मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
५२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
ज्या श्री चरणा सो म्हारो दुख जासी, चरणखोल१ जल पायजोजी।
दरद दिवानी मीराँ वैद सांवलियो, सूती ने आण जगायजोजी।
मीराँ तो दासी थारी जनम की, चरण कमल चित लायजोजी। ॥७१॥
४४
थारें रग रीझी रसिक गोपाल।
निस वासर मै रटूँ निरतर, दरसण द्यो नन्दलाल।
सो पतिव्रत टरै र्जिन टारो, मति बिसरो नन्दलाल।
कोऊ कहै नन्दो कोऊ कहै बन्दौ, चला भावती चाल।
सो पथ भलि केरो जिन साधो, म्हांरो मणि उरमाल।
प्रेम भरी मीराँ जिन गरबै, हरि है गिरधर लाल। ॥७२॥+
पदाभिव्यक्ति असंगत है। प्रथम पक्ति मे 'रग' के बदले 'गुण'
और अन्तिम पक्ति मे 'गरबै' के बदले 'गरजै' का प्रयोग भी मिलता है।
अन्तिम भक्ति पद की प्रामाणिकता का विरोध इगित करती है।
४५
गिरधर रूसणूँ जी कोन गुनाह।
कछु इक औगुण काढो म्हा मै, म्हैं भी कानां सुणा।
मै दासी थारी जनम जनम की, थे साहिब सुगणा२।
काँई बात सूँ करवौ रूसणूँ, क्यो दुःख पावो छो मना।
किरपा करि मोहि दरसण दीज्यो, बीते दिवस घणा३।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, थारो ही नांव गणा४ ॥७३॥+
पद के पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध मे पूर्वापर सबध का निर्वाह नही
हुआ है।
१ चरण धोकर, २ गुणयुक्त, ३० बहुत, ४ गिनना, निरन्तर जपना।
वियोगाभिव्यक्ति ५३
४६
सहेल्या उद्दौ जी आया है।
आया पठाया स्याम का, मेरे मन नहीं भाया है।
एक निमिष के कारणै, षटमास लगाया है।
पहली प्रीत करी हमसूँ, पीछे पछताया है।
जमुना जल मे नहावता, सभी चीर चुराया है।
कुबज्या दासी कस की, जिन स्याम चुराया है।
मुरली तो मोहन लई, जिणि स्याम रिझाया है।
देखो सखी सहलियो, नैणां कंर ल्याया है।
सुष दुष अपने करम का, गोविन्द वर पाया है।
दोस कुणी को दीजिये, मीराँ गुण गाया है। ॥७४॥†
उपर्युक्त पद की क्रियाये सभी आधुनिक हिन्दी मे है। अत
पद का प्रक्षिप्त होना ही युक्ति सगत है।
४७
निजर भर न्हालो नाथ जी, हू तो थारे चरणा री दासी।
मै अबला तुम सबला स्वामी, नही मिलणा कौ टालो रें।
फूँक फूँक पग धरू धरणी पर, मति लगाज्यौ कोई कालौ रे।
आप तो जाइ द्वारिका छाये, हम सूं दे गया टालौ रे।
बालपने को बालसनेही, प्रीति बचन प्रतिपालौ रे।
च्यारि महिना आयो सियालो१, च्यारि महिना उन्हियालो२ रे।
कृपा करि मोहि दरसण दीज्यौ, अब ऋतु आयो बरसालौ रे।
सब जग म्हारी निन्दा करत है, कीन्ही मूढो३ कालौ रे।
सरण तुम्हारी लई सावरा, तुम भी दियो छै म्हासूं टालौ रे।
म्हारो घर मे भयो अधेरो, आण करो उजियालौ रे।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, विरह अगनि मत जालौ रे। ॥७५॥†
पदाभिव्यक्ति मे अर्थ संगति और पूर्वापर संबंध का सर्वथा
अभाव है।
१ जाडे की ऋतु, २ गर्मी की ऋतु, ३ मुख।
५४ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
४८
राम मिलणरो घणो¹ उमावो,² नित उठ जोवूँ बाटडिया³ ।
दरस बिना मोहि कछु न सुहावै, जक न पडत है आखड़िया ।
तलफत तलफत बहु दिन बीता, पडी बिरह की पाशडिया⁴ ।
अब तो बेगि दया करि साहिब, मै तो तुम्हारी दासडिया ।
नैण दुखी दरसण कूँ तरसै, नाभि बैठे सासडिया ।
राति दिवस यह आरति मेरे, कब हरि राखै पासडिया ।
मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे, पूरौ मन की आसडिया । ।।७६।।
