मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २५५
शाखा पत्र भेज री कोमल, श्रीपति चरण कमल लपटानी।
धनि तुलसी पूरब तप कीन्हौ, शालिग्राम भई पटरानी।
शिव सनकादिक अस ब्रह्मादिक ,खोजत फिरे महामुनी ज्ञानी।
छप्पन भोग धरे हरि आगे, बिन तुलसी प्रभु एक न मानी।
धूप दीप नैवेद्य आरती, पुष्पन की वर्षा वर्षानी।
प्रेम प्रीति करी हरि बस कीन्ही, साँवरी सूरत हृदय हुलसानी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भक्ति दान मोहि दियो महारानी।
॥४४२॥†
पद के द्वितीयार्द्ध मे अर्थ सगति का विशेष अभाव है। शिव
और काशी वर्णन के पदो की तरह इस पद को भी भाव और भाषा
के आधार पर प्रक्षिप्त मानना ही अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है।
३३
अजी ये लला जू आज गोकुल वासी।
गोकुल वासी प्राण हमारे, हाँ ललाजी, श्याम आये, भला।
श्याम सुन्दर अविनासी।
इत गोकुल उत मथुरा नगरी, हाँ लला जी, बीच ये भला।
बीचे नदी यमुना सी।
यमुना के तीरे धेनु चरावे, हाँ लला जी, हाथ लिये नौलासी।
वृन्दावन की कुंज गलिन मे, हाँ लला जी, सग दुलहिन राधा सी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हाँ ललाजी, तुम ठाकुर मै दासी।
॥४४३॥†
भाव भाषा के आधार पर प्रक्षिप्त ही प्रतीत होता है। इस शैली
का यही एक पद प्राप्त है। पद मे पूर्वापर सबध और अर्थ सगत
का अभाव है। "यमुना के नीरे तीरे धेनु चरावे" जैसी अभिव्यक्ति
की पुनरुक्ति अन्य कई पदो की तरह इसमे भी हुई है।
३४
नागर नन्दा रे भुगट पर वारी जाऊँ नागर नन्दां।
वनस्पति मे तुलसी बडी है, नदीयन मे बड़ी गंगा।
२५६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
सब देवन मे शिवजी बडे है, तारन मे बडा चन्दा।
सब भक्त मे भरथरी बडे है, शरण राखो गोविन्दा।
मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण, चरण कमल चित चन्दा ॥४४४॥†
३५
कृष्ण करो यजमान, अब तुम कृष्ण करो यजमान।
जाकी कीरत वेद बखानत, साखी देत पुरान।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहत, कुण्डल झलकत कान।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, दो दरशण का दान ॥४४५॥†
३६
माई मोरे नैन- बसे रघुबीर।
कर सर चाप, कुसुम सर लोचन, ढारे भए मन धीर।
ललित लवग लता नागर लीला, जब पेखो तब रनबीर।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, बरसत काचन नीर ॥४४६॥†
३७
दोनो ठाढे कदम की छइयाँ।
गौर वरण है ज्येष्ठ हमारा, श्याम वरण मोरे सइयाँ रे।
गौर के सिर जर कसबी नीरा, श्याम सिर मुकुट धरइया रे।
गौर के नाव बलभद्र भइया, श्याम के नाव कन्हैया रे।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, दोनो मोरे शीश नवइया रे ॥४४७॥†
३८
गोरस लीने नन्दलाल, रसमाँ गोरस लीजे।
मै हू वृषभानु नन्दिनी, तुम हो नन्दाजी के लाल।
मोर-मुकट मुक्ता फूल कुन्डल, उर बैजन्ती माल।
मै दंधि बेचन जाती वृन्दाबन, रोकत है बिना काज।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, बॉह गहे की लाज ॥४४८॥†
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २५७
खड़ी बोली
१
एरी बरजो जसोदा कान, मेरे घर नित्य आता है।
जिधर को मै जाती हूँ, वह मेरे सामा ही आता है।
