाँव छोड़ने में तथा विवाह, देवयात्रा, तीर्थयात्रा, राजदण्ड
और वधूप्रवेश में सम्मुख शुक्र दोषकारक नहीं होता । पिता के ही घर
में जिनके पूरे स्तन तथा रजोदर्शन हुआ हो, अर्थात् जवानी हो गई हों, उन
स्त्रियों को सम्मुख शुक्र का दोष नहीं होता । ऐसे ही भृगु, अंगिरा, वत्स,
वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि और भरद्वाज मुनि के कुल में सम्मुख शुक्र का दोष
नहीं होता ॥ ३-४ ॥
अग्न्याधानप्रकरण
—:०:—
स्यादाग्निहोत्रविधिरुत्तरगे दिनेशे मिश्रध्रुवान्त्यशशिशक्रसुरेज्यधिष्ण्ये ।
रिक्तासु नो शशिकुजेज्यभृगौ न नीचे नास्तंगते न विजिते न च शत्रुगेहे ॥ १ ॥
अन्वयः—उत्तरगे दिनेशे, मिश्रध्रुवान्त्यशशिशक्रसुरेज्यधिष्ण्ये, अग्निहोत्रविधिः
(शुभः) स्यात् । रिक्तासु नो, शशिकुजेज्यभृगौ नीचे न, अस्तं गते न, विजिते न, च
शत्रुगृहे स्थिते न (शस्तः) ॥ १ ॥
उत्तरायण सूर्य के रहते कृत्तिका, विशाखा, रोहिणी, तीनों उत्तरा,
रेवती, मृगशिरा, ज्येष्ठा व पुष्य नक्षत्र में अग्न्याधान हो तो शुभ होता है ।
चौथि, नवमी, चतुर्दशी तिथि में, और चन्द्रमा, मंगल, बृहस्पति और शुक्र
अपने-अपने नीच स्थान में हों, अस्त हों, अन्य ग्रहों से पराजित हुए हों, अथवा
शत्रु के स्थान में हों तो अग्न्याधान नहीं करना चाहिए ॥ १ ॥

१६२ मुहूर्तचिन्तामणि
लग्नशुद्धि
नो कर्कनक्रझषकुम्भनवांशलगने नोऽब्जे तनौ रविशशीज्यकुजे त्रिकोणे ।
केन्द्रक्षषट्त्रिभवगे च परैस्त्रिलाभषट्खस्थितैर्निधनशुद्धियुते विलग्ने ॥ २ ॥
अन्वयः—कर्कनक्रझषकुम्भनवांशलगने (अग्निहोत्रविधिः) नो, अब्जे तनौ नो शुभः ।
रविशशीज्यकुजे त्रिकोणे केन्द्रक्षषट्त्रिभवगे परैः (बुधशुक्रशनैश्चरैः) तिलाभषट्खस्थितैः
निधनशुद्धियुते विलग्ने [सति अग्निहोत्रविधिः शुभः स्यात्] ॥ २ ॥
कर्क, मकर, मीन, कुम्भ लग्न में और इनके नवांशों में तथा लग्न में
चन्द्रमा के (किसी के मत से शुक्र के भी) रहते अग्न्याधान नहीं करना
चाहिए। पाँचवें, नवें, लग्न, चौथे, सातवें, दशवें और छठे स्थान में सूर्य,
चन्द्रमा, बृहस्पति और मंगल हों, तीसरे, गेरहवें, छठे और दशवें स्थान में
बुध, शुक्र, शनैश्चर, राहु और केतु हों, जन्मलग्न से आठवीं को छोड़ अन्य
लग्न में, अथवा जिससे आठवें स्थान में कोई ग्रह हो उस लग्न में अग्न्याधान
शुभ होता है ॥ २ ॥
अग्न्याधानकालिक लग्नदश से यज्ञकारक योग
वापे जीवे तनुस्थे वा मेषे भौमेऽम्बरे द्युने ।
षट्त्र्यायेऽब्जे रवौ वा स्याज्जाताग्निर्यजति ध्रुवम् ॥ ३ ॥
इति मुहूर्त्तचिन्तामणावग्न्याधानप्रकरणं समाप्तम् ॥ ९ ॥
अन्वयः—जीवे चापे तनुस्थे, वा भौमे मेषे (तनुस्थे), अम्बरे द्युने, वा अब्जे
[चन्द्रे] षट् त्र्याये, वा रवौ षट्त्र्याये तदा जाताग्निः ध्रुवं यजति ॥ ३ ॥
धनु राशि में स्थित बृहस्पति लग्न में हो, अथवा मेष राशि में स्थित
मंगल लग्न में हो, अथवा मंगल लग्न से सातवें या दशवें स्थान में हो, अथवा
चन्द्रमा लग्न से तीसरे, छठे या गेरहवें स्थान में हो अथवा सूर्य लग्न से तीसरे,
छठे या गेरहवें स्थान में हो तो अग्न्याधान करनेवाला निश्चय करके
ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ करता है ॥ ३ ॥
———
राजाभिषेकप्रकरण
—:०:—
राजाभिषेकः शुभ उत्तरायणे गुर्विन्दुशुक्रैरूदितैर्बलान्वितैः ।
भौमार्कलग्रेशदशेशजन्मपैर्नो चैत्ररिक्तारनिशामलिम्लुचे ॥ १ ॥

