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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

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क्रमश - यह आन्दोलन दक्षिण भारत से उत्तर भारत की ओर प्रसारित होने
लगा। उत्तर भारत मे इसके अग्रगण्य नेता थे रामानन्द, जिन्होने काशी
को अपना क्षेत्र बनाया।
“भक्ति द्रविड़ उपजी, लाये रामानन्द।
प्रकट करी कबीर ने, सप्त दीप नौ खंड।”
उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त होते हुए इस नवीन आन्दोलन के प्रभाव से
स्वजस्थान भी अछूता न रह सका। राजस्थान मे प्रत्येक प्रचलित धर्म को
राजाश्रय प्राप्त हुआ तथा विचार-स्वातन्त्र्य का पूर्ण अनुमोदन हुआ। फलत.
एकलिंग और भवानी के उपासक गणा-परिवार मे भी महाराणा कुम्भ
वैष्णव भक्ति के रग मे रग कर राधा-कृष्ण के प्रेम-गीत गा उठे तो दूसरी
ओर “अकबर के गर्व दलनहार और चितोड के जोद्धार" वीर श्रेष्ठ
जयमल भी परम वैष्णव सुविख्यात हुए। चितौड की महाराणी झाली ने
भी रामानन्द के शिष्य कबीर के गुरुभाई चर्मकार रैदास को अपना गुरु
स्वीकार करने मे गौरव का ही अनुभव किया। राजस्थान, इस युग मे
प्रवाहित होनेवाली इन तीनो ही विभिन्न धाराओ का सगमराज बना हुआ
था। अस्तु, मीराँ की रचना पर भी तीनो ही विभिन्न धाराओ का प्रभाव
'का पाया जाना स्वाभाविक ही सिद्ध होता है। अत्युक्ति न होगी
यदि कहा जाय कि मीराँ अपने युग की प्रतिनिधि कवयित्री थी।
प्राप्त पदो मे तीनो धाराएँ इतनी स्पष्ट हैं कि इनको बड़ी सरलता से
छाँटा जा सकता है। कृष्ण-भक्ति के कारण ही मीराँ की सर्वाधिक ख्याति
हुई। अत वैष्णव-परम्परा से प्रभावित पदो पर ही सर्व-प्रथम विचार कर
लेना उचित होगा।
वैष्णव-परम्परा से प्रभावित पदो को भी दो विभिन्न प्रभेदो मे विभक्त
किया जा सकता है। प्रथम समूह उन पदो का है जिनसे निर्वेद की भावना
झलकती है। इनमे ससार के सुख और सम्बन्धो को मोह जनित और नश्वर
मान कर उनकी ओर से एक गहरी उदासीनता और परमात्मा के शरणा-
गत होने पर ही पूर्ण शान्ति और आनन्द की प्राप्ति सम्भव होने की ही
अभिव्यक्ति मिलती है। ये पदाभिव्यक्तियाँ अधिकांशतः उपदेशात्मक है।
कुछ पदों पर विभिन्न पौराणिक गाथाओ का प्रभाव भी मिलता है।
ऐसे पद राजस्थानी, ब्रज मिश्रित राजस्थानी, ब्रज, गुजराती और खडी
बोली मे भी पाये जाते हैं। इन पदो मे से अधिकांश की प्रामाणिकता
संदिग्ध ही है। खड़ीबोली मे प्राप्त पदो को भाषा के आधार पर निश्चित-

१७
रूपेण प्रक्षिप्त कहा जा सकता है। गुजराती मे प्राप्त अधिकांश पदं भी
भाव और भाषा के आधार पर प्रामाणिक नही प्रतीत होते हैं। राजस्थानी
और ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे प्राप्त अधिकांश पदो मे पूर्वापर सबंध का
और अर्थ-सगति का सर्वथा अभाव है। अस्तु, ऐसे अधिकांश पदो को तो
प्राप्त रूप मे प्रामाणिक मान लेना सगत नही सिद्ध होता।
वैष्णव परम्परा से प्रभावित अन्य पदो पर पौराणिक गाथाओ का
का विशेष प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। वियोगाभिव्यक्ति द्योतक पदो के
बाद सर्वाधिक सख्या इन्ही पदो की हे। इनमे भी बहुसख्यक पद राधा-
कृष्ण की प्रेम-लीला और बाँसुरी-वर्णन के ही हैं। इसी वर्ग के पद
सर्वाधिक विभिन्न प्रान्तीय बोलियो मे भी प्राप्त है। राजस्थानी, ब्रज
मिश्रित राजस्थानी, ब्रज, गुजराती, अवधी, भोजपुरी आदि बोलियाँ इन
पदो की भाषा है। निर्वेदाभिव्यक्ति द्योतक पदो की तरह ही इन मे भी
अधिकांश मे पूर्वापर सबंध और अर्थ-सगति का अभाव है। अत बहुत
सम्भव है कि इनमे से अधिकांश पद प्रामाणिक न हो। 'मीर माधो',
'रैदास' आदि अन्य भक्त कवियो के पद भी मीराँ के नाम पर चल
पडे है। सर्वाधिक सख्या मे 'चन्द्रसखी' के पद ही मीराँ के पदो से मिल कर
मीराँ के ही नाम पर चल पडे हे। राजस्थान के इस जन-प्रिय कवि का
साहित्य और वृतान्त दोनो ही गहरे अन्धकार मे है। मीराँ के पदो की
तरह इनके सकलन का भी एकमात्र आधार लोक-गीत ही है। लोक-गीतो
की यह परम्परा भी बडे वेग से लुप्त हो रही है। अत समय रहते ही
सकलन हो जाने की अत्यधिक आवश्यकता है। प्रस्तुत सग्रह को तय्यार
करने के प्रसग मे ही 'चन्द्रसखी' के कुछ पदो को सकलित करने का
सुअवसर प्राप्त हुआ। ये लगभग सौ पद हैं। इन प्राप्त पदो से 'चन्द्रसखी'
के व्यक्तित्व या जीवन-वृतान्त पर कोई प्रकाश नही पडता। ऐसी भी
एक मान्यता है कि सम्भवत मीराँ ने ही इस उपनाम से रचना की
परन्तु ऐसी मान्यता का कोई आधार नही। 'चन्द्रसखी' नामक यह
भक्त कौन थे और कब हुए थे यह जानने का कोई भी सूत्र अद्यावधि
उपलब्ध नही। इनकी प्रामाणिक रचनाओ को भी छाँट लेने का भी कोई
आधार नही। जो भी हो, प्राप्त पदो के आधार पर इतना तो निश्चित-
रूपेण ही कहा जा सकता है कि 'चन्द्रसखी' और मीराँ के कुछ पदो मे
भाव और भाषा का गहरा साम्य है। इतना ही नही, कुछ पद तो एक दूसरे

