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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

१७८ मयमतम्
(क) उत्सेधे विशिखांशिते द्वितयतो रूपोत्तरे वाजनम्
षड्भक्तेऽल्पमिलांशतो द्वितयतो वा स्यान्महावाजनम्।
एतन्निर्गमनं निजांशविहितं न्यसेदुपर्युत्तर-
स्यैतत्तीव्रसमुच्छ्रयोच्छ्रयदलांशव्यायतां पट्टिकाम्।।
( तन्त्रसमुच्चय-२.४५ )
यही श्लोक शिल्परत्न ( पूर्वभाग-२९.७ ) में प्राप्त होता है।
(ख) शिल्परत्न ( पूर्व., ३० अ. ३-४ ) में वाजन के प्रमाण के विषय में वर्णन
किया गया है।
(ग) मनुष्यालयचन्द्रिका ( अ. ५ ) में वाजन का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता
है—
एक एव यदि वाजनं भवत्युत्तरस्य शरभाजिते घने।
उच्चमंशयुगलेन निष्क्रमोऽप्यस्य पट्टमवशिष्टभागतः।।
अल्पवाजनयुतोत्तरे घने नागभागिनि महत् त्रिभागतः।
एकतोऽल्पमुभयोश्च निष्क्रमः स्वोच्चतो भवति पट्टमब्धिभिः।।
(५.३३-३४)
४. प्रस्तर का प्रमाण ( श्लोक-४८ )
प्रस्तर के मान के विषय में शिल्परत्न ( पूर्वभाग, ३० अ. ) का कथन है कि
इसका प्रमाण स्तम्भ की ऊँचाई का आधा या मासूर ( अधिष्ठान ) की ऊँचाई के मान
के अनुसार रखना चाहिये—
स्तम्भोत्सेधार्धमानं वा मासूरोत्सेधमात्रकम्।
प्रस्तरस्योच्छ्रयं कुर्यात् पादयोर्ध्वं विशेषतः।। (३०.१)
५. लेप ( श्लोक-४९ )
लेप के विषय में सुधा शब्द से शिल्परत्न ( पूर्व.-१४ अ. ) में अत्यन्त विस्तार
से वर्णन प्राप्त होता है। सुधा की पाँच प्रकृतियाँ हैं—
करालमुद्गीगुल्मासकल्काचिक्कणकाश्च याः।।५८।।
इनमें चिक्कण सुधा का उल्लेख मयमत में किया गया है। शिल्परत्न में यह इस
प्रकार वर्णित है—
चिक्कणं केवलं क्वाथं बद्धोदकमिति द्विधा।।६३।।
∗</L30> * * * * * *
क्षीरद्रुमामलाक्षाणां कदम्बाभययोरपि।।६५।।

षोडशोऽध्यायः 卐 प्रस्तरकरणम् १७९
त्वग्जलैस्त्रिफलातोयं माषजूंषञ्च तत्समम्।
संयम्य शर्कराशुक्त्योश्चूर्णं तत्क्वाथवारिणि।।६६।।
खुरसंघट्टनं कृत्वा स्रावयित्वाथ वाससा।
चिक्कणं कल्पयेत्तेन बद्धोदमथ चोच्यते।।६७।।
दधिदुग्धं माषजूषैर्गुल्याज्यकदलीफलैः।
नालिकेराग्रफलयोर्जलैश्चैतत् प्रकल्पितम्।।६८।।
बद्धोदकं भवेत्तच्च समभागं नियोजयेत्।
लब्धचूर्णशतांशं तु क्षौद्रमंशद्वयं भवेत्।।६९।।
आज्यं तु कदलीपक्वं नालिकेराम्बुमाषयुक्।
क्षीराङ्गत्त्वक्कषायं च क्षीरं दधि ततो गुलम्।।७०।।
पिच्छिलं त्रिफलाम्भश्च त्र्यंशादिकमिदं क्रमात्।
अंशवृद्ध्या समायोज्य पूतपक्वाम्बुशक्तितः।।७१।।
एकीकृत्य करालं च प्रक्षिपेद् दृढवेष्टितम्।
अतीत्यैकदिनं पश्चादथैव घनतां भवेत्।।७२।।
(ख) बृहत्संहिता ( ५७ अ. वज्रलेपाध्याय ) में वज्रलेपों का वर्णन इस प्रकार
प्राप्त होता है—
१. आमं तिन्दुकमानं कपित्थकं पुष्पमपि च शाल्मल्याः।
बीजानि शल्लकीनां धन्वनवल्को वचा चेति।।
एतैः सलिलद्रोणः क्वाथयितव्योऽष्टभागशेषश्च।
अवतार्योऽस्य च कल्को द्रव्यैरेते समनुयोज्यः।।
श्रीवासकरसगुग्गुलभल्लातककुन्दुरुक्सर्जरसैः ।
अतसीबिल्वैश्च युतः कल्कोऽयं वज्रलेपाख्यः।। (१-३)
२. लाक्षाकुन्दुरुगुग्गुलुगृहधूमकपित्थबिल्वमध्यानि ।
नागफलनिम्बतिन्दुकमदनफलमधूकमञ्जिष्ठा ।।
सर्जरससामलकानि चेति कल्कः कृतो द्वितीयोऽयम्।
वज्राख्यः प्रथमगुणैरयमपि तेष्वेव कार्येषु।। (५-६)
३. वज्रतल संज्ञक लेप इस प्रकार है—
गोमहिषाजविषाणैः खररोम्णा महिषचर्मगव्यैश्च।
निम्बकपित्थरसैः सह वज्रतलो नाम कल्कोऽन्यः।। (७)
४. वज्रसङ्घात संज्ञक लेप इस प्रकार निर्मित होता है—

१८० मयमतम्
अष्टौ सीसकभागाः कांस्यस्य द्वौ तु रीतिकाभागः ।
मयकथितौ योगोऽयं विज्ञेयो वज्रसंघातः ।। (८)
६. भित्ति
(क) शिल्परत्न (पूर्व. २१ अ.) में पाँच प्रकार की—शिलानिर्मित, इष्टकानिर्मित,
जालक-(जाल)-निर्मित, फलकनिर्मित एवं मृत्तिकानिर्मित भित्तियों का वर्णन प्राप्त
होता है—
तत् कुड्यं पञ्चधा प्रोक्तं तत्तद्द्रव्यविशेषतः ।।
शिलामयं चेष्टकं च जालकामयमित्यपि ।
फलकामयमप्येतन्मृण्मयं च परं पुनः ।। (९-१०)
(ख) वास्तुविद्या (१५ अ.) में शिला, मृत्तिका एवं काष्ठनिर्मित भित्तियों का
वर्णन प्राप्त होता है—
शिलया च मृदाप्यथवा तरुणा रचयेदथ कुड्यमतीव दृढम्। (१)
इसकी 'लघुविवृति' टीका (त्रिवेन्द्रम् १९४० में प्रकाशित, पृ. १८६) में चौदह
प्रकार के भित्ति-निर्मित गृहों का वर्णन प्राप्त होता है—
गृहं तु विविधं प्रोक्तं शरीरैस्तु पृथग्विधैः ।
पाषाणैर्निचितं यच्च तद् गृहं मन्दिरं स्मृतम् ।।
पक्वेष्टकं वास्तुनाम भवनं हितमुत्तमम् ।
आमेष्टकं सुमन्तं तु सुधारं कर्दमेन तु ।।
मानस्यं वर्धितं काष्ठैर्वेणुभिर्नन्दनं स्मृतम् ।
वस्त्रैश्च विजयं प्रोक्तं राज्ञां शिल्पिविकल्पितम् ।।
कालिनामेति विज्ञेयमष्टमं तृणजातिभिः ।
उत्तमानि तु चत्वारि गृहाणि गृहमेधिनाम् ।।
सौवर्णं राजतं ताम्रमायसं च प्रकीर्तितम् ।
सौवर्णं पुष्करं नाम राजतं श्रीभवं तथा ।।
ताम्रेण सूत्रमन्तं तु चण्डनाम तथायसम् ।
देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसकिन्नरैः ।।
द्वादशैते प्रकारास्तु ग्रहाणां नियताः स्मृताः ।
जातुषं त्वानिलं नाम त्रापुषं वारिबन्धनम् ।।
एवञ्जातिषु सर्वासु गृहाणि च चतुर्दश ।