राजाभिषेकप्रकरण १६३
अन्वयः—उत्तरायणे गुर्विन्दुशुक्रैः उदितैः, भौमार्क लग्नेशदशेशजन्मपैः बलान्वितैः
राजाभिषेकः शुभः (स्यात्) । चैत्ररिक्तारनिशामलिम्लुचे नो (शुभः स्यात्) ॥ १ ॥
उत्तरायण सूर्य के रहते तथा बृहस्पति, शुक्र और चन्द्रमा ग्रहों के
उदित रहते और मंगल, सूर्य, तात्कालिक लग्न का स्वामी, तात्कालिक
दशा का स्वामी और जन्मलग्न का स्वामी बली हो तो राजाभिषेक शुभ
होता है । चैत्रमास, मलमास, चौथि, नवमी, चतुर्दशी तिथि और मंगल
दिन तथा रात्रि का समय अशुभ होता है, इसलिए इनमें राज्याभिषेक न
करना चाहिए ॥ १ ॥
नक्षत्र तथा लग्नशुद्धि
शाक्रश्रवः क्षिप्रमृदुध्रुवोडुभिः शीर्षोदये वोपचये शुभे तनौ ।
पापैस्त्रिषष्ठायगतैः शुभग्रहैः केन्द्रत्रिकोणायधनत्रिसंस्थितैः ॥ २ ॥
अन्वयः—शाक्रश्रवः क्षिप्रमृदुध्रुवोडुभिः शीर्षोदये वा उपचये शुभे तनौ, पापै-
स्त्रिषष्ठायगतैः, शुभग्रहैः केन्द्रत्रिकोणायधनत्रिसंस्थितैः (राजाभिषेकः शुभः स्यात्) ॥२॥
ज्येष्ठा, श्रवण, हस्त, अश्विनी, पुष्य, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा,
रोहिणी, तीनों उत्तरा, इन नक्षत्रों में; मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक
वा कुम्भ लग्न में रहते अथवा जन्मलग्न वा जन्मराशि से तीसरी, छठी,
गेरहवीं लग्न में और लग्न से तीसरे, छठे, गेरहवें स्थान में पापग्रहों के रहते
तथा लग्न, चौथे, सातवें, दशवें, पाँचवें, नवें गेरहवें, दूसरे, तीसरे स्थान में
शुभग्रहों के रहते राजाभिषेक शुभ होता है ॥ २ ॥
राजाभिषेक काल में ग्रहस्थित फल
पापैस्तनौ रुङ्निधने मृतिः सुते पुत्रार्तिरर्थव्ययगैर्दरिद्रता ।
स्यात् खेडलसो भ्रष्टपदो द्युनाम्बुगैः सर्वं शुभं केन्द्रगतैः शुभग्रहैः ॥ ३ ॥
अन्वयः—पापैः तनौ रुग्, निधने पापैः मृतिः, सुते पापैः पुत्रार्तिः, अर्थव्ययगैः
पापैः दरिद्रता, खे पापैः अलसः, द्युनाम्बुगैः पापैः भ्रष्टपदः स्यात्, केन्द्रगतैः शुभग्रहैः
सर्वं शुभम् स्यात् ॥ ३ ॥
पापग्रह लग्न में हो तो रोग, आठवें स्थान में हो तो मृत्यु, पाँचवें
स्थान में हो तो पुत्र-क्लेश, दूसरे या बारहवें स्थान में हो तो निर्धनता दशवें
स्थान में हो तो निरुद्योग, सातवें या चौथे स्थान में हो तो राज्यच्युत और
पूर्ण चन्द्रमा यदि लग्न से छठे, आठवें, बारहवें स्थान में स्थित हो तो

१६४ मुहूर्तचिन्तामणि
राजा का मरण होता है। किन्तु यदि शुभग्रह केन्द्र में स्थित हो तो सब शुभ
हो जाता है ॥ ३ ॥
सम्पत्ति तथा पृथ्‍वीस्थिति ये दो योग
गुर्लग्नकोणे कुजोऽरौ सितः खे स राजा सदा मोदते राजलक्ष्म्या ।
तृतीयायगौ सौरिसूर्यौ खबन्ध्वोगु॑रुश्चेद्धरित्री स्थिरा स्यान्नृपस्य ॥ ४ ॥
इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ राजाभिषेकप्रकरणं समाप्तम् ॥ १० ॥
अन्वयः-[यस्य राजाभिषेकसमये] गुरुः लग्नकोणे, कुजः अरौ, सितः खे स
राजा सदा राजलक्ष्म्या मोदते चेत् यदि सौरिसूर्यौ तृतीयायगौ, गुरुः खबन्ध्वोः तदा
नृपस्य धरित्री स्थिरा स्यात् ॥ ४ ॥
जिस राजा के अभिषेककाल में बृहस्पति लग्न में या नवें, पाँचवें स्थान
में, मंगल लग्न से छठे और शुक्र दशवें स्थान में स्थित हो वह राजा सदा
राजलक्ष्मीयुक्त होकर आनन्द करता है। शनैश्चर लग्न से तीसरे, सूर्य गेरहवें
और बृहस्पति चौथे या दशवें स्थान में स्थित हो तो उस राजा का राज्य
सदा स्थिर रहता है ॥ ४ ॥

यात्राप्रकरण
---------:०:---------
यात्रायां प्रविदितजन्मनां नृपाणां दातव्यं दिवसमबुद्धजन्मनां च ।
प्रश्नाद्यैरुदयनिमित्तमूलभूतैर्विज्ञाते ह्यशुभशुभे बुधः प्रदद्यात् ॥ १ ॥
अन्वयः-प्रविदितजन्मनां नृपाणां यात्रायां दिवसं दातव्यम्। अबुद्धजन्मनां
नृपाणां च प्रश्नाद्यैः उदयनिमित्तमूलभूतैः अशुभशुभे विज्ञाते बुधः यात्रायां दिवसं
प्रदद्यात् ॥ १ ॥
किसी कार्य की सिद्धि के लिए अन्य देशादि में जाने का नाम यात्रा
है। वह कार्यभेद से दो प्रकार की होती है। एक वह जो कि आगे कहे हुए
योग, लग्न और जन्मकुण्डली में राजयोग, शुभलग्न के रहते होती है, यथा
समरयात्रा । और दूसरी वह जो कि साधारण पंचांगादि की शुद्धि रहते होती
है। यथा द्रव्यादि के कमाने या तीर्थादि करने के लिए साधारण यात्रा। इन
दोनों के विशेष विचार करने की इच्छा से पहिले उसके अधिकारी को
कहते हैं।