'१८
के गेय-रूपान्तर ही प्रतीत होते हैं, तो अन्य कुछ पदो मे शब्दावली भी
हूबहू एक ही है। उपर्युक्त परिस्थिति मे यह कहना सम्भव नही कि कौन
पद मौलिक रूपेण किसका है। इतने पर भी, 'चन्द्रसखी' के पदो मे प्राप्त
"चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छबि" जैसी टेक के आधार पर यह कहा जा
सकता है कि 'चन्द्रसखी' की भक्ति वात्सल्य-भाव की ही थी। मीराँ अपनी
माधुर्य-भाव की भक्ति के लिये ही प्रसिद्ध हुई। सम्भवत इस आधार पर
कुछ पदो को छाँट लेने का प्रयास सफल हो सके।
तथाकथित मीराँ के कुछ पदों से सतमत का प्रभाव विशेष रूपेण स्पष्ट
हो जाता है। मतभेद, सघर्ष वियोग, आनन्द, समर्पण आदि सभी विभिन्न
भावाभिव्यक्ति द्योतक पदो से भी सतमत का प्रभाव लक्षित होता है।
'दासी' और 'जन' प्रयोग युक्त पदो मे भी कुछ थोडे से पद सतमत से
प्रभावित मिल जाते है। कुछ पदो मे मीराँ अपने गुरु का नाम
रैदास बताती है। मुंशी देवीप्रसाद के आधार पर मीराँ को भोजराज की
विधवा मान लेने पर मीराँ और रैदास दोनो के जीवन-काल मे लगभग
सौ वर्ष का अन्तर पड जाता है। अत रैदास का मीराँ का गुरु होना सर्वथा
ही असम्भव हो जाता है परन्तु मुशी देवीप्रसाद का कथन भी सर्वथा प्रामा-
णिक नही सिद्ध होता। असम्भव नही कि मीराँ राव दूदा जी की पुत्री
और राणा कुम्भ की ही राणी हो। जनश्रुतियाँ और पदाभिव्यक्तियाँ
इसका समर्थन करती हैं तथा इतिहास सुनिश्चित न होते हुए भी विरोधा-
त्मक नही। सर्व-मान्य है कि मीराँ का विरोध कृष्ण-पूजा के हेतु
नही अपितु कुलमर्यादा के विरुद्ध पडने वाले साधु-समागम के कारण
हुआ। अस्तु, अद्यावधि इन रचनाओ को निश्चित रूपेण प्रामाणिक या
प्रक्षिप्त कहना युक्तियुक्त न होगा। फिर भी, प्रामाणिक पदो के छाँट
लेने के लिये ही भाव-भाषा के आधार पर इनका विश्लेषण आवश्यक हो
जाता है। राजस्थानी, ब्रज मिश्रित राजस्थानी, और ब्रज तीनो ही भाषाओ मे
सतमत से प्रभावित पद प्राप्त होते हैं। संतमत मे प्रभावित शुद्ध ब्रजभाषा
मे प्राप्त इन कुछ पदों की प्रामाणिकता विशेष संदिग्ध ही प्रतीत होती है।
ऐसे अधिकांश पदो मे अर्थ-संगति और पूर्वापर सबध का अभाव है, फलत.
उपर्युक्त सदेह को एक और समर्थन मिलता है।
वैष्णव और सतमत से प्रभावित इस राणापरिवार मे एकलिंग और
भवानी की पूजा का महत्व सदा ही अक्षुण्ण रहा। एकलिंग के पुजारी

११

नाथ-पंथानुयायी जोगी ही हुआ करते थे। राज-परिवार पर नाथ-पथ
के इस गहरे प्रभाव के रहते हुए भी जनता इससे विमुख हो चली थी।
जनता मे नाथ-पथ और उसके योगियो के प्रति आदर-सम्मान नही रह गया था।
बहुत सम्भव है कि राजपरिवार से सम्बन्धित होने के कारण मीराँ
भी कुछ विशिष्ट योगियो के सम्पर्क मे आयी हो और इनसे प्रभावित
भी हुई हो। अत नाथ-परम्परा से प्रभावित पदो की रचना अयुक्त
नही कही जा सकती।
ऐसे पदो मे सर्वाधिक पदो की अभिव्यक्ति वियोगात्मक है। इतना ही
नही, इन्ही पदो मे प्राप्त अभिव्यक्तियो के आधार पर किसी व्यक्तिगत
दाम्पत्य सम्बन्ध को व्यक्त करनेवाला अन्त श्रोत विशेष रूपेण प्रस्फुटित हो
जाता है। किसी जाते हुए 'जोगी' को रोक रखने का निष्फल प्रयास,
'जोगी' के वियोग की वेदना और उसके विश्वासघात के प्रति गहरे
उराल्म्भ के साथ ही साथ एक गहरे समर्पण की अभिव्यक्ति ही इन पदो
की विशेषता है। इन पदाभिव्यक्तियो के आधार पर यह भी सुस्पष्ट हो
जाता है कि मीराँ अपने नाथ परम्परानुसार सुसज्जित 'जोगी' आराध्य
के अनुकूल स्वय भी “भगवाँ भेष” धारण कर “जोगण” बनने को “आकुल
व्याकुल” हो उठी है।
इनमे अधिकांश पद राजस्थानी मे ही प्राप्त है, जैसा कि स्थिति
विशेष मे स्वाभाविक भी प्रतीत होता है। कुछ पद ब्रज मिश्रित राजस्थानी
मे और कुछ पद ब्रज व गुजराती भाषा मे भी प्राप्त है। नाथ-प्रभाव द्योतक ये
थोडे से पद, विशेषत इनमे प्राप्त वियोगाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय है।
विभिन्न भाव और भाषा मे प्राप्त लगभग सभी पदो की टेक है
“मीराँ के प्रभु गिरधर नागर”। 'दासी' और 'जन' प्रयोग-युक्त पदो मे
यह परम्परा खण्डित हो गई है परन्तु इनकी प्रामाणिकता ही सर्वथा
संदिग्ध है। गुजराती भाषा मे प्राप्त अधिकांश पदो मे यह टेक “मीराँ के
प्रभु गिरिधर ना गुण” मे परिवर्तित हो गई है। इस परिवर्तन के लिये
गेय-परम्परा ही उत्तरदायी प्रतीत होती है। कुछ पदो मे “मीराँ के
प्रभु गहिर गम्भीरा”, “यू कहै मीराँ बाई”, “मीराँ व्याकुल विरहणी”
आदि भी टेक रूप मे व्यवहृत हुए है। अन्य कुछ पदो मे मीराँ ने अपने
आराध्य को “जोगी” “गुसाई” आदि सम्बोधनो से भी पुन-पुन सम्बोधित
किया है। “जिन भेष्वां म्हाँरो सावि रीझै, सोई भेख धारणाँ।” के