४९
बसीवारो आयो म्हारो देस, थांरी सावरी सूरत वाली बैस⁵ ।
आऊ आऊ कर गया सांवरा, कर गया कौल अनेक ।
गिणता गिणता घिस गई अगली, घिस गई अंगली की रेख ।
मै वैराग ण आदि की, थारे म्हारे कदकी⁶ सनेस⁷ ।
बिन पानी बिन उबहनो, हर गई धुर सपेद⁸ ।
जोगण होई मै वन वन हेरु, तेरा न पाया भेस ।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, घूंघरवाला केस ।
मीराँ प्रभु गिरधर मिल गये, दूणा बढा सनेस । ।।७७।।†
उपर्युक्त पदाभिव्यक्ति से विरोधाभास ही लक्षित होता है।
प्रथम और अन्तिम-पंक्तियों से आराध्य की समीपता और शेष पदाभि-
व्यक्ति से विरह ही लक्षित होता है।
पद की चतुर्थ पंक्ति मे "वैराग ण . . . सनेस" सर्वथा विभिन्न
पडती है। प्रथम पंक्ति के उत्तरार्द्ध में अर्थ संगति का अभाव हे। पद
की चतुर्थ और छठी पंक्ति की अभिव्यक्ति नाथ पंथ से प्रभावित है।
नाथ पंथ और वैष्णव मत का प्रभाव एक साथ एक ही पद मे
विचारणीय है।
१ बहुत, २ उमग, ३ राह देखना, ४ फंदा, ५ वयस, ६ कब
की, ७ मित्रता, स्नेह, परिचय, ८ सफेद ।
वियोगाभिव्यक्ति ५५
५०
म्हारी सुध ज्यो जाणो ज्यो लीजो जी।
पल पल भीतर पंथ निहारूं, दरसण म्हाने दीजो जी।
मै तो हू बहु औगण हारी, औगण१ चित मत दीजो जी।
मै तो दासी थारे चरण कवल की, मिल बिछुरन मत कीजो जी।
मीराँ तो सतगुरु जी सरणे, हरि चरणा चित दीजो जी। ॥७८॥ †
तृतीय पक्ति का निम्नांकित पाठान्तर भी मिलता है।
“मै तो दासी थारे चरणा जना की, मिल बिछुरन मत कीज्यो जी।”
इस पद के विभिन्न बोलियो से प्रभावित कई पाठ मिलते है।
उपर्युक्त पाठ की भाषा राजस्थानी है।
पाठान्तर १,
सजन, सुध ज्यूँ जानै त्यूँ लीजै हो।
तुम बिन मोरे और न कोई, किरपा रावरी कीजै हो।
दिन नही भूख रैण नही निद्रा, यूँ तन पल पल छीजै हो।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मिल बिछुडन मत कीजै हो। †
'हो' और 'रावरी' जैसे शब्दो के प्रयोग से इस पाठ पर अवधी
का प्रभाव प्रतीत होता है। प्रथम पक्ति मे निम्नांकित पाठान्तर भी
मिलता है।
“ज्यों जानो त्यो लिये सजन, सुधि ज्यों जानो त्यो लीजै।”
पाठान्तर २,
साजन सुधि ज्यो जाणो, त्यो लीज्यौ जी।
म्हे तो दासी जनम जनम की, किरपा रावरी कीज्यौ जी।
उठत बैठत जागत सोवत कबहुक, याद करीज्यौ जी।
१ अवगुण।
५६ मीरों-वृहद्-पद-संग्रह
तुम पतिबरता नारी बिना प्रभु, काहो सो न पतीज्यो जी ।
साचो प्रेम प्रीत मो नातो, ताही सो तुम रीझ्यो जी ।
राति दिवस ओहि ध्यान तिहारो, आपही दरसन दीज्यौ जी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मिलि बिछुरन मत कीज्यौ जी ।
इस पाठ की भाषा पर ब्रज भाषा का प्रभाव अति स्पष्ट है ।
प्रथम दो और अन्तिम पक्तियो के सिवा शेष पद अन्य पाठो से सर्वथा
भिन्न पडता है । बीच की चार पक्तियो मे अर्थ और पूर्वापर सबध
का अभाव है । इस पाठ विशेष से मिलता जुलता एक और निम्नाकित
पाठ भी प्राप्त है।
पाठान्तर ३,
ज्यूँ जाणो ज्यूँ लीज्यो सजन, सुध ज्यूँ जाणे ज्यूँ लीज्यो ।
हूँ तो दासी जनम जनम की, कृपा रावरी कीज्यो ।
उठत बैठत जागत सोवत, कबहुँक याद करीज्यो ।
आवत जावत जीमत सोवत, सुपणे दरस मोये दीज्यो ।
में पतिबरता नारी प्रभु जी, काँहूँ ते न पतीजौ ।
साँचो प्रेम प्रीत को नातो, ताही ते तुम हरि रीझौ ।