यात्राप्रकरण १६५

पण्डितों को चाहिए कि जिनके जन्मकालिक शुभाशुभ राजयोगादि
जाने गये हों उन राजाओं को, और जिनका जन्मकाल न जाना गया हो,
प्रश्नकालिक लग्न वा शकुनादि द्वारा उनके शुभाशुभ राजयोगादि को जानकर
उन राजाओं को भी यदि बताने के योग्य हो तो यात्रा करने के योग्य दिन
बतावे । यहाँ राजाओं के सिवा साधारण अन्य मनुष्य भी ग्रहण किये जाते
हैं; क्योंकि यात्रा के बिना किसी का काम नहीं चल सकता इसलिए राजा
से लेकर साधारण मनुष्य तक सब यात्रा करने के अधिकारी हैं ॥ १ ॥
प्रश्नकालिक शुभ यात्रायोग
जननराशितनू यदि लग्नगे तदधिपौ यदि वा तत एव वा ।
त्रिरिपुखायगृहं यदि वोदये विजय एव भवेद्वसुधापतेः ॥ २ ॥
रिपुजन्मलग्नभमथाधिपौ तयोस्ततएववोपचयसद्म चेद् भवेत् ।
हिबुके द्यूनेऽथ शुभवर्गकस्तनौ यदि मस्तकोदयगृहं तदा जयः ॥ ३ ॥
यदि पृच्छतनौ वसुधा रुचिरा शुभवस्तु यदि श्रुतिदर्शनगम् ।
यदि पृच्छति चादरतश्च शुभग्रहदृष्टयुतं चरलग्नमपि ॥ ४ ॥
अन्वयः—यदि जननराशितनू लग्नगे, यदि वा तदधिपौ, वा तत एव त्रिरिपुखायगृहं
यदि वा उदयेः तदा वसुधापतेः विजय एव भवेत् । रिपुजन्मलग्नभं अथवा तयोः
अधिपौ, वा ततः एव उपचयसद्म चेत् हिबुके द्यूने भवेत् तदा वसुधापतेः जयः, अथ यदि
तनौ शुभवर्गकः वा मस्तकोदयगृहं तदा जयः स्यात् यदि पृच्छतनौ वसुधा रुचिरा,
यदि (वा) शुभवस्तु श्रुतिदर्शनगं (भवेत्) च (तथा) यदि आदरतः पृच्छति अपि
(वा) शुभग्रहदृष्टयुतं चरलग्नं यदि स्यात् तदा जयः स्यात् ॥ २-४ ॥
जिसकी जन्मराशि या जन्मलग्न प्रश्नलग्न में हो, अथवा जन्मराशि
का स्वामी या जन्मलग्न का स्वामी प्रश्नलग्न में हो, अथवा जन्मराशि से
या जन्मलग्न से तीसरे, छठे, दशवें, गेरहवें स्थान में प्रश्नलग्न पड़ती हो
तो यात्रा करनेवाले राजा की विजय अवश्य हो ॥ २ ॥ अथवा जिसके
शत्रु की जन्मराशि या जन्मलग्न, प्रश्नलग्न से चौथे या सातवें स्थान में
हो, अथवा शत्रु की जन्मराशि का स्वामी या जन्मलग्न का स्वामी प्रश्न-
लग्न से चौथे या सातवें स्थान में हो, अथवा शत्रु की जन्मराशि से या
जन्मलग्न से तीसरी, छठी, दशवीं, गेरहवीं राशि, प्रश्नलग्न से चौथे या
सातवें स्थान में पड़ती हो, अथवा शुभग्रह का गृह, होरा, द्रेष्काण, नवां-
शादि षड्वर्ग प्रश्नलग्न में हो, अथवा मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक,

१६६ मुहूर्त्तचिन्तामणि
कुम्भ इनमें से कोई राशि प्रश्नलग्न में हो तो यात्रा करनेवाले राजा की
विजय होती है ॥ ३ ॥ अथवा यात्रा पूछनेवाला ऐसे स्थान में पूछे कि जहाँ
की भूमि, फूल, दूर्वा, देवमंदिर आदि शुभ वस्तुओं से अति मनोरम हो
अथवा यात्रा पूछने के समय कोई शुभ वस्तु देखने या सुनने में आवे
अथवा यात्रा पूछनेवाला बड़े आदर से पूछे, अथवा मेष, कर्क, तुला, मकर
इन राशियों में से कोई प्रश्नलग्न में हो और शुभग्रह उसे देखते हों या उस
लग्न में हों तो भी यात्रा करनेवाले की विजय होती है ॥ ४ ॥
प्रश्नकालिक अशुभ यात्रायोग
विधुकुजयुतलग्ने सौरिदृष्टेऽथ चन्द्रे
मृतिभमदनसंस्थे लग्नगे भास्करेऽपि ।
हिबुकनिधनहोराद्यूनगे वापि पापे
सपदि भवति भंगः प्रश्नकर्तुस्तदानीम् ॥ ५ ॥
अन्वयः—अथ विधुकुजयुतलग्ने सौरिदृष्टे, चन्द्रे मृतिभमदनसंस्थे, अपि वा
भास्करे लग्नगे, अपि वा पापे हिबुकनिधनहोराद्यूनगे, तदानी प्रश्नकर्तुः सपदि भंगः
भवति ॥ ५ ॥
यदि प्रश्नकालिक लग्न में चन्द्रमा या मंगल हो और शनैश्चर उसे देखता
हो, अथवा प्रश्नकालिक लग्न में सूर्य हो और उससे सातवें या आठवें स्थान
में चन्द्रमा हो, अथवा प्रश्नलग्न में या उससे चौथे, आठवें, सातवें स्थानों में
पापग्रह हो तो यात्रा करनेवाले का नाश या पराजय होता है ॥ ५ ॥
प्रश्नद्वारा यात्रा की दिशा का निर्णय
त्रिकोणे कुजात्सौरिशुक्रज्ञजीवा
यदैकोऽपि वा नो गमोर्काच्छशी वा ।
बलीयांस्तु मध्ये तयोर्यो ग्रहः स्या-
त्स्वकीयां दिशं प्रत्युतासौ नयेच्च ॥ ६ ॥
प्रश्ने गम्यदिगीशात्खेटः पञ्चमगो यः ।
बोभूयाद्बलयुक्तः स्वामाशां नयेत्दसौ ॥ ७ ॥
अन्वयः—सौरिशुक्रज्ञजीवाः (सर्वे) वा एकोऽपि यदा कुजात् त्रिकोणे (स्थितः)
वा शशी अर्कात् त्रिकोणे स्यात् तदा गमः [गमनं] नो भवेत्, प्रत्युत तयोर्मध्ये यः
ग्रहः बलीयान् स्यात् असौ स्वकीयां दिशं नयेत् । प्रश्ने गम्यदिगीशात् पञ्चमगः यः
खेटः बलयुक्तः बोभूयात् असौ स्वां आशां नयेत् ॥ ६-७ ॥