२ २०
अनुकूल मीराँ स्वय भी कभी "मोतियन मांग भराँ" के लिये अत्युत्सुक हो
उठती० है तो कभी "कर जटाधारी वेश" "जोगण" बनने को "आकुल
व्याकुल" हो जाती ह । इतने पर भी कभी-कभी इस योग-साधना पर
झुझला जाती है "भाग लिखियो सो ही पायो।""
अपनी माधुर्य भाव की भक्ति के कारण ही मीरा ख्याति को प्राप्त हुई ।'
नाभादास जी लिखते हैं, "सदरिस गोपिन प्रेम प्रगट कलिजुगंहि दिखायो।'
पति-भाव से ही मीराँ ने अपने आराध्य की पूजा की। अत पदों मे प्राप्त
वियोग और श्रृङ्गार, खीज और समर्पण की अभिव्यक्ति तो सहज ही
प्रतीत होती है परन्तु कुछ पदो मे प्राप्त बाल-वर्णन उतना ही असगत भी
प्रतीत होता है। सूर आदि अन्य ब्रजभाषा के कवियो मे भी सयोग और
विप्रलम्भ शृङ्गार के अति उत्कट वर्णन के साथ ही साथ वात्सल्य और
बाल-वर्णन की अभिव्यक्ति भी मिलती है। ब्रजभाषा के इन भक्त-कवियो ने
आराध्य कृष्ण की विभिन्न लीलाओ का वर्णन किया; वे कवि थे परन्तु
मीराँ तो स्वय ही गोपिका बनी हुई थी। एक कवि की तरह उन्होने अपने
इष्टदेव की लीलाओं का वर्णन नही किया अपितु आराध्य मे तन्मय
हो जाने अनजाने ही कुछ गा उठी, भावातिरेक मे बेसुध हृदय के छन्द-
अलकार विहीन वे निश्छल चित्र ही हिन्दी-साहित्य की अपूर्व निधि बन
गये। अस्तु, मीराँ के पदो में वात्सल्य-युक्त वर्णन कुछ अटपटा ही लगता
है। मुग्धा नारी द्वारा अपने ही प्रियतम के बालरूप का वर्णन युक्तिसगत
नही प्रतीत होता।
कुछ पदो मे पूर्वापर सबध और अर्थ-सगति का सर्वथा अभाव है ।
अन्य कुछ पदो मे पुनरुक्ति और अस्पष्टता दोप भी हैं। गेय-परम्परा से
प्राप्त पदो से ऐसा होना अस्वाभाविक या आश्चर्यजनक भी नही। ऐसे
पदो को भी प्रचलित रूप मे तो प्रामाणिक नही ही माना जा सकता है।
कुछ पद विशेष जन-प्रिय होकर विभिन्न क्षेत्रो मे गाये जाने लगे। अत'
क्षेत्र विशेष की भाषा का प्रभाव उन पर पडा और फलत उनकी भाषा में
भी परिवर्तन आ गया। बहुत सम्भव है कि इसी तरह मीराँ के कुछ पदो
की भाषा मे क्रमश इतना अधिक परिवर्तन हो गया हो कि उसके मौलिक
रूप का निर्णय कर लेना दुरूह ही नही वरन् असम्भव भी है। स्थिति
विशेष मे भाषा के इस परिवर्तन के साथ ही साथ भाव परिवर्तन हो
जाना भी सहज प्रतीत होता है। यह मान लेना कि पद विशेष की अभि-

२१
व्यक्ति मौलिक रूपेण मीराँ की ही है, मात्र भाषा ही गेय-परम्परा के
कारण परिवर्तित हो गई है, प्रियकर हो सकता है और हमारी हृदयगत
भावनाओ के निकटतर भी पड सकता है परन्तु खोज कार्य मे सहायक कदोपि नही
हो सकता है। यह भी माना जा सकता है कि उनमे काव्य-सत्य है। -
तथापि इस काव्य-सत्य के साथ ही साथ उनमे से वस्तुत सत्य को भी खोज
निकालने का प्रयास आकाश-कुसुम को पाने का ही प्रयास मात्र होगा।
प्राप्त रूप मे ऐसे पदो की प्रामाणिकता सदिग्ध ही सिद्ध होती है। -
प्रस्तुत सग्रह मे भाव और भाषा के आधार पर ही पदो का वर्गी-
करण किया गया है। मीराँ का जीवन कुछ विशिष्ट क्षेत्रो मे व्यतीत हुआ।
अत उन विभिन्न क्षेत्रो की भाषा का प्रभाव उनकी रचना मे पाया जाना
स्वाभाविक ही है। साधु-समागम के प्रभाव के कारण भी अन्य भाळाओ
के कुछ शब्द-विशेष का प्रयोग भी सम्भव हो सकता है। परन्तु विभिन्न
प्रान्तीय बोलियो मे इक्के-दुक्के पदो की रचना असम्भव ही प्रतीत होती है।
अत ऐसे पदो को प्रक्षिप्त कहना ही युक्तियुक्त होगा।
राजस्थान मे ही मीराँ ने जन्म लिया और राजस्थान मे ही उनका
अधिकांश जीवन व्यतीत हुआ अत अधिकांश पदो का शुद्ध राजस्थानी -
भाषा मे पाया जाना ही युक्ति-सगत है। फिर भी पुरानी राजस्थानी
और आधुनिक राजस्थानी मे गहरा भेद है। अत राजस्थानी मे प्राप्त
पदो की भाषा की शुद्धता पुरानी राजस्थानी के माप पर ही निर्धारित
की जा सकती है। ऐसा एक प्रयास मैं कर भी रही हूँ और आशा रखती
हूँ कि शीघ्र ही हिन्दी-साहित्य की यह छोटी सी सेवा भी कर सकूँगी।
इसके बाद वे पद आते है जो मिश्रित भाषाओ के अन्तर्गत रखे गए
है। इनमे से कुछ की भाषा प्रधानत राजस्थानी होते हुए भी ब्रजभाषा से
प्रभावित है। तो अन्य कुछ की भाषा प्रधानत ब्रजभाषा होते हुए राजस्थानी
से प्रभावित है। साधु-समागम के कारण भी भाषा का यह सम्मिश्रण सम्भव
हो सकता है। अद्यावधि मीराँ का बृज-क्षेत्र मे गमन और निवास भी मान्य है।
तथाकथित मीराँ के पदो की एक बडी सख्या ब्रजभाषा मे भी प्राप्त
है। इनमे से कुछ की भाषा विशुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा है। ऐसे कुछ पद
साहित्यिक सौन्दर्य का सृजन करने मे सूरदास के पदो से भी होड लेते है
अद्यावधि प्राप्त सामग्री के आधार पर मीराँ की वृन्दावन-यात्रा और निवास
बहुमान्य होते हुए भी सुनिश्चित इतिहास नही अपितु एक अत्यन्त विषाद-