मै जल जमुना भरन जात हूँ, मेरे सामा ही आता है।
ककरी दे मोरी बहिया मरोरी, बारजोरी मचाता है।
मै दहि बेचन जात वृन्दावन, चली पीछा से आता है।
दहि मटकी फोड माखन, मेरा लुट खाता है।
रास विलास करत गोकुल मे, बीसयाँ सुनाता है।
मीराँ के गिरधर मिलियाँ, चरण मे लगता है ॥४४९॥†
२
बसीवारे की चितवन सालति है।
मोर मुकुट मकराकृत कुंडल, तापर कलंगी हालति है।
मै तो छकी तुमरे छबि ऊपर, जो न छके ताहैं नालति है।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कवल चित लागति है।
॥४५०॥†
३
बता दे सखी सांवरियाँ को डेरो किती दूर।
इत मथुरा उत गोकुल नगरी बीच बहे यमुना पूर।
मथुरा जी की मस्त गुवालिनी मुख पर बरसे नूर।
मीराँ के प्रभ गिरिधर नागर, सांवरे से मिलना जरूर।
॥४५१॥†
१७
२५८
मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
पंजाबी बोली
१
दसियो मोहन किस दानी।
आवदा जावदा नजर न आवै, अजब तमाशा इस दानी,।
दधि मेरी खायो मटुकिया फोरी, लोभी वह गोरस दानी।
मात यशोदा दधि विलोवै, गोरस ले ले नसदानी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, लूँ लूँ रस दानी ॥४५२॥†
पदाभिव्यक्ति असगत है।
भोजपुरी बोली
१
मेरो मन बसि गयो गिरधर लाल सो।
मोर मुकुट पीताम्बरो, गल बैजन्ती माल।
गऊवन के सग डोलत हो, जसुमति को लाल।
कालिन्दी के तीर हो, कान्हा गऊबा चराय।
सीतल कदम की छहियाँ हो, मुरली बजाय।
जसुमति के दुवरवाँ हो, ग्वालिन सब जाय।
बरजहूँ अपना दुलरवाँ हो, हमसे अरुझाय।
वृन्दावन क्रीडा करै हो, गोपिन के साथ।
सुर नर मुनि सब मोहै हो, ठाकुर जदुनाथ।
इन्द्र कोप घन बरखे, मूसल जल धार।
बूडत ब्रज को राखेऊ, मोरे प्रान अधार।
मीराँ के प्रभु गिरिधर हो, सुनिये चितलाय।
तुम्हरे दरस की भूखी हो, मोहि कछु न सुहाय। ॥४५३॥
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबंध का अभाव है।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २५६
बिहारी बोली
१
मैं तो लागी रहो नन्दलाल सो।
हमरे बारहि दूज न पार।
लाल लाल पगिया झिन झिन बार।
साँकर खटोलना दुइ जन बीच।
मन कइले बरष, तन कइले कीच।
कहाँ गइले बछरु, कहाँ गइली गाय।
कहाँ गइले धेनु चरावन राय।
कहाँ गइले गोपी, कह गइले बाल।
कहाँ गइले मुरली बजावनहार।
मीराँ के प्रभु गिरधर लाल।
तुम्हरे दरस बिन महल बेहाल ।।४५४।।
पदाभिव्यक्ति असंगत और कही कही अर्थहीन भी है।
२
हरि सो बिनती कर जोरी।
बरबस रचल धमारी, हम पर मात पिता पारे गारी ।
निपट अल्प बुधि हीन, दीन गति थोरी, प्रेम मकान रसले बसोरी।
मीराँ के प्रभु शरण तिहारी, ओचक आय मिलतु गिरधारी ।।४५५।।†
पद की तृतीय पंक्ति अर्थहीन है।
३
जागिस गिरधारी लाल, भक्तन हितकारी।
दासी हाजर खवास, कचन ले झारी।
२६० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
संऊच करो दंत धाबन, स्नान की तय्यारी ।
वस्त्र और पुष्प माल, तुलसी अति प्यारी ।
रत्न जटित आभूषण, मुकुट लटक वारी ।
धूप दीप नैवेद्य, आरती सवारी ।
मीराँ प्रभु विधी विधान चरणन चित हारी ॥ ४५६ ॥†
पद की प्रथम पंक्ति से बिहारी प्रभाव स्पष्ट है तथापि शेष पद
की भाषा शुद्ध ब्रजभाषा ही है। भाव और भाषा के आधार पर पद
की प्रामाणिकता संदिग्ध है। पद की अन्तिम पंक्ति का निम्नांकित