यात्राप्रकरण १६७
प्रश्नकाल में शनैश्चर, शुक्र, बुध, बृहस्पति, ये चारों ग्रह या इनमें से
कोई एक ही ग्रह यदि मंगल से नवें, पाँचवें स्थान में स्थित हो, अथवा
चन्द्रमा यदि सूर्य से नवें, पाँचवें स्थान में हो, तो यात्रा करनेवाला जिस
दिशा में जाने की इच्छा करता है उस दिशा में यात्रा नहीं होती, किंतु
इन यात्राप्रतिबंधक ग्रहों में से जो ग्रह बलवान् होता है वह अपनी ही दिशा
में ले जाता है अथवा जिस दिशा में यात्रा करने की इच्छा से प्रश्न किया
गया हो उस दिशा का स्वामी प्रश्नलग्न से जिस स्थान में स्थित हो उस
स्थान से पाँचवें स्थान में यदि कोई बली ग्रह हो तो वह ग्रह अपनी ही दिशा
में यात्रा करनेवाले को ले जाता है। ग्रहों की दिशा इसी प्रकरण के ४६ वें
श्लोक में कही गई हैं ॥ ६-७ ॥
मासभेद से यात्रा के शुभाशुभभेद और तारा
धनुर्मेषसिंहेषु यात्रा प्रशस्ता शनिज्ञोशनोराशिगे चैव मध्या।
रवौ कर्कमीनालिसंस्थेऽतिदीर्घा जनुःपञ्चसप्तत्रिताराश्च नेष्टाः ॥ ८॥
अन्वयः—धनुर्मेषसिंहेषु रवौ यात्रा प्रशस्ता स्यात्, च शनिज्ञोशनोराशिगे रवौ
मध्या स्यात्, कर्कमीनालिसंस्थे रवौ अतिदीर्घा यात्रा स्यात्, तथा जनुः पञ्चसप्तत्रि-
ताराः नेष्टाः ॥ ८ ॥
धनु, मेष वा सिंह में सूर्य हो तो यात्रा उत्तम; मकर, कुम्भ, मिथुन,
कन्या, वृष वा तुला में सूर्य हो तो यात्रा मध्यम; और कर्क, वृश्चिक वा
मीन में सूर्य हो तो यात्रा बहुत दिनों में लौटानेवाली अर्थात् अशुभ होती
है। जन्मनक्षत्र से यात्रा के दिननक्षत्र तक गिनने से जितनी संख्या
हो उसमें नौ का भाग देने से १।३।५ वा ७ शेष रहे तो शुभ नहीं
होते, अर्थात् यात्रा में पहिली, पाँचवीं, सातवीं और तीसरी तारा
निषिद्ध है ॥ ८ ॥
यात्रा में निषिद्धतिथि और विहिततिथि
न षष्ठी न च द्वादशी नाष्टमी नो
सिताद्या तिथिः पूर्णिमाऽमा न रिक्ता।
ह्यादित्यमैत्रेन्दुजीवान्त्यहस्त-
श्रवो वासवरेव यात्रा प्रशस्ता ॥ ९ ॥
अन्वयः—षष्ठी (शुभा) न, च द्वादशी न, अष्टमी न, सिताद्या तिथिः पूर्णिमा
अमा न, रिक्ता न प्रशस्ता भवति। ह्यादित्यमैत्रेन्दुजीवान्त्यहस्तश्रवो वासवैः एव
यात्रा प्रशस्ता स्यात् ॥ ९ ॥

१६८ मुहूर्तचिन्तामणि
छठि, द्वादशी, अष्टमी, शुक्लपक्ष की परीवा, पूर्णमासी, अमावास्या,
चौथि, नवमी, चतुर्दशी ये तिथियाँ यात्रा में शुभ नहीं हैं, अर्थात् इन तिथियों
में यात्रा न करे, इनको छोड़कर अन्य तिथियों में यात्रा करे; और अश्विनी,
पुनर्वसु, अनुराधा, मृगशिरा, पुष्य, रेवती, हस्त, श्रवण, धनिष्ठा, इन नक्षत्रों
में की हुई यात्रा शुभ होती है ॥ ९ ॥
वारशूल और नक्षत्रशूल
न पूर्वदिशि शक्रभे न विधुसौरिवारे तथा
न चाजपदभ गुरौ यमदिशीनदैत्येज्ययोः ।
न पाशिदिशि धातृभे कुजबुधेऽर्यमर्क्षे तथा
न सौम्यककुभि व्रजेत्स्वजयजीवितार्थी बुधः ॥ १० ॥
अन्वयः—स्वजयजीवितार्थी बुधः पूर्वदिशि शक्रभे न, तथा विधुसौरिवारे न
व्रजेत् । च अजपदभे, गुरौ (दिने) यमदिशि न व्रजेत् । इनदैत्येज्ययोः धातृभे पाशिदिशि
न व्रजेत् तथा कुजबुधे अर्यमर्क्षे सौम्यककुभि न व्रजेत् ॥ १० ॥
धन, विजय और जीवन चाहनेवाला बुद्धिमान् मनुष्य ज्येष्ठा नक्षत्र में
तथा सोमवार और शनैश्चर के दिन पूर्व दिशा में, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में
तथा बृहस्पति के दिन दक्षिण दिशा में, रोहिणी नक्षत्र में तथा रविवार
और शुक्र के दिन पश्चिम दिशा में और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में तथा मंगल,
बुध के दिन उत्तर दिशा में यात्रा न करे ॥ १० ॥
कालविशेष में विशेष नक्षत्रों का निषेध
पूर्वाह्णे ध्रुवमिश्रभैर्न नृपतेर्यात्रा न मध्याह्नके
तीक्ष्णाख्यैरपराह्नके न लघुभैर्नो पूर्वरात्रे तथा ।
मित्राख्यैर्न च मध्यरात्रिसमये चोग्रैस्तथा नो चरै
रात्र्यन्ते हरिहस्तपुष्यशशिभिः स्यात्सर्वकाले शुभा ॥ ११ ॥
अन्वयः—पूर्वाह्णे ध्रुवमिश्रभैः नृपतेः यात्रा न शुभा, मध्याह्नके तीक्ष्णाख्यैः न
शुभा, अपराह्नके लघुभैः न, तथा मित्राख्यैः पूर्वरात्रे न, तथा च उग्रैः मध्यरात्रिसमये
न, तथा चरैः रात्र्यन्ते न (शुभा भवति) । हरिहस्तपुष्यशशिभिः सर्वकाले नृपतेः यात्रा
शुभा स्यात् ॥ ११ ॥
दिन के तीन भाग करके पहिले भाग में तीनों उत्तरा, रोहिणी, विशाखा
और कृत्तिका में; दूसरे भाग में मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा और श्लेषा में; तीसरे

