मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ सप्तदशोऽध्यायः
( सन्धकर्मविधानम् )
पार्श्वगस्थितशयितद्रव्याणां सन्धिरुच्यते ।
एकस्मिन् वस्तुनि द्रव्यैर्बहुभिश्च निघट्टनात् ॥१॥
दुर्बलत्वाद् द्रुमाग्राणामबले बलवर्धनात् ।
सन्धकर्म प्रशस्तं स्यात् सजातीयैर्वरद्रुमैः ॥२॥
सन्धिकार्य का विधान—पार्श्व में खड़े एवं लेटे ( ऊर्ध्वाधर एवं क्षैतिज
स्थिति ) पदार्थों की सन्धि होती है। एक वस्तु ( के निर्माण ) में बहुत वस्तुओं के
संयोग से, वृक्ष के अग्र भाग ( के काष्ठों ) की दुर्बलता के कारण, दुर्बल के बलवृद्धि
के कारण सन्धकर्म प्रशस्त होता है। समान जाति वाले वृक्षों ( कोष्ठों ) का सन्धकर्म
प्रशस्त होता है।।१-२।।
✺ सन्धिभेदाः ✺
मल्ललीलं तथा ब्रह्मराजं वै वेणुपर्वकम् ।
पूकपर्वं देवसन्ध्दिण्डिका षड्विधाः स्मृता ॥३॥
सन्धि के भेद—सन्धियाँ छः प्रकार की होती हैं—मल्ललील, ब्रह्मराज, वेणु-
पर्वक, पूकपर्व, देवसन्धि एवं दण्डिका।।३।।
✺ सन्धिविधिः ✺
चतुर्दिक्षु बहिः स्थित्वा निरीक्ष्य स्थपतिर्गृहम् ।
दक्षिणादक्षिणे दीर्घादीर्घाभ्यां सन्धयेत् क्रमात् ॥४॥
जोड़ने की विधि—स्थपति घर के बाहर खड़े होकर चारो दिशाओं से उसका
निरीक्षण करे। तत्पश्चात् दक्षिण को उत्तर से एवं दीर्घ ( लम्बाई ) को अदीर्घ ( छोटी
लम्बाई ) से क्रमशः जोड़े।।४।।
मध्ये च दक्षिणे चैव यः सन्धिं कर्तुमीहते ।
मध्येऽतिदीर्घं युञ्जीयाद् दीर्घमल्पं च पूर्ववत् ॥५॥
यदि मध्य एवं दक्षिण में सन्धि करना चाहते हों तो मध्य के अति दीर्घ को पूर्व
की भाँति छोटे दीर्घ से जोड़ना चाहिये।।५।।