पाठान्तर प्राप्त है :— "जागिये गिरिधारी लाल भक्तन हितकारी"
इस पाठान्तर के आधार पर पद शुद्ध ब्रजभाषा का हो जाता है।
गुजराती में प्राप्त पद
१
कन्हैया बल जाऊँ, अब नहि बसूँ रे गोकुल मे।
काली ओढे कामली रे, काली हेरे कहान ।
वृन्दावन की कुंज गलिन मे, खेलत गोपी तज मान रे।
घेर आईं गोवालन, घेर आये गोवाल ।
हरिह जु नहि आये रे, मेरे मदन गोपाल ।
सोने की बँसरिया, रूपे की जजीर ।
गावे न बजावे कान जी, भट जमुना के तीर ।
जमना के नीरे तीरे बँगला बनावुँ ।
बँगला के भीते भीते बेर बेर प्रेम चणाऊँ ।
'मीराँ' के प्रभु गिरिधर प्यारे लाल ।
अब कोई मत पडो रे, मेरे ख्याल ॥४५७॥†
२
लेने तुरी लकंडी रे, लेने तुरी कामली, गायो तो चरावा नहिं जाऊँ मावडी ।
माखन तो बलभद्र ने खायो, हमने खायो खाटी हो रे छाँशडली ।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २६१
•
वृन्दाबन ने मारग जाता; पाँवों मे खुंचे१ झीनी काँकडली ।
मीराँ बाई के प्रभु गिरधर नागुण, चरण कलम चित राखडली ॥४५८॥†
३
नन्दलाल नही रे आऊँ मुझे घरे काम छे,तुलसीनी माला मे श्याम छे ।
वन्द्राते वनने मारग जता, राधा गोरी ने कान श्याम छे ।
वन्द्राते वन में रास रचो छे, सहस्त्र गोपी मैं एक श्याम छे ।
वन्द्राते वन ने मारग जाता, दान आथानि२ धनी हाम३ छे ।
वन्द्राते वननी कुञ्ज गलिन में, घरे घरे गोपियो मे डाम छे ।
आनी तेरे गगा वाला पेरी तेरे जमुना, वह माँ गोकुल यू गाम छे ।
गामना वालो ना मारे महीना वलोना,महिणा धुनियानी घनी हाम छे ।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरन मे सुख स्याम छे ॥४५९॥†
४
वारे वारे कहोने कहीए दिलडानी वातो, वारे वारे कहोने कहीए ।
आगे तमे बोलड़ा बोल्या मारा राज ।
ते बोलड़ा सभारी४ मने कहे ताँ आवे लाज ।
पाँडवोनी प्रतिज्ञा पाली, द्रौपदी नी राखी लाज ।
सुदामानी वेला वारी, उगार्यो प्रह्लाद ।
प्रजापतिए नीभामाँ पूरियाँ , माँहे देवेतानो वास ।
माजारी५ ना बच्चा रे राख्याँ, एवा श्री महाराज ।
वृन्दावन थी सालुडा लाव्या६, राधाजी ने काज ।
पहेरी ओढी महेले आव्या, रीझया श्री महाराज ।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, सोहागी बनी सजी सीज़॥४६०॥†
१ चुभती हैं, २ देनेकी, ३ इच्छा, ४ सुनकर, ५ बिल्ली, ६ लाये ।
२६२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
५
आँखलडी बाँकी रे, अलबेला तारी, आँखडली बाँकी ।
चारवणीमाँ मारा चित्त चोरी लीधा१,नेणे मोहनी नाखी ।
नेण कमलना भलका२ मारे, अेणे मार्या ताकी ताकी रे ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागुण,नीत चरण कमलनी दासी रे ॥४६१॥†
६
झगडो लाग्यो श्री जमना जी आरे, चल्याने माँरे शुं छे ।
वृन्दावन ना मारग जाताँ, हॉरे आगल आवी३ का घेरे ।
वृन्दाबननी कुज गलीन माँ, पालव आवी का झेरे ।
बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर नागुण,गोपी ओने लाड लडावे ॥४६२।।†
७
कोण भरे रे पानी कोण भरे, जमनानाँ पाणी कोण भरे ।
घर म्हारूँ दूर गागर शिर भारी, अरे खोटी थाँऊ तो घेर बेठणी बढे ।
शिर पर कलश कलश पर झारी, झारी पे बेठी झारी मोज करे ।
आणी तेरे गगा पेली तीरे जमना, वचमाँ४ कानुडे रग रास रमे५ ।