२२
ग्रस्त विषय है। 'इन पदो की साहित्यिकता भी इनकी प्रामाणिकता के
विरुद्ध ही गवाही देती है। मीराँ को शास्त्रीय अध्ययन का सुअवसर प्राप्त
हुआ हाँ, ऐसा भी कोई निश्चित इंगित प्राप्त सामग्री मे नही मिलता।
प्राप्त पद कवि की रचना न होकर एक स्वत सिद्ध भक्त के भावातिरेक
के सत्यतम चित्र है। अतः शुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा मे प्राप्त पदो की
प्रामाणिकता विशेष सन्दिग्ध हो जाती है।
• गुजराती मे भी मीराँ के नाम पर प्रचलित पद पर्याप्त सख्या मे
प्राप्त होते नै। अपने जीवन के अन्तिम काल मे मीराँ का द्वारिका-गमन
और निवास इतिहास सिद्ध है। अद्यावधि मान्य इतिहास, प्राप्त जनश्रुतियों
और पदाभिव्यक्तियो से भी उपर्युक्त कथन का समर्थन होता है।
• अत्युक्ति न होगी यदि कहा जाय कि प्राप्त सम्पूर्ण सामग्री मे यही
एक ऐसा पहलू है जो सर्व-सम्मति से सुनिश्चित है। क्रमशः विकसित होते
हुए जीवन के अन्तिम समय की भावाभिव्यक्ति मे इतने निम्न स्तर के घरेलू
जीवन व अन्य बहुत ही हल्की भावनाओं का चित्रण बहुत सहज नही प्रतीत
होता। चितौड़ के सम्पूर्ण राज-वैभव व तद्जनित सुख-सुविधा को "तजि बटुक
की नाईं" अपने आराध्य के शरण मे द्वारिका आ जाने पर मीराँ जैसी
भक्तिमती नारी की रचना मे विराग और नैराश्य की भावनाओ का मिलना ही
अधिक सहज है। अस्तु, गुजराती में पद रचना असम्भव या असगत नही
प्रतीत होती तथापि अभिव्यक्ति के आधार पर प्राप्त पदो की प्रामाणिकता
मे संदेह ही उत्पन्न होता है।
कुछ गुजराती मे प्राप्त पदो मे "मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर" "मीराँ
के प्रभु गिरिधर ना गुण" मै भी परिवर्तित हो गया है--बहुत सम्भव है
कि गेय परम्परा ही इसका कारण हो, अस्तु, ऐसे पदो की प्रामाणिकता
और भी सदिग्ध है।
भोजपुरी, अवधी, बिहारी आदि विभिन्न बोलियो मे भी कुछ पद
प्राप्त होते है। राजस्थान, ब्रज, और द्वारिका से बाहर भी कभी मीराँ ने
प्रयाण किया हो ऐसा आभास कहीं कोई नही मिलता। साधु-समागम के
कारण पडे प्रभाव के कारण भी ऐसे इक्के-दुक्के पदों की रचना सम्भव
नही। अतः इन पूदो को निश्चित रूपेण प्रक्षिप्त कहा जा सकता है।
खडी बोली मे प्राप्त कुछ पद भी भाषा की आधुनिकता के आधार पर
निश्चित रूपेण प्रक्षिप्त ही कहे जा सकते हैं।

२३

प्रस्तुत सग्रह मे बहुत से पदो पर एक ऐसा † चिह्न लगा दिखा गया
है। भाषा और भाव के आधार पर प्रक्षिप्त प्रतीत होनेवाले पदो पर
ही यह चिह्न लगाया गया है। जैसा कि ऊपर कहा गया है बहुत सम्भव
कि शेष पदों मे से भी अधिकांश प्रक्षिप्त ही हो परन्तु उनको प्रक्षिप्त या
प्रामाणिक कहने का कोई सुनिश्चित सूत्र अद्यावधि उपलब्ध नही। बहुत
सम्भव है कि प्राप्त सामग्री के गहरे अध्ययन के बाद शेष पदो पर भी
निश्चय पूर्वक विचार किया जा सके। किसी ऐसे ही प्रामाणिक सग्रह के
आधार पर ही मीराँ की जीवन-वृत्त को सुनिश्चित इतिहास का रूप
दिया जा सकता है।
इस सग्रह मे लिखित व मौखिक परम्परा से प्राप्त मीराँ के नाम पर
प्रचलित सभी पदो को एकत्रित करने का प्रयास किया गया है, फिर भी
बहुत सम्भव है कि और भी कुछ ऐसे पद प्राप्त हो सके जो इस सग्रह
मे नही आ सके हैं। विभिन्न प्राप्त सग्रह; जिनकी सूची 'मीराँ, एक
अध्ययन' मे दे दी गयी है, इन पदो के सग्रह का मूल आधार रही है।
अत उन सभी विद्वानो की कृतज्ञ हूँ। श्री सूर्यनारायण जी चतुर्वेदी (जयपुर)
द्वारा २०० पद ऐसे प्राप्त हुए जिनके बिना यह सग्रह निश्चित ही अधूरा
रह जाता, अत मै उनकी विशेष कृतज्ञ हूँ। इन पदो मे अधिकांश राजस्थानी
भाषा मे हैं। इनमे अधिकांश की अभिव्यक्ति मतभेद, सघर्ष और वियोग-
द्योतक है। इन पदाभिव्यक्तियो से विभिन्न धार्मिक मतो का विशेषत
सतमत का ही प्रभाव स्पष्ट हो जाता है। कुछ पदो के विषय मे अपने
विचार (जो पद विशेष के नीचे दिये गये हैं) देकर इन्होने मेरे कार्य मे अधिक
सुगमता ला दी। उनके इस कष्ट के लिये मै विशेष आभारी हूँ।
भाई श्री नर्मदेश्वर जी चतुर्वेदी और उनके अग्रज हिन्दी के सुविख्यात
विद्वान् श्री परशुराम जी चतुर्वेदी द्वारा सामग्री एकत्रित करने मे पर्याप्त सहायता
मिली। अपनी राजस्थान की यात्रा-काल मे किसी दादू पन्थी सत के हस्त-
लिखित सग्रह से प्राप्त ६२ पद आपने मुझ को दिये जिनमे लगभग
५० मेरे सग्रह मे थे और शेष पद नवीन थे। इनमे से अधिकांश नाथ-
परम्परा प्रभाव द्योतक है। 'दासी' और 'जन' प्रयोग युक्त पद भी इस
सग्रह का एक बडा भाग है। शेष पदो पर सतमत का ही विशेष
प्रभाव है। इनमे अधिकांश की अभिव्यक्ति वियोगात्मक और भाषा राज-
स्थानी व ब्रज मिश्रित राजस्थानी है।