अथ सप्तदशोऽध्यायः
( सन्धकर्मविधानम् )
पार्श्वगस्थितशयितद्रव्याणां सन्धिरुच्यते ।
एकस्मिन् वस्तुनि द्रव्यैर्बहुभिश्च निघट्टनात् ॥१॥
दुर्बलत्वाद् द्रुमाग्राणामबले बलवर्धनात् ।
सन्धकर्म प्रशस्तं स्यात् सजातीयैर्वरद्रुमैः ॥२॥
सन्धिकार्य का विधान—पार्श्व में खड़े एवं लेटे ( ऊर्ध्वाधर एवं क्षैतिज
स्थिति ) पदार्थों की सन्धि होती है। एक वस्तु ( के निर्माण ) में बहुत वस्तुओं के
संयोग से, वृक्ष के अग्र भाग ( के काष्ठों ) की दुर्बलता के कारण, दुर्बल के बलवृद्धि
के कारण सन्धकर्म प्रशस्त होता है। समान जाति वाले वृक्षों ( कोष्ठों ) का सन्धकर्म
प्रशस्त होता है।।१-२।।
✺ सन्धिभेदाः ✺
मल्ललीलं तथा ब्रह्मराजं वै वेणुपर्वकम् ।
पूकपर्वं देवसन्ध्दिण्डिका षड्विधाः स्मृता ॥३॥
सन्धि के भेद—सन्धियाँ छः प्रकार की होती हैं—मल्ललील, ब्रह्मराज, वेणु-
पर्वक, पूकपर्व, देवसन्धि एवं दण्डिका।।३।।
✺ सन्धिविधिः ✺
चतुर्दिक्षु बहिः स्थित्वा निरीक्ष्य स्थपतिर्गृहम् ।
दक्षिणादक्षिणे दीर्घादीर्घाभ्यां सन्धयेत् क्रमात् ॥४॥
जोड़ने की विधि—स्थपति घर के बाहर खड़े होकर चारो दिशाओं से उसका
निरीक्षण करे। तत्पश्चात् दक्षिण को उत्तर से एवं दीर्घ ( लम्बाई ) को अदीर्घ ( छोटी
लम्बाई ) से क्रमशः जोड़े।।४।।
मध्ये च दक्षिणे चैव यः सन्धिं कर्तुमीहते ।
मध्येऽतिदीर्घं युञ्जीयाद् दीर्घमल्पं च पूर्ववत् ॥५॥
यदि मध्य एवं दक्षिण में सन्धि करना चाहते हों तो मध्य के अति दीर्घ को पूर्व
की भाँति छोटे दीर्घ से जोड़ना चाहिये।।५।।

१८२ मयमतम्
वामेऽवामे समद्रव्यं मध्ये दीर्घमथापि वा ।
मध्यद्रव्यं विना वामेऽवामे द्रव्यं समं तथा ॥६॥
अथवा वाम भाग एवं दक्षिण भाग में समान माप के द्रव्य हों तथा मध्य में स्थित
पदार्थ दीर्घ हों तो उनमें सन्धि करनी चाहिये। यदि मध्य का पदार्थ न हो तथा दोनों
ओर समान माप के द्रव्य हों तो भी सन्धि करनी चाहिये।।६।।
एतत्सन्धिं बहिः कुर्यात् तथैवाभ्यन्तरे विदुः ।
स्थपतिर्हृदयस्थाने स्थित्या प्रेक्ष्य चतुर्दिशि ॥७॥
इस प्रकार गृह के बाहरी भाग की सन्धि करनी चाहिये। भीतरी भाग की सन्धि
के लिये गृह के मध्य स्थान में खड़े होकर स्थपति को चारो दिशाओं का निरीक्षण
करना चाहिये। जिस प्रकार बाहरी भाग की सन्धि होती है, उसी प्रकार भीतरी भाग
की भी सन्धि होती है।।७।।
दीर्घमल्पं समद्रव्यं पूर्ववत् परिकल्पयेत् ।
आधाराधेयनीत्यैव द्रव्यसन्धानमूह्यताम् ॥८॥
दीर्घ, छोटे एवं समान माप के द्रव्यों की सन्धि पूर्ववर्णित विधि से करनी चाहिये।
आधार एवं आधेय के नियम ( दीर्घ का अल्प दीर्घ से, दीर्घ को मध्य में रखकर सम
माप की सन्धि आदि ) का पालन करते हुये पदार्थों को जोड़ना चाहिये।।८।।
मूले मूलं न युञ्जीयादग्रे चाग्रं तथैव च।
मूलाग्रद्रव्ययोगेन सन्धिकर्म सुखप्रदम् ॥९॥
मूलं हि शयितञ्चाधश्चाग्रमूर्ध्वं तु योजयेत् ।
किसी पदार्थ के मूल को मूल से एवं अग्र भाग को अग्र भाग से नहीं जोड़ना
चाहिये। मूल एवं अग्र भाग को जोड़ने से सन्धिकार्य सुखद होता है। मूल भाग को
नीचे लिटा कर रखना चाहिये एवं उसके ऊपर अग्र भाग को जोड़ना चाहिये।।९।।
✺ मल्ललीलादिसन्धयः ✺
द्विद्रव्यमेकसन्धिः स्यान्मल्ललीलमिति स्मृतम् ॥१०॥
त्रिद्रव्यैस्तु द्विसन्धिः स्याद् ब्रह्मराजमितीरितम् ।
चतुर्भिः पञ्चभिर्द्रव्यैस्त्रिचतुः सन्धयः क्रमात् ॥११॥
दो द्रव्यों को जोड़ कर एक सन्धि होती है। इसे मल्ललील कहा गया है। तीन
पदार्थों को जोड़ने से दो सन्धियाँ बनती हैं। इसे ब्रह्मराज कहते हैं। चार एवं पाँच
पदार्थों के योग से क्रमशः तीन एवं चार सन्धियाँ होती हैं।।१०-११।।