रात दिवस मोहि ध्यान तिहारो, आय दरस मोये दीज्यौ ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चित चरणाँ मे लीज्यो ।†
पाठान्तर ४,
थे म्हारी सुध ज्यूँ जाणूँ ज्यूँ लीज्यौ ।
आप बिना मोहे कछु न सुहावै, बेगो ही दरसण दीज्यो ।
मै मद भागण करम अभागण, ओगण चित म़त दीज्यौ ।
विरह लगी पल छिन न लगत है, तो तन यूँही छीज्यौ ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, देख्याँ प्राणपती ज्यौ ।
इस पाठ की अन्तिम पक्ति भी सर्वथा भिन्न पड़ती है ।
प्रथम पाठ से संतमत का प्रभाव सुस्पष्ट हो उठता है, परन्तु अन्य
पाठो से विरह वेदना ही विशेष तौर से लक्षित होती है ।
वियोगाभिव्यक्ति ५७
५१
पिया जी म्हारे नैणा आगे रहज्यो जी।
नैणा आगे रहज्यो जी, म्हाने भूल मत जाज्यो जी।
भौ सागर मे बही जात हूँ; बेग म्हांरी सुध लीज्यो जी।
राणो जी भेज्या विष का प्याला, सो इमरित कर दीज्यो जी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मिल बिछुडन मत कीज्यो जी।
॥७९॥†
उपर्युक्त दोनो पदो मे प्राप्त साम्य के आधार पर यह पद भी ⁓
पद स० ५० का ही गेय रुपान्तर प्रतीत होता है। अन्तिम पंक्ति तो हूबहू
वही है। अन्य पंक्तिया भी विभिन्न पदों मे मिल जा सकती है। गेय
परम्परा से प्राप्त पदो मे ऐसे सम्मिश्रण का होना असम्भव नही।¹
५२
कहो ने जोशी² प्यारा, राम मिलण कद होसी।
जो जोशी मोहे प्रभु मिले, तो हीरा जडावूँ थारी पोथी।
जो जोशी मोहे प्रभु ना मिले, तो झूठी पडे तेरी पोथीं।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, राम मिले सुख होसी। ॥८०॥
⁓ ५३
इतनूँ काई छै मिजाज म्हारे मदिर आवता।
थाने इतनूँ काई छै मिजाज।
तन मन धन सब अरपण कीनूँ, छाडी छै कुल की लाज।
दो कुल त्याग भई वैराग ण, आप मिलन की लाग।
मीराँ के प्रभु कबर मिलोगे, कुबज्या आई काई या है। ॥८१॥†
अन्तिम पंक्ति का उत्तरार्द्ध अर्थ हीन है। प्रथम दो पंक्तियो की
अभिव्यक्ति मे समर्पण की वह गहराई नही, जो मीराँ के पदो की
विशेषता है।
१ देखे 'मीराँ, एक अध्ययन,' २ कुल पुरोहित।
५८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
मिश्रित भाषा में प्राप्त पद
१
थे तो पलक उघाडो दीनानाथ, मे हाजिर नाजिर कद की खटी।
सोजनियाँ दुसमण होय बैठ्या, सब ने लगूँ कड़ी।
तुम बिन साजन कोई नही है, डिगी नाव मेरी सपद अडी।
वाण विरह का लाग्या हिये मे, भूलूँ न एक घडी।
पत्थर की तो अहल्या तारी, बन के बीच पडी।
कहा बोझ मीराँ के कहिए, सौ पर एक घडी। ॥८२॥
कही कही इसी पद के साथ निम्नांकित दो पंक्तियाँ और भी पायी
जाती हे।
'गुरु रैदास मिले मोहिं पूरे, धुर से कलम भिडी।
सतगुरु सैन दई जब आकें, जोत से जोत रली।
पदाभिव्यक्ति स्पष्ट नही है। पूर्वापर सबध और अर्थ संगति
का भी अभाव है। साथ ही प्रथम पंक्ति और शेष पद की अभिव्यक्तियो
मे गहरा विरोध भी है। सतमत का प्रभाव विशेष रूपेण लक्षित हो
उठता है।
२
राम मिलण के काज सखी, मेरे आरति उर मे जागी री।
तलफत तलफत कल न परत है, बिरह आणि उर लागी री।
निस दिन पथ निहारूँ पीव को, पलक न पल भरी लागी री।
पिव पिव मे रटूँ रातदिन, दूजी सुध बुध भागी री।
बिरह भवग¹ मेरो उस्यो है कलेजो, लहरि हलाहल जागी री।
मेरी आरति मेटि गुँसाई, आई मिलौँ मोहि सागी² री।
मीराँ व्याकुल उकलाणी³, पिया की उमंग अति लागी री।
