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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 395 में से

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अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः १९५
यथाक्रमेण नामानि ज्ञातव्यानि विचक्षणैः ।
जघनाद् बहिरेवैते एकाः सर्वे समाहिताः ।।११।।
सर्वे ते तैतलानां स्युरर्धादधस्तु मानुषम् ।
ज्ञानियों द्वारा इनका ( पाञ्चाल आदि का ) नाम क्रमशः जानना चाहिये। ये सभी
जङ्घा के बाहर निकले होते हैं। इन शिखरों में नीचे वाला ( आवन्तिक ) शिखर मनुष्य
के आवास के योग्य एवं शेष सभी देवालय के योग्य होते हैं।।११।।
तद्दशाद्यासप्तदशभागादेकांशवर्धनात् ।।१२।।
आवन्तिका प्रभृत्यूर्ध्वमष्टाविष्टलुपोदयाः ।
व्यामिश्रं च कलिङ्गं च तथा कौशिकमेव च ।।१३।।
वराटं द्राविडं चैव बर्बरं कोल्लकं पुनः ।
तथा शौण्डिकमित्येते व्यामिश्रादिलुपोदयाः ।।१४।।
इन आवन्तिक आदि शिखरों पर लुपा-संयोजन के लिये दश भाग से प्रारम्भ कर
एक-एक अंश बढ़ाते हुये सत्रह भाग पर्यन्त आठ प्रकार की ऊँचाइयाँ प्राप्त होती हैं।
इनके नाम इस प्रकार हैं—व्यामिश्र, कलिङ्ग, कौशिक, वराट, द्राविड, बर्बर,
कोल्लक तथा शौण्डिक।।१२-१४।।
✺ शिखराकृतिः ✺
देवानां प्रथितान्येव पाषण्ड्याश्रमिणामपि ।
चतुरस्रं च वृत्तं च षडस्राष्टास्रमेव च ।।१५।।
द्वादशास्रं द्विरष्टास्रं पद्मकुङ्मलसन्निभम् ।
तथामलकपक्वाभं दीर्घवृत्तं च गोलकम् ।।१६।।
शिखर की आकृति—देवों एवं साधुओं-संन्यासियों का भवन के शिखरों के
आकार चौकोर, वृत्ताकर, षट्कोण, अष्टकोण, द्वादश कोण, षोडश कोण, पद्माकार,
पके आँवले के आकार का, लम्बी गोलाई के आकार का और गोलाकार होता है।
अष्टास्राद्यष्टधाराणि हर्म्यादीनां शिरांसि हि ।
षडाद्याषष्टिकर्णं च सम्मतं शिखराकृतिः ।।१७।।
हर्म्यों ( महलों ) के शिखर आठ कोण एवं आठ धाराओं वाले होते हैं; किन्तु
ये छः कोण से लेकर साठ कोणपर्यन्त हो सकते हैं।।१७।।
✺ स्थूपिकोत्सेधः ✺
तदुच्छ्रयचतुष्पञ्चभागं स्यात् पञ्चतुङ्गकम् ।
तत्समोच्चत्रिभागा वा तदूर्ध्वे स्थूपिकायतः ।।१८।।