सप्तदशोऽध्यायः 卐 सन्धिकर्मविधानम् १८३
वेणुपर्वमिति प्रोक्तं तैतलानां नृणां गृहे।
षड्भिस्तु सप्तभिर्द्रव्यैः सन्धयः पञ्च षट् क्रमात् ॥१२॥
(तीन एवं चार सन्धियों को) वेणुपर्व कहते हैं। यह देवालय एवं मनुष्यों के
गृहों में होता है। छः एवं सात पदार्थों के योग से पाँच एवं छः सन्धियाँ बनती हैं॥१२॥
पूकपर्वेति तत् प्रोक्तं धनधान्यकरं स्मृतम्।
अष्टाभिर्नवभिर्द्रव्यैः सन्धयः सप्त वाऽष्टधा ॥१३॥
(उपर्युक्त सन्धियों को) पूकपर्व कहा गया है; साथ ही इसे धन-धान्य प्रदान
करने वाला कहा गया है। आठ एवं नौ पदार्थों के योग से सात एवं आठ सन्धियाँ
निर्मित होती हैं॥१३॥
देवसन्धिरिति प्रोक्तः सर्ववासेषु योग्यतः।
बहुसन्धिर्बहुद्रव्यैर्दीर्घमल्पं च पूर्ववत् ॥१४॥
दण्डिकेति समाख्याता धनधान्यसुखप्रदा।
(पूर्वोक्त सन्धियों को) देवसन्धि कहते हैं। यह सभी प्रकार के गृहों के अनुकूल
होती है। बहुत-से पदार्थों से बहुत-सी सन्धियाँ निर्मित होती हैं। इनमें दीर्घ एवं अल्प
दीर्घ (कम लम्बा) के संयोग का नियम पहले की भाँति ही लगता है। इस सन्धि
को दण्डिका कहा गया है। यह सन्धि धन, धान्य एवं सुख प्रदान करती है॥१४॥
❋ सर्वतोभद्रसन्धिः ❋
दक्षिणापरभागे तु द्रव्यमूलं प्रशस्यते ॥१५॥
अग्रमग्रं तथैशान्ये तेषां बन्धनमुच्यते।
आधारं प्रथमं प्राच्यां मूलाग्रच्छेदनान्वितम् ॥१६॥
दक्षिणोत्तरयोरग्रं तस्योपरि निधापयेत्।
दक्षिणोत्तरयोर्मूलमूर्ध्वच्छेदनसंयुतम् ॥१७॥
पश्चिमस्थमधश्छेदं क्षेप्यमाधेययोगतः।
एतत्तु सर्वतोभद्रमवागादि तथा विदुः ॥१८॥
(सर्वतोभद्र सन्धि में) दक्षिण एवं अपर भाग (दक्षिण-पूर्व) में पदार्थ का मूल
रखना प्रशस्त होता है; साथ ही इसका ऊर्ध्व भाग ईशान कोण में होना चाहिये। अब
इनके बन्धन का उल्लेख किया जाता है। प्रथम आधार पूर्व दिशा होती है, जहाँ मूल
एवं अग्र छेद से युक्त पदार्थ रक्खा जाता है। उसके ऊपर दक्षिण एवं उत्तर में अग्र
भाग से युक्त पदार्थ रक्खा जाता है। इनके मूल भाग एवं ऊर्ध्व छेद से युक्त अग्र भाग

१८४ मयमतम्
संयुक्त होते हैं। पश्चिमी दिशा में रक्खे पदार्थ का छेद नीचे की ओर रखना चाहिये एवं
इसे आधेय होना चाहिये। इस प्रकार दक्षिण से प्रारम्भ होने वाला यह संयोग ( सन्धि )
सर्वतोभद्र संज्ञक होता है।।१५-१८।।
✺ नन्द्यावर्तसन्धिः ✺
नन्द्यावर्तविधानेन नन्द्यावर्तं प्रकल्पयेत् ।
दक्षिणोत्तरगं दीर्घं दक्षिणे तु सकर्णकम् ।।१९।।
नन्द्यावर्त सन्धि नन्द्यावर्त आकृति के अनुसार बनाई जाती है। दक्षिण से उत्तर
की ओर जाने वाली लम्बाई में दक्षिण दिशा में निकला भाग कर्णकयुक्त होता है।।१९।।
प्राक्प्रत्यग्गतमायामं पश्चिमे तु सकर्णकम् ।
दक्षिणोत्तरगं दीर्घमुत्तरे तु सकर्णकम् ।।२०।।
पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाले आयाम ( लम्बाई ) का कर्णक पश्चिम में होता
है। दक्षिण एवं उत्तर की लम्बाई ( सन्धि के दूसरी ओर ) में उत्तर दिशा में कर्णक
होता है।।२०।।
पूर्वपश्चिमगं दीर्घं पूर्व्यां तु सकर्णकम् ।
आधाराधेयनीत्यैव पूर्वांदीनि च विन्यसेत् ।।२१।।
नन्द्यावर्तमिदं तद्वदवागादीनि च क्रमात् ।
पूर्व एवं पश्चिम की ( दूसरी दिशा में ) लम्बाई में पूर्व दिशा में कर्णक होता है।
आधार एवं आधेय नियम के अनुसार पूर्व आदि में इस प्रकार रखना चाहिये। इस
नन्द्यावर्त सन्धि को दक्षिणक्रम से करना चाहिये।।२१।।
✺ स्वस्तिबन्धसन्धिः ✺
पक्षयोर्बहुभिर्द्रव्यैर्दीर्घं प्रागुदगग्रकम् ।।२२।।
सशिखैश्च बहुद्रव्यैर्द्वाभ्यां वा तिर्यगग्रकम् ।
स्वस्त्याकृतिसमायुक्तं स्वस्तिबन्धनमिष्यते ।।२३।।
जब पूर्व-उत्तर की ओर शीर्ष भाग वाले दीर्घ से बहुत से पदार्थ जुड़ते हैं, जब
तिरछे अग्र भाग वाले दीर्घ से दो या बहुत से पदार्थ शिखाओं ( चूलों ) से जुड़ते हैं
एवं यह योग यदि स्वस्तिक की आकृति का होता है तो इसे स्वस्तिबन्ध सन्धि कहते
हैं।।२२-२३।।
✺ वर्धमानसन्धिः ✺
परितो बहुभिर्द्रव्यैर्युक्तं तद्दत्तदन्तरे ।
मध्येऽङ्गणसमायुक्तं बाह्ये युक्त्या सभद्रकम् ।।२४।।

सप्तदशोऽध्यायः 卐 सन्धिकर्मविधानम् १८५
जब चारो ओर बहुत से पदार्थों का संयोग होता है एवं इसी प्रकार भीतर भी होता
है तथा मध्य भाग में आँगन जैसी आकृति होती है तो बाह्य भाग से युक्त यह आकृति
सभद्रक होती है।।२४।।
पूर्वद्रव्यं परद्रव्यं भद्रकं दक्षिणोत्तरम् ।
शालानां भित्तिमाश्रित्य युक्त्या साधु समाचरेत् ॥२५॥
एवं युञ्ज्यादिदं बन्धं वर्धमानमितीरितम् ।
अधोभूमिक्रियायुक्त्या स्यादूर्ध्वोर्ध्वतलं प्रति ॥२६॥
पूर्व दिशा का पदार्थ दक्षिण की ओर एवं पश्चिम दिशा का पदार्थ उत्तर की ओर
कक्षों की भित्ति का आश्रय लेते हुये उचित रीति से रखते हुये जोड़ना चाहिये। इस
बन्ध को वर्धमान कहते हैं। निचले तल के कार्य के अनुसार ऊपर एवं उसके ऊपर
के तल में भी करना चाहिये।।२५-२६।।
विपरीतं विपत्त्यै स्यादिति शास्त्रविनिश्चयः ।
दीर्घादीर्घेषु संयोगद्रव्यसन्धानतर्पणम् ॥२७॥
इसके विपरीत करने से विपत्ति आती है, ऐसा शास्त्रों का मत है। दीर्घ एवं अदीर्घ
( कम लम्बा ) का संयोग पदार्थों का विधिवत् परीक्षण एवं निरीक्षण करके ही करना
चाहिये।।२७।।
यथाबलं यथायोगं तथा योज्यं विचक्षणैः ।
एवं विधिविशिष्टं स्यात्सम्पत्त्यै द्रव्यबन्धनम् ॥२८॥
जिस स्थान पर जितने बल की एवं जिस प्रकार के योग ( सन्धि, जोड़ ) की
आवश्यकता हो, वहाँ उसी प्रकार की सन्धि का प्रयोग बुद्धिमान ( स्थपति ) को करना
चाहिये। इस प्रकार विशेष विधि से की गई सन्धि सम्पत्तिकारक होती है।।२८।।
✹ सन्धिभेदाः ✹
मेषयुद्धं त्रिखण्डं च सौभद्रं चार्धपाणिकम् ।
महावृत्तं च पञ्चैते स्तम्भानां सन्धयः स्मृताः ॥२९॥
सन्धि के भेद—स्तम्भों की पाँच प्रकार की सन्धियाँ इस प्रकार कही गई हैं—
मेषयुद्ध, त्रिखण्ड, सौभद्र, अर्धपाणिक एवं महावृत्त।।२९।।
षट्शिखा झषदन्तं च सूकरघ्राणमेव च ।
सङ्कीर्णकीलं वज्राभं पञ्चैव शयितेष्वपि ॥३०॥
( खड़ी स्थिति की सन्धियाँ पूर्ववर्णित हैं ) लेटी स्थिति ( अथवा क्षैतिज ) की