॥८३॥
१ भुवग-साँप, २ स्वयम्, ३ व्याकुल।
वियोगाभिव्यक्ति ५९
३
पिया मोँहि दरसण दीजै हो।
बेर बेर मै टेर हूँ, अहे किरपा कीजै हो।
जेठ महीने जल बिना, पछी दुख दई हो।
मोर असाढो कुरल हे, घन चात्रग सोई हो।
सावण मे झड लागीयो, सखी तीजा खेले हो।
भादरवे नहिया बहै, दूरि जिन मेलो हो।
देव काती मे पूज है, मेरे तुम होई हो।
मगसर ठड बहोती पडै, मोहि बेगि सम्हालो हो।
पोस माही पाला घणा, अब ही तुम न्हालो हो।
माह मही बसत पचमी, फागाँ सब गावे हो।
चेत चित मे ऊपजी, दरसण तुम दीजै हो।
वैसाख वणराइ फूलवे, कोइल कुरलीजै हो।
काग उडावता दिन गयौ, बुझूँ पिडत जोशी हो।
मीराँ व्याकुल विरहणी, दरसण कद होशी हो। ॥८४॥†
मीराँ के नाम पर प्रचलित पदो मे ‘बारह मासें’ की शैली पर यही
एक पद है। इस पद की विशेष आलोचना देखे, ‘मीराँ, एक अध्ययन’ मे।
४
नीदडली नही आवै सारी रात, किस बिध¹ होई परभात।
चमक उठी सुपने सुध भूली, चन्द्रकला न सोहात।
तलफ तलफ जिय जाय हमारो, कबरे मिले दीनानाथ।
भई हूँ दिवानी तन सुध भूली, कोई न जानी म्हारी बात।
मीराँ कहै बीती सोइ जाने, मरण जीवन उन हाथ। ॥८५॥
१ किस तरह।
६० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
५
सइयाँ, तुम बिन नीद न आवै हो ।
पलक पलक मोहि जुग सो बीते, छिनि छिनि विरह जगावै हो ।
प्रीतम बिनि तिम जाइ न सजनी, दीपक भवन न भावै हो ।
फूलैरू सेझा सूल होइ लागी, जागति रैणि बिहावै हो ।
काँसे कहूँ कूण माने मेरी, कह्याँ न को पतियावै हो ।
प्रीतम पनग डस्यो कर मेरो, लहरि लहरि जिव जावै हो ।
दादुर मोर पपइया बोले, कोइल सबद सुणावै हो ।
उमगि घटा घन ऊलरि आई, बिजु चमक डरावै हो ।
है कोई जग में राम सनेही, जै उरि साल' मिटावै हो ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, नैणा देख्यां भावै हो ।॥८६॥†
पद की नवीं पक्ति मे प्रयुक्त 'राम सनेही' प्रयोग विशेष विचार-
णीय है। और भी दो एक पदो मे ऐसा प्रयोग मिलता है। पद की
तीसरी पक्ति 'तिम' शब्द का प्रयोग अर्थहीन सिद्ध होता है। "फूलनसेज
• भावै हो" पक्तियाँ स्वतत्र पद के रूप मे भी प्रचलित हैं।
६
थे म्हारे घर आवो जी प्रीतम प्यारा।
चुन चुन कलियाँ मे सेज बनाऊँ, भोजन करूँ१ मे सारा।
तुम सगुणा मे अवगुणधारी, तुम छो बगमणहारा२।
मीराँ के प्रभु गिरिधर, तुम बिनि नैण दुखियारा ।॥८७॥†
पदाभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है।
पाठान्तर १,
घर आवो जी प्रीतम प्यारा।
तन मन धन सब भेंट करूंगी, भजन करूंगी तुम्हारा।
१ तय्यार करूँ, २ पुरस्कार देने वाले, क्षमा करने वाले।
वियोगाभिव्यक्ति ६१
तुम गुणवत साहिब कहिये, मो मे ओगण सारा ।
मै निगुणी गुण जाण्यो नाही, तुम छो बगसणहारा ।
मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे तुम, बिन नैण दुखियारा।†
इस पाठ पर खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट है।
पाठान्तर २,
म्हारे घर आज्यो प्रीतम प्यारा, तुम बिन सब जग खार।
तन मन धन सब भेट करूँ, औ भजन करूँ मै थारा।
तुम गुणवन्त बडे सुखसागर, मै हूँ जी औगुणहारा।
मै निगुणी गुण एकौ नही, तुझ मै जी गुणसारा।
मीराँ कहै प्रभु कबहि मिलोगे, बिन दरसण दुखियारा।†
पहले पाठान्तर से इस पाठ का गहरा साम्य है।
पाठान्तर ३,
म्हॉरे डेरे¹ आज्यो जी महराज।
चुणि चुणि कलियाँ सेज बिछाई, नख सिख पहर्यो साज।