साव सोनानो मारो घाट घडुलो, उठाणीए तो रत्न कनक जडे ।
मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल चित्त ध्यान ठरे ॥४६३॥†
८
चाल सखी वृन्दाबन जइये, जीवन जोवाने६, महीनी भटुकी ओ माथे लई ।
श्याम सुन्दर ने भावे भेट जो, तेणे दुखडा सहु शमावशे७ रे ।
मीराँ बाई प्रभु गिरधर नागर, भावजी मारग माँ आवशे रे ॥४६४।।†
१ लिया, २ चमक, ३ आकर, ४ बीच मे, ५ खेले, ६ देखने के लिए,
७ शामिल हो जावेगे, नष्ट हो जावेगे ।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २६३
९
चढी ने कदम्ब पर बैठो रे, वालो मारो चीर तो हरी ने।
माता जसोदा नो कुँवर कन्हैया, नागर नन्दजी नो बेटो रे।
मोर मुकुट सिर बिराजे, पहिर्यो छे पीलो लपेटो रे।
नहाया धोया मै केम१ करी आवी ये, नाखो२ ने नवरग रेटो रे।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, को उतारू ने अने हेठो३ रे ॥४६५॥†
१०
नाव रीसायो रे, बेनी मारो नाव रीसाचो रे।
चोरामा जोया४ ने चौटामाँ जोयो, फलीयाँ जोयाँ पूरी पूरी ने।
हाथ माँ दीवलडो ने घेर घेर जोती, जोती अणे धणु५ रोती।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल चित देती ॥४६६॥†
११
कानुड न जाणी मोरी पीर।
बाई हुँ तो बाल कुँवारी रे, कानुडे न जाणी मोरी पीर।
जलरे जमनाँ अमे पाणीडाँ गया ना, वाहला कानुडे उठाडाया आच्छानीर ।।
उडाया फर ऽऽऽ रे।
वृन्दा रे वनमाँ वालछै, रास रच्यो सोलसे गोपियाँ ताण्याँ चीर।
फाट्योँ चर ऽऽऽ रे।
हुँ६ वरणागी काहना तमारो७ र नामनी रे, कानुडे मारया छे अमने तीर।
वाग्योँ अरऽऽऽरे।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, कानुडे बाली ने फेकी ऊँचे नीर।
राख ऊँडे फर ऽऽऽ रे ॥४६७॥†
१ कैसे, २ डालो, ३ नीचा, ४ देखा, ५ बहुत, ६ में, ७ तुम्हारा।
२६४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
१२
कांकरी मारे घूनारो कान, पाणीलों केम करी जई ये।
आं१ कांढे२ गगा वहाला, पेली३ कांठे जमना जी, वचमाँ गोकुलीऊं गाम।
सोना उठाणी मारूँ, रूपानु बेठँ वा'लाँ, हलवो चढावत कानो करे काम।
मारे मदरिए मारी सासु रहे छे वा'ला, सामा मदरीए मारो श्याम।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर नागुण, भावे भेटों४ भगवान ॥४६८॥†
१३
भूली मोतियन को हार, सखी तट जमुना किनारे।
एक एक मोती मारूँ लाख टकानु वाला, परोव्यूँ सुवरण के रे तार।
सासु हमारी अती बढकणी५ वा'ला, नन्दन बिखड़ानु६ झार।
सासु हमारो परम सुहागी, मारा छे मोहना बान।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल चित ध्यान ॥४६९॥†
१४
हॉरे कोइ माधवल्यो, माधवल्यो, बेचती व्रजनारी रे।
माधव ने मटुकी माँ घाली, गोपी लटके लटके चाली रे।
हॉरे गोपी घेलुं शुं७ बोलती जाय, मटुकी माँ न समाय रे।
नव मानो तो जुवो८ उतारी, माँही जुवे तो कुजबिहारी रे।
वृन्दाबन माँ जाता दहाडी वा'लो गो चार छे गिरधारी रे।
गोपी चाली वृन्दाबन वाटे, सौ व्रजनी गोपियो साथे रे।
मीराँ कहे प्रभु गिरधर नागर, जेना चरण कमल सुख सागर रे ॥४७०॥
उपर्युक्त पद से भाव साम्य रखता हुआ एक पद ब्रजभाषा मे भी
मिलता है।
१ इस, २ और, ३ उस, ४ मिलो, ५ क्रोधी, ६ विषका, ७ पागल की
तरह, ८ देख लो।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २६५
१५