१८६ मयमतम्
पाँच प्रकार की सन्धियाँ इस प्रकार हैं—षट्शिखा, झषदन्त, सूकरघ्राण, सङ्कीर्णकील
एवं वज्राभ ।। ३० ।।
✺ स्तम्भसन्धयः ✺
स्वव्यासकर्णमध्यर्धद्विगुणं वा तदायतम् ।
त्र्यंशैकं मध्यमशिखं मेषयुद्धं प्रकीर्तितम् ॥ ३१ ॥
स्तम्भ की सन्धियाँ—जब सन्धि वाले पदार्थ का मध्य भाग चौड़ाई में स्तम्भ
के तीसरे भाग के बराबर एवं लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी अथवा ढाई गुनी हो तो इसे
मेषयुद्ध सन्धि कहते हैं।।३१।।
स्वस्त्याकारं त्रिखण्डं स्यात्सत्रिचूलि त्रिखण्डकम् ।
पार्श्वे चतुःशिखोपेतं सौभद्रमिति संज्ञितम् ॥३२॥
त्रिखण्ड सन्धि स्वस्तिक के आकार की होती है। इसके तीन भाग एवं तीन
चूलियाँ होती हैं। पार्श्व में चार शिखा ( चूली ) से युक्त सन्धि सौभद्र कहलाती
है।।३२।।
अर्धं छित्त्वा तु मूलेऽग्रे चान्योन्याभिनिवेशनात् ।
अर्धपाणिरिति प्रोक्तो गृहीतघनमानतः ॥३३॥
जिस सन्धि के लिये स्तम्भ की मोटाई के अनुसार आधा भाग मूल ( निचले )
भाग का एवं आधा भाग अग्र ( ऊर्ध्व ) भाग का काटा जाता है, उसे अर्धपाणि सन्धि
कहते हैं।।३३।।
अर्धवृत्तशिखं मध्ये तन्महावृत्तमुच्यते ।
वृत्ताकृतिषु पादेषु प्रयुञ्जीत विचक्षणः ॥३४॥
जब चूलिका का आकार अर्धवृत्ताकार हो एवं मध्य भाग ( जहाँ जोड़ बैठाया
जाय ) में अर्धवृत्त हो तो उस सन्धि को महावृत्त कहते हैं। बुद्धिमान ( स्थपति )
स्तम्भों के वृत्ताकार भाग में इस सन्धि का प्रयोग करते हैं।।३४।।
स्तम्भानां स्तम्भदैर्घ्यार्धादधः सन्धानमाचरेत् ।
स्तम्भमध्योर्ध्वसन्धिश्चेद् विपदामास्पदं सदा ॥३५॥
स्तम्भों में की जाने वाली सन्धि स्तम्भों की लम्बाई के मध्य भाग के नीचे करनी
चाहिये। स्तम्भ के मध्य एवं उसके ऊपर यदि सन्धि हो तो वह सर्वदा विपत्ति प्रदान
करती है।।३५।।
कुम्भमण्ड्यादिसंयुक्तं सन्धानं सम्पदां पदम् ।
सालङ्कारे शिलास्तम्भे यथा योगं तथाचरेत् ॥३६॥

सप्तदशोऽध्यायः 卐 सन्धिकर्मविधानम् १८७
कुम्भ एवं मण्डि आदि से युक्त स्तम्भ की सन्धि ( उपर्युक्त दोनों की सन्धि )
सम्पत्ति-कारक होती है। सज्जा से युक्त प्रस्तर-स्तम्भ की सन्धि जैसी आवश्यकता
हो, उसके अनुसार करनी चाहिये ।। ३६ ।।
स्थितस्य पादपस्याङ्गप्रवृत्तिवशतो विदुः ।
ऊर्ध्वमूलमधश्चाग्रं सर्वसम्पद्विनाशनम् ।। ३७ ।।
खड़े वृक्ष के ( काष्ठों के ) विविध अङ्गों का संयोग अनुकूलता के अनुसार करना
चाहिये। ऊर्ध्व भाग का मूल भाग के साथ एवं निचले भाग के साथ शीर्ष भाग की
सन्धि सभी प्रकार की सम्पत्तियों का नाश करती है ।। ३७ ।।
✺ शयितसन्धयः ✺
अर्धपाणिद्विल्ललाटे लाङ्गलाकारषट्शिखा ।
घनमध्यस्थकीला या सा मता षट्शिखाह्वया ।। ३८ ।।
क्षैतिज सन्धियाँ—जिसके दोनों छोरों पर अर्धपाणि सन्धियाँ हों एवं सन्धि वाले
पदार्थ में छः लाङ्गल ( हल के ) आकार की शिखायें ( चूलें ) बनी हों, साथ ही मध्य
की कील मोटी हो, उस सन्धि को षट्शिखा सन्धि कहते हैं ।। ३८ ।।
स्वायामतिर्यग्बाहुस्थशिखं तु झषदन्तकम् ।
ऊर्ध्वाधस्ताद् यथायोग्यं यथाबलशिखान्वितम् ।। ३९ ।।
झषदन्तक सन्धि में पदार्थ के ऊपर एवं नीचे दोनों ओर बहुत-सी शिखायें होती
हैं। ये सभी शिखायें आवश्यकतानुसार एवं बल के अनुसार निर्मित होती हैं ।। ३९ ।।
सूकरघ्राणमित्युक्तं सूकरघ्राणसन्निभम् ।
यथाबलं यथायुक्ति नानाबलशिखान्वितम् ।। ४० ।।
सूअर की नाक के समान, आवश्यकतानुसार शक्ति एवं योग से युक्त, विभिन्न
बल की शिखाओं वाली सन्धि सूकरघ्राण कही जाती है ।। ४० ।।
नानाकीलैस्तु सङ्कीर्णं स्यात्तु सङ्कीर्णकीलकम् ।
वज्राकृतिशिखं नाम्ना वज्रसन्निभमेव तत् ।। ४१ ।।
विभिन्न प्रकार की कीलों से युक्त सन्धि को सङ्कीर्णकीलक कहते हैं। वज्रसन्निभ
सन्धि में वज्र के आकृति की शिखा होती है ।। ४१ ।।
एतस्मिन् पङ्क्तिसन्धाने सन्धिरेकाकृतिर्भवेत् ।
उपर्युपरि चैवं स्याद् विपरीते विपत्करम् ।। ४२ ।।
इस प्रकार एक पंक्ति को जोड़ने में ऊपर से नीचे तक एक ही आकार की सन्धि

