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सर्वकोश
मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

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अनुकूल मीराँ स्वय भी कभी "मोतियन मांग भराँ" के लिये अत्युत्सुक हो
उठती० है तो कभी "कर जटाधारी वेश" "जोगण" बनने को "आकुल
व्याकुल" हो जाती ह । इतने पर भी कभी-कभी इस योग-साधना पर
झुझला जाती है "भाग लिखियो सो ही पायो।""
अपनी माधुर्य भाव की भक्ति के कारण ही मीरा ख्याति को प्राप्त हुई ।'
नाभादास जी लिखते हैं, "सदरिस गोपिन प्रेम प्रगट कलिजुगंहि दिखायो।'
पति-भाव से ही मीराँ ने अपने आराध्य की पूजा की। अत पदों मे प्राप्त
वियोग और श्रृङ्गार, खीज और समर्पण की अभिव्यक्ति तो सहज ही
प्रतीत होती है परन्तु कुछ पदो मे प्राप्त बाल-वर्णन उतना ही असगत भी
प्रतीत होता है। सूर आदि अन्य ब्रजभाषा के कवियो मे भी सयोग और
विप्रलम्भ शृङ्गार के अति उत्कट वर्णन के साथ ही साथ वात्सल्य और
बाल-वर्णन की अभिव्यक्ति भी मिलती है। ब्रजभाषा के इन भक्त-कवियो ने
आराध्य कृष्ण की विभिन्न लीलाओ का वर्णन किया; वे कवि थे परन्तु
मीराँ तो स्वय ही गोपिका बनी हुई थी। एक कवि की तरह उन्होने अपने
इष्टदेव की लीलाओं का वर्णन नही किया अपितु आराध्य मे तन्मय
हो जाने अनजाने ही कुछ गा उठी, भावातिरेक मे बेसुध हृदय के छन्द-
अलकार विहीन वे निश्छल चित्र ही हिन्दी-साहित्य की अपूर्व निधि बन
गये। अस्तु, मीराँ के पदो में वात्सल्य-युक्त वर्णन कुछ अटपटा ही लगता
है। मुग्धा नारी द्वारा अपने ही प्रियतम के बालरूप का वर्णन युक्तिसगत
नही प्रतीत होता।
कुछ पदो मे पूर्वापर सबध और अर्थ-सगति का सर्वथा अभाव है ।
अन्य कुछ पदो मे पुनरुक्ति और अस्पष्टता दोप भी हैं। गेय-परम्परा से
प्राप्त पदो से ऐसा होना अस्वाभाविक या आश्चर्यजनक भी नही। ऐसे
पदो को भी प्रचलित रूप मे तो प्रामाणिक नही ही माना जा सकता है।
कुछ पद विशेष जन-प्रिय होकर विभिन्न क्षेत्रो मे गाये जाने लगे। अत'
क्षेत्र विशेष की भाषा का प्रभाव उन पर पडा और फलत उनकी भाषा में
भी परिवर्तन आ गया। बहुत सम्भव है कि इसी तरह मीराँ के कुछ पदो
की भाषा मे क्रमश इतना अधिक परिवर्तन हो गया हो कि उसके मौलिक
रूप का निर्णय कर लेना दुरूह ही नही वरन् असम्भव भी है। स्थिति
विशेष मे भाषा के इस परिवर्तन के साथ ही साथ भाव परिवर्तन हो
जाना भी सहज प्रतीत होता है। यह मान लेना कि पद विशेष की अभि-