मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९२ मयमतम्
२. सन्धिभेद ( श्लोक ३ )
सन्धिभेदों का वर्णन विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( ६१ अ. ) में इस प्रकार प्राप्त होता
है—
करनिम्नं भूमिनिम्नं कुम्भनिम्नं क्वचिन्मतम्।।
खड्गनिम्नं महानिम्नं निम्नं नानाविधं क्वचित्।
कल्पनाहं प्रकर्तव्यं शैलदार्विष्टिकास्वपि।। (१३-१४)
३. सन्धिविधि ( श्लोक ४-९ )
सन्धिविधि का वर्णन वास्तुविद्या ( ८ अ. ) में इस प्रकार प्राप्त होता है—
सन्धिकर्माभिधानानि संक्षिप्य प्रवदाम्यहम्।
ह्रस्वद्रव्यं तथा वामे दीर्घद्रव्यं तु दक्षिणे।।
यथाक्रमं प्रयोक्तव्यं कीलपार्श्वं तु दक्षिणे।
सन्धिखण्डस्य दैर्घ्यं तु स्वव्याससममुच्यते।।
अर्ध वा पादहीनं वा योग्यायोग्यं च कारयेत्।
महीरुहाङ्घ्रिसन्धौ च खण्डं कार्यं घनांशकैः।।
एकेनापि तथा द्वाभ्यां त्रितयेनापि दृश्यते।
स्तम्भाग्रात् तद्द्रुतिस्तम्भादाधारेऽधः शिखान्तरी।। (३८-४१)
४. मेषयुद्ध सन्धि ( श्लोक २९ )
(क) इस सन्धि का प्रयोग वंश या अग्रधानी के मूल शिखा से कूट को जोड़ने
में किया जाता है। इसे कूट के पार्श्व रन्ध्र से जोड़ा जाता है—
वंशाग्रमूलशिखया यदि कूटपार्श्वरन्ध्रप्रवेशकृतसन्धिरिहाजयुद्धः।
आधारभेदकृतसन्धिवशेन कूटस्याधोगतं भवति मूलमिहापि नित्यम्।।
( मनुष्यालयचन्द्रिका-६.१३ )
(ख) मानसार ( १७ अ. ) में मेषयुद्ध का वर्णन प्राप्त होता है। शिलास्तम्भों में
इसका प्रयोग करना चाहिये—
शिलास्तम्भं तु सर्वेषां मेषयुद्धं प्रकल्पयेत्। (१७.५७)
मेषयुद्ध सन्धि में चारो दिशाओं में चार शूल बने रहते हैं—
मेषयुद्धे चतुर्दिक्षु चतुःशूलं तु संयुतम्। (१७.५४)
इसमें कर्ण कोने के नीचे एवं मध्य भाग में छिद्र बनाना चाहिये—
अधः कर्ण मध्ये छिद्रं मेषयुद्धं हि योजयेत्। (१७.४७)