यात्राप्रकरण १६९
भाग में अश्विनी और अभिजित् में यात्रा न करे । ऐसे ही रात्रि के तीन
भाग करके पहिले भाग में रेवती, चित्रा और अनुराधा में; दूसरे भाग में
तीनों पूर्वा, भरणी और मघा में और तीसरे भाग में स्वाती, पुनर्वसु, धनिष्ठा
और शतभिष में यात्रा न करनी चाहिए । श्रवण, हस्त, पुष्य, मृगशिरा,
इन नक्षत्रों में सब काल में यात्रा शुभ होती है ॥ ११ ॥
यात्रा में मध्यम नक्षत्र तथा कई निषिद्ध नक्षत्रों की त्याज्य घटी
पूर्वाग्निपित्र्यान्तकतारकाणां भूपप्रकृत्युग्रतुरङ्गमाः स्युः ।
स्वातीविशाखेन्द्रभुजङ्गमानां नाड्यो निषिद्धा मनुसंमिताश्च ॥ १२ ॥
अन्वयः-पूर्वाग्निपित्र्यान्तकतारकाणां भूपप्रकृत्युग्रतुरंगमाः नाड्यः, च स्वाती-
विशाखेन्द्रभुजङ्गमानां मनुसम्मताः नाड्यः निषिद्धाः स्युः ॥ १२ ॥
तीनों पूर्वाओं के प्रथम सोलह दण्ड, कृत्तिका के इक्कीस दण्ड, मघा के
ग्यारह दण्ड, भरणी के सात दण्ड, और स्वाती, विशाखा, ज्येष्ठा, श्लेषा,
इन नक्षत्रों के चौदह दण्ड यात्रा में निषिद्ध होते हैं ॥ १२ ॥
अन्यमत से त्याज्य घटी
पूर्वार्द्धमाग्नेयमघानिलानां त्यजेद्धि चित्राहियमोत्तरार्द्धम् ।
नृपः समस्तां गमने जयार्थी स्वातीं मघां चोशनसो मतेन ॥ १३ ॥
अन्वयः-जयार्थी नृपः गमने आग्नेयमघानिलानां पूर्वार्द्धं, चित्राहियमोत्तरार्द्धं हि
त्यजेत्, च उशनसः मतेन स्वातीं मघां समस्तां त्यजेत् ॥ १३ ॥
विजय चाहनेवाला राजा कृत्तिका, मघा और स्वाती का पूर्वार्द्ध तथा
चित्रा, श्लेषा और भरणी का उत्तरार्द्ध यात्रा में त्याग दे । शुक्राचार्य के मत
से सम्पूर्ण स्वाती और सम्पूर्ण मघा को यात्रा में त्याग दे ॥ १३ ॥
नक्षत्रों की जीवपक्षादि संज्ञा
तमोमुक्तताराः स्मृता विश्वसंख्याः शुभो जीवपक्षो मृतश्चापि भोग्याः ।
तदाक्रान्तभं कर्तरीसंज्ञमुक्तं ततोऽक्षेन्दुसंख्यं भवेद्ग्रस्तनाम ॥ १४ ॥
अन्वयः-विश्वसंख्याः तमोमुक्तताराः जीवपक्षः शुभः स्मृतः, च भोग्याः विश्वसंख्याः
मृतः उक्तः, तदा क्रान्तभं कर्तरीसंज्ञं उक्तम, ततः (राहोः) अक्षेन्दुसंख्यं ग्रस्तनाम
भवेत् ॥ १४ ॥
राहु के भुक्त तेरह नक्षत्र जीवपक्षसंज्ञक, और भोग्य तेरह नक्षत्र मृतपक्ष-
संज्ञक होते हैं और जिस नक्षत्र में राहु स्थित हो वह नक्षत्र कर्तरीसंज्ञक
और उससे पन्द्रहवाँ नक्षत्र ग्रस्तसंज्ञक होता है । इनमें यात्रा के लिए