१८८ मयमतम्
का प्रयोग करना चाहिये। इसके विपरीत सन्धि करने पर विपत्ति आती है।।४२।।
अन्तर्मूलं बहिश्चाग्रं पार्श्वद्रव्येषु योजयेत्।
अन्तरग्रं बहिर्मूलं स्वामिनश्च विनाशनम् ॥४३॥
(सन्धि करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि) मूल भाग भीतर की
ओर एवं अग्र भाग बाहर की ओर रहे। यदि अग्र भाग भीतर एवं मूल भाग बाहर रहता
है तो वह स्वामी के विनाश का कारण बनता है।।४३।।
✺ विद्धं कीलं च ✺
शिखा दन्तं च शूलं च विद्धं पर्यायमीरितम्।
शल्यं च शङ्कुराणिश्च कीलं पर्यायमुच्यते ॥४४॥
अष्टसप्तकषडंशकेऽङ्घ्रिके भागतारमथ शूलकीलयोः।
विद्ध एवं कील—शिखा, दन्त, शूल एवं विद्ध—ये सभी (चूली, चूल के)
पर्याय हैं तथा शल्य, शङ्कु, आणि तथा कील—ये सभी शब्द (कील के) पर्याय हैं।
शूल एवं कील का माप स्तम्भ की चौड़ाई का आठ, सात या छठवें भाग के बराबर
होता है।।४४।।
✺ सन्धिदोषाः ✺
कीलपार्श्वमथ पादमध्यमं योजयेत् समुदग्रबुद्धिमान् ॥४५॥
सन्धि के दोष—बुद्धिमान (स्थपति) को चाहिये कि कील का पार्श्व स्तम्भ के
मध्य में लगाये।।४५।।
स्तम्भान्तं दन्तान्तकं चेद्विनाशं
दन्तान्तं चेत् स्तम्भमध्यं तदेव।
स्तम्भान्तं चेत् सन्धिमध्यं सरोगं
सन्धेर्मध्यं पादमध्यं क्षयं स्यात् ॥४६॥
स्तम्भ का अन्तिम भाग एवं दन्त (शिखा, चूल) का अन्तिम भाग यदि आपस
में जुड़ें तो विनाश के कारण बनते हैं। इसी प्रकार यदि दन्त का अन्तिम भाग स्तम्भ
के मध्य में पड़े तो भी वही परिणाम होता है। यदि स्तम्भ का अन्तिम भाग सन्धि के
मध्य पड़े तो वह रोगकारक होता है तथा सन्धि का मध्य एवं पाद का मध्य यदि एक
साथ हो तो वह क्षय का कारण होता है।।४६।।
दिग्विदिग्द्वारदेवांशं सर्वं त्यक्त्वा प्रयोजयेत्।
अर्कार्किवरुणेन्दूनां स्थानं दिगिति कीर्तितम् ॥४७॥

सप्तदशोऽध्यायः 卐 सन्धिकर्मविधानम् १८९
दिक्, विदिक् एवं द्वार के देवताओं के सभी भागों को छोड़कर सन्धि का प्रयोग
करना चाहिये। अर्क ( सूर्य ), अर्कि ( यम ), वरुण एवं इन्दु देवों का स्थान दिक्
कहलाता है ( ये दिशायें क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवं उत्तर हैं )।४७।।
अग्निराक्षसवाय्वीशस्थानं विदिगिति स्मृतम्।
गृहक्षतश्च पुष्पाख्यो भल्लाटश्च महेन्द्रकः ।।४८।।
एतेषामंशकद्वारं तत्र सन्धिं न सन्ध्येत् ।
शल्यञ्च दन्तं त्यक्त्वैव पूर्वोक्तानाञ्च सम्मतम् ।।४९।।
अग्नि, राक्षस, वायु एवं ईश देवता का स्थान विदिक् ( कोण ) कहलाता है।
गृहक्षत, पुष्पाख्य, भल्लाट एवं महेन्द्र देवों का भाग द्वारभाग है। इन स्थानों पर सन्धि
नहीं करनी चाहिये। पूर्व-वर्णित स्थानों पर शल्य ( कील ) एवं दन्त ( चूल ) का
प्रयोग नहीं करना चाहिये ।।४८-४९।।
मध्यार्धमध्यमध्यं च त्यक्त्वा युञ्जीत बुद्धिमान् ।
द्रव्यमध्यस्थसूत्रस्य वामेऽवामे तु दन्तकम् ।।५०।।
इसी प्रकार दन्त का प्रयोग मध्य अथवा मध्यार्ध के मध्य ( चतुर्थांश भाग के
बिन्दु ) को छोड़ कर करना चाहिये। दन्त का प्रयोग पदार्थ के केन्द्र-सूत्र के दाहिने
एवं बाँयें भाग में करना चाहिये।।५०।।
द्रव्यविस्तारमध्यस्था शिखा शीघ्रविनाशिनी ।
अन्योन्यसन्धिविद्धं च शिखा कीलस्य वेधनम् ।।५१।।
पदार्थ के विस्तार के मध्य में स्थित शिखा ( चूल ) शीघ्र ही विनाश करती है।
शिखा के लिये निर्मित स्थान में कील लगाना तथा कील के स्थान में शिखा का प्रयोग
करना वेधन होता है।।५१।।
धर्मार्थकामसौख्यानां विपत्तिं नित्यमादिशेत् ।
वामदक्षिणयोगेन प्रतिसन्धिं परित्यजेत् ।।५२।।
( उपर्युक्त वेधन ) धर्म, अर्थ, काम एवं सुख का नाश करती है। बाँयें स्थान में
होने वाली सन्धि दाहिने एवं दाहिने स्थान की सन्धि बाँयें हो तो इसका ( प्रतिसन्धि
का ) परित्याग करना चाहिये।।५२।।
तारतीर्वान्तरस्थं यत् कल्प्यशल्यमिति स्मृतम् ।
पूर्ववद् विधिना सन्ध्यायाममध्ये तु योजयेत् ।।५३।।
पदार्थ की चौड़ाई के बराबर स्थान पर लम्बाई में हुई सन्धि कल्प्यशल्य कहलाती

