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मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 207 में से

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पृष्ठ 183

१७४ मुहूर्त्तचिन्तामणि
अन्वयः—पौषे पक्षत्यादिकाः द्वादश तिथ्यः, एवं माघादौ द्वितीयादिकाः ताः
[तिथ्यः], च कामात् तिस्रः तृतीयादिवत् ज्ञेयाः । तत्र प्राच्यादौ याने फलं वक्ष्ये ।
श्लोकक्रमेणैव सुगमः । इदं प्राच्यादौ याने क्रमेण फलं ज्ञेयम् ॥ २०-२३ ॥
खड़ी खींची हुई तेरह रेखाओं के ऊपर आड़ी चौदह रेखा ऐसी खींचे कि
जिनसे एकसौ छप्पन कोठोंवाला एक चक्र बन जावे । तदनन्तर उस चक्र की
ऊपरवाली पहिली पंक्ति में पौषादि बारह महीने लिखे । उन महीनों में से पौष
के नीचे बारह कोठों में क्रम से परीवा से लेकर द्वादशीपर्यन्त बारह तिथियाँ
लिखे और जिन कोठों में तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, ये तीन तिथियाँ हों उन्हीं
कोठों में त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा, ये तीन तिथियाँ भी क्रम से लिखे ।
ऐसे ही माघ आदि मासों में द्वितीया से लेकर परीवा पर्यन्त बारह तिथियाँ
क्रम से और तृतीया आदि तीन तिथियों के कोठों में त्रयोदशी आदि तीन
तिथियाँ क्रम से लिखे । वे सब आगे चक्र में स्पष्ट होंगी । अब उन तिथियों
में पूर्व आदि दिशाओं के यात्रा करने का फल कहते हैं ॥ २० ॥ पौष की
परीवा तिथि में पूर्व दिशा को यात्रा करने में सौख्य, दक्षिण में क्लेश, पश्चिम
में भय, उत्तर में धन का लाभ होता है; द्वितीया में पूर्वदिशा में शून्य फल,
दक्षिण में धन की हानि, पश्चिम में धन की हानि, उत्तर में मिश्रता अर्थात्
कभी हानि, कभी लाभ होता है; तृतीया में पूर्व में द्रव्यक्लेश, दक्षिण में दुःख
पश्चिम में वाञ्छित वस्तु का लाभ, उत्तर में धन होता है; चतुर्थी में पूर्व में
लाभ, दक्षिण में सौख्य, पश्चिम में मंगल, उत्तर में धनलाभ होता है ॥ २१ ॥
पञ्चमी में पूर्व में लाभ, दक्षिण में द्रव्यलाभ, पश्चिम में धन, उत्तर में सौख्य
होता है; छठि में पूर्व में भय, दक्षिण में लाभ, पश्चिम में मरण, उत्तर में
धनलाभ होता है; सप्तमी में पूर्व में लाभ, दक्षिण में कष्ट, पश्चिम में द्रव्यलाभ,
उत्तर में सुख होता है; अष्टमी में पूर्व में कष्ट, दक्षिण में सौख्य, पश्चिम में
क्लेश, उत्तर में सुख होता है ॥ २२ ॥ नवमी में पूर्व में सौख्य, दक्षिण में लाभ,
पश्चिम में कार्यसिद्धि, उत्तर में कष्ट होता है; दशमी में पूर्व में क्लेश, दक्षिण
में कष्ट से सिद्धि, पश्चिम में धन, उत्तर में धन होता है और एकादशी में पूर्व
में मरण, दक्षिण में लाभ, पश्चिम में द्रव्यलाभ, उत्तर में शून्य फल होता है;
द्वादशी में पूर्व में शून्य फल, दक्षिण में सौख्य, पश्चिम में मरण, उत्तर में
अत्यन्त कष्ट होता है; त्रयोदशी आदि तीन तिथियों का फल तृतीया आदि
तीन तिथियों के समान होता है और माघ आदि महीनों की द्वितीया आदि
तिथियों का भी यही फल है । सो भी चक्र में स्पष्ट है ॥ २३ ॥

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