२४
उपर्युक्त पदो के सिवाय कुछ पद लोक-गीत परम्परा से भी प्राप्त हुए।
विशेष प्रयास के करने बाद कुल १४ पदो को एकत्रित करने मे सफल
हो सकीँ। ये पद भी 'मीराँ', एक अध्ययन' मे परिशिष्ट मे दे दिये गये
है। लोक-गीत परम्परा से प्राप्त प्राय पद सग्रह मे वर्तमान किसी-न-किसी
पद का गेय रूपान्तर मात्र ही सिद्ध हुए।
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभाग के अध्यक्ष हिन्दी के
सुविख्यात विद्वान् श्री हजारीप्रसाद जी द्विवेदी ने पदो के वर्गीकरण के
बारे मे जो महत्वपूर्ण सुझाव किये उनके बिना इस सग्रह को इस रूप में
प्रस्तुत करना सम्भव न होता। "मीरा बाई" के विद्वान् लेखक डा० श्रीकृष्ण
लाल ने अपनी कार्य-व्यस्त दिनचर्या के बाद भी सग्रह मे महत्वपूर्ण सुझाव
देने और भूमिका लिखने का कष्ट स्वीकार किया। गुरुजनों के प्रति कृत-
ज्ञता प्रकाश करना भी धृष्टता ही होगी, अत मै इनको नमस्कार ही
करती हूँ।
अनुज तुल्य श्री अवधेश तिवारी के सहयोग और कार्य-निष्ठा के बिना
प्रस्तुत सग्रह असम्भव ही था। इन पदो की पुन पुन प्रतिलिपि करना
सुगम या रुचिकर कार्य नही। उनकी अटूट लगन और कठिन परिश्रम के
बिना यह सग्रह कदाचित तय्यार नही हो सकता था। अपने छोटे देवर श्री
जानकी प्रसाद झुनझुनवाला, श्री गोपालचन्द सराफ और पुत्र तुल्य श्री बाल-
कृष्ण मालवीय के विशेष सहयोग की महत्ता भी सदा अक्षुण्ण रहेगी।
भाई श्री नरेन्द्र श्रीवास्तव और भाई श्री सुधाकर पाण्डेय ने प्रूफ देखने का
भार उठा कर मेरे कार्य को विशेष सुगम बना दिया। मानव-जीवन मे
स्निग्ध भावनाओ का एक अपना विशिष्ठ स्थान है। अतः उपर्युक्त सभी स्वजनो के
स्नेहमय सहयोग के लिये कृतज्ञता प्रकाशन या धन्यवाद दोनो ही असम्भव है।
प्रस्तुत सग्रह मे जो अपूर्णता और गलतियाँ रह गई हो, उन पर
प्रकाश डाल कर गुरुजन मेरा प्रोत्साहन और पथ-प्रदर्शन करेंगे, ऐसी ही
आशा करती हूँ।
विशेष प्रयास के बावजूद भी प्रूफ आदि की जो गलतियाँ छूट गयी
हो, उनके लिये मै क्षमाप्रार्थिनी हूँ।
पद्मावती

विषय-सूची
विषय पृ० स०
जीवन खण्ड
मतभेद
राजस्थानी मे प्राप्त पद १
मिश्रित भाषाओ मे प्राप्त पद २४
ब्रजभाषा मे प्राप्त पद २७
वियोगाभिव्यक्ति
राजस्थानी मे प्राप्त पद ३१
मिश्रित भाषाओमे प्राप्त पद ५८
ब्रजभाषा मे प्राप्त पद ७४
गुजराती मे प्राप्त पद ८६
विभिन्न बोलियो मे प्राप्त पद ६०
संघर्षाभिव्यक्ति
राजस्थानी मे प्राप्त पद ६२
मिश्रित भाषाओ मे प्राप्त पद १२३
ब्रजभाषा मे प्राप्त पद १३०
खडी बोली मे प्राप्त पद १३१
गुजराती मे प्राप्त पद १३१
मिलन और बधाई
राजस्थानी मे प्राप्त पद . १३५
मिश्रित भाषाओ में प्राप्त पद १३६
ब्रजभाषा मे प्राप्त पद .. १४१
गुजराती मे प्राप्त पद .. १४८
समर्पण द्योतक पद
राजस्थानी मे प्राप्त पद . १५१
मिश्रित भाषाओ मे प्राप्त पद .. ... १५४

[ २ ]
ब्रजभाषा मे प्राप्त पद .. . . १५५
विभिन्न बोलियो मे प्राप्त पद .. . १५६
गुजराती मे प्राप्त पद . .. . . १६०
"दासी" और "जन", प्रयोग युक्त पद
राजस्थानी मे प्राप्त पद . १६५
'मिश्रित भाषाओ मे प्राप्त पद . . . १७८
ब्रजभाषा मै प्राप्त पद . . १८३
गुजराती मे प्राप्त पद . १६६
विभिन्न बोलियो मे प्राप्त पद ... २०२
उपासना खण्ड
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद --निवेंदाभिव्यक्ति
राजस्थानी मे प्राप्त पद . . . ... २०५
मिश्रित भाषाओ मे प्राप्त पद . २११
ब्रजभाषा मे प्राप्त पद . . . . २१७
गुजराती मे प्राप्त पद .. २२२
खडी बोली मे प्राप्त पद . . २२६
विभिन्न बोलियो मे प्राप्त पद .. . . .. २२८
पौराणिक गाथाएँ
राजस्थानी मे प्राप्त पद .. . २३६
मिश्रित भाषाओ मे प्राप्त पद . २३८
विभिन्न भाषाओ मे प्राप्त पद . . .. २४०
विभिन्न बोलियो मे प्राप्त पद . .. .. २५७
गुजराती मे प्राप्त पद . . .. . . २६०
राधावर्णन
राजस्थानी मे प्राप्त पद . . .. २७५
मिश्रित भाषाओ मे प्राप्त पद , . .. .. .. २७७

[ ३ ]
ब्रजभाषा मे प्राप्त पद . २७६
गुजराती मे प्राप्त पद - २८३
बाँसुरी वर्णन
ब्रजभाषा मे प्राप्त पद २८४
गुजराती मे प्राप्त पद २६१
नाथ-प्रभाव द्योतक पद
राजस्थानी मे प्राप्त पद .. २६५
मिश्रित भाषाओ मे प्राप्त पद ३०१
ब्रजभाषा मे प्राप्त पद . ३०३
गुजराती मे प्राप्त पद ३०४
संतमत-प्रभाव द्योतक पद
राजस्थानी मे प्राप्त पद ३०७
मिश्रित भाषाओ मे प्राप्त पद ३१४
ब्रजभाषा मे प्राप्त पद ३१८