१९० मयमतम्
है। पूर्ववर्णित विधि से पदार्थ के मध्य स्थान को छोड़ कर सन्धि करनी चाहिये॥५३॥
अज्ञानात् त्वरयानुक्तस्थाने वा योजयेद् यदि ।
सर्वेषामपि वर्णानां सर्वसम्पत्क्षयो भवेत् ॥५४॥
अज्ञानता अथवा शीघ्रता के कारण वर्जित स्थान पर यदि सन्धि की जाय तो सभी
वर्ण वाले गृहस्थों की सभी सम्पत्तियों का नाश होता है॥५४॥
पुराणैर्न नवद्रव्यैर्न पुराणैर्नवैरपि।
नवैर्नवानां द्रव्याणां योगो जीर्णैश्च जीर्णिनाम् ॥५५॥
पुराने पदार्थों की नये पदार्थ से तथा नये पदार्थों की पुराने पदार्थों के साथ सन्धि
नहीं करनी चाहिये। नये पदार्थों की नये से एवं पुराने पदार्थों का पुराने पदार्थ से सन्धि
करनी चाहिये॥५५॥
युक्त्यैव द्रव्यसन्धानं सम्पदामास्पदं सदा।
विपरीते विनाशाय भवेदेवेति निश्चयः ॥५६॥
उचित रीति से पदार्थों की सन्धि सम्पत्तिकारक होती है। इसके विपरीत करने से
निश्चय ही विनाश होता है॥५६॥
ऊर्ध्वद्रव्याणि सर्वाणि वाजनादीनि यान्यपि।
सशिखान्यशिखान्येतान्युक्त्या योज्यानि पूर्ववत् ॥५७॥
( स्तम्भ के ) ऊपर के सभी वाजन आदि पदार्थ शिखा के साथ अथवा विना
शिखा के पूर्ववर्णित विधि के अनुसार उचित रीति से जोड़ना चाहिये॥५७॥
पादोपरि भवेत् सन्धिरन्तरे नैव कारयेत् ।
ब्रह्मस्थलोर्ध्वगद्रव्यसन्धानं विपदां पदम् ॥५८॥
सन्धि स्तम्भ के ऊपर होती है। उनके मध्य में सन्धि नहीं करनी चाहिये।
ब्रह्मस्थल ( मध्य स्थान ) के ऊपर पदार्थों की सन्धि विपत्तिकारक होती है॥५८॥
ब्रह्मस्थानस्थितः स्तम्भः स्वामिनश्च विनाशनम्।
तुलादीन्युपरिद्रव्याणामत्र दोषो न विद्यते ॥५९॥
ब्रह्मस्थान पर स्थित स्तम्भ गृहस्वामी का विनाश करता है। तुला आदि यदि ऊपर
स्थित पदार्थ वहाँ पड़ें तो दोष नहीं होता है॥५९॥
पुंस्त्रीनपुंसकमहीरुहसन्धिकार्ये
पुंसा च पुंविहितमेव तथैव पुंस्त्री।
नैवोभयेन च नपुंसकस्सङ्गमः स्या-
ज्जात्यैकया शुभद उक्तविधिक्रमं वा॥६०॥

सप्तदशोऽध्यायः 卐 सन्धिकर्मविधानम् १९१
पुँल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग एवं नपुसंकलिङ्ग वृक्षों के काष्ठों के सन्धि की समय इस बात
का ध्यान रखना चाहिये कि पुरुष-काष्ठ से पुरुष-काष्ठ का एवं इसी प्रकार स्त्री-काष्ठ
से स्त्रीकाष्ठ का ही सन्धिकर्म हो। इनके साथ नपुंसक काष्ठ की सन्धि नहीं होनी
चाहिये। नपुंसक काष्ठ का सजातीय काष्ठ से संयोग होना चाहिये। एक जाति के
काष्ठों की सन्धि शुभ परिणाम देती है।।६०।।
एवं युक्त्या द्रव्यसन्धानयोगं प्रोक्तं नृणां तैतिलानां निवासे ।
युक्त्या युक्तं सम्पदामास्पदं तद्युक्त्यायुक्तं सर्वसम्पत्क्षयं स्यात् ॥६१॥
इस विधि से मनुष्यों एवं देवों के आवास में पदार्थों की सन्धि करनी चाहिये।
इस रीति से की गई सन्धि सम्पत्ति प्रदान करती है। इसके विपरीत रीति से हुई सन्धि
सभी सम्पत्तियों का नाश करती है।।६१।।
छिद्रं स्वल्पतरं विधेयमधुना दीर्घान्वितच्छेदं
स्थूलं काष्ठशिलेभदन्तमुदितं निम्नं हि पक्वेष्टकम् ।
पक्वं निर्गमनं सुधाभिरनिशं कुर्यात्तनुत्वं यथा
पूर्वं मानसमुन्नयेत्तदपरं शिल्प्युत्तमः शातधीः ॥६२॥
इति मयमते वास्तुशास्त्रे सन्धिकर्मविधानो
नाम सप्तदशोऽध्यायः
अच्छे स्थपति को छोटा, किन्तु गहरा छिद्र बनाना चाहिये। कील काष्ठ, प्रस्तर
या गजदन्त निर्मित से होना चाहिये। पकी ईंट में छिद्र छोटा एवं कम गहरा होना
चाहिये। इसके छिद्र को सुधा के प्रयोग से पतला एवं उचित घेरे वाला बनाना चाहिये।
जिनका यहाँ वर्णन नहीं किया गया है, उनके योग को बुद्धिमान स्थपति को अपनी
बुद्धि द्वारा युक्तिपूर्वक करना चाहिये।।६२।।
व्याख्यात्मक टिप्पणी
१. सन्धि ( श्लोक २ )
मानसार ( १७.२ ) में काष्ठखण्डों में की जाने वाली सन्धियों का वर्णन इस
प्रकार किया गया है—
वृक्षमूले बलं युक्तं वृक्षाग्रे बलहीनकम्।
तस्मात्तु बन्धयेत्सर्वं दारुसम्मूलतः सुधीः ।।

१९२ मयमतम्
२. सन्धिभेद ( श्लोक ३ )
सन्धिभेदों का वर्णन विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( ६१ अ. ) में इस प्रकार प्राप्त होता
है—
करनिम्नं भूमिनिम्नं कुम्भनिम्नं क्वचिन्मतम्।।
खड्गनिम्नं महानिम्नं निम्नं नानाविधं क्वचित्।
कल्पनाहं प्रकर्तव्यं शैलदार्विष्टिकास्वपि।। (१३-१४)
३. सन्धिविधि ( श्लोक ४-९ )
सन्धिविधि का वर्णन वास्तुविद्या ( ८ अ. ) में इस प्रकार प्राप्त होता है—
सन्धिकर्माभिधानानि संक्षिप्य प्रवदाम्यहम्।
ह्रस्वद्रव्यं तथा वामे दीर्घद्रव्यं तु दक्षिणे।।
यथाक्रमं प्रयोक्तव्यं कीलपार्श्वं तु दक्षिणे।
सन्धिखण्डस्य दैर्घ्यं तु स्वव्याससममुच्यते।।
अर्ध वा पादहीनं वा योग्यायोग्यं च कारयेत्।
महीरुहाङ्घ्रिसन्धौ च खण्डं कार्यं घनांशकैः।।
एकेनापि तथा द्वाभ्यां त्रितयेनापि दृश्यते।
स्तम्भाग्रात् तद्द्रुतिस्तम्भादाधारेऽधः शिखान्तरी।। (३८-४१)
४. मेषयुद्ध सन्धि ( श्लोक २९ )
(क) इस सन्धि का प्रयोग वंश या अग्रधानी के मूल शिखा से कूट को जोड़ने
में किया जाता है। इसे कूट के पार्श्व रन्ध्र से जोड़ा जाता है—
वंशाग्रमूलशिखया यदि कूटपार्श्वरन्ध्रप्रवेशकृतसन्धिरिहाजयुद्धः।
आधारभेदकृतसन्धिवशेन कूटस्याधोगतं भवति मूलमिहापि नित्यम्।।
( मनुष्यालयचन्द्रिका-६.१३ )
(ख) मानसार ( १७ अ. ) में मेषयुद्ध का वर्णन प्राप्त होता है। शिलास्तम्भों में
इसका प्रयोग करना चाहिये—
शिलास्तम्भं तु सर्वेषां मेषयुद्धं प्रकल्पयेत्। (१७.५७)
मेषयुद्ध सन्धि में चारो दिशाओं में चार शूल बने रहते हैं—
मेषयुद्धे चतुर्दिक्षु चतुःशूलं तु संयुतम्। (१७.५४)
इसमें कर्ण कोने के नीचे एवं मध्य भाग में छिद्र बनाना चाहिये—
अधः कर्ण मध्ये छिद्रं मेषयुद्धं हि योजयेत्। (१७.४७)