१७० मुहूर्त्तचिन्तामणि
जीवपक्ष शुभ होता है। उदाहरण—जैसे हस्त नक्षत्र में राहु हो तो उसके
उलटे चलने के कारण चित्रा से लेकर पूर्वाभाद्रपद तक तेरह नक्षत्र
भुक्त होंगे उनकी जीवपक्ष संज्ञा होगी, और उत्तराफाल्गुनी से पूर्व रेवती तक
तेरह नक्षत्र भोग्य होंगे उनकी मृतपक्ष संज्ञा होगी, और हस्त कर्तरी-
संज्ञक तथा उत्तराभाद्रपद ग्रस्तसंज्ञक होगा। ये सब नीचे के चक्र में स्पष्ट
ज्ञात होंगे ॥ १४॥
जीवपक्षादि संज्ञाचक्र
कर्तरी [ह.] [चि.] [स्वा.] [वि.] [अनु.] [ज्ये.] [मू.] [पू.] जीवपक्ष
[उ.]                         [उ.]
[पू.]                         [अ.]
[म.]                         [श्र.]
[श्ले.]                        [ध.]
[पु.]                         [श.]
[पु.]                         [पू.]
मृतपक्ष [आ.] [मृ.] [रो.] [कृ.] [म.] [अ.] [रे.] [उ.] ग्रस्त
जीवपक्षादि का विशेष फल
मार्त्तण्डे मृतपक्षगे हिमकरश्चेज्जीवपक्षे शुभा
यात्रा स्याद्विपरीतग क्षयकरी द्वौ जीवपक्षे शुभा।
ग्रस्तर्क्षं मृतपक्षतः शुभकरं ग्रस्तात्तथा कर्तरी
यायीन्दुः स्थितिमान्रविर्जयकरौ तौ द्वौ तयोर्जीवगौ ॥ १५॥
अन्वयः—मार्त्तण्डे मृतपक्षगे चेत्, हिमकरः जीवपक्षे, तदा यात्रा शुभा स्यात्, विप-
रीतगे क्षयकरी स्यात्, द्वौ यदि जीवपक्षे तदा यात्रा शुभा, ग्रस्तर्क्षं मृतपक्षतः शुभकरं,
तथा ग्रस्तात् कर्तरी [शुभकरा] तथा इन्दुः यायी, रविःस्थितिमान्, तौ द्वौ जीवगौ तयोः
[यायिस्थायिनोः] जयकरौ ॥ १५॥

यात्राप्रकरण १७१
सूर्य मृतपक्ष में और चन्द्रमा जीवपक्ष में हो तो यात्रा शुभ होती है, और
इससे विपरीत अर्थात् चन्द्रमा मृतपक्ष में और सूर्य जीवपक्ष में हो तो यात्रा
विनाश करनेवाली होती है। यदि सूर्य और चन्द्रमा, दोनों जीवपक्ष में हों
तो यात्रा अति शुभ होती है, और यदि सूर्य-चन्द्रमा दोनों मृतपक्ष में हों तो
यात्रा अति अशुभ होती है। मृतपक्ष से ग्रस्तसंज्ञक नक्षत्र कैसा शुभकर है
जैसे मरे हुए से मरनेवाला रोगी अच्छा होता है, और ग्रस्तसंज्ञक नक्षत्र से
कर्तरीसंज्ञक कैसा अच्छा है जैसे कि एक दिन में मरनेवाले से दो दिन में
मरनेवाला अच्छा होता है। अब राजाओं की यात्रा का विशेष फल कहते
हैं। राजा दो प्रकार के होते हैं—एक यायी, दूसरा स्थायी । जो दूसरे राजा
के ऊपर चढ़ाई करता है उसे यायी और जो अपने घर में है उसे स्थायी
कहते हैं। चन्द्रमा यायी का स्वामी और सूर्य स्थायी का स्वामी है। यदि
सूर्य-चन्द्रमा दोनों जीवपक्ष में हों तो यायी-स्थायी दोनों की विजय होती है
और यदि चन्द्रमा जीवपक्ष में हो तो यायी राजा की विजय और सूर्य
जीवपक्ष में हो तो स्थायी राजा की विजय होती है, और यदि सूर्य-चन्द्रमा
दोनों मृतपक्ष में हों तो दोनों की पराजय होती है ।। १५ ।।
युद्धयात्रा के उपयोगी कुलाकुलसंज्ञक तिथि, वार, नक्षत्र
स्वात्यन्तकाहिवसुपौष्णकरानुराधा-
दित्यध्रुवाणि विषमास्तिथयोऽकुलाः स्युः ।
सूर्येन्दुमन्दगुरवश्च कुलाकुलाज्ञो
मूलाम्बुपेशविधिभं दशषड्द्वितिथयः ।। १६ ।।
पूर्वाश्विज्यमघेन्दुकर्णदहनद्वीशेन्द्रचित्रास्तथा
शुक्रारौ कुलसंज्ञकाश्च तिथयोऽर्काष्टेन्द्रवेर्देमिताः ।
यायी स्यादकुले जयी च समरे स्थायी च तद्वत्कुले
सन्धिः स्यादुभयोः कुलाकुलगणे भूमीशयोर्युध्यतोः ।। १७ ।।
अन्वयः—स्वात्यन्तकाहिवसुपौष्णकरानुराधादित्यध्रुवाणि विषमाः तिथयः सूर्येन्दु-
मन्दगुरवश्च अकुलाः स्युः । ज्ञः मूलाम्बुपेशविधिभं, दशषड्द्वितिथयः कुलाकुलाः स्युः ।
पूर्वाश्विज्यमघेन्दुकर्णदहनद्वीशेन्द्रचित्राः तथा शुक्रारौ अर्काष्टेन्द्रवेर्देमिताः तिथयः कुल-
संज्ञकाः स्यु । अकुले समरे यायी जयी स्यात् । तद्वत् कुले स्थायी जयी स्यात् । कुला-
कुलगणे, युध्यतोः उभयोः भूमीशयोः सन्धिः स्यात् ।। १६-१७ ।।
स्वाती, भरणी, इलेषा, धनिष्ठा, रेवती, हस्त, अनुराधा, पुनर्वसु, रोहिणी,