जनम जनम की दासी तेरी, तुम मेरे सिरताज।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, दरसण दीज्यो आज।†
इस पाठ की अन्तिम पंक्ति मे और शेष सभी पाठो की अन्तिम
पंक्ति मे स्पष्ट अन्तर है। इस अन्तर के बावजूद भी भावाभिव्यक्ति
वही है। यह पाठ प्रथम पाठ से ही अधिक साम्य रखता है
७
आई मिलो हमकूँ प्रीतम प्यारे, हमकूँ छाँडि भये कयूँ न्यारे।
बहुत दिनन की बाट निहारू, तेरे ऊपरि तन मन वारूँ
१ निवास स्थान।
६२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
तुम दरसण की भी मन माहि, आई मिलो करि कृपा गुँमाई।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, आई दग्ग द्यो सुख के सागर।
॥८८॥
८
कभी म्हांरे गैलरी आव रे, जिया की तपन बुझाव रे, म्हाँरे मोहन प्यारे।
तेरे सांवले बदन पर, कोई कोट काम वारे।
तेरी खूबी के दरस पै, नैन तरसते हमारे।
घायल फिरूं तडपती, पीड जाने नही कोई।
जिस लागी पीड़ प्रेम की, जिन लाई जानं सोई।
जैसे जल के सोखे मीन क्या जीवे बिचारे।
कृपा कीजै, दरसु दीजै, मोराँ नन्द के दुलारे॥ ८९॥।
उपर्युक्त पद की भाषा विचारणीय हे। राजस्थानी, ब्रज, उर्दू
और खडी बोली चारो का ही इसमे सम्मिश्रण हुआ है, जैसा कि शायद
ही किसी अन्य पद में हुआ हो। साथ ही, 'मीराँ नन्द के दुलारे' जैसा
प्रयोग भी इस पद की विशेषता है।
'बृहद्राग रत्नाकर' मे एक ऐसा ही पद 'मीर माधो' के नाम पर
भी मिलता है।
'कभी गली हमारी आव रे, मोरे जिया की तपन बुझाव रे,
नन्दजू के मोहन प्यारे लाला।
तेरे सांवरे बदन पै कई कोटि काम वारैं,
तेरियां जुल्फा दिलदिया कुलफा जी, दोऊ नैन है सतारे।
तेरे खूबी के दरस पै लाल, नयन तरसते हमारे।
पिया पिया करै पपीहरा रे, निशि दिन सो याद तेरी।
मेरे सांवले सलोने मोहन, आसा दर्शन केरी।
घायल फिरूँ दरसण की, पीर जाने नही कोई।
मोंहि लागी चोट प्रेम की, जिन लाई जानै सोई।
वियोगाभिव्यक्ति ६३
जैसे जल के सोखे हुए मीन क्या जीवै बिचारै।
कृपा कीजो दरसण दीजो, मीर माधो नन्द दुलारे।
(पद ४६९, पृष्ठ १२०)
मीराँ के पद सभी गेय परम्परा से प्राप्त हैं। अतः परिस्थिति
दखते उपर्युक्त पद को 'मीर माधो' के पद का ही गेय रूपांतर मानना
अयुक्तियुक्त न होगा।
९
घर आवो जी साजन मिठबोला१ ।
तेरे खातर सब कुछ छोडा, काजर तेल तमोला।
जो नहि आवै रैण बिहावै, छिन मासा छिन तोला।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, कर धर रही कपोला ॥९०॥
इस पद से गहरा साम्य रखता हुआ एक पद स० ३३ राजस्थानी
मे भी पाया जाता है।
१०
तुम आज्यो जी रामा, आवत आस्या सामा।
तुम मिलिया मै बहुत सुख पाऊ, सरै२ मनोरथ कामा।
तुम बिच हम बिच अतर नाही, जैसे सूरज घामा।
मीराँ मन के और न मानै, चाहे सुन्दर स्यामा ॥ ९१ ॥
११
उड जा रे कागा बनका, मेरा स्याम गया बोहो दिन कारी।
तेरे उडास्यूं राम मिलेगा, धोखा भागै मन का रे।
इत गोकुल उत मथुरा नगरी, हरि है गाढ़े दिल्का रे।
१ मधुर भाषी २ पूर्ण हो । *
६४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
आप तो जाय विदेसा छाये, हम वासी मधुवन का रे।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, चरण कँवल हरिजन का रे ॥९२॥†
पदाभिव्यक्ति मे संगति नही है।
९२
गोविन्द, कबहुँ मिलै पिया मोरा।
चरण कँवल कूँ हँसि हँसि देखूँ, राखूँ नैणां नेरा१।