मेलो ने मारगड़ो मेलीनी मावा ।
वाटे ने घाटे रोको साँवलिया हारे मारा पाल बडा सावा ।
रसिया जी सु सहोर करो छो, जीवन दो जावा ।
मीराँ बाई के शुभ गिरधर ना गुण, गुण तो गोविन्द नु गावा ॥४७१॥
१६
मने मेली ना जाशो भावा रे, आ व्रज मा केम वैसीए बोलारे, भेली ना जाशो।
जे जोइए ते तमणे आणी आपु बोला, मीठाई मेवा खावा रे ।
आ बीजाँ घणा घणा तमने बाना रे करती, नहि देऊँ तमने जावा रे ।
कब की ठारी अरज करूँ हूँ, ऐटली¹ अरज मोरी मानो ब्रज बाबा रे ।
जल जमनाँ रे जल भरवाँ गयाँ ताँ वहाला, सुन्दर गयाँ ता न्हावा रे ।
मीराँ बाई के प्रभु गिरधर ना गुण वहाला, शाम लिओ चित्र थे मनावा रे ।
॥४७२॥†
१७
जल भरवा के म जाऊँ, कानो मारी केडे² पड़्यो रे ।
साव सोनानु घाट घड़ुला वाला, उठानिए रतन जड़ाऊँ रे ।
मारग माँ वा'लो पानिला मागे, सहिय³ देखताँ⁴ केम⁵ पाऊँ रे ।
नाथ जी हमारा निरलज थई बैठा, वां'ला हुँ निरलज केम थाऊँ ।
बाईं मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण वा'ला, हरी चरणे ध्यान धराऊँ ।
॥४७३॥†
१८
काँनुडे कामण⁶ कीधा⁷, ओधव ने वा'ल, कानुड़े कॉमण कीधॉ ।
वृन्दावन माँ धेनु चरावे वा'लो, मोरलीए मनड़ा गोपी बिर्धा ।
जल जमनाँ भरवाँ ने गयाँ ताँ, ताँ पालव पकड़ी मन लीधॉ ।
१ इतना, २ पीछे, ३ सखियो के, ४ देखते हुये, ५ कैसे, ६ सम्मोहन,
जादू, ७ किया ।
२६६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
राधा नो कथ^१ कामण^२ गारो।
मीराँबाई के प्रभु गिरिधर ना गुण वा'ला, भव सागर थी^३ हमने तारो।
॥४७४॥†
१९
प्रेम नी प्रेम नी प्रेम नी रे, मन लागी कटारी प्रेम नी रे।
जल जमुना माँ भरवा गयाताँ, इती गागर माथे इमे नीरे।
काँचे ते ताँत न हरि जी पे बाँधी, जेम खेचे तेम नी रे।
'मीराँ' के प्रभु गिरधर नागर, साँवली सुरत सुभ एक नी रे॥४७५॥†
श्री विष्णु कुमारी 'मजु' ने उपर्युक्त पद को मीराँ कृत मानने मे
सन्देह प्रकट किया है। परन्तु "मीराबाई की शब्दावली" वेलवेडियर
प्रेस, प्रयाग मे लिखित होने के कारण इसमे उल्लिखित है।
२०
जागो रे अलबेला कान्हा, मोटा मुकुट धारी र।
सहु दुनिया तो सुती जागी, प्रभु तुम्हारी निद्रा भारी रे।
गोकुल गामिनी गायो छूटी, वनज करे व्यापारी रे।
दातन करो तमे आद देवा, मुख धुओ मुरारी रे।
भात भात ना भोजन निपाया^५, भरी सुवरण थीली रे।
लवँग सुपारी न एलची, प्रभु पाननी बीडी वाली रे।
प्रीत करी बाओ पुरुषोत्तम, अवडावे^६ ब्रजनी नारी रे।
कस नीत मे वस काढी, मासी पूतना मारी रे।
पताले जाई काली नाग नाथ्यो, अँवली करी असारी रे।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, हुँ छे दासी तमारी रे ॥४७६॥
२१
ब्रजमा कथम र' वाशे, ओधवना वा' ला, ब्रजमा कयम रें' वाशे।
आठ दाहाड़ानी^७ अवध करीने गया छे वा'ला, खर मास थया छे^८ हरि ने।
१ पति, २ जादू करनेवाला, ३ से, ४ सब, ५ बनाया, ६ अच्छा लगे,
७ दिवस, ८ हो गये।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २६७
वृन्दाबन नी कुज गली माँ वा'ला, बेठा छे मुख मोरली धटी ने ।
मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण वा'ला, अमोरहया छे ऑसडा१ मरी ने ।
॥४७७॥†
२२
शामले मेल्याँ ते विसारी, ओधवने वा'ले शामले ते मेयाँ विसारी ।