मतभेद
राजस्थानी मे प्राप्त पद
पद स० पृष्ठ स०
०१ तू मत बरजै माई री, साधाँ दरसन जाती ... १ ३
२ माई म्हाँने सुपणे मे परण गया जगदीस . २ ३
(१) माँई, म्हाने सुपणा मे परणी गोपाल . . ४
(२) माई, म्हाँने सुपणे मे परणी गोपाल . .. . "
(३) माई, मै तो सपना मे परणी गोपाल ... . "
(४) माई, हूँ सुपणे मे परणी गोपाल . . ५
३ कूडो वर कुण परणीजे माय, परणूँ तो मर मर जाय . ३ "
४ म्हाँने गुरु गोविन्द री आण, गोरल ना पूजॉ . ४ "
(१) साधो रो सग निवारो राई, . .. ६
५. मीराँ तो जन्मी मेरता सजनी म्हौरी हे .. ५ ७
६ दे माई म्हाँको गिरधर लाल ... ६ ९
७ मीराँ ए ज्ञान धरम की गाँठडी, हीरा रतन जडाओ जी ७ "
८ कोई कछु कहो रे रग लाग्यो, रग लाग्यो, भ्रम भाग्यो ८ १०
९ थाँने बरज बरज मै हारी, भाभी मानो बात हमारी . ९ "
१० म्हौरी बात जगत सूं छानी, साधाँ सूं नही छानी री . १० ११
११ भाभी मीराँ कुल ने लगायी गाल . ११ १२
१२. भाभी मीराँ हो साधाँ को सग निवारि .. १२ "
१३ माया थे क्यूं रे तजी भाभी मीराँ . .. १३ १४
१४ सुनजो जी थे भाभी मीराँ .. १४ १५
१५ अकोलो लाग्यो जी रग गिरधर को आन . १५ "
१६. अब मीराँ मान लीजो म्होरी . . १६ १६
१७. नाहि भावै थारो देसडलो रग रूडो . १७ १७
(१) नाहिं भावै थारो देसडलो जी रूड़ो रूड़ो . . "
(२) राणा जी, थाँरो देसडलो रंग रूडो ... ... .. "
(३) राणा जी, थाँरो देसड़लो छै रग रूड़ो . १८
(४) देसडलों रूडो रूडो, राणा जी थॉरो देसडलो . . "
१८ राणो जी मेवाडी म्हाँरे दाय न आवे १८ "
१९. अब नहि मानुं राणा थाँरी, मै बर पायो गिरधारी . १९ १९

२
(१) अब नाहिं माना लाँ म्हे थारी २०
(२) अब तो नही म्हे थौरी म्होंने "
२० अरे राणा पहली क्यो न बरजी २० २१
२१ राणा जी म्होंने या बदनामी लागे मीठी २१ "
(१) याही बदनामी मीठी ह्वै, राणा जी २२
(२) राणा जी, म्होंने याही बदनामी मीठी "
(३) राणा जी, मुझे यह बदनामी लगे मीठी "
(४) राणा जी, म्हॉने या बदनामी लागे मीठी "
(५) राणा जी म्हांने या बदनामी लागे मीठी २३
२२ माई ! म्होंने साधाँ रो इकत्यार है २२ "
मिश्रित भाषाओं मे प्राप्त पद
१ राणा जी अब न रहूँगी तोरी हटकी २३ २४
(१) अब न रहूँगी अटकी, मन लाग्यो गिरधर से "
(२) अब ना रहूँगी स्याम अटकी २५
(३) अब न रहूँगी अटकी "
(४) मेरो मन लाग्यो हरि जूं सूं, अब न रहूँगी अटकी २६
(५) रूप देख अटकी, तेरो रूप देख अटकी "
(६) माई ! मै तो गोविन्द सो अटकी २७
व्रजभाषा में प्राप्त पद
१ बरजी मै काहू की नाहि रहूँ . २४ "
२ बरजी नाही रहूँगी, म्हाँरो स्याम सुंदर भरतार २५ २८
३ काहू की मै बरजी नाही रहूँ . २६ "
(१) मेरो मन लाग्यो सखी साँवलिया सो "
४ नैना लोभी रे बहुरि सके नहि आय २७ २९
५ नयन लागे तब घूंघट कैसो २८ ३०
वियोगाभिव्यक्ति
राजस्थानी मे प्राप्त पद
१. छोड मत जाज्यो जी महाराज २९ ३१
२ प्रभुजी थे कहाँ गया नेहडी लगाय ३० "
(१) पिया ते कहाँ गयो नेहरा लगाय "
३. हो जी हरि कित गये नेह लगाय ३१ ३२
(१) कितहँ गये नेह लगाय

३
४ जावो हरि निरमोहिडा, जाणी थॉरी प्रीत . ३२ ३२
५. थॉने काँई कांई कह समझावूँ, म्हाँरा बाल्हा गिरधारी ३३ ३३
६. गिरधर, दुनियाँ दे छै वोल . ३४ ,,
(१) गिरधर, दुनियाँ दे छै बोल . .. ,,
(२) गिरधर, दुनियाँ दे छै बोल . .. .. ३४
७ अपने करम को छै दोस, काकूं दीजै उधो .. ३५ ,,
(१) अपणा करम ही का खोट, दोष कोई दीजै री . ,,
(२) सखी आपणाँ स्याम खोटा, दोष नही कुबज्या मे .. ३५
(३) कछु दोष नही कुबज्या ने, बिरी अपना स्याम खोटा .. ,
८ निरमोहिडा नेह न जोडे छै . . ३६ ३६
९ माई ! मेरा पिया बिन अलूणो देस ३७ ,,
१०. नातो हरि नाँव को माई, मोसूं तनक न बिसरयो जाई ३८ ,,
(१) नातो नाम को रे मोसूं, तनक न तोडयो जाय . ३७
११ तै दरद नहि जान्यूँ, सुनि रै वैद अनारी .. ... ३९ ३८
१२ रमैया बिन मोसूं रह्यो न जाय .. ४० ,,
१३ पिय बिन रह्यो न जाइ ... ४१ ३९
१४ रै पपइया प्यारे कब को बैर चितार्यो . ४२ ,,
१५ तुम देख्या बिन कल न पड़त है ... .. ४३ ,,
(१) कृष्ण मेरे नजर के आगे ठाढो रहो रे .. ,,
१६ म्हाँरो मनडो लाग्यो हरि सूं, मे अरज करूँ अतर सूं ४४ ४०
१७ म्होरो मन मोह्यो छै जी स्याम सुजाण . . ४५ ,,
१८ बाई, म्हॉने रावल भेष .. . ४६ ,,
(१) बाई, थाराँ नैन रावल भेख . .
(२) बाई, म्हाँरि नैन रावल भेख .. ४१
१९ डाल गयो रे गल मोहन फाँसी .. . ४७ ,,
(१) डारि गयो मन मोहन फॉसी . .. ,,
२०. ओलूंडी लगाय गयो है ब्रज को वासी, कब मिलि जासी हे ४८ ४२
२१. ओलू थारी आवे हो महाराज अविनासी ... ४९ ,,
२२ परम सनेही राम की नित ओलूूं री आवै . ५० ४२
२३. सांवरियाँ, मोरे नैणा आगे रहिज्यो जी .. . ५१ ४३
२४ सांवरियाँ, म्हाँरी प्रीतडली निभाज्यो ... ५२ ,,
२५. घड़ी एक नंही आवडे तुम दरसण बिन मोय ५३ ४४
२६. को विरहणि को दुख जाणै हो . .. ५४ ,,
२७ रमैया बिन नीद न आवै . ... ... ५५ ४५

