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सर्वकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

यात्राप्रकरण १६७
प्रश्नकाल में शनैश्चर, शुक्र, बुध, बृहस्पति, ये चारों ग्रह या इनमें से
कोई एक ही ग्रह यदि मंगल से नवें, पाँचवें स्थान में स्थित हो, अथवा
चन्द्रमा यदि सूर्य से नवें, पाँचवें स्थान में हो, तो यात्रा करनेवाला जिस
दिशा में जाने की इच्छा करता है उस दिशा में यात्रा नहीं होती, किंतु
इन यात्राप्रतिबंधक ग्रहों में से जो ग्रह बलवान् होता है वह अपनी ही दिशा
में ले जाता है अथवा जिस दिशा में यात्रा करने की इच्छा से प्रश्न किया
गया हो उस दिशा का स्वामी प्रश्नलग्न से जिस स्थान में स्थित हो उस
स्थान से पाँचवें स्थान में यदि कोई बली ग्रह हो तो वह ग्रह अपनी ही दिशा
में यात्रा करनेवाले को ले जाता है। ग्रहों की दिशा इसी प्रकरण के ४६ वें
श्लोक में कही गई हैं ॥ ६-७ ॥
मासभेद से यात्रा के शुभाशुभभेद और तारा
धनुर्मेषसिंहेषु यात्रा प्रशस्ता शनिज्ञोशनोराशिगे चैव मध्या।
रवौ कर्कमीनालिसंस्थेऽतिदीर्घा जनुःपञ्चसप्तत्रिताराश्च नेष्टाः ॥ ८॥
अन्वयः—धनुर्मेषसिंहेषु रवौ यात्रा प्रशस्ता स्यात्, च शनिज्ञोशनोराशिगे रवौ
मध्या स्यात्, कर्कमीनालिसंस्थे रवौ अतिदीर्घा यात्रा स्यात्, तथा जनुः पञ्चसप्तत्रि-
ताराः नेष्टाः ॥ ८ ॥
धनु, मेष वा सिंह में सूर्य हो तो यात्रा उत्तम; मकर, कुम्भ, मिथुन,
कन्या, वृष वा तुला में सूर्य हो तो यात्रा मध्यम; और कर्क, वृश्चिक वा
मीन में सूर्य हो तो यात्रा बहुत दिनों में लौटानेवाली अर्थात् अशुभ होती
है। जन्मनक्षत्र से यात्रा के दिननक्षत्र तक गिनने से जितनी संख्या
हो उसमें नौ का भाग देने से १।३।५ वा ७ शेष रहे तो शुभ नहीं
होते, अर्थात् यात्रा में पहिली, पाँचवीं, सातवीं और तीसरी तारा
निषिद्ध है ॥ ८ ॥
यात्रा में निषिद्धतिथि और विहिततिथि
न षष्ठी न च द्वादशी नाष्टमी नो
सिताद्या तिथिः पूर्णिमाऽमा न रिक्ता।
ह्यादित्यमैत्रेन्दुजीवान्त्यहस्त-
श्रवो वासवरेव यात्रा प्रशस्ता ॥ ९ ॥
अन्वयः—षष्ठी (शुभा) न, च द्वादशी न, अष्टमी न, सिताद्या तिथिः पूर्णिमा
अमा न, रिक्ता न प्रशस्ता भवति। ह्यादित्यमैत्रेन्दुजीवान्त्यहस्तश्रवो वासवैः एव
यात्रा प्रशस्ता स्यात् ॥ ९ ॥