मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
प्रथम अङ्क । ३३
प्रथम अङ्क । ३३
दुःशीलता * ( बैठ कर आप ही आप ) क्या सब लोग यह
बात जान गए कि मेरे × नन्दवंश के नाश से क्रुद्ध हो कर
राक्षस, पितावध से दुखी मलयकेतु + से मिल कर यवनराज
की सहायता ले कर चन्द्रगुप्त पर चढाई किया चाहता है।
( कुछ सोच कर ) क्या हुआ, जब मै नन्दवश की बड़ी प्रतिज्ञा ५
रूपी नदी से पार उतर चुका, तब यह बात प्रकाश होने ही से
क्या मै इस को न पूरी कर सकूँगा ? क्यों कि—
दिसि सरिस रिपु रमनी बदन शशि शोक कारिख लाय कै।
लै नीति पवनहि सचिव बिटपन छार डारि जराय कै ॥
बिनु पुर निवासी पच्छिगन नृप बंसमूल नसाय कै । १०
भो शांति मम क्रोधाग्नि यह कछु दहन हित नहि पाय कै - ॥१२॥
और भी
जिन जनन नै अति सोच सों नृप भय प्रगट धिक नहि कह्यौ।
पै मम अनादर को अतिहि वह सोच जिय जिन के रह्यौ =॥
ते लखहि आसन सों गिरायो नन्द सहित समाज कौं । १५
जिमि शिखर तें वनराज क्रोधि गिरावई गजराज कौं ॥ १३ ॥
सो यद्यपि मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर चुका हूं, तौ भी
चन्द्रगुप्त के हेतु शस्त्र अब भी धारण करता हूं। देखो मैने—
नवनन्दन कौ मूल सहित खोद्यो छन भर में।
चन्द्रगुप्त मै श्री राखी नलिनी जिमि सर में ॥ २०
क्रोध प्रीति सो एक नासि कै एक बसायो।
शत्रु मित्र को प्रगट सबन फल ले दिखलायो ॥
* अर्थात् कुछ तुम लोगो पर दृष्टता मे नहीं अपने काम की घबराहट से बिछी हुई चटाई नहीं देखी ।
× नन्दवश अर्थात् नवा न द, एक नन्द और उस क आठ पा ।
+ पर्वतेश्वर राजा का पत्र ।
— अग्नि बिना आधार नही जलती ।
= न द ने कुरूप होने क कारण चाणक्य को अपने श्राद्ध से निकाल दिया था ।
३४ मुद्राराक्षस ।
अथवा जब तक राक्षस नही पकडा जाता तब तक नन्दों के मारने से क्या और चन्द्रगुप्त को राज्य मिलने से ही क्या ? (कुछ सोचकर) अहा ! राक्षस की नन्दवंश मे कैसी दृढ़ भक्ति है ! जब तक नन्दवंश का कोई भी जीता रहेगा तब तक
५ वह कभी शूद्र का मन्त्री बनना स्वीकार न करेगा, इस से उस के पकडने मे हम लोगों को निरुद्यम रहना अच्छा नही । यही समझ कर तो नन्दवंश का सर्वार्थसिद्धि बिचारा तपोवन मे चला गया तौ भी हमने मार डाला । देखो, राक्षस मलय केतु को मिला कर हमारे बिगाड़ने मे यत्न करता ही जाता है
१० (आकाश मे देख कर) वाह राक्षस मन्त्री वाह ! क्यों न हो ! वाह मन्त्रियों मे वृहस्पति के समान वाह ! तू धन्य है, क्योंकि—
जब लौं रहै सुख राज को तब लौं सबै सेवा करै ।
पुनि राज बिगडे कौन स्वामी तनिक नहि चित पे धरै ॥
१५ जे विपतिहू मे पालि पूरब प्रीति काज सवारहीं ।
ते धन्य नर तुम सारिखे दुर्लभ अहै संसय नहीं ॥
इसी से तो हम लोग इतना यत्न करके तुम्हें मिलाया चाहते है कि तुम अनुग्रह करके चन्द्रगुप्त के मन्त्री बनो, क्योंकि—
२० मूरख कातर स्वामिभक्ति कछु काम न आवै ।
पण्डित हूं बिन भक्ति काज कछु नाहि बनावै ॥
निज स्वारथ की प्रीति करैं ते सब जिमि नारी ।
बुद्धि भक्ति दोउ होय तबै सेवक सुखकारी ॥
सो मै भी इस विषय मे कुछ सोता नही हूं, यथाशक्ति
२५ उसी के मिलाने का यत्न करता रहता हूं । देखो, पर्व्वतक को चाणक्य ने मारा यह अपवाद न होगा, क्योंकि सब जानते है कि चन्द्रगुप्त और पर्व्वतक मेरे मित्र है तो मै पर्व्वतक को मार