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मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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पृष्ठ 170

द्विरागमनप्रकरण १६१
शुक्रदोष का परिहार
नगरप्रवेशविषयाद्युपद्रवे करपीडने विबुधतीर्थयात्रयोः ।
नृपपीडने नववधूप्रवेशने प्रतिभार्गवो भवति दोषकृन्नहि ॥ ३ ॥
पित्र्ये गृहे चेत्कुचपुष्पसंभवः स्त्रीणां न दोषः प्रतिशुक्रसंभवः ।
भृग्वंगिरोवत्सवशिष्ठकश्यपात्रीणां भरद्वाजमुनेः कुले तथा ॥ ४ ॥
इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ द्विरागमनप्रकरणं समाप्तम् ॥ ८ ॥
अन्वयः—नगरप्रवेशविषयाद्युपद्रवे करपीडने विबुधतीर्थयात्रयोः नृपपीडने नववधू-
प्रवेशने प्रतिभार्गवः दोषकृत् नहि भवति । चेत् पित्र्ये गृहे स्त्रीणां कुचपुष्पसम्भवः तदा
प्रतिशुक्रसम्भवः दोषः न भवेत् । तथा भृग्वङ्गिरोवत्सवसिष्ठकश्यपात्रीणां तथा भरद्वाजमुनेः
कुले प्रतिशुक्रसम्भवः दोषः न (स्यात्) ॥ ३-४ ॥
नगर को जाने में, देश या गाँव में किसी प्रकार का उपद्रव होने
पर, देश या गाँव छोड़ने में तथा विवाह, देवयात्रा, तीर्थयात्रा, राजदण्ड
और वधूप्रवेश में सम्मुख शुक्र दोषकारक नहीं होता । पिता के ही घर
में जिनके पूरे स्तन तथा रजोदर्शन हुआ हो, अर्थात् जवानी हो गई हों, उन
स्त्रियों को सम्मुख शुक्र का दोष नहीं होता । ऐसे ही भृगु, अंगिरा, वत्स,
वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि और भरद्वाज मुनि के कुल में सम्मुख शुक्र का दोष
नहीं होता ॥ ३-४ ॥
अग्न्याधानप्रकरण
—:०:—
स्यादाग्निहोत्रविधिरुत्तरगे दिनेशे मिश्रध्रुवान्त्यशशिशक्रसुरेज्यधिष्ण्ये ।
रिक्तासु नो शशिकुजेज्यभृगौ न नीचे नास्तंगते न विजिते न च शत्रुगेहे ॥ १ ॥
अन्वयः—उत्तरगे दिनेशे, मिश्रध्रुवान्त्यशशिशक्रसुरेज्यधिष्ण्ये, अग्निहोत्रविधिः
(शुभः) स्यात् । रिक्तासु नो, शशिकुजेज्यभृगौ नीचे न, अस्तं गते न, विजिते न, च
शत्रुगृहे स्थिते न (शस्तः) ॥ १ ॥
उत्तरायण सूर्य के रहते कृत्तिका, विशाखा, रोहिणी, तीनों उत्तरा,
रेवती, मृगशिरा, ज्येष्ठा व पुष्य नक्षत्र में अग्न्याधान हो तो शुभ होता है ।
चौथि, नवमी, चतुर्दशी तिथि में, और चन्द्रमा, मंगल, बृहस्पति और शुक्र
अपने-अपने नीच स्थान में हों, अस्त हों, अन्य ग्रहों से पराजित हुए हों, अथवा
शत्रु के स्थान में हों तो अग्न्याधान नहीं करना चाहिए ॥ १ ॥