१. गुरु-महिमा एवं साधु-संग पद

४
२८ साजन, म्हाँरी सेजडली कद आवै हो ५६ ४५
२९ म्हॉरे घर आवो जी, राम रसिया ५७ ४६
३० भवन पति, तुम घरि आज्यो जी ५८ ,,
३१ बेग पधारो साँवरा कठिन बनी है ५९ ,,
३२ म्हाँरे घर होता जाज्यो राज़ ६० ४७
(१) होता जाज्यो राज,महलाँ म्हॉरे होता जाज्यो राज़ ,,
३३ साजन, बेगा घर आज्यो जी . ६१ ,,
३४ आवो मनमोहना जी जोऊँ थारी बाट ६२ ४८
३५ आवो मनमोहना जी मीठा थॉरा बोल ६३ ,,
३६ कोई कहियो रे विनती जाइकै, म्हॉरा प्राण पिया नाथ नै ६४ '
३७ पतिया ने कूण पतीजै, आणि खबरि हरि लीजै ६५ ४९
३८ थे छो म्हॉरा गुण रा सागर ६६ ,,
३९ मदरो सो बोल मोरा, मोरा स्याम बिन जिय दोरा ६७ ५०
४० ऊधो, भली, निभाई रे ६८ ,,
४१ अहो कोई जाणे गुवालियो, बेदरदी पीर तो पराई ६९ ,,
४२ देख्या कोई नन्द के लाला, बताओ बसरी वाला ७० ५१
४३ वेद वण आयजो, स्वामी म्हॉरा व्याकुल भयो है सरीर ७१
४४ थॉरे रंग रीझी रसिक गोपाल ७२ ५२
४५ गिरिधर रूसणूं जी कोन गुनाह . ७३ ,,
४६ सहेल्या ऊद्धौ जी आया है ... ७४ ५३
४७ निजर भर न्हालो नाथजी, हूँ तो थॉरे चरणा री दासी ७५ ,,
४८ राम मिलण रो घणो उमावो, नित उठ जोवूं बाटडियाँ ७६ ५४
• ४९ बसी वारो आयो म्हॉरो देस ७७ ,,
५० म्हॉरी सुध ज्यो जाणो ज्यो लीजो जी . ७८ ५५
(१) सजन, सुध ज्यूँ जानै त्यूँ लीजै हो ,,
(२) साजन, सुधि ज्यो जाणो, त्यो लीज्यौ जी ,,
(३) ज्यूँ जाणो ज्यूँ लीज्यो सजन, ५६
(४) थे म्हॉरी सुध ज्यूँ जाणूं ज्यूँ लीज्यौ ,,
५१ पिया जी म्हॉरि नेणा आगे रहज्यो जी ७९ ५७
५२ कहो ने जोशी प्यारा, राम मिलण कद होसी ८० ,,
५३ इतनूं कोई छै मिजाज म्हॉरि मदिर आवताँ ८१ ,,
मिश्रित भाषाओं मे प्राप्त पद
१ थे तो पलक उघाडो दीनानाथ, ८२ ५८
२ राम मिलण के काज सखी, मेरे आरति उर मे जागी रे ८३ ,,

५
३. पिया मोहि दरसण दीजै हो ... .. ८४ ५९
४. नीदडली नही आवै सारी रात, किस बिध होई परभात ८५ "
५. सइयाँ तुम बिन नीद न आवै हो . . ८६ ६०
६ थे म्हाँरे घर आवो जी प्रीतम प्यारा . ८७ ,
• (१) घर आवो जी प्रीतम प्यारा . . ,
• (२) म्हाँरे घर आज्यो प्रीतम प्यारा .. ६१
• (३) म्हाँरे डेरे आज्यो जी महाराज .. "
७ आई मिलो हमकूँ प्रीतम प्यारे, ८८ "
•८ कभी म्हाँरे गली आव रे, जिया की तपन बुझाव रे ८६ ६२
९ घर आवो जी साजन मिठबोला . ९० ६३
१० तुम आज्यो जी रामा, आवत आस्याँ सामा . ९१ "
११. उड जा रे कागा बन का ९२ "
१२ गोविन्द, कबहुँ मिलै पिया मोरा . ९३ ६४
१३ भीजै म्हाँरो दावण चीर, सावणियो लुम रहियो रे ९४ "
१४ म्हाँरि घर आओ, स्याम, गोठडी कराइये ९५ ,
१५ साँइया, सुणजो अरज हमारी .. . ९६ ६५
१६. हरि, म्हाँरी सुणजो अरज महाराज . : ९७ ,
१७ कैसी रितु आई, मेरो हियो लरजे है मा .. ... ९८ "
१८. ऐसी ऐसी चाँदनी मे पिया घर नाई . ९९ ६६
१९ मोसी दुखियाँ कूँ, लोग सुखिया कहत है .. १०० "
२० रसमरिया महाराज मोकूँ, आप सुनाई बाँसुरी .. १०१ ६७
२१ प्यारी हट माँड्यो माँझल रात . १०२ "
२२ लाग रही औसेर कान्हा, तेरी लाग रही औसेर . १०३ ६८
२३ माधो बिन बसती उजार मेरे भावे . १०४ ,
२४ दासी, म्हाँरा मारुडा मारुँ जी से कहना .. . १०५ "
२५. तुम ह्याँ ही रहो राम रसियाँ . १०६ ६६
२६ नेहा समद बिच नाव लगी है १०७ "
२७ माई, म्हाने मोहन मित्र मिलाय .१०८ "
२८ मैं खड़ी निहारुँ बाट, चितवन चोट कलेजे बह गई १०६ ७०
२९ उधो, म्हाँरे मन की मन मे रही ... .. ११० "
३० तुम आवो हो कृपानिधान बेग ही ... ... १११ "
३१ होली पिया बिन मोहि न भावै, घर आँगण न सुहावै . ११२ ७१
३२ किण सग खेलूँ होली, पिया तजि गए है अकेली ११३ "
३३. इक अरज सुनो मोरी, मैं किन सग खेलूँ होली ११४ ७२
३४ होली पिया बिन मोहि लागे खारी, सुनो री सखी प्यारी ११५ "

६
ब्रजभाषा में प्राप्त पद
१ मै तो चरण लगी गोपाल ११६ ७४
२ आली री मोरे नैनन बान पडी ११७ ,,
३ माई, मेरे नैनन बान पडी री ११८ ,
४ नैन परि गई ऐसी बानि • . ११९ ७५
५ नैणा री हो पड गई बाण १२० "
६ जब कें तुम बिछुडे प्रभु जी, कबहूँ न पायो चैन १२१ "
७ मै जाण्यो नहि प्रभु को मिलन कैसे होय री १२२ ७६
८ सखी मोरी नीद नसानी हो १२३ ७७
९ पलक न लागै मेरी स्याम बिन १२४ ,,
१० नीद नही आवे जी सारी रात १२५ *
११ मैं विरहणी बैठी जागूँ, जगत सब सोवै री आली १२६ ७८
१२ दरस बिन दूखन लागै नैण १२७ ,,
१३ जोहने गोपाल फिरूँ, ऐसी आवत मन मे १२८ ,,
१४ हो गये श्याम दुइज के चन्दा १२९ ७९
१५ कान्हा तेरी रे जोवत रह गई बाट १३० ,,
१६ अँखिया कृष्ण मिलन की प्यासी . १३१ ,,
१७ मन हमारा बाँध्यो माई, कँवल नैन अपने गुन १३२ ८०
१८ बिरहनी बावरी सी भई १३३ ,,
१९ हरि तुम काय कूं प्रीति लगाई १३४ ८१
२० पिया इतनी बिनती सुनो मोरी, कोई कहियो रे जाय १३५ ,,
२१ देखो साइयाँ, हरि मन काठ कियो १३६ ,,
२२ पिया कूं बता दे मेरे, तेरे गुण मानूंगी १३७ "
२३ पियाजी, थे तो कटारी मारी १३८ ८२
२४ सोवत ही पलको मे, मै तो पलक लागी पलमे पिऊ आये १३९ ,,
२५ स्याम को संदेशो आयो, पतियाँ लिखाय माय १४० ,,
२६ मेरे प्रीतम राम कूं लिख भेजूँ री पाती १४१ ८३
२७ मतवारो बांदल आए रे, हरि को संदेशो कछु नही लाए रे १४२ ,,
२८ बादल देखि झरी हो श्याम, बादल देखि झरी १४३ ,,
२९ सावण दे रह्यो जोरा रे, घर आवो हो स्याम मोरा रे १४४ ८४
३० बरसे बदरिया सावन की, सावन की मन भावन की १४५ ,,
३१ सुनी हो मै हरि आवन की आवाज १४६ ,,
३२ कोई कहियो रे प्रभु आवन की १४७ . ८५