प्रीत करीने पालव पकडो वा'ला, प्रेम नी कटारी मुने मारी ।
गोकुल थी मथुरामाँ गया छो वा'ला, कुब्जा से लागी छे ताली ।
मीराँ बाई के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल बलिहारी ॥४७८॥†
२३
लालने लोचनीए दिल लीधाँरे, माडी मारा, लालने लोचनीए दिल लीधाँ रे ।
जत्र मणी वा'लो मुझ पर डारे वा'लो, वेला कबेलाजाँ कामण मने कीधाँ रे ।
जल जमना ना जल भरवाँ गयाँ ताँ वा'ला, घुंघटड़ा माँ घेरी लीधाँ रे ।
चुन चुन कलिया वाली सेज बनावुँ वाहला, भ्रमर पलग सुख लीधाँ रे ।
मीराँ बाई के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल मे चित्त चोरी लीधाँ रे ।
॥४७९॥†
२४
लेशे रे महीडाँ केरा दान आ तो मोढुं, लेरो रे महीडा केराँ दाण ।
अमो अबला कइ सबल सुवालाँ वा'ला, आवड़ी शी खेचा ताण ।
नन्दना घरना गोवालियो रे, ओलख्या बिना रे अभ्रु माण ।
मधराते मथुराथी रे नांठो, ते तो अमणे न थी रे अजाण ।
वृन्दावन ने मारगे जाताँ, तुँ तो शेणे माँगे छे रे दाण ।
मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल नु चित्तडा मे ध्यान ॥४८०॥†
२५
कोने२ कोने कहुँ दिलडानी बात, वारे वारे कोने कोने केहुँ ।
पॉडवनी प्रतिज्ञा पाली, द्रौपदी नी राखी लाज रे,
१ आशा, २ किसको ।
२७० मीरॉ-बृहद्-पद-संग्रह
३१
वृजमॉ नाव्या१ फरीने२ गोपीनो वांलो, व्रज माँ नाव्या फरीनो ।
गामने गोकुल यो मेली मथुरा पधारिया वांलो, जईवरिया कुब्जा कारीनो ।
सातरी दिवस हरि वादो करीने गयो छो, षटमास थमाछे हरी ने ।
सोलसे गोपी नो साथे रास रचे थे वांला, उमा मुख मुरली धरीने ।
बाई मीरॉ के प्रभु गिरधर ना गुन वाला, चरन कमल चित हरी ने ।
।।४८७।।†
३२
गगरिया बेडा ढलसे, उठानी मारी आप्णे, गागरिया बेडा ढलसे ।
साव सो नानी मारी, जड़ित्र उघानी वांला, सुने री तार मारो खड़से ।
कस तो दाय नो कुरु छे राज वांला, कस कहयू जू पडसे ।
जल रे जमुना ना वांला मोटो छे आरो रे, नित्य उठि नाहवॉ जाऊ परसे ।
बाई मीरॉ के प्रभु गिरिधर नागर वांला, गोपी नो स्वामी मुझने मलसे ।
।।४८८।।†
३३
वांला ना कान हेडा रे ओधव जी, एवा काल ना कठन हेडा रे ।
टीटू डीना इण्डा३ डगरिया मञ्जारी, ना राख्या दड्या रे ।
ग्रेह थी गजराज उगारियो, गोकुल मा चारी गइया रे ।
गोकुल सघन रेलतुँ राख्युँ, गोबरधन कर धरिया रे ।
मीरॉ गवे गिरधर ना गुन, मै तो तोरे लागूँ पड्या रे ।।४८९।।†
३४
उठानी मोरे आलो रे, गागरिया बेढा ढलसे ।
जल जमना भरूआ गयाँ ता, चीर खस्योने बेढु परसे ।
१ न + आव्या-नाव्या अर्थात् नही आये, २ लौटकर, ३ अण्डा ।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २७१
•
सास हठीली मारी ननद धुतारी, नाधड़े दीयरियो मूजने बढसे ।
मीराँ गावे प्रभु गिरधर ना गुन, चरण कमल चित हर से ॥४९०॥†
३५
ज्ञान कटारी मारी, अमने प्रेम कटारी मारी।
मारे आँगणे रे रामजी तपसीओ तापे रे,
काने कुडल जटाँधारी रे, राणाजी अमने।
मकनोसो¹ हाथी रामजी, लाल अबाडी² रे,
अँकुश दई दई हारी रे।
खारा समुद्र माँ अमृत नाँ बहे लियुँ रे,
ऐवी³ छे भक्ति हमारी रे।
बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर,
चरण कमल बलिहारी रे ॥४९१॥†
३६
राखो रे श्याम हरि लज्जा मोरी, राखो श्याम हरि।
भीम ही बैठे, अर्जुन ही बैठे, तेणे⁴ मारी गरज ना खरी।