निरखण कूँ मोहि-चाव घणेरो, कब देखूँ मुख तेरा।
व्याकुल प्राण धरत न धीरज, मिलि तू नित सबेरा२।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, ताप तपन बहुतेरा ॥ ९३ ॥
पदाभिव्यक्ति से 'गोविन्द' और 'पिया' की दो विभिन्न हस्तियाँ
स्पष्ट हो उठती है। यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और विचारणीय
प्रश्न है।
९३
भीजै म्हाँरो दावण चीर, सावणियो लूम रहियो के।
आप तो जाय विदेसाँछाये, जिवणो धरत न धीर।
लिख लिख पतियाँ संदेशा भेजूँ, कब घर आवै म्हाँरो पीव।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, दरसन द्यो नै बलवीर ॥९४॥
९४
म्हाँरे घर आओ, स्याम, गोठडी३ कराइये।
आनन्द उछाव करूँ, तन मन भेट धरूँ।
मै तो हूँ तुम्हारी दासी, ताँकूँ तो चितारियो।
गिगन४ गरजि आयो, बदरा बरसे भायो।
सारंग सबद सुनि ब्रिहन पुकारिये।
१ पास, नजदीक, २ शीघ्र, ३ गोष्ठी, ४ गगन, आकाश।
वियोगाभिव्यक्ति ६५
घर आवो स्याम मोरे, मैं तो लागूँ पाय तोरे ।
मीराँ को सरण लीजिये, बलि बलि हारिये । ।१९५।।
१५
साँइया, सुण जो अरजै हमारो ।
मया¹ करो महल्या पग धारो, मै खानाजाद तुम्हारी ।
तुम बिन प्राण दुखी दुख मोचन, सुधि बुधि सबै बिसारी ।
तलफ तलफ उठि उठि मग जोऊ, भई ब्याकुलता भारी ।
सेज सिंघ ज्यूँ लागी प्राण कूँ, निस भुजग भई भारी ।
दीषग मनहूँ दूहूँ दिसि लागी, बिरहिन जरत बिचारी ।
जब के गये अजहूँ नही आये, विलम्बे कहा मुरारी ।
मीराँ के प्रभु दरसन दीजो, तुम साहेब हम नारी ।।९६।।
१६
हरि म्हारी सुणजो अरज म्हाराज ।
मै अबला बल नाहि गुसाईं, राखो अबके लाज ।
रावरी होइ के कणी रे जाऊ, है हरि हिवडारो साज ।
हम को वपु हरि देत सधार्यो, साद्यो देवन के काज ।
मीराँ के प्रभु और न कोई, तुम मेरे सिरताज । ।१९७।।
पद की तृतीय पक्ति अर्थहीन है। इस पक्ति का शेष पद से
पूर्वापर सबध भी नही बैठता।
१७
कैसी रितु आई मेरी हियो लरजे, है मा ।
निस अधियारी कारी, बिजरी चमकै, सेज चढता² जिया डरपै,
हे मा।
१ दया, २ चढते हुये ।
५
६६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
नान्ही बूँदन मेहा बरसै, ऊपर से सुरपति गरजै, हे मा।
सूनी सेज स्याम बिन लागत,कूक उठी पिया पिया करि के,हे मा।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मोय¹ विधाता क्यूँ सरजी², हे मा।
॥९८॥
१८
ऐसी ऐसी चादनी मे पिया घर नाईं।
चार पहर दिन सोचत बीत्या, तडपत रैन बिहाई।
मै सूती पिया अपने महल मे, खालूडा³ मे आई सरदाई४।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरख निरख गुण गाई ॥९९॥†
पद मे पूर्वापर सबंध का सर्वथा अभाव है। पद की तीसरी पंक्ति
सर्वथा अर्थहीन है। अभिव्यक्ति मे भी कोई गम्भीरता नही। ऐस
पदो को प्रक्षिप्त मान लेना ही युक्तियुक्त प्रतीत होता है।
१९
मोसी दुखियाँ कूँ, लोग सुखिया कहत है।
ऐसो री अड़ीलो कथ, दियो है विधाता मोकूँ।
सेजहूँ न आवै प्यारो, न्यारौ ही रहत हं ।
तारा तो अगारा भया, सेज भई भाषा सी।
पिया को पिलंगू मानो, आगि जूं रहत है।
जारे बारे बाष में तो, भीतर बेहाल भई।
बिरह की करवत, मेरे हिया में बहत है।
द्यौस५ तो यूँ ही गयौ, रैनिहू बिहानी है।
मीराँ तो बेहाल भई, दरस कूँ चहात है। ॥१००॥†
१ मुझको, २ सृजन किया, बनाया, ३ कमरा, ४ ठंड, ५ दिन,