१७२ मुहूर्त्तचिन्तामणि
तीनों उत्तरा, ये बारह नक्षत्र, और परीवा, तीज, पंचमी, सप्तमी, नवमी,
एकादशी, त्रयोदशी, पूर्णमासी, अमावास्या य तिथियाँ और रविवार,
सोमवार, शनैश्चर, बृहस्पति ये दिन अकुलसंज्ञक तथा बुधवार यह एक
दिन और मूल, शतभिष, आर्द्रा, अभिजित् ये चार नक्षत्र और दशमी,
छठि, दुइज ये तिथियाँ कुलाकुलसंज्ञक ॥ १६ ॥ तथा तीनों पूर्वा, अश्विनी,
पुष्य, मघा, मृगशिरा, श्रवण, कृत्तिका, विशाखा, ज्येष्ठा, चित्रा, ये बारह
नक्षत्र और शुक्र, मंगल ये दो दिन और द्वादशी, अष्टमी, चतुर्दशी, चौथि,
ये चार तिथियाँ कुलसंज्ञक हैं । अकुलसंज्ञक तिथि, वार, नक्षत्रों में यात्रा या
युद्ध का प्रारम्भ करनेवाला यायी राजा, और कुलसंज्ञक तिथि, वार नक्षत्रों
में युद्ध का प्रारम्भ करनेवाला स्थायी राजा युद्ध में विजयी होता है, और
कुलाकुलसंज्ञक तिथि, वार, नक्षत्रों में युद्ध करनेवाले यायी, स्थायी दोनों
राजाओं में सन्धि हो जाती है ॥ १७ ॥
पन्थाराहु का विचार
स्युर्द्धर्मे दस्रपुष्योरगवसुजलपद्धीशमैत्राण्यथार्थे
याम्याजाङ्घ्रीन्द्रकर्णादितिपतृपवनोडून्यथोभानि कामे ।
वह्नचाद्राबुध्न्यचित्रानिरृतिविधिभगाख्यानि मोक्षेथरोहि-
ण्यार्य्यम्णाप्येन्दुविश्वान्तिमभदिनकरर्क्षाणि पन्थादिराहौ ॥ १८ ॥
अन्वयः—पन्थादिराहौ दस्रपुष्योरगवसुजलपद्धीशमैत्राणि धर्मे स्युः, अथ याम्या-
जांघ्रीन्द्रकर्णादितिपतृपवनोडूनि अर्थे स्युः, अथो वह्नयाद्राबुध्न्यचित्रानिरृतिविधि-
भगाख्यानि भानि कामे स्युः, अथ रोहिण्यार्यम्णाप्येन्दुविश्वान्तिमभदिनकरर्क्षाणि
मोक्षे स्युः ॥ १८ ॥
पाँच खड़ी रेखाओं के ऊपर नौ आड़ी रेखाओं के खींचने से जो बत्तीस
कोठों का चक्र होता है उसे पन्थाराहुचक्र कहते हैं । उसमें धर्म, अर्थ, काम,
मोक्ष, ये चार मार्ग होते हैं । उन चारों में से धर्ममार्ग में अश्विनी, पुष्य,
आश्लेषा, धनिष्ठा, शतभिष, विशाखा, अनुराधा, ये सात नक्षत्र; अर्थमार्ग में
भरणी, पूर्वाभाद्रपद, ज्येष्ठा, श्रवण, पुनर्वसु, मघा, स्वाती, ये सात नक्षत्र;
काममार्ग में कृत्तिका, आर्द्रा, उत्तराभाद्रपद, चित्रा, मूल, अभिजित्, पूर्वा-
फाल्गुनी ये सात नक्षत्र और मोक्षमार्ग में रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़,
मृगशिरा, उत्तराषाढ़, रेवती, हस्त, ये सात नक्षत्र स्थापन करने से यह पंथादि
राहु स्पष्ट होता है ॥ १८ ॥

यात्राप्रकरण १७३
पन्थाराहुचक्र
| धर्ममार्ग | अ० | पु० | आश्ले० | वि० | अनु० | ध० | श० |
| अर्थमार्ग | भ० | पुन० | म० | स्वा० | ज्ये० | श्र० | पू०भा० |
| काममार्ग | कृ० | आ० | पू० फा० | चि० | मू० | अभि० | उ०भा० |
| मोक्षमार्ग | रो० | मृ० | उ० फा० | ह० | पू० फा० | उ०फा० | रे० |
पन्थाराहुचक्रफल
धर्मगे भास्करे वित्तमोक्षे शशी वित्तगे धर्ममोक्षस्थितिः शस्यते ।
कामगे धर्ममोक्षार्थगः शोभनो मोक्षगे केवलं धर्मगः प्रोच्यते ॥ १९ ॥
अन्वयः—धर्मगे भास्करे, वित्तमोक्षे शशी शस्यते; वित्तगे भास्करे, धर्ममोक्ष-
स्थितः शशी; कामगे भास्करे, धर्ममोक्षार्थगः शशी शोभनः; मोक्षगे भास्करे, केवलं
धर्मगः शशी शोभनः प्रोच्यते ॥ १९ ॥
धर्ममार्ग में सूर्य हो और अर्थमार्ग या मोक्षमार्ग में चन्द्रमा हो तो शुभ
है, तथा अर्थमार्ग में सूर्य और धर्ममार्ग या मोक्षमार्ग में चन्द्रमा हो तो शुभ
है, तथा काममार्ग में सूर्य और धर्ममार्ग या मोक्षमार्ग या अर्थमार्ग में चन्द्रमा
हो तो शुभ है, तथा मोक्षमार्ग में सूर्य और धर्ममार्ग में चन्द्रमा हो तो शुभ है,
और इससे विपरीत अशुभ है ॥ १९ ॥
पौषादि मासों की परीवादि तिथियों में पूर्वादि दिशाओं
की यात्रा का शुभाशुभ फल
पौषे पक्षत्यादिका द्वादशैकं तिथ्यो माघादौ द्वितीयादिकास्ताः ।
कामात्तिस्रः स्युस्तृतीयादिवच्च याने प्राच्यादौ फलं तत्र वक्ष्ये ॥ २० ॥
सौख्यं क्लेशो भीतिरर्थागमश्च शून्यं नैस्वं निस्स्वता मिश्रता च ।
द्रव्यक्लेशो दुःखमिष्टाप्तिरर्थो लाभः सौख्यं मङ्गलं वित्तलाभः ॥ २१ ॥
लाभो द्रव्याप्तिर्धनं सौख्यमुक्तं भीतिर्लाभो मृत्युरर्थागमश्च ।
लाभः कष्टं द्रव्यलाभः सुखं च कष्टं सौख्यं क्लेशलाभः सुखं च ॥ २२ ॥
सौख्यं लाभः कार्यसिद्धिश्च कष्टं क्लेशः कष्टात्सिद्धिरर्थो धनं च ।
मृत्युर्लाभो द्रव्यलाभश्च शून्यं शून्यं सौख्यं मृत्युरत्यन्तकष्टम् ॥ २३ ॥

