मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
प्रथम अङ्क। ३६
प्रथम अङ्क। ३६
कुटुम्ब यों न छोड़ जाता (प्रकाश) भला, तूने यह कैसे
जाना कि राक्षस मन्त्री वहां अपना कुटुम्ब छोड़ गया ?
दूत।—महाराज ! इस “मोहर” की अंगूठी से आप को
विश्वास होगा (अंगूठी देता है)।
चाणक्य।—(अंगूठी लेकर और उस में राक्षस का नाम बांच ५
कर प्रसन्न हो कर आप ही आप) अहा ! मै समझता हूं
कि राक्षस ही मेरे हाथ लगा (प्रकाश) भला, तुम ने
यह अंगूठी कैसे पाई ? मुझ से सब वृत्तान्त तो कहो।
दूत:—सुनिये, जब मुझे आप ने नगर के लोगों का भेद लेने
भेजा तब मै ने यह सोचा कि बिना भेस बदले मै दूसरे के १०
घर मे न घुसने पाऊंगा इससे मै जोगी का भेस कर
के जमराज का चित्र हाथ मे लिये फिरता फिरता चन्दन-
दास जौहरी के घर मे चला गया और वहा चित्र फेला
कर गीत गाने लगा।
चाणक्य। हां तब ? १५
दूत।—तब महाराज ! कौतुक देखने को एक पांच बरस
का बड़ा सुन्दर बालक एक परदे के आड से बाहर
निकला, उस समय परदे के भीतर स्त्रियों में बड़ा
कलकल हुआ कि “लड़का कहा गया”। इतने मे एक स्त्री
ने द्वार के बाहर मुख निकाल कर देखा और लड़के को २०
झट पकड़ ले गई, पर पुरुष की उंगली से स्त्री की उंगली
पतली होती है, उस से द्वार ही पर यह अंगूठी गिर पड़ी,
और मै उस पर राक्षस मन्त्री का नाम देख कर आप के
पास उठा लाया।
चाणक्य।—वाह वाह ! क्यो न हो, अच्छा जाओ, मैं ने २५
सब सुन लिया ! तुम्हे इस का फल शीघ्र ही मिलेगा।
दूत।—जो आज्ञा (जाता है)।
चाणक्य।—शारङ्गरव ! शारङ्गरव ! !
४० मुद्राराक्षस !
शिष्य ।—( आकर ) आज्ञा, गुरुजी ?
चाणक्य ।- बेटा ! कलम, दावात, कागज तो लाओ ।
शिष्य ।—जो आज्ञा, ( बाहर जाकर ले आता है ) गुरुजी !
ले आया ।
५ चाणक्य ।—(लेकर आप ही आप ) क्या लिखू ? इसी पत्र से
राक्षस को जीतना है।
( प्रतिहारी आता है )
प्रतिहारी ।—जय हो महाराज की, जय हो !
चाणक्य ।—(हर्ष से आप ही आप ) वाह वाह ! कैसा सगुन
१० हुआ कि कार्यारम्भ ही में जय शब्द सुनाई पडा ।
( प्रकाश ) कहो, शोणोत्तरा, क्यों आयी हो ?
प्र० ।—महाराज ! राजा चन्द्रगुप्त ने प्रणाम कहा है और पूछा
है कि मै पर्व्वतेश्वर की क्रिया किया चाहता हूं इस से
आप की आज्ञा हो तो उन के पहिरे आभरणों को
१५ पण्डित ब्राह्मणों को दूं ।
चाणक्य ।—( हर्ष से आप ही आप ) वाह चन्द्रगुप्त वाह,
क्यों न हो, मेरे जी की बात सोच कर संदेशा कहला भेजा
है ( प्रकाश ) शोणोत्तरा ! चन्द्रगुप्त से कहो कि “वाह !
बेटा वाह ! क्यों न हो, बहुत अच्छा विचार किया ! तुम
२० व्यवहार में बड़े ही चतुर हो, इस से जो सोचा है सो
करो पर पर्व्वतेश्वर के पहिरे हुए आभरण गुणवान्
ब्राह्मणों को देने चाहिए, इस से ब्राह्मण मै चुन के
भेजूंगा ।”
प्र० ।-- जो आज्ञा महाराज ! ( जाता है ) ।
२५ चाणक्य ।—शार्ङ्गरव ! विश्वावसु आदि तीनों भाइयों से
कहो कि जाकर चन्द्रगुप्त से आभरण ले कर मुझ से
मिलें ।