वियोगाभिव्यक्ति ६७
ऐसे पदो को प्रक्षिप्त ही मान लेना युक्ति सगत प्रतीत होता है,
क्योकि इसकी अभिव्यक्ति मे वह भाव भाषा का गाम्भीर्य नही, जो
मीराँके पदो की विशेषता है। इसमे क्रिया-पद विशेष विचारणीय है।
२०
रसभरिया म्हाराज मोकूँ, आप सुनाई बाँसुरी।
सुनत बाँसुरी भइ बावरी, निकसन लग्या साँस री।
रकतर रती भर ना रह्योरी, नही मास भर माँस री।
तन तिनकासो है गयो री, रही निगोरी साँस री।
मै जमुना जल भरन जात ही, सास नन्द की भास री।
मीराँ कूँ प्रभु गिरिधर मिल गयो,पूजो मनकी आस री॥१०१॥†
अभिव्यक्ति के आधार पर पद की प्रामाणिकता सर्वथा संदिग्ध है।
२१
प्यारी हट माँड्यो¹ माँझल² रात।
कब की ठाढी अरज करत हूँ, होई जासी परभात ।
तलफत तलफत बोहो दिन बीते, कबहूँ न बूझी बात ।
जब के गए म्हारी सुध नाहि लीनी, तुम बिन फीको म्हारो गात ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, कर मीड़त पछितात ॥१०२॥†
उपर्युक्त पद के विषय मे श्री सूर्यनारायण जी चतुर्वेदी लिखते
है, "पूर्वापर असबद्ध सा ज्ञात होता है। यदि "प्यारी" के स्थान पर
"प्यारा" होता तो असबद्ध नही था।"
मेरे विचार मे पद की पूर्वापर असबद्धता हर हालत मे बनी
रहती है, क्योकि प्रथम दो पक्तियो से मिलन और शेष पद से
वियोग ही लक्षित होता है। ऐसे पदो को प्रामाणिक सग्रह मे स्थान
न मिलना ही युक्तियुक्त प्रतीत होता है।
१ किया, २ बीच ।
६८ · मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
२२
लाग रही ओसेर१ कान्हा, तेरी लाग रही ओसेर।
दरसण दीजे, कृपा कीजे, कहाँ लगाई बेर ।
दिन मे नही चैन, रैन नही निद्रा, बिरह बिथा लई घेर ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सुण जो म्हारी टेर । ॥१०३॥
२३
माधो बिन बसती उजार मेरे भावै२।
एक समै मोतियन के धोके, हसा चुगत जुवार ।
सरवर छोड़ तलैया बैठे, पख लपट रही गार।
सरवर सूख तरवर कुम्हलाये, हसा चले उड़ार ।
मीराँ के प्रभु मिलोगे, लाम्बी भुजा पसार ॥१०४॥†
पदाभिव्यक्ति अर्थहीन और असंगत है।
२४
दासी म्हारा मारुड़ा मारु३ जी से कहना।
मोय नीद न आवै नैना।
जे मेरा गोविन्द दूर बसत है, मोय सदेशो देना।
जे मेरा गोविन्द गली देखे, सनक४ सनक सुन लेना।
जे मेरा गोविन्द बैन५ बजावै, प्रेम मगन होय कहना।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कवल चित देना ॥१०५॥†
श्री सूर्यनारायण चतुर्वेदी जी इस पद के विषय मे लिखते है,
“मारुडा” के स्थान मे स्यात् “भुजरा” होगा। लिपि दोष से अथवा
अन्य किसी दोष से अपभ्रंश हुआ ज्ञात होता है।”
१ हुसेर, याद, २ लगती है, ३. पति, ४ धैर्य सहित, ५ वेणु।
वियोगाभिव्यक्ति ६९
श्री चतुर्वेदी जी का कहना बहुत यथार्थ प्रतीत होता है, क्योकि
"मारु" और "मारुडा" दोनो एक ही शब्द है । "मारूड़ा" कोई स्वतंत्र
शब्द न होकर "मारु" का ही रूपान्तर मात्र है। अपने बुजुर्गो या अन्य
किसी भी विशेष सम्मानित व्यक्ति के प्रति 'मुजरौ" विनम्रता पूर्वक
नमस्कार के अर्थ मे आज भी प्रयुक्त होता है ।
२५
तुम हयाँ ही रहो राम रसियाँ, थांरी साँवरी सूरत मे मन बसिया ।
क्याने तो राम जी घोडा सिणगारो, क्या ने पाषर कसिया।
चुण चुण कलियाँ सेज सँवारु, ओर गादी तकिया ।
बोहोत दिना की पंथ निहारूँ, तुम आया रग रञ्चिया ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, चरण कमल म्न बसिया ।। १०६।।†