७
गुजराती में प्राप्त पद
१. क्यारे आवसे घर कान रे, जोसिडा जोस जुवो ने . १४८ ८६
२ कागद कोण लई जाय रे १४९ ,
३ कही जइ करूँ रे पोकार, कारी मनी धावे लागे थे १५० '
४. शामले मल्याँ त बिसारी १५१ ८७
५. ब्रजमाँ कयम रेवाशे ओधव ना वा'ला १५२ "
६. आवजो म्हाँरे नेडे ओधव ना वा'ला, १५३ "
७ कॉनी ग्यवे देखन जाऊँ श्यामलो वेरागी भयो रे १५४ "
८ गोविन्दा ने देश ओधव मुने लेई, १५५ ८८
९. आवो ने सलुणा म्हाँरा मीठडाँ मोहन १५६ "
१० मारा प्राण पातलिया वाहेला आवो रे १५७ "
११. नारे लाव्या ब्रजमाँ फरी ने, ओधव जी वॉलो १५८ ८९
१२ हाँ रे माया शीद ने लगाड़ी, धुतारे वाले १५९ "
१३ ब्रजमाँ केम रेवाशे, ओधवना वाला, ब्रजमाँ केम रेवाणे १६० ९०
विभिन्न बोलियों में प्राप्त पद
पंजाबी मे प्राप्त पद
१ साँवरे दी झालन माये, सानू प्रेम दी कटारियाँ १६१ "
खडी बोली मे प्राप्त पद
१ आली साँवरे की दृष्टि मानो प्रेम की कटारी हैं १६२ ९१
२. जल्दी खबर लेना मेहरम मेरी .. १६३ "
संघर्षाभिव्यक्ति
राजस्थानी में प्राप्त पद
१. अब नंहिं बिसरूँ म्हाँरे हिरदै लिख्यो हरिनाम . १६४ ९२
२. म्हाँरे हिरदे लिख्यो जी हरि नाम, अब नंहिं बिसरूँ १६५ ९३
३ म्हाँरे हिरदे लिखयो हरि नाव, अब मै ना बिसरूँ १६६ ९४
४. में तो सुमर्या छै मदनगोपाल . १६७ ९५
(१) मैं तो सुमरया छै मदन गोपाल .. ९६
५. गढ से तो मीरों बाई उतरी, करवा लीना जी साथ १६८ ९७
६ राणा जी महलों से ऊतरी, ऊँटा कसियो भार . १६९ ९८
७ काँई थारो लागै छै गोपाल .. .. .. १७० "
८ ए मीराँ थॉरो कॉई लागै गोपाल . .. १७१ ९९
९ राणा जी महल पधारिया जी, कर केसरिया साज .. १७२ १०० .
१० म्हाँने बोल्याँ मति मारो जी राणा यो लैइ थॉरो देस १७३ १०१

८
११ गरुड चढ हरी आए मीराँ के पास ... .. १७४ १०२
१२ ओ ल्यो राणा जी देस थौरो, बन मे कुटिया बनास्याँ १७५ १०३
१३ सुत्यो राणा जी निस भर नीद ओ १७६ १०४
१४ सुत्या राणा जी नीस भरी नीद, १७७ १०५
१५ राणा जी क्योंने राखो म्हाँसूँ बेर् १७८ १०६
॰ (१) राणा जी थे क्योने राखो मोसूं बेर "
॰ (२) राणा म्हाँसूँ क्याने जी राखो बेर १०७
१६ सिसोद्या राणो, प्यालो म्होंने क्यूँ रे पठायो १७९ १०८
१७ इण सरवरिया री पाल मीराँ बाई सांपडे १८० १०९
॰ (१) उभी मीराँ सरवरिया री पाल, ११०
(२) उभी मीराँ सरवरिया री पाल १११
(३) (तू तो) सांवडली गोरी नार ११२
१८ सिसोद्यो रूठ्यो तो म्हारो कॉई करलेसी १८१ ११३
१९ राणो जी मेवाडो, म्हाँरो कॉई करसी १८२ ११४
२० राणा जी मेवाडो, म्हाँरो कॉई करसी १८३ "
२१ रसियो राम रिझास्याँ हे माय १८४ ११५
२२ मेरे राणा जी मै गोविन्द गुण गाना १८५ "
२३ राणा जी मै तो गोविन्द का गुण गास्याँ १८६ ११६
२४ राणो म्हाँरो कॉई करलेसी राज, १८७ "
२५ म्हाँरो मनडो राजी राजा जी १८८ ११७
२६ गिरधर म्हाँरा साचौं पति छै, मै गिरधर री दासी हे माय १८९ "
२७ गिरधर म्हॉरे मन भाया मोरी माय १९० "
२८ राणो जी हट मॉडूचो म्हाँसु, गिरधर प्रीतम प्यारा जी १९१ ११८
२९ राणा जी म्हॉरे गिरधर प्रीतम प्यारो हो • १९२ "
३० निन्दा म्हॉरी भलाई करो नै सोने काट न लागै १९३ "
३१ तुलसाँ की माला हिवडे लागी जी १९४ ११९
३२ मेडतियारा कागद आया १९५ "
३३ हो जी हो सिसोद्या राजा मनडो वैरागी धन रो क्या करूँ १९६ १२०
३४ राणौ म्होंने ऐसी कही महाराज . १९७ १२१
३५ राणा जी हो जाति रो कारण म्हॉरे को नही १९८ "
३६ प्रभु जी अरज बन्दी री सुण हो १९९ १२२
मिश्रित भाषाओं मे प्राप्त पद
१ म्हॉरे सिर पर सालिग्राम, राणा जी म्हॉरे कॉई करसी २०० १२३
२ राणाजी थे जहर दियो म्हे जाणी २०१ "