दुष्ट दुर्योधन चीरने खेचावे, सभा बीच खडी रे करी।
गरूड चढीने गोविन्द जी रे आव्या, चीरना तो वाण भरी।
बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण, चरणे आवे तो उबरी ॥४९२॥†
३७
ओ आवे हरि हसता सजनी, ओ आवे हरि हसता।
मुझ अबला एकलडी जानी, पीताम्बर केड़े कसता।
पचरगी पाघ केसरिया रे बाधा, फुलडा मेहेले तोरा।̂
१ मदमाता, २ हौदा, ३ ऐसी, ४ उनसे ।
३७२ मीरॉँ-वृहद्-पद-संग्रह
मारे ऑँगनए द्राख बिजॊरा, मेवले भराउँ तारा खोला१ ।
प्रीत करे ने तेनी पुठ न मेले, पासे थी से नथी खसता२ ।
मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर ना गुण, हाँ रे वालो हृदय कमलमॉँ बसता ।
।।४९३।।†
३८
दव३ तो लागेल डुँगर४ मे, कहो ने ओधा जी हवे केम करी ओ ।
केम ते करी ओ, अमे केम करी ओ, दव तो लागेल डुगर मे ।
छालवा५ जइये तो वाहला हाली न शकीए, वेशी रहीए तो अमे
बली मरीए रे।
आरे वरतीए नथी ठेकाणँरू रे, वाहला हेरी परवरती नी पाँखे
अमे फरीए रे।
ससार सागर महाजण भरीओ वाहला हेरी, बॉँहेड़ी झालो नीकर
बूडी मरीए रे।
बाईँ मीराँ के प्रभु गिरधर नागर हेरी, गुरु जी तारे तो अमे
अमे तरीए रे। ।।४९४।।†
३९
जाण्यूँ जाण्यूँ हेत तमारू जदवारे लोल, हेतज होय तो हुई डामा बरताय जो,
अमे तमारी आँख डिये अलखामणा६ रे लोल, बालप होय तो नयणा
मॉँ कलकाय जो ।
पारिजातक नूँ फूल रे नारद लखियारे लोल;
जै सोप्यूँ राणी रुकमणी ने दरबार जो ।
राके पाखडकी मारे मदिर नव मोकली रे लोल;
कीधी मुज थीरा अदकेरी नार जो।
अचरत पाम्या ने आनन्द उतर्यो रे लोल,
जाओ जाओ जाओ नहि बोलूँ सुन्दर श्याम जो।
१ गोद, २ हटना, ३ अग्नि, ४ जगल, ५ दौडना, ६ परिचय।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २७३
रुकमणी ने मदिर जैने रंगे रमोरे लोल,
हवे तमारे अमसाथे शुं काम जो।
अलगा रहो अलबेला मने अडशे नही रे लोल,
तम साथे न॑हि बोलूं नदकुमार जो।
भले ने पधारो मोनती तणे रे लोल,
आज पछी आवशोमा मारे द्वार जो।
नारदे कहचूं सतभामा साभलो रे लोल,
ऐ निर्लज ने नथीं तमारू काम जो।
काला ने वा'ला करतो ते आवशेरे लोल,
मोटा कुलनी मूक शोभा मान जो।
उतरचा आभरणारे सर्वे अग थकी रे लोल,
लो शामलिया तमारो शणगार जो।
मारा रे मैयरनी ओढूं आढणी रे लोल,
बीजूं आयो माने ती दरबार जो।
चरणा चीर उतारी चोली चूंदरी रे लोल,
उरथ की उतारचो नवसर हार जो।
काबी ने कडला रे भोटी दामणी रे लोल,
सर्व संभाली लेजो नन्दकुमार जो।
आगलथी नव जाण्यूँ मे तो रावडूं रे लोल,
घरथी न जाण्यूँ धूतारानो ढग जो।
वाला पणरी प्रीत अमारी पालटी रे लोल,
ए निर्लेंज ने शानो दीजे रग जो।
धीरज नी बातो धरथी जाणी नही रे लोल;
प्रीत करीने परवश कीधा प्राण जो।
कालजणा कोरी ने भीतर भेदिया रे लोल,
मीट उलियाँ मार्या मोहना वाण जी।
प्रीत करी पर हरऊँ नोतू पधारू रे लोल,
थोडा दिवस माँ शूं दीधा मने सुख जो।
१८
२७४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
स्वपनाना सुख डारे स्वपने पही गया रे लोल ;
देहड़ लीमां प्रगट्या दारुण दुख जो ।
पूरण पाप मल्यां रे ओ अबला तणां रे लोल ,
जेनो परण्यो पर घेर रमवा जाय जो ।
अवोलड़ा लीधा रे वाले वेहाथीरे लोल,
जे नारी नूं जोबन भोला खाय जो ।