पदाभिव्यक्ति असगत है ।
२६
नेहा समद बिच नाव लगी है, बाल न लगत बही जात अकेली ।
लाज को लगर छूटि गयो है, बही जात बिन दाम की चेरी ।
मलहन कर से छाड दई है, आस बडी गोपाल ज्यो तेरी ।
अब के नाम लगावो नातर, लोग हँसेगे बजा के हतेरी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मेरी सुध लीज्यो प्रभु आन सबेरी ।।१०७।।†
पदाभिव्यक्ति असगत है। प्रथम पक्ति मे 'बाल' के स्थान पर
सम्भवतः 'पाल' शब्द हो ।
२७
माई म्हाने मोहन मित्र मिलाय, मोहन मित्र मिलाय ।
रसियो है उर अंतर बसियो, या बिनु कछु न सुहाय ।
पात लियो¹ साँवरियो लोभी, राखूं कठ लगाय ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तन की तपत बुझायं । ।।१०८।।
१ सुगठित शरीरवाला।
७० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
२८
मे खडी निहारू बाट, चितवन चोट कलेजे बह गई, सुन्दर स्याम सूं घाट।
मथुरा मे कुबज्या कर राखी, महाजन की सी हाट।
केसर चदन लेपन कीन्हो, मोहन तिलक ललाट।
हमारा पिलैंग जडाऊ छोड् या, बणिया¹ रेशमी पीली पाट।
क्याँ पर राजी भयो साँवरो, चेरी के नही खाट।
अजहूँ न आयो कँवर नन्द को, क्यॉरी लागी चाट।
छाड गयो मरुधार साँवरो, बिन अकल को जाट²।
आप बिना गोपी सब ब्रज की, व्याकुल भई निराट।
मीराँ के प्रभु गोपी दरसन दीज्यो, करज्यो आनन्द ठाट। ॥१०९॥†
२९
उधो, म्हाँरे मन की मन मे रही।
एक समै मोहन घर आये, मे दधि मथत रही।
या दुनियाँ को झूठो धधो, मै हरि को बिसर गई।
वा कपटी की का कहूँ, उधो बचन प्रतीत नही।
नेन हमारे ऐसे झूरै, उलटी गंग बही।
इत गोकुल उत मथुरा नगरी, बीच मे जमुना बही।
आप मोहन जी पार उतर गया, हम सै कछु ना कही।
ब्रज बनिता को संग छाडि कै, कुबज्याँ सग लई।
मीराँ के प्रभु गिरिधर अविनासी, चरणा लिपट रही। ॥११०॥
अभिव्यक्ति असगत और अर्थहीन है।
३०
तुम आवो हो कृपा निधान बेग ही।
मेरे मदिर आये प्रभु निकसे, कदी³ महलहूँ न आये मै दीदार देख री।
१ बना हुआ, २ राजस्थान की स्थानीय जाति विशेष, जो परिश्रम और सत्यता
के लिये प्रसिद्ध होते हुए भी सर्वथा बुद्धिहीन मानी जाती हैं। ३ कभी।
वियोगाभिव्यक्ति ७१
मेरे मंदिर आये प्रभु निकसि क्यूँ गये, दीन के दयाली कठोर क्यूँ भये ।
दीपक मेरे हाथ लियों बाट जोवती, राम हूँ न आये सारी रैण रोवती ।
पिया के दरस बिन फिरु डोलती, मीराँ तो तुम्हारी दासी राम बोलती ।
॥१९१॥†
पदाभिव्यक्ति सर्वथा असंगत है। कही कही द्वितीय पंक्ति मे
‘कदी’ शब्द के बदले ‘देख ही’ और अन्तिम पंक्ति मे “डोलती’ शब्द
के बदले ‘झूरती’ का प्रयोग भी मिलता है।
३१
होली पिया बिन मोहि न भावै, घर आँगण न सुहावै ।
दीपक जोय¹ कहा करु सजनी, पिय परदेस रहावै ।
सूनी सेज जहर ज्यूँ लागे, सुसक सुसक जिय जावै ।
नीद नही आवै ।
कब की ठाढी मे मग जोऊँ, निस दिन बिरह सतावै ।
कहा कहू कुछ कहत न आवै, हिवडा अति अकुलावै ।
पिया कब दरस दिखावै ।
ऐसा है कोई परम सनेही, तुरन्त सन्देशो ल्यावै ।
वा बिरियाँ² कद³ होसी, मोकूँ हस करि निकट बुलावै ।
मीराँ मिल होली गावै । .॥१९२॥
प्रथम पति मे प्रयुक्त ‘पिया’ शब्द के बदले “हरी’ शब्द का भी
प्रयोग मिलता है।
३२
किण संग खेलूँ होली, पिया तजि गए हे अकेली ।
माणिक मोती हम सब छोडे, गले मे पहनी सेली॒ ।
१ जलाकर, २ समय, ३ कब,