अथाष्टादशोऽध्यायः
( प्रासादोर्ध्ववर्गाः )
गलभूषणमेतेषां शिरश्छन्दमथाधुना ।
लुपामानं च वक्ष्येऽहं स्तूपिकालक्षणं क्रमात् ॥१॥
प्रासाद के ऊर्द्ध वर्ग—अब मैं ( मय ऋषि ) इन ( प्रासादों ) के गले के अलङ्करणों
का, शीर्ष-भाग के आच्छादन का, लुपा के प्रमाण का एवं स्तूपिका के लक्षण का
क्रमशः वर्णन करता हूँ।।१।।
✺ गललक्षणम् ✺
वेदिकाद्विगुणोत्सेधं कन्धरं शिखरोदयम् ।
तद्द्वित्रिगुणतुङ्गं वा वेदिकोच्चं तु वा गलम् ॥२॥
गल का लक्षण—भवन का गल वेदिका की ऊँचाई का दुगुना ऊँचा होना
चाहिये। उसके ऊपर शिखरोदय गल का दुगुना अथव तीन गुना ऊँचा होना चाहिये।
अथवा गल की ऊँचाई वेदिका की ऊँचाई के बराबर होनी चाहिये।।२।।
गर्भभित्तित्रिभागैकमङ्घ्रेर्वेद्यङ्घ्रिवेशनम् ।
ग्रीवावेशं ततस्तावदेवं दैवे च मानवे ॥३॥
गर्भ-भित्ति ( कक्ष की दीवार ) के तीन भाग के एक भाग के बराबर अङ्घ्रि ( पाद,
चरण, स्तम्भ ) की वेदी में अङ्घ्रि का निवेश होना चाहिये। इसी प्रकार भित्ति के ऊपरी
भाग में ग्रीवा ( कण्ठ, गल ) का निवेश होना चाहिये। यह विधान देवालय एवं
मनुष्यगृह—दोनों के लिये कहा गया है।।३।।
पञ्चांशे भित्तिविष्कम्भे भागो वेद्यङ्घ्रिवेशनम् ।
ग्रीवावेशं ततस्तावच्चतुरंशे तथैव च ॥४॥
( अथवा ) भित्ति-विष्कम्भ के पाँचवें भाग के बराबर पाद-निवेश की वेदिका एवं
ग्रीवावेश ( कण्ठ-निवेश ) होता है। इसी प्रकार ये दोनों भित्ति-विष्कम्भ के चौथे भाग
के बराबर भी हो सकते हैं।।४।।
एवं त्रिविधनीत्या तु ग्रीवा साध्या प्रयत्नतः ।
उत्तरं वाजनं चैव मुष्टिबन्धं मृणालिका ॥५॥
मय०-१३

१९४ मयमतम्
दण्डिकावलयं चैव गलभूषणमिष्यते ।
मुष्टिबन्धोपरि क्षिप्तव्यालनाटकमूर्ध्वतः ॥६॥
दण्डिका च विधातव्या तदूर्ध्वे शिखरक्रिया ।
इस प्रकार इन तीन प्रकारों से ( किसी एक नियम से आवश्यकतानुसार )
प्रयत्नपूर्वक कण्ठ निर्मित करना चाहिये। उत्तरवाजन, मुष्टिबन्ध, मृणालिका, दण्डिका
एवं वलय गल के भूषण होते हैं। मुष्टिबन्ध के ऊपर व्याल एवं नाट्य-दृश्य ऊपर
से ( नीचे तक ) होते हैं। दण्डिका का निर्माण ( इस प्रकार ) होना चाहिये ( जिसमे )
उसके ऊपर शिखर-निर्माण हो सके॥५-६॥
✵ शिखरभेदाः ✵
शिखरोत्सेधमात्तोच्चा भागमानवशेन वा ॥७॥
दण्डिकावधिविस्तारं पञ्चांशं द्वयंशमानकम् ।
सप्तनन्दशिवांशे तु त्रयोदशतिथौ तथा ॥८॥
सप्तदशांशके बन्ध्वेदभूतषडंशकम् ।
सप्ताष्टांशं तु तारार्धमित्यष्टौ शिखरोदयाः ॥९॥
पाञ्चालं चापि वैदेहं मागधं चापि कौरवम् ।
कौसलं शौरसेनं च गान्धारावन्तिकं तथा ॥१०॥
शिखर के भेद—शिखर की ऊँचाई वर्णित भाग के मान के अनुसार होती है।
अथवा दण्डिका के मध्य के विस्तार के अनुसार रखी जाती है। इसका माप इस
प्रकार होता है—पाँच भाग में दो भाग, सात भाग में तीन भाग, नौ भाग में चार भाग,
ग्यारह भाग में पाँच भाग, तेरह भाग में छः भाग, पन्द्रह भाग में सात भाग, सत्रह
भाग में आठ भाग अथवा दण्डिका की मोटाई का आधा भाग। इस प्रकार शिखर के
आठ भेद बनते हैं, जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—पाञ्चाल, वैदेह, मागध, कौरव,
कौसल, शौरसेन, गान्धार एवं आवन्तिक। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है—
१. पाँच भाग में दो भाग—पाञ्चाल
२. सात भाग में तीन भाग—वैदेह
३. नौ भाग में चार भाग—मागध
४. ग्यारह भाग में पाँच भाग—कौरव
५. तेरह भाग में छः भाग—कौसल
६. पन्द्रह भाग में सात भाग—शौरसेन
७. सत्रह भाग में आठ भाग—गान्धार
८. दण्डिका मोटाई का आधा भाग—आवन्तिक ॥७-१०॥

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः १९५
यथाक्रमेण नामानि ज्ञातव्यानि विचक्षणैः ।
जघनाद् बहिरेवैते एकाः सर्वे समाहिताः ।।११।।
सर्वे ते तैतलानां स्युरर्धादधस्तु मानुषम् ।
ज्ञानियों द्वारा इनका ( पाञ्चाल आदि का ) नाम क्रमशः जानना चाहिये। ये सभी
जङ्घा के बाहर निकले होते हैं। इन शिखरों में नीचे वाला ( आवन्तिक ) शिखर मनुष्य
के आवास के योग्य एवं शेष सभी देवालय के योग्य होते हैं।।११।।
तद्दशाद्यासप्तदशभागादेकांशवर्धनात् ।।१२।।
आवन्तिका प्रभृत्यूर्ध्वमष्टाविष्टलुपोदयाः ।
व्यामिश्रं च कलिङ्गं च तथा कौशिकमेव च ।।१३।।
वराटं द्राविडं चैव बर्बरं कोल्लकं पुनः ।
तथा शौण्डिकमित्येते व्यामिश्रादिलुपोदयाः ।।१४।।
इन आवन्तिक आदि शिखरों पर लुपा-संयोजन के लिये दश भाग से प्रारम्भ कर
एक-एक अंश बढ़ाते हुये सत्रह भाग पर्यन्त आठ प्रकार की ऊँचाइयाँ प्राप्त होती हैं।
इनके नाम इस प्रकार हैं—व्यामिश्र, कलिङ्ग, कौशिक, वराट, द्राविड, बर्बर,
कोल्लक तथा शौण्डिक।।१२-१४।।
✺ शिखराकृतिः ✺
देवानां प्रथितान्येव पाषण्ड्याश्रमिणामपि ।
चतुरस्रं च वृत्तं च षडस्राष्टास्रमेव च ।।१५।।
द्वादशास्रं द्विरष्टास्रं पद्मकुङ्मलसन्निभम् ।
तथामलकपक्वाभं दीर्घवृत्तं च गोलकम् ।।१६।।
शिखर की आकृति—देवों एवं साधुओं-संन्यासियों का भवन के शिखरों के
आकार चौकोर, वृत्ताकर, षट्कोण, अष्टकोण, द्वादश कोण, षोडश कोण, पद्माकार,
पके आँवले के आकार का, लम्बी गोलाई के आकार का और गोलाकार होता है।
अष्टास्राद्यष्टधाराणि हर्म्यादीनां शिरांसि हि ।
षडाद्याषष्टिकर्णं च सम्मतं शिखराकृतिः ।।१७।।
हर्म्यों ( महलों ) के शिखर आठ कोण एवं आठ धाराओं वाले होते हैं; किन्तु
ये छः कोण से लेकर साठ कोणपर्यन्त हो सकते हैं।।१७।।
✺ स्थूपिकोत्सेधः ✺
तदुच्छ्रयचतुष्पञ्चभागं स्यात् पञ्चतुङ्गकम् ।
तत्समोच्चत्रिभागा वा तदूर्ध्वे स्थूपिकायतः ।।१८।।