१७४ मुहूर्त्तचिन्तामणि
अन्वयः—पौषे पक्षत्यादिकाः द्वादश तिथ्यः, एवं माघादौ द्वितीयादिकाः ताः
[तिथ्यः], च कामात् तिस्रः तृतीयादिवत् ज्ञेयाः । तत्र प्राच्यादौ याने फलं वक्ष्ये ।
श्लोकक्रमेणैव सुगमः । इदं प्राच्यादौ याने क्रमेण फलं ज्ञेयम् ॥ २०-२३ ॥
खड़ी खींची हुई तेरह रेखाओं के ऊपर आड़ी चौदह रेखा ऐसी खींचे कि
जिनसे एकसौ छप्पन कोठोंवाला एक चक्र बन जावे । तदनन्तर उस चक्र की
ऊपरवाली पहिली पंक्ति में पौषादि बारह महीने लिखे । उन महीनों में से पौष
के नीचे बारह कोठों में क्रम से परीवा से लेकर द्वादशीपर्यन्त बारह तिथियाँ
लिखे और जिन कोठों में तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, ये तीन तिथियाँ हों उन्हीं
कोठों में त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा, ये तीन तिथियाँ भी क्रम से लिखे ।
ऐसे ही माघ आदि मासों में द्वितीया से लेकर परीवा पर्यन्त बारह तिथियाँ
क्रम से और तृतीया आदि तीन तिथियों के कोठों में त्रयोदशी आदि तीन
तिथियाँ क्रम से लिखे । वे सब आगे चक्र में स्पष्ट होंगी । अब उन तिथियों
में पूर्व आदि दिशाओं के यात्रा करने का फल कहते हैं ॥ २० ॥ पौष की
परीवा तिथि में पूर्व दिशा को यात्रा करने में सौख्य, दक्षिण में क्लेश, पश्चिम
में भय, उत्तर में धन का लाभ होता है; द्वितीया में पूर्वदिशा में शून्य फल,
दक्षिण में धन की हानि, पश्चिम में धन की हानि, उत्तर में मिश्रता अर्थात्
कभी हानि, कभी लाभ होता है; तृतीया में पूर्व में द्रव्यक्लेश, दक्षिण में दुःख
पश्चिम में वाञ्छित वस्तु का लाभ, उत्तर में धन होता है; चतुर्थी में पूर्व में
लाभ, दक्षिण में सौख्य, पश्चिम में मंगल, उत्तर में धनलाभ होता है ॥ २१ ॥
पञ्चमी में पूर्व में लाभ, दक्षिण में द्रव्यलाभ, पश्चिम में धन, उत्तर में सौख्य
होता है; छठि में पूर्व में भय, दक्षिण में लाभ, पश्चिम में मरण, उत्तर में
धनलाभ होता है; सप्तमी में पूर्व में लाभ, दक्षिण में कष्ट, पश्चिम में द्रव्यलाभ,
उत्तर में सुख होता है; अष्टमी में पूर्व में कष्ट, दक्षिण में सौख्य, पश्चिम में
क्लेश, उत्तर में सुख होता है ॥ २२ ॥ नवमी में पूर्व में सौख्य, दक्षिण में लाभ,
पश्चिम में कार्यसिद्धि, उत्तर में कष्ट होता है; दशमी में पूर्व में क्लेश, दक्षिण
में कष्ट से सिद्धि, पश्चिम में धन, उत्तर में धन होता है और एकादशी में पूर्व
में मरण, दक्षिण में लाभ, पश्चिम में द्रव्यलाभ, उत्तर में शून्य फल होता है;
द्वादशी में पूर्व में शून्य फल, दक्षिण में सौख्य, पश्चिम में मरण, उत्तर में
अत्यन्त कष्ट होता है; त्रयोदशी आदि तीन तिथियों का फल तृतीया आदि
तीन तिथियों के समान होता है और माघ आदि महीनों की द्वितीया आदि
तिथियों का भी यही फल है । सो भी चक्र में स्पष्ट है ॥ २३ ॥

यात्राप्रकरण १७५
तिथिचक्र

पौ०मा०फा०चै०वै०ज्ये०आ०श्रा०भा०कु०का०आ०पूर्वदक्षिणपश्चिमउत्तर
१२३।१३४।१४५।१५६७८९१०१११२सौख्यक्लेशभीतिअर्थागम
२३।१३४।१४५।१५६७८९१०१११२१शून्यनैःस्वनैःस्वमिश्रता
३।१३४।१४५।१५६७८९१०१११२१२द्रव्यक्लेशदुःखइष्टाप्तिअर्थ
४।१४५।१५६७८९१०१११२१२३।१३लाभसौख्यमंगलवित्तलाभ
५।१५६७८९१०१११२१२३।१३४।१४लाभद्रव्याप्तिधनसौख्य
६७८९१०१११२१२३।१३४।१४५।१५भीतिलाभमृत्युअर्थागम
७८९१०१११२१२३।१३४।१४५।१५६लाभकष्टद्रव्यलाभसुख
८९१०१११२१२३।१३४।१४५।१५६७कष्टसौख्यक्लेशलाभसुख
९१०१११२१२३।१३४।१४५।१५६७८सौख्यलाभकार्यसिद्धिकष्ट
१०१११२१२३।१३४।१४५।१५६७८९क्लेशकष्ट से सि०अर्थधन
१११२१२३।१३४।१४५।१५६७८९१०मृत्युलाभद्रव्यलाभशून्य
१२१२३।१३४।१४५।१५६७८९१०११शून्यसौख्यमृत्युअत्यन्त कष्ट