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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

तृतीय अङ्क । ७९

तृतीय अङ्क । ७९

कञ्चुकी ।—आर्य्य, क्यों नही ।
चाणक्य ।—( क्रोध से ) है ? किस ने कहा बोल तो ?
कञ्चुकी ।—( भय से ) महाराज प्रसन्न हों, जब सुगांगप्रसाद की अटारी पर गए थे तो देख कर महाराज ने आप ही जान लिया कि कौमुदी-महोत्सव अबकी नही हुआ । ५
चाणक्य ।—अरे ठहर, मैं ने जाना यह तुम्ही लोगों ने वृषल का जी मेरी ओर से फेर कर उसे चिढ़ा दिया है, और क्या ।
कञ्चुकी ।—( भय से नीचा मुंह कर के चुप रह जाता है । )
चाणक्य ।—अरे राज के कारबारियों का चाणक्य के ऊपर बड़ा ही विद्वेष पक्षपात है । अच्छा, वृषल कहा है ? १० बता ।
कञ्चुकी ।—( डरता हुआ ) आर्य्य ! सुगांगप्रसाद की अटारी पर से महाराज ने मुझे आप के चरणो मे भेजा है ।
चाणक्य ।—(उठकर) कञ्चुकी ! सुगांगप्रसाद का मार्ग बता ।
कञ्चुकी ।—इधर महाराज ( दोनों घूमते हैं ) । १५
कञ्चुकी ।—महाराज ! यह सुगांगप्रसाद की सीढ़ियां हैं, चढ़ें ।
( दोनों सुगांगप्रसाद पर चढते हैं और चाणक्य के घर का परदा गिर के छिप जाता है । )
चाणक्य ।—( चढ़ कर और चन्द्रगुप्त को देख कर प्रसन्नता से आप ही आप ) अहा ! वृषल सिंहासन पर बैठा है— २०
हीन नन्द सो रहित नृप, चन्द्र करत जेहि भोग ।
परम होत सन्तोष लखि, आसन राजा जोग ॥
( पास जाकर ) जय हो वृषल की !
चन्द्रगुप्त ।—(उठ कर और पैरों पर गिर कर ) आर्य्य ! चन्द्रगुप्त दण्डवत् करता है । २५
चाणक्य ।— ( हाथ पकड़ कर उठाकर ) उठो बेटा ! उठो ।
'जहँ लो हिमालय के शिखर सुरधनी कन सीतल रहै ।

७८ मुद्राराक्षस-

जहँ लो विविध मणिखण्ड मंडित समुद्र दक्षिणदिसि बहै ॥
तहँ लो सबै नृप आइ भय सों तोहि सीस झुकावहीँ ।
तिनके मुकुट मणि रँगे तुव पद निरखि हम सुख पावही ॥

चन्द्रगुप्त।—आर्य्य ! आप की कृपा से ऐसा ही हो रहा है।

५ बैठिए।

(दोनों यथास्थान बैठते हैं)

चाणक्य।—वृषल ! कहो, मुझे क्यों बुलाया है ?
चन्द्रगुप्त।—आर्य्य के दर्शन से कृतार्थ होने को।
चाणक्य।—[हस कर] भया, बहुत शिष्टाचार हुआ, अब

१० बताओ क्यो बुलाया है ? क्योंकि राजा लोग किसी को बेकाम नहीं बुलाते।
चन्द्रगुप्त।—आर्य्य ! आप ने कौमुदी महोत्सव के न होने से क्या फल सोचा है ?
चाणक्य।—[हस कर] तो यही उलाहना देने को बुलाया

१५ है न ?
चन्द्रगुप्त।—उलाहना देने को कभी नही।
चाणक्य।—तो क्यों ?
चन्द्रगुप्त।—पूछने को।
चाणक्य।—जब पूछना ही है तब तुम को इससे क्या ? शिष्य

२० को सर्व्वदा गुरु की रुचि पर चलना चाहिए।
चन्द्रगुप्त।—इस मे कोई सन्देह नही पर आप की रुचि बिना प्रयोजन नही प्रवृत्त होती, इस से पूछा।
चाणक्य।—ठीक है तुम ने मेरा आशय जान लिया, बिना प्रयोजन के चाणक्य की रुचि किसी ओर कभी फिरती

२५ ही नही।
चन्द्रगुप्त।—इसी से तो सुनने बिना मेरा जी अकुलाता है।
चाणक्य।—सुनो, अर्थशास्त्रकारों ने तीन प्रकार के राज्य लिखे हैं—एक राजा के भरोसे, दूसरा मन्त्री के भरोसे, तीसरा