पाणीडा पीनेरे घर शूं पूछिये रे लोल,
तेरीं पिता ओ शोध्या पूरण बैर जो ।
उद्देरी आपी रे ओना हात मारे लोल,
गल थूथ़ी मा घोल न पाया अरे जो ।
शोकडलीना वे मने बहु साभवरे लोल,
नयणथी छूटे छै जलनी धार जो ।
हैडू नव फोड्यू रे हजूए अमतणूं रे लोल,
उर ऊपर काई अहचा मेघ मलार जो ।
रावा ने मेण सूं बोलो मुख कीरे लोल,
कुलवन्ती तमे केम करो कल्यान्त जो ।
पटराणी तमथी बीजी घारी न थी रे लोल,
घणो वधारे घरे घरे विरोध जो ।
साँचू जो कहु तो तमे नव सांभलो रे लोल;
तोरा तमारू मन नव माने काम जो ।
मोहन जी कहेरे सती तमे साभलोरे लोल;
कहो तो मंगावू पारिजातक नू आड़ जो ।
आणी ने रोपाऊ तमारो ऑगणे रे लोल;
राणी रोषत जी ने मूको राड़ जो ।।४९५।।†
६. आत्म-समर्पण, ज्ञान-वैराग्य व उपसंहार
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २७५
राधा वर्णन
राजस्थानी में प्राप्त पद
१
मोहन जावो कठे¹ सावरियाँ मोहन जावो कठे।
तुम रहो न अठे² सावरियाँ मोहन जावो कठे।
गोकुल बसवो फीको लागे, मथुरा मे काई लडु बटे।
नित को आणो जाणो छोडि दे, नित के आये जाये से तेरा मान घटे।
राधा रुक्मण और सतभामा, कुब्जा ने कोई लीनी पटे।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तुम सुमरॉ सूं सकट कटे ॥४९६॥†
पाठान्तर १,
जावो कठे रे रामा, रह्वो अठे सांवरियां।
नित काई जावो, नित कांई आवो, नित का जाया से मान घटे।
गोकुल बसवो फिकोई लागे, मथुरा मे काई लाडु बटे।
गोकुल मे काई धेनु चरावे, मथुरा मे काई राज लुटे।
राधाई रुक्मण और सतभामा, कुब्जा काई थारे संग पटे।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तुम सुमरॉ सूं सकट कटे।
उपर्युक्त पदाभिव्यक्तियो मे पूर्वापर सबध का अभाव है।
'चन्द्रसखी' के नाम पर प्रचलित एक ऐसा निम्नाकित पद मिलता है
जिसका उपर्युक्त पदो से गहरा साम्य है।
कांई मिस आया छोजी राज अठे।
राय आगणिये ठाढा रहियो, आगे जावोला³ कठे।
राधा रुक्मण अर सतभामा, कुब्जा ने कांई लीनो पटे।
१ कहाँ, २ यहाँ, ३ जावेगे।
२७६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
हाथ को हीरो खोय दियो है, खोटी लाल सटे ।
चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छबि, लीनी है सीस सटे ।
उपर्युक्त पदो के साम्य को देखते हुए चन्द्रसखी का ही यह पद कुछ
हेर फेर के साथ मीराँ के नाम पर भी चल पडा हो, ऐसा असम्भव
नही प्रतीत होता ।
२
आली ! म्हाने लागे वृन्दावन नीको ।
घर घर तुलसी ठाकुर पूजा, दरसण गोविन्द जी को ।
निरमल नीर बहुत जमुना मे भोजन दूध दही को ।
रतन सिघासन आप विराजै, मुगट धर्यो तुलसी को ।
कुजन कुजन फिरत राधिका, सबद सुनत मुरली को ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भजन बिना नर फीको ॥४९७॥
३
उधो ! म्हांने लागे वृन्दावन नीको रे ।
वृन्दावन मे धेनु बोहोत है, भोजन दूध दही को ।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, सिर केसर को टीको ।
घर घर मे तुलसी को बिड़लौ, दरसण माधवजी को रे ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरी बिना सब फीको रे ॥४९८॥
उपर्युक्त दोनो पदो का गहरा साम्य विचारणीय है। बहुत
सम्भव है कि ये दो स्वतन्त्र पद न होकर एक ही पद के गेय रूपान्तर हो ।