मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
सप्तम अङ्क । १४१
सप्तम अङ्क । १४१
यह बिचारा कुछ भी लोकव्यवहार नही जानता । यह किसका मुह देख के जीएगा ?
स्त्री ।—इस की रक्षा कुलदेवी करेंगी । बेटा ! अब पिता फिर न मिलेंगे इस से मिल कर प्रणाम कर ले ।
बालक ।—( पैरों पर गिर के ) पिता ! मैं आप के बिना क्या ५ करू गा ?
चं० दा० ।—बेटा ! जहा चाणक्य न हो वहा बसना ।
दोनों चाडाल ।—( सूली खड़ी कर के ) अजी चन्दनदास ! देखो, सूली खड़ी हुई, अब सावधान हो जाओ ।
स्त्री ।—( रोकर ) लोगो, बचाओ ! अरे ! कोई बचाओ । १०
च० दा० ।—भाइयो, तनिक ठहरो ( स्त्री से ) अरे ! अब तुम रोरो कर क्या नन्दों को स्वर्ग से बुला लोगी ? अब वे लोग यहा नही है जो स्त्रियों पर सर्व्वदा दया रखते थे ।
१ चाडाल ।—अरे वजुवेत्रक ! पकड़ इस चन्दनदास को, १५ घरवाले आप ही रो पीट कर चले जायगे ।
२ चाडाल ।—अच्छा वज्रलोमक, मै पकड़ता हूं ।
चं०दा० ।—भाइयो ! तनिक ठहरो, मै अपने लड़क से तो मिल लूं ( लड़के को गले लगा कर और माथा सूंघ कर) बेटा ! मरना तो था ही पर एक मित्र के हेतु मरते हैं इस से सोच मत कर । २०
पुत्र ।—पिता, क्या हमारे कुल के लोग ऐसा ही करते आए हैं ? ( पैर पर गिर पड़ता है ।)
२ चाडाल ।—पकड़ रे बज्रलोमक ! ( दोनों चंदनदास को पकड़ते हैं ) ।
स्त्री ।—लोगो ! बचाओ रे, बचाओ ! २५
१४२ मुद्राराक्षस—
(वेग से राक्षस आता है)
राक्षस ।—डरो मत, डरो मत । सुनो सुनो सेनापति !
चन्दनदास को मत मारना, क्योंकि—
नसत स्वामिकुल जिन लख्यो, निज चख शलु समान ।
५ मित्रदुख ह्र मै धरयौ, निलज होइ जिन प्रान ॥
तुम सों हारि बिगारि सब कढ़ी न जाकी साल ।
ता राक्षस के कठ मै, डारहु यह जमफास ॥
च० दा० ।—(देख कर और आखों मे आसू भर कर)
अमात्य ! यह क्या करते हो ?
१० राक्षस । मित्र, तुम्हारे सच्चरित्र का एक छोटा सा अनुकरण ।
च० दा ।—अमात्य, मेरा किया तो सब निष्फल हो गया, पर आप ने ऐसे समय यह साहस अनुचित किया ।
राक्षस ।—मित्र चंदनदास ! उराहना मत दो, सभी स्वार्थी है ।
१५ (चाडाल से) अजी ! तुम उस दुष्ट चाणक्य से कहो ।
दोनों चाडाल ।—क्या कह ?
राक्षस ।—
जिन कलि मै हू मित्र हित, तृन सम छोड़े प्रान ।
जाके जस-रवि सामुहे, शिवि जस दीप समान ॥
२० जाको अति निर्मल चरित, दया आदि नित जानि ।
बौद्धहु सब लज्जित भए, परम शुद्ध जेहि मानि ॥
ता पूजा के पात्र कों, मारत तू धरि पाप ।
जाके हितु सो शत्रु, तुव, आयो इत मै आप ॥
१ चाडाल । —अरे वेणुवेत्रक ! तू चन्दनदास को पकड़ कर
२५ इस मसान के पेड़ की छाया मे बैठ, तब से मन्त्री चाणक्य को मै समाचार दू कि अमात्य राक्षस पकड़ा गया ।