१९६ मयमतम्
शिखर की ऊँचाई के चौथे या पाँचवें भाग के बराबर ऊँचा कमल होना चाहिये।
उसके ऊपर पद्म के बराबर अथवा उसके तीसरे भाग के बराबर लम्बी स्थूपिका
( स्तूपिका ) होती है।।१८।।
अल्पीयसी शिरोर्धा वा भागोच्चा वा त्रिभागिके ।
सङ्क्षेपात् स्थूपिकाभूषा ह्युपरिष्टात् प्रकाश्यते ।।१९।।
अत्यन्त छोटे भवन में स्थूपिका ( स्तूपिका ) का प्रमाण शिखर का आधा अथवा
तीसरे भाग के बराबर होना चाहिये। इस प्रकार संक्षेप में स्थूपिका के अलङ्करणों का
वर्णन ऊपर किया गया।।१९।।
✵ लुपासंख्या ✵
पञ्चाद्येकादशान्ताश्च चतुराद्या दशान्तकाः ।
चतुर्विधा लुपासंख्या देवेऽदेवे निकेतने ।।२०।।
देवों एवं मनुष्यों के भवन में चार प्रकार के लुपाओं ( लट्ठे, लकड़ी के पट्टे )
की संख्या होती है। यह पाँच से लेकर ग्यारह पर्यन्त ( पाँच, सात, नौ, ग्यारह )
अथवा चार से लेकर दस तक ( चार, छः, आठ, दश ) होती है।।२०।।
✵ पुष्करम् ✵
पूर्वोक्तं ह्यन्तरोच्चं तु व्यामिश्रं नाम पुष्करम् ।
ऊर्ध्वस्थान्यप्यधस्थानि पुष्कराण्यर्धमानतः ।।२१।।
पूर्व-वर्णित अन्तर की ऊँचाई व्यामिश्र नामक पुष्कर ( शिखर का एक भाग )
की है। ऊर्ध्व-स्थित एवं अधोभाग में स्थित पुष्कर का माप आधे प्रमाण से रखना
चाहिये।।२१।।
अर्धमारभ्य संवर्त्य पश्चादुक्तोच्चसीमयुक् ।
आरोहाण्यवरोहाणि गुह्यमेतदुदाहृतम् ।।२२।।
आधे प्रमाण से प्रारम्भ कर सबसे ऊँचे प्रमाण तक जाना चाहिये। इसके पश्चात्
वापस ( नीचे तक ) लौटना चाहिये। आरोह एवं अवरोह का यह गोपनीय क्रम इस
प्रकार वर्णित है।।२२।।
✵ लुपामानम् ✵
दण्डिकावधि तारार्धं चतुरस्त्रीकृतं समम् ।
कोष्णीषासनसीमाख्यसूत्रयुक्तं खलं नयेत् ।।२३।।
( दो ) दण्डिकाओं के मध्य की मोटाई ( चौड़ाई ) के आधे माप के बराबर एक

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः १९७
सम चतुर्भुज बनाना चाहिये। इस चतुर्भुज के चारो भुजाओं ( सूत्रों ) की संज्ञा क,
उष्णीष, आसन एवं सीम होती है॥२३॥
दण्डिकोत्तरबाहुल्यं सूत्रयेदासनादधः ।
आसने चतुरंशाद्याद्दशांशं बिन्दु विन्यसेत् ॥२४॥
आसन सूत्र के नीचे दण्डिका एवं उत्तर के बराबर सूत्र फैलाना चाहिये ( रेखा
बनानी चाहिये )। इसके पश्चात् आसनसूत्र पर चार से प्रारम्भ कर दश भागपर्यन्त
( चार, पाँच, छः, सात, आठ, नौ, दश ) बिन्दु चिह्नित करना चाहिये॥२४॥
कोष्णीषसन्धेस्तद्विन्दु सीमच्छायाोच्चमावहेत् ।
छायोच्चायतमानानि कमूलादासने न्यसेत् ॥२५॥
क सूत्र एवं उष्णीष सूत्र की सन्धि से उस बिन्दु को सीम की छाया ( शिखर का
एक भाग ) की ऊँचाई तक ले जाना चाहिये। छाया की ऊँचाई तक लम्बाई के मान
को क सूत्र के मूल से आसनसूत्र पर न्यस्त करना चाहिये॥२५॥
तान्येव दण्डिकादीनां पर्यन्तानि भवन्ति हि।
कोष्णीषसङ्गात् पर्यन्तबिन्द्वन्तं तल्लुपायतम् ॥२६॥
ये ही सूत्र दण्डिका आदि तक होते हैं। लुपाओं की लम्बाई क एवं उष्णीष सूत्र
के सन्धिस्थल से बिन्दु के अन्त तक होती है॥२६॥
तत्तत्पर्यन्तविस्तारं कसूत्रे विन्यसेत् पुनः।
स्वस्वकर्णगतच्छायामानैः सर्वान् विमानयेत् ॥२७॥
क सूत्र पर उनका ( लुपाओं का ) विस्तार पुनः विन्यस्त करना चाहिये ( अर्थात्
लुपायें कहाँ-कहाँ लगनी हैं—इसे चिह्नित करना चाहिये )। सभी को अपने कर्ण से
छायामान तक मापना चाहिये॥२७॥
तत्तत्पर्यन्तसूत्राणि मल्लपर्यन्तसूत्रवत् ।
एवं मध्यलुपासीम्नो वर्धन्ते वर्णसंख्यया ॥२८॥
वे पर्यन्त सूत्र मल्ल ( शिखर के एक भाग ) तक सूत्र की भाँति होते हैं। इस
प्रकार मध्य में स्थित लुपा अन्य लुपाओं ( पार्श्व में स्थित लुपा ) की संख्या के अनुसार
बढ़ सकते हैं॥२८॥
एवमावर्त्य तत्पश्चादारोहैर्वावरोहा च।
तत्तत्पुष्करसञ्जातं तत्तन्मल्लायतं विदुः ॥२९॥
इस प्रकार ( लुपा-संयोजन ) करने से तथा आरोह एवं अवरोह से पुष्कर निर्मित