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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 395 में से

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१८८ मयमतम्
का प्रयोग करना चाहिये। इसके विपरीत सन्धि करने पर विपत्ति आती है।।४२।।
अन्तर्मूलं बहिश्चाग्रं पार्श्वद्रव्येषु योजयेत्।
अन्तरग्रं बहिर्मूलं स्वामिनश्च विनाशनम् ॥४३॥
(सन्धि करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि) मूल भाग भीतर की
ओर एवं अग्र भाग बाहर की ओर रहे। यदि अग्र भाग भीतर एवं मूल भाग बाहर रहता
है तो वह स्वामी के विनाश का कारण बनता है।।४३।।
✺ विद्धं कीलं च ✺
शिखा दन्तं च शूलं च विद्धं पर्यायमीरितम्।
शल्यं च शङ्कुराणिश्च कीलं पर्यायमुच्यते ॥४४॥
अष्टसप्तकषडंशकेऽङ्घ्रिके भागतारमथ शूलकीलयोः।
विद्ध एवं कील—शिखा, दन्त, शूल एवं विद्ध—ये सभी (चूली, चूल के)
पर्याय हैं तथा शल्य, शङ्कु, आणि तथा कील—ये सभी शब्द (कील के) पर्याय हैं।
शूल एवं कील का माप स्तम्भ की चौड़ाई का आठ, सात या छठवें भाग के बराबर
होता है।।४४।।
✺ सन्धिदोषाः ✺
कीलपार्श्वमथ पादमध्यमं योजयेत् समुदग्रबुद्धिमान् ॥४५॥
सन्धि के दोष—बुद्धिमान (स्थपति) को चाहिये कि कील का पार्श्व स्तम्भ के
मध्य में लगाये।।४५।।
स्तम्भान्तं दन्तान्तकं चेद्विनाशं
दन्तान्तं चेत् स्तम्भमध्यं तदेव।
स्तम्भान्तं चेत् सन्धिमध्यं सरोगं
सन्धेर्मध्यं पादमध्यं क्षयं स्यात् ॥४६॥
स्तम्भ का अन्तिम भाग एवं दन्त (शिखा, चूल) का अन्तिम भाग यदि आपस
में जुड़ें तो विनाश के कारण बनते हैं। इसी प्रकार यदि दन्त का अन्तिम भाग स्तम्भ
के मध्य में पड़े तो भी वही परिणाम होता है। यदि स्तम्भ का अन्तिम भाग सन्धि के
मध्य पड़े तो वह रोगकारक होता है तथा सन्धि का मध्य एवं पाद का मध्य यदि एक
साथ हो तो वह क्षय का कारण होता है।।४६।।
दिग्विदिग्द्वारदेवांशं सर्वं त्यक्त्वा प्रयोजयेत्।
अर्कार्किवरुणेन्दूनां स्थानं दिगिति कीर्तितम् ॥४७॥